आज की कविता
दृष्टी
खुली आँखों से नहीं दिखता जो
दिखता वह
मन की दृष्टि से
उगते सूर्य का धरती को वरदान
बादलों के आँचल से
शर्माता सा चाँद
गुदगुदाते फूल और
छू लेने पर उनकी
दोस्ती भरी मुस्कान
हवा में फैले प्रकृति के गीत
नदी का प्रवाह और
प्रवाह में बहता संगीत
स्वर्ग सा पाता हूँ अपने आस-पास
शांत मन की दृष्टि से
नेत्रों की धवल ज्योति सी
शांत मन की निर्मल दृष्टि ...
-चंदर धींगरा
दृष्टी
खुली आँखों से नहीं दिखता जो
दिखता वह
मन की दृष्टि से
उगते सूर्य का धरती को वरदान
बादलों के आँचल से
शर्माता सा चाँद
गुदगुदाते फूल और
छू लेने पर उनकी
दोस्ती भरी मुस्कान
हवा में फैले प्रकृति के गीत
नदी का प्रवाह और
प्रवाह में बहता संगीत
स्वर्ग सा पाता हूँ अपने आस-पास
शांत मन की दृष्टि से
नेत्रों की धवल ज्योति सी
शांत मन की निर्मल दृष्टि ...
-चंदर धींगरा
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