Chander Dhingra's Blog

Wednesday, April 22, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story '-12


                                            ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला जारी है।
                             आज गुरुवार है, अब आगे...    

( १२ )      मैं ऊपर कमरे में आकर अपने परिचित से अंदाज़ में बिस्तर पर गिरा। ये क्या हुआ ? लवली तो बस सूचना देकर चली गयी। पिंकी को स्वयं आना चाहिए था, उसकी बहन तो एक हवा के झोंके सी निकल गयी। आज यदि जाना नहीं हुआ तो क्या कल जायेंगे या किसी और दिन ? कुछ भी पता नहीं। मैं फिर से  एक बार खुद से उलझने लगा। ये क्या बात हुई ? सामान्य शिष्टाचार कहता है कि पिंकी को अपनी बहन को ठीक से समझाकर भेजना चाहिए था। लवली तो वैसे भी शैतान और नादान लड़की है। वह क्या जाने, किसी के मन की बात ? बस, स्कूटर पर आई और 'आज का प्रोग्राम कैंसिल ' कह कर निकल गयी। परन्तु, मैं परेशान क्यों हो रहा था ? इन सिख लोगों के पूजा स्थल से मुझे क्या लेना-देना ?  एक बात हुई थी गुरूद्वारे घूम आने की, बस...  कोलकाता में ऑफिस आते-जाते एक गुरूद्वारे को देखता रहा हूँ। देखता रहा हूँ कि कैसे सिख पुरुष और स्त्रियां वहां दिखते हैं, परन्तु कभी भीतर जाने की इच्छा न हुई। हमेशा यही लगता रहा कि ये लोग पूजा-पाठ के विधि विधान क्या समझते होंगे ? पूजा तो एक जटिल प्रक्रिया होती है। मैंने अपनी माँ और बचपन में नानी को कुछ विशेष अवसरों पर पूजापाठ का आयोजन करते देखा है। कैसे तिथि और मुहूर्त निकाला  जाता और कैसे कुछ दिनों पहले से ही साधन-सामग्री आदि इकठ्ठा किये जाते। फिर पूजा के दिन पंडित-पुरोहित की प्रतीक्षा की जाती थी। नानी चिल्लाती थी कि मुहूर्त निकला जा रहा है और पंडित का कुछ अता-पता नहीं.. फिर माँ, बाबा सभी परेशान हो उठते थे। मुझे पंडित जी को खोजने के लिए भेजा जाता था। इधर-उधर घूमने के बाद पता चलता कि वे तो किसी और घर में पूजा करवा रहे हैं।  ' बस, यहाँ की पूजा समाप्त कर पहुँचता हूँ ', पंडित जी कह देते परन्तु वहां से उन्हें कोई अन्य अपने घर पकड़ कर ले जाता और कुछ समय बाद मुझे एक बार फिर से उनकी खोज के लिए दौड़ाया जाता। ये बहुत खीज पैदा करने वाली बात होती थी और मुझे लगता कि ऐसे पूजा-पाठ का क्या तात्पर्य ? स्कूल में मेरे मित्र अपने अपने घरों में होने वाली पूजा के बारे में बताते कि उन्होंने कैसे आनंद लिया और खाया-पीया। पंडित वाली दुविधा प्रायः सभी घरों में होती। बाद के वर्षों में मुझे समझ आ गया था कि ये पंडित के पीछे दौड़ना, पूजा का ही एक अंग जैसा है। यदि पंडित स्वयं से सही समय पर आ जाएं तो पूजा का क्या मज़ा ?  ये वैसा ही है जैसे बारात का समय से न पहुंचना। समय से पहुँच गए और कन्या पक्ष वालों को प्रतीक्षा न करवाई तो  बारात कैसी ? मैं माँ से कहता कि ऐसी पूजा में क्या लाभ ? हमें खुद पूजा कर लेनी चाहिए। मेरी बात सुन नानी अंदर से मुझे डांटते हुए चिल्लाती, ' बिना पुजारी कहीं पूजा होती है ? मन्त्र-विधि क्या हम जानते हैं ? हम सब परेशान से पंडित जी की प्रतीक्षा में बैठ जाते। पंडित जी अपने समय से हांफते-हांफते आते और हड़बड़ी दिखाते कि जल्दी करो क्योंकि उन्हें तीन अन्य घरों में जाना है। मैं कहता कि मुहूर्त तो निकल चुका है तो वह बताते कि एक विशेष पंचाग के अनुसार संध्या तक का मुहूर्त है, चिंता की बात नहीं है परन्तु शीघ्रता करनी होगी। मैं खीजता हुआ पूजा स्थल पर बैठ जाता। परिवार के अन्य सभी सदस्य कुछ मिनिट तक पंडित जी से विलम्ब हेतु शिकायत करते और फिर सामान्य हो अपने अपने-अपने  स्थान पर बैठ जाते मानों कुछ हुआ ही न हो। नाना इस सब तूफान से अलग हो अपने कमरे में, अपने में सिमटे, किसी पुस्तक या समाचार पत्र में समाये रहते। उन्हें खाने की प्रतीक्षा अवश्य परेशान करती जो उस दिन विशेष बनता था। बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा और अन्य कई ऐसे आयोजनों की यही कहानी है। मैं चिढ़ जाता था। ये सब ढोंग-आडंबर और तमाशा है। मेरे खास मित्र सुब्रत का भी यही मत था। लोग गरीब हैं, भूखे हैं और हम इन सब फिजूल की बातों में उलझे हुए हैं। रोबी दा का भी कुछ ऐसा ही कहना था। उन के साथ एक बार बैंक कर्मचारियों की मीटिंग में गया था। वे ही ले गए थे। उन्होंने कहा था कि हम कच्चे नौजवानों को कुछ सीखना चाहिए। कैसे समाज को बदला जाये ? कैसे नया समाज लाया जाये ? कैसे पूजा-पाठ जैसे आडम्बरों से मुक्ति पाईजाये ? उस मीटिंग में काफी भीड़ थी और लाल झंडे लहरा रहे थे। क्षण भर को मेरी विचार श्रृंखला रुकी। मैं क्यों सोचते - सोचते कहाँ से कहाँ निकल जाता हूँ ? मैं स्वतः से नहीं रुक पाता। मुझे प्रयास करना पड़ता है अपने विचारों को विराम देने के लिए।  

