Chander Dhingra's Blog

Wednesday, April 15, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story '-11



                                                   ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...    

( ११ )    जोगेन्दर अंकल के घर से देर रात को वापिस लौटा। खाना वहीं खाया। उन लोगों ने बिना खिलाये लौटने ही न दिया। उस शाम को जब से गुरूद्वारे जाने की बात चली थी, तब से ही मैं प्रतीक्षा की मनस्थिति में आ चुका था। मैं अपने कमरे में आ तो गया था परन्तु मेरा मन कहीं बाहर भटक रहा था। कलकत्ता में मैंने सिख समुदाय की गतिविधियों को देखा था। ऑफिस आते-जाते एक गुरूद्वारे के सामने से गुजरना होता था। बाहर से ही देखता था कि लोग आ-जा रहे होते थे।  कोलकाता के प्रसिद्ध मैदान में भी साल में दो बार बहुत विशाल समारोह, सिखों के गुरु नानक के जन्मोत्सव और बैशाख माह के आरम्भ के अवसर पर किया जाता है। यहाँ लाखों लोग एकत्रित होते हैं। ये समारोह दो-तीन दिन तक चलता है। इतनी बड़ी संख्या में सिख लोगों को एक साथ देख आश्चर्य होता। ऑफिस में इस सम्बन्ध में साथियों से बात होती तो वे व्यंगात्मक भाषा में कहते, ' कोलकाता तो अब पंजाबी पगड़ीवालों का शहर हो गया है..' कुछ ऐसी ही बात तब भी सुनाई देती जब बिहारी लोग छठ की पूजा करते हैं। तब ऐसा लगता है मानों कोलकाता बंगाल का नहीं बिहार का कोई शहर हो। छठ पूजन मुझे बहुत विस्मित करता। लोग जिस तरह से बैंड बाजे और हो-हल्ला के साथ गंगा घाटों पर जमा होते, मुझ में कुछ ऐसी भावना जाग्रत करते कि ये कोई पिछड़ा और अंध विश्वासी समुदाय हो। आज जब ये सब लिख रहा हूँ तो अपनी सोच-समझ  बहुत कुछ बदल चुका हूँ। किन्तु उन दिनों  मेरी सोच काफी संकीर्ण हुआ करती थी। आज सत्य की प्रतिज्ञा के साथ पेन और कागज़ लेकर बैठा हूँ तो कुछ छिपाऊँगा नहीं । उन दिनों मुझे बंगाल के बाहर से आये लोगों के जनसमूह और उनके द्वारा किये जाने वाले समारोह परेशान किया करते थे। मुझे लगता था इन बाहर से आये हुए लोगों के कारण धीरे धीरे हमारे बंगाल की संस्कृति प्रभावित हो रही है। उन दिनों बंगाल के राजनैतिक और सांस्कृतिक समुदायों में कुसंस्कृति  की बात भी उठी थी। ऑफिस, दोस्त-यारों में इसे लेकर वाद विवाद हुआ करता था। 'अपोसंस्कृति ' हम बंगालियों के लिए एक मज़ेदार शब्द बनकर उभरा था। हम दोस्त लोग इसका खूब प्रयोग करते थे। मुझे याद है एक दिन मेरे टिफिन में माँ ने फोर्क रख दिया था। उन्हें लगा होगा कि जिस तरह का खाना उस दिन दिया गया था उसे इस फोर्क से खाने में सुविधा होगी। लंच के समय मुझे इस तरह फोर्क के साथ खाते देख एक साथी ने हँसते हुए कहा था, ' क्या हाथ से सीधे-सीधे खाने में शर्म आती है..अपोसंस्कृति.. अपोसंस्कृति.. ' इसी तरह एक दोस्त के घर पर उसके रिकॉर्ड प्लेयर पर ऊँची ध्वनि पर एक इंग्लिश गाना बजता देख मैंने भी इसी तरह अपोसंस्कृति.. अपोसंस्कृति.. कहकर उसे चिढ़ाया था। वह दोस्त दार्जिलिंग के बोर्डिंग स्कूल में पढ़ा था और उसे इस तरह का संगीत पसंद था। मेरे व्यवहार पर वह झुंझलाया था और उसने मुझे कहा था, ' बस, कुँए के मेंढक बने रहो..'   मैं सामने खुलकर कहूँ या न कहूँ परन्तु भीतर कहीं कसक सी होती थी कि ये लोग बंगाल में आ बसे  हैं किन्तु अपनी आदतों और संस्कारों को छोड़ नहीं पा रहे हैं। चाहे बिहारी हों या सिख-पंजाबी या मारवाड़ी या फिर चीनी लोग।  

