Chander Dhingra's Blog

Friday, March 6, 2020

' टू स्टेट्स - मेरी कहानी ' ' Two States - My Story ' - 3

                                                           ' टू स्टेट्स - मेरी कहानी '  
' Two States - My Story ' 
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चन्दर धींगरा 

 इस कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, आगे बढ़ते हैं। 

            ( ३ )   अगले दिन से एक नयी दिनचर्या आरम्भ हो गयी। मैं काफी जल्दी उठ गया। अच्छे से तैयार हो गया और अपने पेपर-फाइल आदि ठीक से रख लिए। सुबह के नाश्ते की मुझे कुछ जानकारी न थी। मैं अपने कमरे में ही बैठा रहा। बाहर झाँकने की कोशिश की तो कुछ समझ नहीं आया। एक बार फिर घड़ी में देखा। अभी साढ़े सात ही बजे थे। कुछ क्षण बाद पिंकी और लवली दोनों मेरे कमरे में आई। वे चाय लेकर आई थी। मुझे तैयार देख वे हैरान हो गयी, 'अरे ! आप तो नहा-धोकर रेडी हैं ..'  पिंकी ने आश्चर्य जताते हुए कहा। लवली बेमतलब हंसने लगी। मुझे समझ नहीं आया कि वह क्यों हंसी ?  वे दोनों जॉगिंग या जिम से होकर आई थी और इसी तरह की ड्रेस में थी और स्पोर्ट्स शू पहने थे। चाय रख कर वे चली गयी। चाय, सीधे-सीधे कप या गिलास में न थी। पूरी ट्रे थी। चाय, दूध और चीनी। एक छोटा सुन्दर सा बॉक्स भी था जिसके दो भाग थे और दोनों में अलग तरह के बिस्कुट रखे थे। मुझे अपने घर की चाय याद आ गयी। सीधे-सीधे कप और प्लेट और उसी प्लेट में किनारे पर रखे दो बिस्कुट। मैंने सोचा ये लोग कितने ढंग से सब कुछ करते हैं। हम बंगाली लोग ऐसा क्यों नहीं करते ? फिर मुझे लगा, हमें पढने- लिखने का शौक होता है। ये लोग उधर ध्यान नहीं देते, ये दुनियादारी वाली बातों में ध्यान देते हैं। वैसे भी चाय को इस तरह से पेश करना तो अपनी शानोशौकत दिखाने जैसा है। चाय का असली मज़ा तो वैसे पीने में है जैसे बंगाल में पी जाती है। नहीं-नहीं चाय तो ऐसे ही पीनी चाहिए। अंग्रेज लोग भी तो ऐसे ही पीते हैं। मेरा दिमाग तर्क में जुटा हुआ था कि अंकल आ गए। उन्होंने कहा कि वे मुझे आज मेरे सेंटर तक छोड़ आयेंगे। मुझे लगा कि ये कुछ ज्यादा ही हो रहा था। मैं इन लोगों के लिए बोझ बनता जा रहा हूँ। मेरा अपने गेस्ट हाउस में शिफ्ट हो जाना ही उचित होगा। इतना सब कुछ मेरे लिए एक तरह का मानसिक दबाव हो जायेगा और शायद घुटन भी। मैंने सोचा, बाद में इस विषय पर अंकल से बात करूँगा। अभी तो ट्रेनिंग शुरू की जाये। 

