Chander Dhingra's Blog

Wednesday, April 8, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story '-10


                                                            ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                              इस लम्बी कहानी को साँझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, अब आगे...    

( १० )   चंडीगढ़ के गेस्ट हाउस के कमरे में अकेला और सुस्ताया मैं, स्मृतियों की गलियों में भटक रहा था कि नीचे से सन्देश आया कि कोई  मिलने आया है। मैं समझ गया कि पिंकी आ गयी है। मैंने संदेशवाहक से कहा कि कह दो आ रहा हूँ। एक कमीज निकाली और पहन ली। क्षण भर बाद न जाने मन में क्या आया, उसे उतार, दूसरी कमीज पहन ली। बाल ठीक किये, शीशे में खुद को निहारा और नीचे उतर आया। पिंकी स्वागत कक्ष में सोफे पर बैठी थी। मुझे देख वह मुस्कुराई और बोली, ' रेडी.. चलें.. ?  मैंने सर हिला दिया। आज फिर मैं झेंप सा रहा था। पिंकी की ड्रेस उस दिन आकर्षक थी। सामान्य पंजाबी लड़कियों की तरह उसने सलवार-कमीज पहनी हुई थी। रंग हल्के के डिज़ाइन जो सफ़ेद रंग पर फैले हुए थे, उस पर खूब फब रहे थे।  यहां चंडीगढ़ में अधिकतर लड़कियों को गहरे रंग की पोशाकों में देखा था। पिंकी को इन हलके रंग के कपड़ों में देखना अच्छा लगा। कुछ तो था जो उसे सामान्य पंजाबी लड़कियों से अलग कर रहा था। मन में एक विचार किसी चमक सा लहराया। अगर पिंकी हल्के गुलाबी रंग की तांत की साड़ी पहने तो बहुत  सुन्दर दिखेगी। वो गोरी और अच्छे कद की लड़की थी, साड़ी उस पर अच्छी लगेगी। पिंकी को बंगाली लड़की की पोशाक में देखने की मेरी कल्पना स्वाभाविक थी। पिंकी और मैं वहां से निकले। वह अपना स्कूटर लेकर ही आयी थी जो उसने मुख्य द्वार के किनारे खड़ा कर दिया था। पिंकी ने मुझसे मुस्कुराते हुए दिन के बारे में पूछा, ' सो, हाऊ वास द डे, बाबू मोशाय ?   ये एक सामान्य सी बात है। लोग अक्सर ऐसे ही बातचीत शुरू करते हैं। राजेश खन्ना ने अपने इस बाबू मोशाय वाले डायलॉग से दुनिया भर के बंगालियों को पहचान सी दे दी है। ट्रैनिंग सेंटर में भी एक जगह अपना नाम लिखते वक्त डेस्क पर बैठे क्लर्क ने मेरा नाम देखकर कहा था, ' आईये, बाबू मोशाय, बैठिये.. पर आज मुझे लगा कि 'बाबू मोशाय' जो एक सम्मानजनक सम्बोधन है, गैर बंगालियों के लिए एक ऐसे चरित्र की पहचान बन गया है जो सफ़ेद धोती-कुरता पहने है, सिर पर घने बाल हैं, बीच से मांग निकाली हुई है। ये चरित्र पढ़ा-लिखा तो है परन्तु तर्क-वितर्क में उलझा हुआ है और आराम पसंद है। मैं सोचता रहा हूँ कि हमारे देश में बंगाली लोगों और बंगाल की संस्कृति को सही पहचान नहीं मिल पाई है। नाना के पास भी जो पंजाब से मित्रजन आते हैं, वे भी कुछ इसी तरह का नजरिया रखते हैं। वे बंगाल को क्रांतिकारियों की भूमि मानते हैं परन्तु ये भी कि बंगाल हर वक्त विरोध की राजनीति करता है। मैं एक दो बार घर आये पंजाबी मेहमानों से इस बात पर उलझ चुका हूँ। अक्सर ये बात यूँ शुरू होती है कि बंगालियों को मछली और चावल दे दो, बस वे खुश रहेंगे। हंसी-मजाक में उठायी गयी ये छोटी सी बात, एक मानसिकता को दर्शाती है। 