मैं पिंकी और लवली के साथ गुरूद्वारे जाने के कार्यक्रम को लेकर उत्साहित था। मुझे पिंकी के साथ कुछ समय बिताने का अवसर मिल रहा था। नहीं कह सकता कि क्या कहीं न कहीं उसने मुझे प्रभावित किया था ?  किन्तु कुछ तो ऐसा था जो मेरे भीतर हलचल कर रहा था। मुझे स्मरण है कि इन्द्राणी दीदी  ने एक बार मुझे अपना अनुभव बताया था कि कैसे वे अपने दन्त चिकित्सक से प्रभावित थी और जिस दिन उन्हें उसके पास जाना होता था तो वे काफी पहले से एक तरह के ' वेटिंग मॉड ' में आ जाती थी और सुबह से सोचने लगती थी कि आज कौन सी साड़ी पहन कर जाऊंगी ? आज मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही तो हो रहा था। कहीं न कहीं मैं चाहता था कि बीच का यह समय जल्द से जल्द गुजर जाये। मैं इधर-उधर करवट बदल रहा था। नींद का दूर दूर तक कुछ अतापता न था। कभी माँ की बातें याद आ जाती, कभी बाबा की। बाबा की याद आते ही उनका चेहरा सामने आ जा जाता है। आज भी और पहले भी जब कभी मैं बाबा के बारे में सोचता तो मुझे लगता कि वे एक तरह के अकेलेपन में जी रहे हैं। माँ उनका ख्याल तो बहुत रखती थी। उनके खान-पान, दवा और ड्रेस इत्यादि का परन्तु कहीं न कहीं बाबा दबाव में रहते थे। पुरुष का चरित्र कुछ ऐसा होता है कि वह एक तरह की आज़ादी चाहता है। वह पूर्णाधिकार तो नहीं चाहता परन्तु अपनी बात की स्वीकार्यता और समर्थन अवश्य चाहता है। घर में अपने विचार की स्वीकार्यता बाबा को न मिलती थी। मैं बचपन से ही इस तथ्य को समझने लगा था परन्तु इसे व्याख्या दे पाना मेरे बस में न था। इन्द्राणी दी को मैंने एक बार हलके से कहा था कि मेरी माँ, मेरबाबा पर एक तरह का प्रेशर बनाये रखती हैं। इन्द्राणी दी ने तब मुझे समझाना चाहा था कि माँ ने अपने बाबा यानि मेरे नाना के साथ, शासकीय प्रभाव एवं अधिकार का सुख भोगा है। उनका बचपन प्रभावशाली व्यक्तियों की गोद में बीता है। उनका स्कूल-कॉलेज जीवन उन साथियों के साथ रहा है जिनके अभिभावक सत्ता और प्रशासन के गलियारों में रसूख रखते थे। ये स्वाभाविक है कि अनजाने ही उनमें दूसरे को दबाने का स्वभाव आ गया है। ऐसे लोगों में अनजाने ही ऐसी प्रवर्ति बन जाती है जो अपने भीतर बन चुकी धारणाओं को ही जीवन का अंतिम सत्य मानने लगती हैं। समय के साथ वे इसी मानसिकता में जीते जाते हैं और उससे विपरीत कुछ भी देखने और समझने की शक्ति से अलग होते जाते  हैं। इन्द्राणी दीदी ने ये भी कहा था कि मेरी माँ एक समझदार और संतुलित महिला हैं और मेरे बाबा भी इस सत्य को बहुत अच्छे से समझते हैं। मैं आज जब बरसों पुरानी इस बात को याद कर रहा था तो  इन्द्राणी दीदी का चेहरा मेरे जेहन में स्पष्ट छा रहा था। मैं उनकी किसी भी विषय की व्याख्या करने की प्रतिभा का फिर से एक बार कायल हो रहा था। 

