Chander Dhingra's Blog

Wednesday, March 18, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' - 7

                                                           ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 

   इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे...  
  
 ( ७ )   गेस्ट हाउस में आ जाने के बाद एक दिन माँ को फोन किया। वह चिंता करने लगी। उन्होंने कहा कि जोगेन्दर के घर पर था तो ठीक था। कुछ भी समस्या आ जाती तो वो लोग देख लेते। आखिर घर से बाहर दूसरी और नई जगह पर हूँ, तबीयत भी तो ख़राब हो सकती है। गेस्ट हाउस में न जाने खाना कैसा होगा ?  मुझे याद है उस चार मिनिट की टेलीफोन बातचीत में मैं ही सुन रहा था। माँ न जाने क्या क्या बोल रही थी। मुख्यतः वह मेरे प्रति चिंतित थी। एक बात और कही थी माँ ने कि मैं जोगेन्दर अंकल से और उसके परिवार से संपर्क बनाये रखूँ और ये भी कुछ भी परेशानी आ जाये तो उन्हें तुरंत बता दूं। मैंने  माँ को अपनी और से आश्वस्त किया कि उसे चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है। कुछ दिनों की ही तो बात है, सब ठीक ठाक गुजर जायेगा। मैंने उस दिन एक कॉल सेंटर से फ़ोन किया था। मोबाइल फ़ोन उन दिनों नए नए आये थे। महंगे थे और गिनेचुने लोगों के पास ही हुआ करते थे। उन दिनों तो इनकमिंग कॉल पर भी पैसे लगते थे। मुझे याद है उस टेलीफोन बूथ में एक तरफ सिखों के गुरु नानकदेव जी की फोटो लगी हुई थी और दूसरी तरफ भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की। मैं खुश था कि हमारे नेताजी बंगाल के बाहर भी सम्मान के साथ देखे जाते हैं। मैंने उस बूथ के युवा सरदार जी से पैमेंट करते समय, नेताजी की तस्वीर की ओर इशारा करते हुए पूछा था कि ये कौन हैं ? मुझे तो पता था परंतु मैं जानना चाहता था कि कहीं उसने ऐसे ही अनजाने में तो ये तस्वीर नहीं लगा रखी। परन्तु मैं जानना ही क्यों चाहता था ? मुझे विश्वास क्यों नहीं था कि इस युवा सरदार को अपने गुरुओं की तरह ही हमारे देश के महान लोगों पर भी श्रद्धा थी ?  खैर, उसने मुझे जो जवाब दिया वह मुझे विस्मित कर गया। उसने पंजाबी में कहा था परंतु मुझे समझ आ गया था। उसने जो कहा था वह कुछ यूँ था, ' अरे ! इन्हें कौन नहीं जानता ? इनके लिए ही तो हिंदुस्तान आज़ाद हुआ है ? इनकी फौज में तो हमारे दादा जी भी थे..'  मेरे नाना अक्सर आज़ाद हिन्द फौज और नेताजी की बातें बताया करते थे और ये भी कि कैसे देश के हर हिस्से से नौजवान नेताजी की फौज में जुड़ गए थे। पंजाब से सबसे ज्यादा लोग उनकी आज़ाद हिन्द फौज में आये थे। अचानक मुझे उस लड़के के चेहरे में उसके दादाजी दिखे। शायद ऐसे ही तो रहे होंगे इसके दादाजी जब  सेना की नौकरी छोड़ आज़ाद हिन्द फौज से आ जुड़े होंगे और देश पर शहीद हो गए होंगे। नेताजी को पूरे देश का सम्मान और प्यार मिला है। बंगाल में तो स्वाभाविक है परंतु पंजाब में उनके प्रति यह सम्मान नेताजी के एक ऐसे व्यक्तित्व के कारण है जो स्वाभिमानी है, अपने अधिकार के लिए मर-मिटना जानता है, जिसका चरित्र आध्यामिक है और जो दूर दृष्टि का स्वामी है। मेरे नाना अक्सर नेताजी, उनके अनेक कार्यों और कार्य पद्धति के बारे में बताया करते थे।  

