Chander Dhingra's Blog

Wednesday, April 1, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' - 9


' टू स्टेट्स - एक कहानी '  ' Two States - A Story '
चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA

इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे..
( ९ ) पिंकी कुछ मिनटों के लिए ही आयी परन्तु मुझे प्रभावित कर गयी थी। वह अपने ऑफिस जाते वक्त मुझे सामान दे गयी थी। ये सोचकर अच्छा लगा कि ये लोग कितने केयरिंग हैं। मेरा भी कितना ख्याल रख रहे हैं। मुझे लगा कि आंटी-अंकल से मिलने और उन्हें थैंक्स देने के लिए उनके पास एक बार हो आना चाहिए। यही सब सोचते हुए मैं गेस्ट हाउस से बाहर निकल आया। यूँ ही पास की मार्किट में टहलता रहा। अचानक एक टेलीफोन बूथ के पास से गुजरा तो मन में आया क्यों न जोगेन्दर अंकल के घर फ़ोन किया जाए ? मैंने उनका नंबर मिलाया। दूसरी ओर आंटी थी। वह खुश हुई और बार-बार पूछती रही, ' बेटा, सब ठीक है न ? न जाने उन्हें लग रहा था कि शायद मुझे कुछ असुविधा है इसलिए मैंने फ़ोन मिलाया था। मैं कहता रहा, 'आंटी, बस यूँ ही फ़ोन कर लिया, आपने सामान भेजा है, सो मन हुआ थैंक्स कहूं.. वैसे मुझे इन चीजों की जरुरत नहीं थी..' इस बात पर आंटी ने कहा, ' मुझे पता है आजकल के बच्चों को किसी भी चीज की जरुरत नहीं होती, पिंकी इन्सिस्ट कर रही थी कि गेस्ट हाउस के बेड शीट्स और टॉवल अच्छे नहीं थे तो वो ऑफिस जाते वक्त लेती गयी..' मैं चौंका, तो पिंकी ने ये अपनी तरफ से किया था ? मैंने बात को बढ़ाते हुए कहा, ' आंटी, किसी दिन आऊंगा मिलने..' उन्होंने जोर देते हुए कहा, ' क्यों ? किसी दिन क्यों ? आज ही क्यों नहीं ? मैं पिंकी को फोन कर देती हूँ, ऑफिस से लौटते वक्त तुम्हें साथ लेती आये, हमारे साथ डिनर करना..' मैं ना नुकर करता रहा परन्तु उन्होंने न मानी। मैं कमरे में आ लेट गया और ये सोचने लगा कि आज पिंकी आयेगी.. कौन सी शर्ट पहन कर उसके साथ जाऊंगा ?
ये प्रतीक्षा भी अजीब होती है। कुछ विशेष न भी हो परन्तु ऐसा लगता है मानों कुछ विशेष होने को है। प्रतीक्षा में आनंद है, प्रतीक्षा में आशा है किन्तु यह आवश्यक है कि हम प्रतीक्षा के क्षणों में खुद से किस तरह से व्यवहार करते हैं ? ये बात न जाने मैंने कहाँ पढ़ी थी ? शायद कहीं नहीं। ये तो मेरे मन की लहरें हैं जो मुझ से अक्सर खेला करती हैं। ये खेल मुझे अच्छा लगता है। मैं खुद से ही बातें किया करता हूँ। बाबा ने मुझे एक बार खामोश बैठा देखा था और शायद मैं काफी समय से अपने में ही था तो उन्होंने मेरे पास आकर जानना चाहा था कि मैं इस तरह से शांत क्यों था ? उन्हें मेरा व्यवहार ठीक न लगा था। उन्होंने मेरी माँ से भी कहा था। माँ ने इसे बेहद हल्के से लिया था। 