                    यहाँ के ट्रेनिंग सेंटर का माहौल कुछ अलग सा था। बैंक सम्बन्धी कार्यों की आधुनिक जानकारी एवं ट्रेनिंग हेतु इस केंद्र का नाम था। लंच में खाना- खाने साथियों के साथ कैंटीन गया। कैंटीन अच्छी थी परन्तु मुझे तो कुछ अलग सा और अलग तरीके से खाने की आदत थी। कैंटीन की साफ़-सफाई भी कोलकाता से अच्छी थी। ट्रेनिंग रूम्स, ऑफिस आदि भी वहां से ज्यादा अच्छे ढंग से व्यवस्थित थे। पहला दिन था, मिलने-मिलाने में ही बीत गया। इस ट्रेनिंग में 25 लोगों के नाम थे परन्तु वहां आये  केवल 18 थे। ये सब अलग-अलग शहरों से आये थे। एक जो इलाहबाद से था, बंगाली- तपन बनर्जी था। मैंने उससे परिचय करने का सोचा। लगा इससे दोस्ती ठीक रहेगी। परन्तु थोड़ी सी बात करने के बाद ही  मुझे लगने लगा कि वह सिर्फ नाम का बंगाली है। वह अच्छी हिंदी में बात कर रहा था। मैंने जब बांग्ला में कुछ पूछना चाहा तो वह हल्का सा उत्तर देकर चुप हो गया। फिर उसने कहा कि उसका जन्म और पढाई-लिखाई यूपी में ही हुई है इसलिए उसकी बंगाली अच्छी नहीं है। जब उसने बांग्ला की जगह बंगाली कहा तो मुझे अखरा।
कैंटीन में भी उसने चावल की जगह रोटी खायी। वह मुझे कुछ अनदेखा सा कर रहा था। मैं उससे बात करने का प्रयास करता तो वह संक्षेप में जवाब दे चुप हो जाता। कलकत्ता के अपने साथियों-दोस्तों से प्रवासी बंगालियों के बारे में अक्सर सुना था कि अपने ' देश ' से बाहर रह कर ये लोग ' बाहर वालों ' जैसे ही हो जाते  हैं। परन्तु क्या यह ' बाहर वाले जैसा हो जाना ' एक स्वाभाविक परिवर्तन नहीं है ?

            शाम को  वापिस लौटा तो आंटी ने स्वागत किया। लवली ने उत्सुक होते हुए पूछा, ' सो, होऊ वाज द डे ? ' मैंने सिर्फ ओके कहा। आंटी ने कुछ खाने-पीने के बारे में पूछा। लवली एक ट्रे में रखकर एक गिलास में पानी लेकर आई। साथ में एक खाली गिलास और दो कोल्ड ड्रिंक की बोतलें थी। उसने इशारे से पूछा, ' ओरंज
आर लेमन ? ' यह साधारण सा प्रश्न था। मुझे तुरंत एक किसी एक का नाम बता देना चाहिए था, परन्तु मेरे लिए इस तरह का  स्वागत नया सा था। हमारे घर में ऐसा नहीं होता था कि शाम को ऑफिस से लौटो और कोई अपने से कोल्ड ड्रिंक आदि ले आये। फिर यहाँ का माहौल भी हाई-फाई था। मैं आं ..ऊं .. में उलझ कर रह गया। पानी का गिलास उठाते हुए कहा, ' नहीं, सिर्फ पानी ही ठीक है '  आंटी अपने घर के कामों में व्यस्त थी। अंकल- और पिंकी शायद घर में नहीं थे। मैं संकोच करता हुआ सोफे में बैठा रहा। बगल में कई अंग्रेजी की पत्रिकाएँ रखी थी, एक को उठा कर उसमें झाँकने लगा। ये अंग्रेजी की एक फ़िल्मी पत्रिका थी। हिंदी फिल्मों के रंगीन चित्र और गप-शप। मैं पन्ने पलट रहा था। पढने को तो ऐसी पत्रिकाओं में कुछ होता नहीं और वैसे भी हिंदी फिल्में मुझे फिजूल लगती हैं। समझ नहीं आ रहा था कि कैसे उठूँ और अपने कमरे में जाऊं? मेरी निगाहें अपने काम में व्यस्त आंटी और लवली को देख रही थीं। मैंने सोचा, ये आधुनिक टाइप की बेटी कैसे माँ का हाथ बटा रही है और ये आंटी भी इस उम्र में कितनी चुस्त हैं। पत्रिका में अचानक मुझे एक बंगाली फिल्म निर्देशक के बारे में कुछ दिखा तो मैं रूक गया। ये बांग्ला फिल्मों के नामी निदेशक हैं। लिखा था कि वे शरतचन्द्र की एक कहानी पर हिंदी में फिल्म बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। जिस कहानी पर वे काम कर रहे हैं, वह शरतचंद्र की अत्यंत प्रसिद्द रचना है और इस पर बांग्ला में पहले ही फिल्म बन चुकी थी। मैं दो-तीन बार इस कहानी को पढ़ चुका हूँ. इसके एक नारी चरित्र ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। मुझे लगा कि हिंदी में इस तरह की कहानी पर क्या फिल्म बनेगी ? उस पात्र के साथ न्याय कर सके, ऐसी अभिनेत्री ही तो हिंदी फिल्म जगत में नहीं है और फिर ऐसी कहानियों में रुचि रखने वाले  हिंदी दर्शक ही कहाँ हैं ? मैं खुद में उलझा हुआ ही था कि आंटी एक प्लेट में कुछ फल लेकर आ गयी और सामने बैठ काटने लगी। उन्होंने स्नेह से कहा, ' कैसा लगा हमारा चंडीगढ़ ?' और एक छोटी प्लेट में सेब  काट कर मेरी ओर बढ़ा दिया। प्लेट में एक छोटा सा फोर्क रखा हुआ था। मैंने कहा, ' अच्छा है .. यह तो प्लांड सिटी है, अच्छा तो होना ही है.. '  ' हाँ, अच्छा तो है पर, सब कुछ अच्छा नहीं है, चंडीगढ़ महंगा बहुत है ', उन्होंने कहा और मेरी प्लेट में चीकू के कुछ टुकड़े रख दिए।  कुछ देर तक मैं यूँ ही शर्माता-झिझकता रहा। आंटी ने कहा कि शायद मैं थक गया होऊंगा और मुझे थोड़ा आराम कर लेना  चाहिए। मैं उठ कर अपने कमरे में आ गया। यहाँ बिस्तर पर बैठ मुझे सकून सा लगा। ये सब  कितना सत्कार कर रहे हैं, कितना ख्याल रख रहे हैं फिर भी मैं कहीं और जाने कि क्यों सोच रहा हूँ ? यदि कहीं और गया तो शायद ये लोग सोचें कि उनके आव-भगत  में कुछ त्रुटि रह गयी है ?

