' टू स्टेट्स - मेरी कहानी '
' Two States - My Story '
---
चन्दर धींगरा
इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, आगे बढ़ते हैं।
( ४ ) अंकल के साथ खाने की टेबल पर मुलाकात हुई। उन्होंने भी मेरा हाल-चाल पूछा, ' कोलकाता में मम्मी से बात हुई ? मेरे ना कहने पर आश्चर्य दिखाते हुए उन्होंने तुरंत पॉकेट से अपना मोबाइल निकाला और कहा ' नंबर क्या है ? ये उन दिनों की बात है जब मोबाइल बहुत सामान्य नहीं था और यह गिने चुने अमीर लोगों के पास ही हुआ करता था। मैंने कहा, ' सब ठीक है अंकल.. मैंने कल बात की थी.. एक-दो दिन बाद फिर कर लूँगा.. ' उन्होंने हँसते हुए कहा, ' ओय जी.. आज भी करो, कल भी कर लेना, परसों भी करना.. नंबर बताओ जी.. मैंने नंबर बताया । अंकल ने नंबर मिलाकर मोबाइल मुझे पकड़ा दिया। माँ ने फोन उठाया। मैंने उन्हें सब ठीक है कहा। मैं सबके सामने अधिक बात नहीं करना चाहता था। पर अंकल कुछ ऐसा इशारा कर रहे थे कि खुलकर बात करूं। मैंने सामान्य सी बात की। फिर अंकल ने मेरे हाथ से फोन ले लिया। उन्होंने गर्म जोशी से बात की कि मेरे बारे में चिंता बिलकुल न करें, कि मैं खाता-पीता बहुत कम हूँ और कि वे मुझे हट्टा-कट्टा बना कर वापिस भेजेंगे। एक बार फिर उन्होंने मेरे बारे में चिंता न करने का आश्वासन दिया। वे माँ को ' बहिन जी ' कहकर संबोधित कर रहे थे।
अगले दिन खुद से ऑफिस गया। अंकल तो छोड़ आने की बात कर रहे थे परन्तु यह ठीक नहीं था। पिंकी और मैं साथ-साथ घर से निकले। पिंकी अपने स्कूटर से जाती थी। अंकल ने कहा एक साथ निकल जाओ। एक मोड़ पर वह मुझे उतार देगी, वहां से पैदल का रास्ता है। पिंकी ने स्कूटर निकाला और मुझसे पूछा कि क्या मैं स्कूटर चलाऊंगा ? मेरे न कहने पर उसने कहा कि यहाँ का ट्रेफिक कोलकाता जैसा नहीं है। मैं आराम से चला सकता हूँ बल्कि उसे उसके ऑफिस में उतार कर अपने ट्रेनिंग सेण्टर तक ले जा सकता हूँ। मैं कहा, ' नहीं..नहीं.. नयी जगह है ' मैं झूठ बोल गया था। मुझे तो स्कूटर चलाना आता ही न था। कोलकाता में तो बस से ही आना-जाना होता है। मुझे लगा कि इस युग में स्कूटर चलाना नहीं आता कहूँगा तो विचित्र सा लगेगा ? मुझे वो दिन याद आये जब मैंने स्कूटर लेने की बात कही थी तो घर में कैसा विरोध हुआ था। माँ कहती कलकत्ता में स्कूटर चलाना कितना रिस्की है ? बाबा कहते घर के बाहर ही से तो सीधे ऑफिस तक की बस मिल जाती है तो स्कूटर का क्या फायदा ? मैंने थोड़ी बहुत जिद की परन्तु जब ऑफिस के मेरे वरिष्ट रोबी दा ने भी कहा कि मेरे बाबा-माँ ठीक ही कह रहे हैं तो मैंने जिद छोड़ दी। रोबी दा ने तो एक घटना भी सुनाई कि कैसे उनके मुह्हले का एक लड़का कुछ समय पहले एक मोटर साइकिल दुर्घटना में मारा गया था। उसने भी शौक से मोटर साइकिल खरीदी थी। उन्होंने सलाह दी थी कि कोलकाता के लिए बस ही सबसे सुविधाजनक है और जहाँ हमारा घर है वहां से तो बस से ही आना-जाना सबसे उचित है। छुट्टी के दिन कहीं जाना हो तो टैक्सी है ही। कलकत्ता तो वैसे भी पीली टैक्सी का नगर के नाम से जाना ही जाता है। न जाने क्यों मुझे रोबी दा की बातें ठीक लगती थी। उन्हें हमारे परिवार के बारे में जानकारी थी। नानाजी के जीवन और देश की आज़ादी के संग्राम में उनके योगदान के बारे में वे जानते थे। वे अक्सर मेरे नानाजी का हाल-चाल पूछते और मुझे सलाह देते रहते थे। ऑफिस में जब मुझे कम्प्यूटर अनुभाग से सम्बंधित काम दिया गया तो उन्होंने ही सलाह