'अरे ! बच्चा चुप बैठा है तो इसमें अनहोनी क्या है ? उन्होंने कहा और घर के कामकाज में व्यस्त हो गयी थी। लेकिन बाबा चिंतित होते रहे और उन्होंने मुझे घर से बाहर जा मित्रों से मिल आने को कहा। मैंने कहा, ' ठीक है बाबा..' परन्तु फिर मैंने सोचा, चलो, बुआ के घर हो आते हैं.. जब आप सत्य की सौगंध लिए हों तो स्मरण शक्ति भी आप के साथ हो लेती है। इसीलिए तो अपना सत्य लिखते वक्त आज छोटी छोटी बातें, न जाने कैसे मुझे याद आती चली आ रही हैं। ये यादें ऐसे उभर कर आ रही हैं मानों कल की ही बातें हों और अब तक दिल के किसी एक कोने में दुबकी बैठी थी।
अपनी बुआ के पास जाने के लिए घर से निकलने को तैयार होने लगा। बाबा के चेहरे पर संतोष का भाव था। उन्होंने ने सोचा शायद मैं अपने मित्र सुब्रत के घर जा रहा हूँ। उन्होंने अक्सर मुझे उसी के साथ देखा है और उन्हें लगता है कि वह ही मेरा सबसे नजदीकी मित्र है। उन्होंने पूछा, ' सुब्रत से मिलने जा रहे हो ? ' मैंने कहा, 'नहीं, पिशी के घर जा रहा हूँ..' मैं घर से निकल आया। पिशी यानि मेरी बुआ का घर बहुत दूर न था। एक बस सीधी वहां जाती थी परन्तु बसों की भीड़ मुझे पसंद नहीं थी। मैं पैदल ही चलने लगा। पैदल चलने वाले रास्ते में भी भीड़ थी परन्तु किया ही क्या जा सकता है? भीड़ तो भारत की पहचान है। मुझे तब भी ऐसा लगता था और आज भी। मैं भीड़ में बचता बचाता चला जा रहा था। मुख्य सड़क का रास्ता तो लम्बा था परन्तु एक छोटी सी गली से होकर जाने से बुआ का घर काफी करीब था। यह गली केवल पैदल या हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे के लिए ही उपयुक्त है। सामने से एक रिक्शा चला आ रहा था। उस पर एक युव दम्पति बैठे हुए थे। सजे-धजे, हँसते-मुस्कुराते मानों घर के सोफा पर बैठे हों। रिक्शा वाला उम्रदार व्यक्ति था, शायद सालों से रिक्शा खींचना ही उसका जीवन था। सब शहरों से इस तरह के रिक्शे समाप्त हो रहे हैं परन्तु हमारे कलकत्ता से नहीं। मुझे गुस्सा आ रहा था। पर मैंने सोचा कलकत्ता के रिक्शे बिहार से आये गरीब लोगों को रोजगार दे रहे हैं। ये गरीब लोग और कुछ तो कर नहीं सकते, रिक्शा खींच कम से कम अपने परिवार का पेट तो भर रहे हैं। कभी कभी जब नगर में बरसात का पानी जमा हो जाता है और यातायात के अन्य साधन ठप्प हो जाते हैं तो बूढ़े, बच्चों और बीमार-लाचार लोगों को डाक्टर,स्कूल ले जाने और अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए, यही रिक्शे काम में आते हैं। नहीं, इन्हें कलकत्ता से हटाना उचित नहीं। विचार को आगे बढ़ाते हुए, अगले ही क्षण मैंने सोचा किसी दिन अगर बिहारी मजदूर लोगों ने इन रिक्शों को चलाना बंद कर दिया तो क्या होगा ? क्या बंगाली इस तरह का मुश्किल काम कर सकेंगे ?
