' टू स्टेट्स - मेरी कहानी '
' Two States - My Story '
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चन्दर धींगरा
हर सप्ताह इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे...
( ५ ) कैंटीन से लौटकर आया तो मन में कुछ उबल सा रहा था। ये प्रवासी बंगाली पूरे बंगाल की प्रतिष्ठा को ख़राब कर रहे हैं। इनकी वजह से ही बंगाल से बाहर आकर हमें शर्मिंदगी सहनी पड़ती है। ये लोग बंगाल के बारे में ठीक से जानते ही नहीं। बंगाल की संस्कृति का इन्हें ज्ञान ही नहीं है। बाहर के लोग इन्हें ही बंगाल और बंगाली समझते हैं और गलत धारणा बना लेते हैं। फिर मन के किसी कोने से आवाज़ आई, ' इतनी भी गंभीर बात नहीं है .. ठीक है, अब छोड़ो भी इस बात को... लेकिन मेरा तार्किक दिमाग था जो जोर दे रहा था और छोड़ने वाला नहीं था। ये कौन था मेरे भीतर जिसे मैं हराना चाहता था ? मेरा ध्यान इधर-उधर भटक रहा था। अचानक मुझे कलकत्ता का अपना ऑफिस याद आ गया। मुझे याद आया वो शर्मा जिसे कलकत्ता और बंगाल की हर बात में खोट नज़र आती थी। वो राजस्थान का रहने वाला था और वहां से स्थानांतरित होकर आया था। बात-बात में वहां तो ऐसा होता है, इसे ऐसा क्यों नहीं कर सकते ? ऐसा करने से आसानी रहेगी.. जैसी बातें करता था। हम लोग उसे सिखाने की कोशिश करते कि भाई ये कलकत्ता है, तुम्हारा राजस्थान नहीं। ऑफिस में कभी कुछ खाने-पीने का कार्यक्रम बनता तो वह राजी तो हो जाता परन्तु यही कहता कि ' इस बार कुछ नया करो, वही मछली... वैसे वह यह भी कहता था कि मछली बहुत अच्छी मिलती है कलकत्ता में, पर कांटें बहुत होते हैं... वह समय से ऑफिस आता था और काम-धाम में भी ठीक था। परन्तु उसकी बातों में मुझे एक तरह का हल्कापन सा दिखता था। मुझे लगता उसे सिर्फ ऑफिस का काम ही आता है, साहित्य-संगीत आदि से उसका कुछ लेना देना नहीं। उसने अपनी टेबल को अच्छे से सुसज्जित कर लिया था। वह सुबह आकर अपनी मेज-कुर्सी को साफ़ करता क्यों कि जब वह आता तब तक ऑफिस के चपरासी आदि नहीं पहुंचे होते थे। वह शिकायत करता परन्तु कुछ होता नहीं था। सबको मालूम था कि इन नीचे ग्रेड वालों को समय से ऑफिस लाना, कोई सरल काम नहीं है। वो सीनियर मैनेजर से कहता कि सख्त होना चाहिए परन्तु फिर वह कहता, ' जब सीनियर स्टाफ खुद ही लेट आता है तो ये लोग क्यों समय से आयेंगे? उसे कोलकाता आये हुए दो साल हो चले थे। अब वह पहले सा आक्रामक नहीं था। वह समय से तो आता परन्तु देर से आने वालों को दोष देने से बचता। उसे लगने लगा था कि यहाँ ऐसा ही चलेगा। रोबी दा ने भी एक बार कहा था कि समय के साथ ये शर्मा भी ठीक हो जायेगा और इसे भी कलकत्ता का काम का तरीका समझ आ जायेगा। न जाने उस पर स्थानीय रंग चढ़ा था या नहीं परन्तु वह
अब इस प्रयास में लग गया था कि उसे शीघ्र से शीघ्र यहाँ से निकल जाना है। मेरी उससे कुछ नजदीकी हुई थी। वह मुझसे अपनी कई बातें करता। वह एक किराये के मकान में रहता था। वह बताता कि कैसे उसकी पत्नी और बेटा परेशान रहते हैं। कैसे आस-पड़ोस से कोई सहयोग नहीं मिलता और कैसे पत्नी दिनभर एक प्रकार के दिमागी बोझ से जूझती रहती है। मैं उसे चुपचाप सुनता पर मुझे लगता कि वह नाहक परेशान है। यह सब तो होता ही है ज़िन्दगी में। एक बार घर में मैंने माँ से उसकी बात कही तो उन्होंने ने कहा कि किसी भी नयी जगह में जाओ तो कुछ न कुछ परेशानी होती ही है। उन्होंने बताया था कि किस प्रकार मेरे बाबा को जब एक बाहर की पोस्टिंग मिली तो कैसे उन्हें संघर्ष करना पड़ा था। मैंने बाबा से भी बातों-बातों में शर्मा का जिक्र किया तो उन्होंने कहा कि वह राजस्थान के किसी छोटे शहर से आया है, कोलकाता जैसे महानगर में एडजस्ट होने में समय तो लगेगा ही। मुझे भी ऐसा ही लगा। शर्मा को भी मैंने ऐसा ही कहा। उसने कहा,' अब एडजस्ट कितना करें ? यहाँ का माहौल ही काम न करने का है। ट्रान्सफर मिल जाय उसी में भला है... मेरे भीतर ही छिपा एक दूसरा मैं मुझ से वार्तालाप करता ही चला जा रहा था। अचानक मैं जागा और अपने भीतर चल रहे इस वार्तालाप को रोकने का प्रयास करने लगा। मैं एक बार फिर से चंडीगढ़ में था और सोचने लगा कि यहाँ जोगेन्दर अंकल के घर पर बंध जाऊंगा। मैंने भीतर ही भीतर निश्चित किया कि आज अंकल से बात करूँगा और अपने गेस्ट हाउस में शिफ्ट कर जाऊंगा।
