Chander Dhingra's Blog

Thursday, March 12, 2020

' टू स्टेट्स - मेरी कहानी ' ' Two States - My Story ' - 6

                                                          ' टू स्टेट्स - मेरी कहानी '  
' Two States - My Story ' 
---
चन्दर धींगरा 

 हर सप्ताह इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे...  

( ६ )   सुबह सिर में भारीपन के साथ उठा। घर की अनुपस्थिति का अहसास था या कुछ अन्य, समझ नहीं पाया। माँ और बाबा  यानि मेरे मम्मी-पापा की एक तस्वीर मेरे पास रहती है। उसे निकाला और देखता रहा। ये उनके युवा दिनों की तस्वीर थी। माँ का रोबदार और गर्व से भरा चेहरा, बाबा, दबे-दबे से सौम्य और शांत। चाय आ गयी थी। पीते- पीते मैंने जोगेन्दर अंकल और आंटी के घर की चाय को याद किया और खुद से कह उठा, ' अब यहाँ गेस्ट हाउस में वहां जैसी चाय तो मिलेगी नहीं ? पी लो, जो भी  मिलता है... तैयार हो नीचे डाइनिंग हॉल में आया और नाश्ते का इंतज़ार करते हुए स्थानीय अखबार देखने लगा।  घड़ी देखी तो लगा शायद मैं कुछ जल्दी आ गया हूँ। यहाँ का अखबार मुझे अपने घर आने वाले ' स्टेट्समैन ' से कुछ अलग लगा। स्वाभाविक था।  बचपन से 'स्टेट्समैन' की आदत है। यहाँ वाला एक पुराना अंग्रेजी अखबार है जिसका प्रकाशन सौ साल से पहले लाहौर से हुआ करता था। मुझे याद आ रहा था कि वर्षों पहले एक सरदारजी रिपोर्टर हमारे घर आये थे और उन्होंने नाना का इंटरव्यू लिया था। उनके पास एक फाइल में इस अखबार की कुछ विशेष अंकों की फोटोज और कटिंग्स थीं जो उन्होंने हम सब को दिखाई थी। उनकी फाइल में उस दिन का मुखपृष्ठ भी था जिस पर भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की फांसी का समाचार और भगत सिंह की फोटो छपी थी। नाना उस दिन बहुत उत्साहित थे और बड़े जोश से उस रिपोर्टर को पंजाब के साथियों के बारे में बता रहे थे। उनके चेहरे  पर आ रही चमक देखने लायक थी।  
--------------------------------------
अपनी कहानी लिखने की और अपने भीतर बैठे झूठ से दो-दो हाथ करने की जब ठान ली थी तो उस क्षण मैं एक विजेता सा था। मुझ में गर्व और एक विजेता का भाव उबल रहा था। मैंने प्रतिज्ञा की थी केवल सत्य बताने की। शायद यह एक बहुत कठिन प्रतिज्ञा थी। महाभारत के भीष्म की प्रतिज्ञा जैसी। मैं उतना मानसिक बलशाली तो हो नहीं सकता था। मेरा लेखन बंद हो गया। मैं रुक गया और महीनों तक रुका रहा। ये कुछ लिखे पन्ने यूँ ही बेकार के कागज से इधर उधर बिखरे रहे। सत्य का ही दूसरा पक्ष साहस है जो मुझे विचलित करता रहा है। इन दिनों फिर से सिर्फ अपने आप में सिमटा रहा। अपने आप से साक्षात्कार करता रहा। ये मैं क्या करने जा रहा हूँ ? मेरे समक्ष मैं खुद ही बैठा था। शतरंज का खेल बिछा था हम दोनों के बीच। इस ओर काले मोहरे और सामने सफ़ेद। मैं किसे हराना चाहता था ? सामने मैं ही तो था ? खुद से ही कैसी जीत, कैसी हार ? जीत भी गया तो अपने आप से ही तो जीतूंगा ? अपने परिवार, अपने समाज से तो हार ही जाऊंगा ? ये कैसा द्वंद चल रहा था, जो मुझे तोड़ रहा था ? क्या होगा इस सब से ? छोड़ ये सब बातें। सब कुछ ठीक ही तो चल रहा है। इतने सालों से मैं सबकी सहानुभूति का पात्र बना हुआ हूँ तो क्यों न बना ही रहूं ? ये संसार यूँ ही चलता है और चलता रहेगा। न जाने कितनी अनकही कहानियां छिपी पड़ी हैं, हमारे समाज में, हम सब के बीच ? मैं ही क्या सबसे से भिन्न हूँ ? क्यों अपने आप से द्वन्द करता रहता हूँ मैं ? किस दोष का परिणाम मेरे भीतर, मेरे दिलोदिमाग पर छा गया है और मुझे हर क्षण व्यथित करता रहता है ?

आज बहुत अंतराल के बाद फिर से संभाला है खुद को। नहीं, मुझे बरसों के असत्य से बाहर निकलना ही है। मैं खुद को ही हराता रहा हूँ, इतने वर्षों तक। यदि यह संसार एक नाटक है तो मैं एक झूठा सेहरा बांधे, समाज की प्रथम पंक्ति के सम्मानजनक आसन पर विराजमान होने का नाटक ही करता रहा हूँ।  यह कैसी स्थिति आन पड़ी है मेरे मन के द्वार ? केवल मैं ही जानता  हूँ कि मेरा स्थान कहाँ होना चाहिए ? मैं अपना जीवन जी ही नहीं रहा हूँ, मैं तो मर रहा हूँ। मन के किसी कोने में एक छोटा सा सफ़ेद तिल है जिसने मुझे जीने को उकसाया है। जिसने मुझे सत्य बोलने को प्रेरित किया है और प्रकाश की किरण सी दिखलाई है। परन्तु न जाने कितने काले तिल छिपे बैठे हैं  मेरे दिल की हर एक पर्त में जो मुझे विचलित करते रहते हैं। ये मुझसे कहते हैं, ' जो है वही ठीक है.. कुछ मत कर.. यथास्थिति बनाये रख.. दुनिया को दुनिया की तरह जी.. मत याद कर बीते समय को। जो लिखा है अब तक, उसे नष्ट कर दे। 

दुर्बल होते स्वयं को मैंने एक बार फिर से स्थिर किया। नहीं, मुझे पराजित नहीं होना है। मैंने अब तक जो लिखा था उसे प्रारम्भ से पढ़ा। चंडीगढ़ के गेस्ट हाउस की छवि मेरे सामने फिर से ऐसे फ़ैल गयी, मानों  कल की ही बात हो। एक एलबम सा था जो मेरे सामने खुलता चला गया था। मेरे जीवन का एक एक दिन था जो एक एक सत्य-चित्र सा था और प्रकाश पुंज सा खिलता चला गया। मैं एक बार फिर से कागज-कलम ले बैठ गया। 



( आगे अगले सप्ताह आज ही के दिन, यहीं पर )

No comments:

Post a Comment