Chander Dhingra's Blog

Wednesday, March 25, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' - 8


                                                            ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                              इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। 
                             आज गुरुवार है, अब आगे...    

( ८ )      मैं अपने आप के साथ कुछ समय बिताना चाहता था। मैंने क्लास से निकल जाने का सोचा। बच्चों का सा सिरदर्द का बहाना बनाया और ऊपर कमरे में आ गया। कुछ नहीं, बस यूँ ही बिस्तर पर पड़ा रहा। ये मन का कैसा बेचैनपना था ?  एक ओर मन अकेला खुद में बंधा रहना चाहता था और दूसरी ओर वह चाह रहा था कोई मिल आ बैठे और मेरे साथ कुछ अपनापन बांटे ?  मेरे साथ ऐसा होता ही रहता है। मन की ऐसी स्थिति में, मैं खुद को किसी पुस्तक के पन्नों में उलझा लेता हूँ। मैंने अपने सूटकेस से एक पुस्तक निकाली। ये चुनी हुई कविताओं का संकलन था। मैंने बीच से बिना देखे कोई एक पृष्ठ खोल लिया। कविता को पढ़ता चला गया। मुझे लगा ये कविता मेरे विचलित हो रहे मन के लिए ही थी। इस कविता में कवि ने ईश्वर का धन्यवाद किया है जिसने उसका परिचय अपरिचितों से करवाया है और इन अपरिचित चेहरों के बीच स्वयं ईश्वर उसे दर्शन दे रहे हैं। आज ऐसा ही तो मेरे साथ हो रहा था। अनजाना नगर, अपरिचित लोग फिर भी इनके बीच कहीं मुझे मैत्री और संतोष के ईश्वरीय दर्शन हो रहे थे। किसी सच्ची कविता के शब्दों में कितनी शक्ति होती है। मैंने कविता पढ़ पुस्तक को बंद कर दिया। मेरी ऊँगली पुस्तक के उसी पृष्ठ पर फंसी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि मेरा उस कविता से संपर्क बना हुआ है। मेरी बुआ की बड़ी लड़की इन्द्राणी ने एक बार मुझसे कहा था कि कोई पुस्तक पढ़ते वक्त यदि कुछ पंक्तियाँ या प्रसंग प्रभावित कर रहें हों तो वहां कुछ समय के लिए रुक जाना चाहिए और उन दो पृष्ठों के बीच ऊँगली रख आंखे बंद कर लेनी चाहिए या फिर पुस्तक के उन दो पृष्ठों कोअपने चेहरे पर रख, चुपचाप लेट जाना चाहिए। इन्द्राणी दीदी के अनुसार इस प्रकार पढ़ी जा रही पुस्तक, विशेषकर पुस्तक के उस भाग से पाठक का, एक प्रकार का आध्यात्मिक सम्बन्ध बन जाता है जो लम्बे समय तक साथ रहता है। मैंने उस समय इन्द्राणी दीदी की बात को हँसकर उड़ा दिया था। पुस्तक के किसी पृष्ठ विशेष के ऊपर ऊँगली रख लेने, आँखें बंद कर पुस्तक को चेहरे पर रख लेने से आपका उस पुस्तक, उस प्रसंग या उस पृष्ठ से हमेशा का सम्बन्ध ?  मैंने तब दीदी से हँसते हुए कहा था, ' ये आध्यात्मिक बात है या साहित्यिक या फिर कोई विज्ञान ? आज की कविता ने कुछ इसी तरह का प्रभाव मुझ पर छोड़ा था। इन्द्राणी दीदी की बात मुझे सत्य प्रतीत हो रही थी। मुझे लग रहा था कि वह कविता कहीं गहरे तक मेरे भीतर समा रही है। मेरा एक रिश्ता है इस कविता से। परन्तु मेरा तार्किक मन कहाँ रुकने वाला था ? उसने उलझना प्रारम्भ कर दिया। ये गुरुदेव की कविता है। उनकी कविताओं के भाव तो हमेशा ही गहरा प्रभाव छोड़ जाते हैं। इसमें अनहोनी क्या है अगर मैं भी इस तरह का प्रभाव महसूस कर रहा हूँ ? स्कूल के दिनों में मैंने इंग्लिश की एक डिबेट प्रतियोगिता में भाग लिया था। डिबेट का विषय टैगोर की कविताओं  से जुड़ा था। इस प्रतियोगिता में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। विषय की रूरेखा मेरे बाबा ने तैयार करवा दी थी। मैंने उस पर बहुत परिश्रम भी किया था। कुछ बातें माँ ने समझायी थी, कुछ नाना ने और परिणाम था कि मैं प्रथम आया था। नाना और बाबा बहुत खुश थे। बाबा ने मुझे 'गीतांजलि' का इंग्लिश अनुवाद और नाना ने सौ रुपये इनाम में दिए थे। माँ ने थपथपाया तो अवश्य था परन्तु कहा था इन स्कूल की खेलकूद और सामान्य ज्ञान की प्रतियोगिताओं में प्रथम आने से कुछ नहीं होगा। असली बात तो फाइनल परीक्षा में प्रथम आने की है। मेरी माँ हमेशा से ही चाहती थी कि मैं कक्षा में सदैव पहला स्थान लाऊँ, दूसरा नहीं। वह चाहती थी कि भविष्य में मैं एक सफल अर्थ शास्त्री बनूँ। अर्थ शास्त्री तो नहीं परन्तु आज में एक चार्टिड अकाउंटेंट अवश्य हूँ। सी. ए. की परीक्षा मैंने प्रथम प्रयास में ही और ऊँचे स्तर पर पास की थी। माँ को बहुत गर्व था। बाबा अवश्य कुछ निराश थे क्यों कि वह चाहते थे कि में अर्थ शास्त्र में आगे बढूं और फिर अमेरिका जाऊँ और इस विषय पर अनुसन्धान करूँ। स्कूल की प्रतियोगिता में पुरस्कार पाने पर मैं बहुत खुश था। उस समय मैंने सोचा था क्या केवल मेरी माँ ही ऐसा ही ऐसा सोचती है या सभी मायें कि स्कूल परीक्षा में प्रथम आना ही सही होता है ? बाद के वर्षों में मुझे लगने लगा कि बच्चों के प्रति माता-पिता की इस तरह की सोच उचित नहीं है। मैं आज इस डिबेट प्रतियोगिता में प्रथम आया, मेरे लिए बस यही काफी था। आगे स्कूल परीक्षा में क्या होगा, बाद में देखा जायेगा। उस दिन मैं बहुत उत्साहित था। बांग्ला साहित्य,संगीत और वाम विचारधारा की ओर मेरे रुझान का प्रारम्भ संभवत इस प्रथम से ही हुआ था। 
( आगे अगले सप्ताह, आज ही के दिन, यहीं पर .. ) 

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