पिंकी शायद लौट आई थी। मुझे उसकी आवाज़ सुनाई दी। थोड़ी देर में वह मेरे  कमरे में आई। उसने भी वही सब पूछा। कैसा रहा दिन ?  कैसा है यहाँ का ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट ?, चंडीगढ़ कैसा लगा? आंटी की आवाज़ आई कि चाय तैयार है। वह उठकर जाने लगी और पूछा, ' आप लेंगे चाय ?' मेरे मुंह से फटाक से निकल गया, हाँ  ..  वह दो कप चाय लेकर आई। हम दोनों बात करने लगे। उसने बैंकिंग - ट्रेनिंग और बैंक के कार्य-प्रणाली के बारे में बात चलायी। ' ये ट्रेनिंग- व्रेनिंग सब एक ढकोसला है..  स्टाफ काम तो करता नहीं, फिर ट्रेनिंग देने का मतलब ? मैंने कहा, ' ट्रेनिंग नहीं होगी तो नए सिस्टम्स कैसे पता चलेंगे?  उसने तड़ाक से उत्तर दिया, ' काम करने का मोटीवेशन ही नहीं होगा तो नए सिस्टम्स क्या कर लेंगे? पहले मोटीवेट तो करो ..' मैंने कहा, ' नयी बातें नहीं पता होंगी तो कस्टमर को सर्विस कैसे देंगे?  पिंकी हंसने लगी, ' वाह .. कस्टमर क्या है, उसकी जरूरतें क्या है ? यह पता नहीं पर सर्विस के टूल्स नए-नए हैं .. ये तो दिखावे के लिए ही रखे रह जायेंगे न ? पहले अपने काम के प्रति 'आनेस्टी' और 'सिंसियरिटी' तो दिखाओ ?  मन में सोचा, ' यह पंजाबी लड़की मुझसे क्या तर्क  करेगी ?  परन्तु मैंने कहा, ' हाँ, ये बात तो कुछ हद तक ठीक ही है '  पिंकी थोड़ी संतुष्ट हुई, ' तो आप भी मानते हो कि सबसे पहले काम के प्रति समर्पण होना चाहिए फिर कुछ और...   एक बार फिर सहमति दिखाते हुए मैंने कहा, ' हाँ ये बात तो ठीक ह.. न मालूम मैं हाँ.. हाँ .. क्यों कर रहा था क्यों कि मेरे दिमाग के गहरे तल पर विरोध का भाव था। तो क्या मैं पिंकी के बात करने के अंदाज़ से प्रभावित हो रहा था ? नहीं, ऐसा भी नहीं था। इसमें प्रभावित होने की क्या बात थी ? क्या ये पिंकी का व्यक्तित्व था जो मुझे विवश कर रहा था ? वह एक खुले से व्यक्तित्व की लड़की थी। उसके सामने मैं स्वयं को कमजोर सा क्यों महसूस कर रहा था ?
( आगे अगले सप्ताह, यहीं पर, आज ही के दिन )

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