पिंकी के न आने और गुरूद्वारे न जा पाने के कारण मैं यादों की गलियों में कहाँ से कहाँ तक पहुँच गया था ? एक बार फिर मैंने स्वयं को व्यवस्थित किया। कभी कभी ऐसा तो हो ही जाता है। मुझे समझना चाहिए कि कुछ ऐसी विशेष बात हो गयी होगी कि उसे गुरूद्वारे जाने का प्रोग्राम कैंसिल करना पड़ा होगा। उसने खबर तो पहुंचा ही दी न?  परन्तु अब किस दिन जाना है, उसे ये तो बताना चाहिये था? मुझे याद नहीं कि कितनी देर तक मैं खुद से उलझा रहा। झपकी भी लग गयी थी। आंख खुली तो पता चला कि संध्या के आठ बज चुके थे। मैं हाथ-मुंह धोकर नीचे आ गया। खाने का समय हो चुका था। कैंटीन के लड़के ने मुझे देखा तो दूर से ही बोला , ' क्या दादा, आज जल्दी भूख लग गयी ? ' मैंने जवाब नहीं दिया तो वह बोला, ' बस पांच-दस  मिनिट रुकिए  दादा, अभी थाली लगाता हूँ .. ' अब मैंने उसे उत्तर दिया कि कोई जल्दी नहीं है। मैं कोने में रखी कुर्सी को खींच, दरवाजे के सामने बैठ गया ताकि बाहर का नज़ारा दिख सके। मुख्य द्वार सामने ही था। सिक्यूरिटी इंचार्ज दोनों हाथ पीठ पीछे कर टहल रहा था। गेट के बाहर सड़क पर चहल पहल थी। अचानक मैंने गेट में एक स्कूटर को घुसते देखा। कोई लेडी  चला रही थी। क्या पिंकी थी ? नहीं, ये तो कोई मोटी महिला थी। पीछे भी कोई बैठा था। उन्होंने स्कूटर साइड में खड़ा किया और सिक्योरिटी इंचार्ज से बात करने लगी। सिक्योरिटी इंचार्ज ने मुझे कैंटीन के गेट पर कुर्सी पर बैठा देख लिया था। मैंने देखा कि वह उन्हें लेकर इधर ही आ रहा है। क्षण भर बाद मुझे उन दो महिलाओं में एक पिंकी दिखी। सिक्योरिटी इंचार्ज ने कहा, ' दादा, ये आपसे मिलने आई हैं। पिंकी ने भी मुझे देख लिया था और हाथ उठाकर 'हाय' कहा। उसने मुझे अपनी सहेली से मिलवाया और बताया कि कैसे उसे उसके साथ कहीं आवश्यक कार्य से जाना पड़ गया था और गुरूद्वारे जाना न हो पाया। लेकिन उसने कहा कि संडे को वह जरूर मुझे ले जाएगी। वह सुबह आयेगी और पहले गुरूद्वारे और बाद में चंडीगढ़ की अन्य जगहों पर घुमाने ले जाएगी। उसने दूसरी बार सॉरी कहा। स्कूटर स्टार्ट कर उस पर बैठेते हुए भी उसने सॉरी कहा। ' संडे रेडी रहना ', कह वो दोनों गेट से बाहर निकल गयी। एक बार फिर से मैं देखता रह गया। पहले छोटी वाली आयी थी और एक सूचना देकर चली गयी थी। अब उसी तरह से बड़ी वाली आयी और सॉरी कहकर निकल गयी। ये लोग धैर्य से बात क्यों नहीं करते ? बस स्कूटर पर आये और खबर दे, निकल गए। पिंकी को तो थोड़ा समय रुकना चाहिए था। ठीक से और विस्तार से बताना चाहिए था कि क्या आवश्यक कार्य उसकी सहेली पर आन पड़ा था ? परन्तु, मुझे ऐसी जिज्ञासा क्यों हो रही थी ? कुछ भी कार्य हो सकता है। मुझे क्यों सब कुछ बताया जाये ? मैं क्या सच में  कारण जानना चाहता था या कुछ और था जो मुझे परेशान कर रहा था ? ये सालों पुरानी छोटी सी घटना है परन्तु मुझे स्पष्ट रूप में आज भी याद है। असल में, मैं उस दिन पिंकी  की ही प्रतीक्षा कर रहा था। मैं उसके साथ संभावित समय बिताने को उत्सुक था। मुझे उसका स्वयं यहाँ अपनी फ्रेंड के साथ आकर बता जाना अच्छा लगा था। वह आने वाले संडे का कार्यक्रम भी बता गयी थी। ये सब तो उसने ठीक किया था। ये उसके दायित्व बोध को दर्शाता था। लेकिन जब मित्र  के साथ आयी थी तो उसके साथ मेरा परिचय तो करवाना चाहिए था। 