कब सो गया था पता न चला। सुबह उठा तो एक बेचैनी सी थी। न जाने क्यों लगा, माँ स्वस्थ नहीं हैं। मैं यहाँ उनसे मीलों दूर हूँ। कौन उनकी देखभाल करता होगा ? बाबा है न ? मेरे भीतर से ही उत्तर मिला। परन्तु बाबा तो सरलता से कह देंगे, ' एक केलपोल की गोली क्यों नहीं ले लेती ? बाबा के लिए केलपोल की गोली संजीवनी के सामान थी। माँ तो बाबा के इस सुझाव पर सिर पकड़कर बैठ जाएँगी और कुछ जवाब न देंगी। फिर बाबा भी माँ की इस बेरुखी को देख, ' अच्छा, जो तुम्हें ठीक लगे.. ' का भाव लेकर, कोने में रखी कुर्सी पर अख़बार लेकर बैठ जायेंगे। एक क्षण को मैंने आंखें बंद की, गर्दन को पीछे की ओर झुकाया और सोचने लगा, माँ की अस्वस्थता का हल्का सा विचार ही मेरे भीतर कैसा उथल-पुथल मचा रहा है। ये सपना भी न था। ये तो किसी नन्हें पंख सा ख्याल था जो उड़ते उड़ते कहीं से आया और न जाने मुझे कहाँ से कहाँ ले चला था। मैंने खुद को संतुलित किया। माँ के सुस्वास्थ्य की कामना करते हुए बाबा लोकनाथ को स्मरण और प्रणाम किया। ये माँ ने ही सिखाया था कि चिंता और आशंका की मनस्थिति में बाबा लोकनाथ का स्मरण कर लेना चाहिए। उनकी बाबा लोकनाथ में खूब आस्था थी और वे प्रतिमाह इस आस्था हेतु अच्छा खासा दान भी किया करती थी। अब प्रातःकाल की दिनचर्या का समय था। मैं उठा और बाथरूम की और बढ़ा किन्तु फिर लौट कर अपने सूटकेस को खोल अपने कपड़ों को देखने लगा। मैंने नीले रंग की एक शर्ट को निकाला और देखने लगा कि उसे आयरन करने की जरुरत है या नहीं ?   

सामान्य दिनों की तरह अपने ट्रेनिंग सेंटर गया और सामान्य दिनों की तरह ही दोस्तों के साथ दिन बिताता रहा परन्तु आज एक गुदगुदी सी थी मेरे भीतर।  मैं उत्सुकता में था कि समय जल्दी बीते। नज़र कलाई पर बंधी घड़ी पर चली जाती थी। पर मैं उत्साहित क्यों था ? मैं खुद को बार बार सँभालने की कोशिश कर रहा था। मुझे लगता ये जो मेरे भीतर एक उत्सुकता सी बन रही है, मुझे दुर्बल कर रही है। मैं यहाँ चंडीगढ़ में कुछ दिनों के लिए आया हुआ हूँ। यहाँ परिवार के परिचित मेरे स्थानीय अभिभावक की तरह हैं और उनकी बेटियाँ  मुझे स्थानीय पूजा स्थल यानि उनके गुरूद्वारे ले जा रही हैं। यह सब मेरे लिए सामान्य होना चाहिए। मैं अपने विचारों को दबा रहा था परन्तु यह भी महसूस कर रहा था कि मेरे विचार सामान्य स्थिति में न थे। हमारी आज की क्लास समाप्त हो चुकी थी। सभी साथी दिन भर के लिए विदा ले, अगले दिन फिर से  मिलने का वादा करते हुए, जा रहे थे। मैं भी उनके साथ हँसते-हंसाते मुख्य द्वार तक आ गया और फिर गेस्ट हाउस की ओर बढ़ गया। गेस्ट हाउस अधिक दूर न था। केवल दो-तीन मिनिट ही पैदल चलना होता था। गेस्ट हाउस के सामने पहुंच, मैं सड़क की दाहिनी ओर देखने लगा। इधर से ही तो पिंकी आयेगी। ऊपर अपने कमरे में चला जाऊं ?  उसके आने का समय तो हो ही चला है। फिर से नीचे आना होगा। यहीं प्रतीक्षा करता हूँ। कुछ मिनिट ही बीते होंगे कि मैंने दूर मोड़ से एक स्कूटर को अपनी ओर आते हुए देखा। अहा, पिंकी आ गयी है। स्कूटर पास आकर रुका तो एक झटका सा लगा। हेलमेट जिसने उतारा वो पिंकी नहीं उसकी बहन लवली थी। वहीं स्कूटर पर खड़े खड़े उसने कहा, ' अच्छा हुआ आप यहीं मिल गए..  दादा, आज का प्रोग्राम कैंसिल..'  वह हंस रही थी।  ' पिंकी को अपनी किसी सहेली के साथ कहीं ओर जाना पड़ गया है.. सो नॉट टुडे.. मुझे इतनी दूर आपको आकर बताना पड़ा.. ओके बाय.. '  कहकर उसने स्कूटर घुमाया और फुर्र से निकल गयी। मैं कुछ भी समझ न पाया। ऐसा लगा कोई कोई माइक था जिस पर ऊँची ध्वनि में उद्घोषणा हुई थी जिसमें मुझे अपने कमरे में चले जाने, और चुपचाप बिस्तर पर धम से गिर जाने का आदेश था।  
( आज यहीं तक... आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )

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