मैं संकीर्ण रास्ते से अपने ही विचारों में खोया चला जा रहा था। बुआ के घर जाकर क्या करूँगा, कुछ पता न था। बस समय था और घर से कुछ समय के लिए निकलना था, सो उधर कदम बढ़ गए। आज एकांत में हूँ तो उस संकरी गली को ऐसे याद कर रहा हूँ जैसे कोई खास बात जुड़ी हो। हाँ, बताता हूँ। उस गली के मोड़ पर एक पान-सिगरेट की दुकान थी। न जाने क्या हुआ, मैंने एक सिगरेट खरीदी और दुकान के साथ झूलती और सुलगती रस्सी से उसे जलाया। वो मेरी ज़िन्दगी की पहली सिगरेट थी। मुझे पहले ही दिन सिगरेट पीना कैसे आ गया, समझ न पाया। मुझे न खांसी आयी थी, न ही गले में जलन हुई थी और न ही किसी परिचित द्वारा देखे जाने जैसी भय की अनुभूति हुई थी। मैं सिगरेट के कश ऐसे लेते हुए चला जा रहा था जैसे मैं सिगरेट का पुराना खिलाड़ी हूँ। वैसे मेरे भीतर कोई था जो मुझसे बेखौफ होने को प्रेरित कर रहा था। जो कह रहा था, अबे ! डरना क्या ? सिगरेट तो सभी पीते हैं.. एक न एक दिन तो सिगरेट शुरू करनी ही है.. मेरे मित्र सुब्रत ने मुझे अपनी पहली सिगरेट की कहानी बताई थी कि कैसे उसने छिपकर कश लगाए थे और कैसे उसे एक रोमांच की सुरसुरी सी अपने अंदर महसूस की थी। मुझे ऐसा कुछ भी न लगा था। लेकिन बुआ के घर पहुँचने से पहले मैंने नल से कुल्ला अवश्य किया था और एक मिंट वाली गोली भी अपने मुंह में रख ली थी। सिगरेट की गंध न आये, ये भय तो था मेरे अंदर। बुआ ने ही दरवाजा खोला। मुझे देख उन्होंने हलकी सी आश्चर्य वाली मुस्कान दी और पूछा कि सब कुछ ठीक तो है ? वे संभवत: मेरे बिना सूचना के आ जाने से हैरान थी। फिर उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि क्या मैं इस ओर किसी काम से आया हुआ था ? मैंने दोनों बातों का हाँ और न में उत्तर दिया और अंदर आकर बुआ के बड़े और ऊँचे पलंग पर एक ओर बैठ गया। बुआ ने चाय का पूछा का पूछा। मैंने हाँ कहा तो वो रसोई में चली गयी। मैं बिस्तर पर रखी पुस्तक को उलट पुलट कर देखने लगा। अचानक भीतर के कमरे से इन्द्राणी दी की आवाज़ सुनाई दी। मुझे यही आशा थी कि किसी भी क्षण इन्द्राणी दी दिख जाएँगी। वे बच्चों के स्कूल में पढ़ाती हैं और दोपहर दो बजे तक घर लौट आती हैं। उनका व्यक्तित्व आकर्षक है। वे बातें भी बहुत अच्छी करती हैं और रबिन्द्र संगीत पर भी उनकी पकड़ है। 'अरे ! तुम ? अचानक ? उन्होंने पूछा.. ' बस ऐसे ही, बोर हो रहा था, आपसे मिलने चला आया ' ' मुझे से या अपनी बुआ से ? उन्होंने हँसते हुए कहा। मैं क्या उत्तर देता, इतना कहा, 'आपसे भी और उनसे से भी..' बुआ, चाय-बिस्कुट लेकर आ गयी। वहीं पलंग पर बैठे हुए हमने चाय पी। फिर ऊपर के कमरे में मैं और इन्द्राणी दीदी इधर-उधर की बातें करते रहे। कुछ सिनेमा की, कुछ संगीत की और कुछ उन दिनों के हालात की बातें चली। करीब दो घंटे वहां बीता कर लौट आया। बाहर कुछ दूर तक इन्द्राणी दी मेरे साथ आयी। उन्हें पास की दुकान से कुछ खरीदना था। दुकान से आगे बढ़ने पर उन्होंने मुझे फिर से किसी एक दिन घर आने के लिए कहा और ये भी कहा कि अगले शनिवार की शाम को कुछ साथी घर आने वाले हैं। गीत-संगीत की महफ़िल बैठेगी, तुम भी आ जाना, मुझे अच्छा लगेगा।

( आज यहीं तक, आगे अगले सप्ताह, आज ही के दिन .. )

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