सुबह फिर पिछले दिन जैसी। कायदे से पेश किया गया चाय का पहला कप। नाश्ते के समय अंकल से मुलाकात हुई। उन्होंने गर्मजोशी के साथ हाल-चाल पूछा। कुछ इधर-उधर की बात के बाद मैंने कहा कि मैं गेस्ट हाउस में शिफ्ट कर जाऊँगा। उन्होंने चौंकते हुए प्रतिक्रिया दी, ' अरे ! यहाँ क्या तकलीफ है ? मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है, बस अन्य ट्रेनिंग में आये अन्य लोग भी वहीं हैं तो यही उचित रहेगा... उन्होंने कहा, ' अरे इतनी बड़ी कोठी है, तुम्हारे लिए अपना अलग से कमरा है, आराम से अपने घर में रहो, बहनजी ने तो हमें खास हिदायत दी है कि तुम्हें कोई तकलीफ न हो... मैंने कहा, ' नहीं, कोई परेशानी नहीं है, मैं आता-जाता रहूँगा और कुछ जरुरत होगी तो आप को बताऊंगा... आंटी ने जब मेरे गेस्ट हाउस जाने की बात सुनी तो उन्होंने भी वहीं उनके घर पर रह जाने और बड़ी कोठी की बात कही परन्तु बाद में कहा, ' जैसा तुम्हें ठीक लगे, वैसे घर तुम्हारा अपना ही है... शाम को गेस्ट हाउस में चले जाने का तय हुआ। रात के खाने के बाद सभी मिलकर मुझे गेस्ट हाउस छोड़ आये। गेस्ट हाउस के कमरे में कुछ देर रुके। गेस्ट हाउस किसी सरकारी गेस्ट हाउस जैसा ही था। लवली इधर-उधर की कमियां निकालती रही परन्तु पिंकी ने कहा सब कुछ ठीक ही तो है। उसका मानना था कि गेस्ट हाउस ऐसे ही होते हैं परन्तु, उसने ये भी कहा कि मुझे कुछ चीजें जैसे तोलिया, चादरें आदि अपने वाले ही उपयोग करने चाहिए क्यों कि गेस्ट हाउस वाले इन चीजों की सफाई -धुलाई आदि पर उसे भरोसा न था। आंटी ने भी इस बात में हाँ मिलाते हुए, घर से ये सब भिजवाने का कहा। पिंकी ने आगे बढ़ माँ की बात का समर्थन किया और अगले दिन ऑफिस जाते वक्त ये सब मुझे देते हुए जाने की बात की। लवली ने मुस्कुराते हुए, नटखट अंदाज़ में कहा, 'अरे वाह ! इतना काम तुम मेरा कभी नहीं करती ? पिंकी ने भी खास अंदाज़ में मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'आदमी-आदमी देखकर काम करना पड़ता है... दो बहनों का व्यवहार साधारणरूप में ऐसा ही होता है। एक बांग्ला कहानी में मैंने ऐसा देखा था। छोटी शरारती और चुलबुली और दायित्व बोध से दूर, बड़ी समझदार और माता-पिता तथा परिवार के प्रति दायित्व भरी। उस दिन पहली बार मैंने पिंकी को चोर नज़र से देखा था। वह मुझे सुन्दर लगी थी। अब तक तो वह सामान्य लड़की सी ही दिखती थी। वे लोग चले गए तो में तकिया टिका कर बिस्तर में सुस्ताने के मूड में बैठ गया। आँखें बंद की ही थी कि मुझे पिंकी की बात याद आ गयी कि गेस्ट हाउस के तकिये, तोलिये और चादरों की सफाई-धुलाई पर उसे भरोसा न था। एक झटके में मैंने तकिये को अपने से दूर किया। कुछ समय बाद में बाथरूम गया तो वहां भी ऐसा ही लगा और वहाँ झूल रहे तोलिये का इस्तेमाल नहीं किया। अपने सूटकेस से छोटा तोलिया निकाल लाया जो माँ ने मुझे रास्ते में व्यवहार करने के लिए दिया था। मैंने टीवी चालू किया और चॅनेल्स को ऊपर-नीचे करता रहा। कुछ देर बाद सोने के लिए बिस्तर पर लेट गया तो उस पर बिछी चादर कुछ परेशान करने लगी। मुझे पिंकी की बात याद हो आई। चादर अच्छी खासी साफ़-सुथरी थी फिर मुझे क्यों ठीक से धुली नहीं लग रही थी ?
( आगे अगले सप्ताह यहीं पर, आज ही के दिन .. )
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