मैं स्वयं में उलझता और सुलझता रहा हूँ। अपने जीवन की पोटली को खोलकर, हर छोटी बड़ी सामग्री को निकाल-निकाल कर, न केवल स्वयं से पुनः एक बार परख रहा हूँ अपितु आप को भी दिखा रहा हूँ। इन्हें छिपाये-लुकाये अकेला ही अपरिचित पथ पर चलता रहा हूँ। कभी कभी तो इस यादों की पोटली को दूर अनजान जगह पर फेंक आने या किसी गहरी नदी में डुबो आने का भी मन बनाया। परन्तु जैसे ही ऐसा कुछ करने की सोचता, कहीं भीतर से आहाट सी होती कि ' बच्चे, इसे तुम अपने से जुदा नहीं कर सकते। इसका बोझ तुम्हें जीवनपर्यन्त ढोना है। यही नहीं, ये बोझ समय के साथ साथ बढ़ता भी  जायेगा..'  सच में इस बोझ को बढ़ते हुए मैं महसूस कर चुका हूँ। मेरे मन की भीतरी सतह पर ये बढ़ता बोझ, एक तरह का भय भी पैदा करता रहा था। मैं  जितना भी सरल शब्द में कहूँ या निश्चिंत भाव दिखाने  का प्रयास करूँ, वास्तविकता यह थी कि मैं खुद में परेशान था। मैं उखड़ा उखड़ा सा रहता था। कभी कभी मुझे लगता जीवन बेमतलब है। मैं अपनी दुर्बलता को समझ पा रहा था। क्या ये डिप्रेशन के लक्षण थे ? मैंने कहीं पढ़ा था कि डिप्रेशन के नौ मुख्यः लक्षण होते हैं और यदि किसी व्यक्ति में इन में से पांच हों तो वह डिप्रेशन का शिकार माना जाता है। ऐसी मानसिक स्थति में मैंने एक रात खुद को टटोलना चाहा था। ये पिछले वर्ष की बात है। तब मुझे लगा था कि खिन्नता के कई लक्षण मुझ पर सही बैठते हैं। पर क्या था कि मैं सम्भला हुआ था ? वह क्या था मेरे अंदर जो मुझे मेरी मानसिक स्थिति से मुझे परिचित करवा रहा था ? मैं कहाँ से कहाँ चला आया ? अब इन बातों को सोचता हूँ तो मुझे खुद पर हँसी आ जाती है। मुझे तो अपनी पूरी कहानी पूर्ण सत्यता के साथ सुनानी है। ये जो मैं इधर-उधर भटक जाता हूँ या स्मृतियों की गलियों में दूर कहीं निकल जाता हूँ, ये भी तो मेरी कहानी का ही हिस्सा हैं। मेरी इस मानसिकता के प्रभाव को दर्शाये बिना तो सब कुछ अपूर्ण सा ही दिखेगा। 
( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )

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