Chander Dhingra's Blog

Sunday, August 8, 2010

Drishti

आज की कविता

दृष्टी 

खुली आँखों से नहीं दिखता जो
दिखता वह
मन की दृष्टि से

उगते सूर्य का धरती को वरदान
बादलों के आँचल  से
शर्माता सा चाँद
गुदगुदाते फूल और
छू लेने पर उनकी
दोस्ती भरी मुस्कान
हवा में फैले प्रकृति के गीत
नदी का प्रवाह और
प्रवाह में बहता संगीत

स्वर्ग सा पाता हूँ अपने आस-पास
शांत मन की दृष्टि से
नेत्रों की धवल ज्योति सी
शांत मन की निर्मल दृष्टि ...
                                       -चंदर धींगरा 


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