माँ को फोन कर कमरे में आकर ऐसे ही लेट गया। जूता भी नहीं उतारा। हल्का सा सिरदर्द महसूस कर रहा था। लगा कहीं ज्वर न आ जाये। अक्सर मैंने देखा है कि मुझे जब कभी भी सिरदर्द और गले में खराश सी रहती है तो मुझे ज्वर आ जाता है। जोगेन्दर अंकल के घर की छवि सामने आ गयी। ऑन्टी-अंकल का स्नेह और लवली-पिंकी का दोस्ती भरा व्यवहार याद आ गया। मैं बड़ी बहन के बारे में सोचने लगा। पिंकी क्यों अपनी बहन सी नहीं है ? वह समझदार है। छोटी लवली तो नटखट है। दो बहनों में ऐसा ही होता है। मेरी चचेरी बुआ की दो लड़कियां भी ऐसी ही हैं। बड़ी को शास्त्रीय संगीत और गंभीर विषय की पुस्तकें पसंद हैं तो छोटी को आजकल का फ़िल्मी संगीत और पुस्तकों से तो उसका कोई नाता ही नहीं है।  कितनी समानता है मेरी बुआ की लड़कियों और जोगेन्दर अंकल की लड़कियो में। यही सब सोचते सोचते नींद आ गयी। कुछ समय बाद आँख खुली तो पाया कि अंधकार हो आया था। घड़ी  देखी तो रात के दस बजने को थे। शायद अब डिनर न मिले। देर हो चुकी थी। फिर भी मैं नीचे डाइनिंग हॉल में आया। कर्मचारी सब कुछ समेटने में जुटे थे। मैंने उन्हें बताया कि थोड़ी तबीयत ठीक न थी और आँख लग गयी थी। इंचार्ज ने कहा, 'आपको नौ बजे तक खा लेना चाहिए, चलो बैठो, खाना लगाता हूँ ..' मुझे उसका व्यवहार मित्रतापूर्ण लगा। खाना खा तो लिया पर अच्छा नहीं लगा। सब्जी, दाल, रोटी और सलाद। मुझे बचपन से ही नॉन वेजीटेरियन पसंद है। दिल को तसल्ली दी, ' गेस्ट हाउस में तो ऐसा ही होता है..'  नींद आने का नाम न ले रही थी। काफी समय तक इधर-उधर करवट पलटता रहा। देर रात कब आँख लग गयी पता ही न चला।

अगले दिन ट्रेनिंग सेंटर पहुंचा। सब सामान्य था। वही क्लास, वही नोट्स और वही मेरा मन जो कह रहा था, ' क्या होगा, ये सब सीखकर, बैंकों में तो जैसा चल रहा है वैसा ही चलेगा ..'  क्लास को शुरू हुए बीस-पच्चीस मिनिट ही हुए होंगे कि चपरासी आया यह बताने कि कोई मुझसे मिलने आया है। हैरान सा मैं बाहर आया तो देखा कि पिंकी वहां खड़ी थी। उसके हाथ में एक बड़ा बैग था।  ' हेल्लो ! ' उसने गरम जोशी से कहा। 'अरे तुम, अचानक ? ' मैंने पूछा 
 उसने हँसते हुए कहा, ' हाँ, हम तो ऐसे ही सरप्राइज देते हैं.. मम्मी ने कुछ भेजा है, फ्रेश बेड शीट्स हैं, टॉवल है..  उस दिन कहा था न.. '  पिंकी ने बैग मुझे थमा दिया। मैंने कहा कि ये सब तो है यहाँ, क्या जरुरत थी ?  पिंकी ने उसी जोश भरे अंदाज़ में कहा, ' जरुरत-वरुरत मैं नहीं जानती, मम्मी ने कहा तो मैं देने आ गयी और वैसे भी उस दिन मैंने देखा था, बेड शीट्स और टॉवल अच्छे नहीं थे यहाँ के..'  अच्छा, अब चलती हूँ, अभी समय नहीं है, तुम भी चलो और अच्छे बच्चों की तरह क्लास में जाओ और पढाई पर ध्यान दो.. ' वह हिंदी-अंग्रेजी में बात कर रही थी। हँसते -खिलखिलाते हुए पिंकी बाहर निकल गयी।  मैं अपनी जगह पर आकर बैठ गया।  मुझे लगा एक ताज़ी हवा का झोंका था जो मुझे छूकर निकल गया है। हाँ, हवा के झोंके जैसा ही था पिंकी का आना और फिर एक ताजगी की अनुभूति दे, निकल जाना। क्लास में क्या चल रहा था, मेरे दिलोदिमाग से गायब  हो चुका था। मन न जाने कहाँ बादल सा उड़ चला था। टेबल पर मेरी उँगलियाँ किसी संगीत की धुन उगाने में व्यस्त थी। एक रबिन्द्र संगीत था जो मुझे भीतर तक आनंदित कर रहा था।  

( आगे अगले सप्ताह, यहीं पर, आज ही के दिन ) 

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