दी थी कि यह काम ठीक नहीं है। इसमें समय का बंधन हो जाता है और काम पूरा कर ही शाम को घर जाना पड़ता है। जब मैंने कहा कि कम्प्यूटर का काम मुझे पसंद है तो उन्होंने कहा कि ऑफिस में कम्प्यूटर चलाने के तो बहुत अवसर हैं परन्तु इस काम से जुड़ गए तो समझो, बंध गए.. पक्के समय पर आना और शाम को घर वापिस जाने का कुछ ठीक नहीं..' रोबी दा ने ही सीनियर मैनेजर से बात कर मुझे इस कम्प्यूटर वाली ड्यूटी से मुक्ति दिलाई थी। रोबी दा बैंक यूनियन के अध्यक्ष रह चुके थे। उनकी स्थानीय यूनियन संघों और राजनैतिक हलकों में अच्छी खासी पहुँच थी। इसी कारण हमारे बैंक के उच्च अधिकारीगण उनकी किसी बात को टालते न थे। रोबी दा का बहुत प्रभाव था, वे यह अच्छे से जानते व समझते थे किन्तु इसे दिखाते न थे। वे अपने बर्ताव में बहुत सरल और मधुर बने रहते थे। मैंने सदैव उन्हें श्वेत धोती-कुर्ते में ही देखा था। मुझे ये अच्छा लगता था कि वे बंगाली पोशाक एवं अन्य परम्पराओं के पक्षधर थे। आज ये बातें याद आ रही थी। मुझे लगा कि कभी कभी हमें अपने मन की बात मान लेनी चाहिए। अक्सर हमें लगता है कि हम सही निर्णय न ले पाएंगे और इसी भ्रम में धीरे-धीरे आत्मविश्वास खोते जाते हैं।
पिंकी बहुत विश्वास के साथ स्कूटर चला रही थी। वह एक जगह रुकी भी और उसने जल्दी में अपने लिए कुछ ख़रीदा। बहुत होशयारी और चुस्ती से उसने पेट्रोल पंप की ओर अपना स्कूटर घुमाया और पेट्रोल लिया। उचित
जगह पर उतार उसने मुझे बाय कहा और 'सी यू इन इवनिंग ..' कहकर तेजी से आगे निकल गयी। पिंकी अच्छी कद काठी की स्मार्ट और सुन्दर लड़की थी जो किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेने में सक्षम थी। कहीं न कहीं मैं भी उससे आकर्षित और प्रभावित हो रहा था।
आज ट्रेनिंग का दूसरा ही दिन था। यहाँ अलग अलग स्थानों से आये हम सब
एक-दूसरे से अच्छे से परचित न थे। कैंटीन में सब एक दूसरे मिलजुल रहे थे। मैं पीछे की और था।
तपन को देखने की कोशिश की तो पाया कि वह एक कोने में तीन-चार लड़कों से घिरा ठहाके लगा
रहा था। मैं उसकी ओर बढ़ गया परन्तु उसने कुछ फीकी सी ही मुस्कान दी।
मैंने बांग्ला में उससे पूछा कि वह कैसा है। उसने अंग्रेजी में उत्तर दिया।
मुझे आशा थी कि अपनी भाषा में बात करने पर वह मेरे निकट
आएगा। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। वह तो सब से हिंदी-अग्रेजी में ही बात कर रहा
था। मेरे साथ उसका रवैया निकटता का नहीं था। मैंने मन में सोचा आज दूसरा
ही दिन है। बाद में दोस्ती हो ही जाएगी। आधा दिन बीत गया। सबने शाम का कार्यक्रम
बना लिया था। मुझे भी शाम को एक खास जगह पर मिलने को कहा। लंच के समय मैंने
तपन से जानना चाहा कि क्या उसका कोई सम्बन्धी बंगाल में है ? उसने
बताया कि कई रिश्तेदार वहां हैं। एक बुआ तो कोलकाता में ही है। मुझे बुआ समझ
नहीं आया। बाद में उसी ने कहा बुआ यानि पिशी। उसके मुंह से पिशी सुनकर
मुझे अच्छा लगा। मैंने कहा कि चलो बांग्ला के रिश्ते तो उसे याद हैं। उसने
मेरी बात को हंसी में उड़ाते हुए कहा कि ऐसी बात नहीं है। घर में सब बांग्ला में
ही बातचीत करते हैं। मैंने कहा,' तुम कोलकाता पिछली बार कब गए थे ? उसने
कहा,' मैं दो वर्ष पहले गया था.. बहुत भीड़ है.. कहीं कहीं तो चलना तक मुश्किल हो जाता है...हमें तो अपना इलाहाबाद ही अच्छा लगता है... '
( आगे अगले सप्ताह, यहीं पर, आज ही के दिन यानि गुरुवार को )
No comments:
Post a Comment