पिंकी ने अपना स्कूटर स्टार्ट कर दिया था और वह इशारे से मुझे पीछे बैठने को कह रही थी परन्तु मैं खुद ही में खोया हुआ था। तब पिंकी ने आवाज़ देकर कहा, ' आइये.. साहब.. बैठिये..   मैं जरा लड़खड़ाया और फिर स्कूटर की पिछली सीट पर बैठ गया। मैंने पीछे लगे लोहे के रिंग को कस कर पकड़ लिया। पिंकी निसंकोच हो तेज रफ़्तार में स्कूटर दौड़ा रही थी। मैं कुछ सिमटा सा था और यह भी नहीं कह पा रहा था कि, ' जरा आराम से चलाओ, इतनी जल्दी क्या है ? वैसे मैंने मेरे मन में आयी यह बात शायद पिंकी ने सुन ली थी। उसने अब जो कहा वह मेरी बात का ही तो उत्तर था।  उसने कहा, ' शाम के समय तो यहाँ चालीस-पचास से ऊपर चला ही नहीं सकते.. कितना समय लग जाता है कहीं भी पहुँचने.. '
 घर पहुँचने पर जैसे ही पिंकी ने स्कूटर का हॉर्न बजाया, आंटी ने दरवाजा खोल दिया। लगता है उन्हें आभास था कि बेटी आ गयी है। कहते हैं न कि माँ को अपने बच्चों की गंध मिल जाती है। उन्होंने हँसते हुए मेरा स्वागत किया, ' बेटा कैसे हो ? सब ठीक है न ? '  मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा, ' हाँ आंटी, सब ठीक है..  पिंकी स्कूटर खड़ा कर अपने कमरे में चली गयी। मैं और आंटी भीतर ड्राइंग रूम में आ गए। आंटी ने मुझे सोफे पर बैठने का इशारा किया। मैं कुछ संकोच के साथ बैठा था। आंटी ने मुझे सहज करते हुए कहा, ' आराम से बैठो.. ऐसे क्यों बैठो हो ?  मैं थोड़ा पीछे की ओर सरक गया और पीठ टिका कर बैठ गया। आज मुझे प्रतीत हुआ जैसे अपने ही घर में बैठा हूँ। मैंने कहा, ' आंटी, लवली कहाँ है ?  ' होगी यहीं कहीं ', उन्होंने ऐसे कहा मानों  कहना चाहती हों कि उसका किसी को कुछ पता नहीं होता, वो तो अपनी मर्जी की मालिक है। आंटी किचन की ओर बढ़ गयी, ' चाय लाती हूँ..' कहकर। मैंने सेंटर टेबल के नीचे रखी एक पत्रिका को निकाला और पन्ने पलटने लगा। मैं कोने के दरवाजे को भी कनखियों से देख रहा था। क्या मैं पिंकी का देखना चाहता था ? हाँ, मुझे लग रहा था कि किसी भी क्षण पिंकी कमरे में आ जाएगी। मेरे विचार श्रृंखला को आंटी की आवाज़ से ठोकर लगी। वे चाय लेकर आ गयी थीं। वही ट्रे में सरीखे से सजा कर। उन्होंने एक कप मेरे सामने किया। मैंने पहली चुस्की ली ही थी कि लवली लगभग दौड़ते हुए अंदर आ गयी।  उसने मेरी तरफ झांकते हुए  'हाय' कहा और अपनी माँ के पास बैठ गयी। हमेशा की तरह वह चहचहा रही थी। उसने मुझसे पंजाबी में कुछ कहा और फिर हँसते हुए कहने लगी, ' अब तक हमारी पंजाबी लैंग्वेज इतनी तो आ ही गयी होगी ?  हाँ, सच में इतनी पंजाबी तो मुझे आ ही गयी थी। उसने मेरा हालचाल पूछा। मैंने जवाब में सिर हिलाकर दिया था। थोड़ी देर तक आंटी से इधर उधर की बात हुई तब पिंकी भी आ गयी और आगे बढ़ कर खुद ही चाय ली और कुछ ऐसा भाव दिया कि मानों कह रही हो  ' घर आकर चाय पियो तभी ऑफिस की थकान मिटती है..'  पिंकी के आने पर आंटी अंदर चली गयी यह कहकर की उन्हें बहुत काम हैं। हम तीनों बात करते रहे। मुख्यतः दोनों बहनें मुझसे कोलकाता के बारे में पूछ रही थी। कोलकाता की मिठाई, कोलकाता की भीड़, कोलकाता की ट्राम, पार्क स्ट्रीट, कॉलेज स्ट्रीट और चाइनीज़ फ़ूड। मैं संभल संभल कर बता रहा था। लवली तो हमेशा ही नटखटपने में रहती थी। यहाँ भी उसके मन में कुछ शरारत ही घूम रही थी। मुझे इंतज़ार था कि वह कुछ न कुछ ऐसी बात करेगी ही। जहाँ दो बहनें होती हैं वहां छोटी नटखट और बड़ी समझदार होती है, यह मैं जानता था और समझता भी था परन्तु लवली में मुझे एक शरारती लड़की से कुछ अधिक दिखाई दिया।  शायद इसकी पढाई - लिखाई में रूचि नहीं है, शायद यह समझती है कि उसके पापा पैसे वाले हैं और उनका अच्छा खासा बिज़नेस है। उसे किसी बात की चिंता नहीं है। पिंकी के सम्बन्ध में मेरा विचार  कुछ दूसरा ही बनता जा रहा था। वह पापा के समृद्ध होते हुए भी नौकरी कर रही है। वह सामान्य लड़कियों की तरह रहती है। एक और बात जो मुझे आकर्षित कर रही थी वह थी पिंकी का दूसरों के प्रति संवेदनशील होना। उसका पहले दिन मेरे गेस्ट हाउस में आना और वहां की सुविधाओं की ओर देखना था। मानव की संवेदनशीलता ही इस प्रकार का व्यवहार दिखा सकती है। लवली तो वहां भी उतावलापन दिखा रही थी। मेरा मन खुद में ही उलझता जा रहा था। मेरे साथ ऐसा होता ही रहता है। मैं अपने आप से ही बातें करता जाता हूँ और तर्क-वितर्क के बीच कहीं कुछ ऐसा हो जाता है जो मुझे यानि मेरी सोच की अनियंत्रित आंधी को सामान्य स्तर पर ले आता है। आज फिर ऐसा ही हुआ। लवली चहकते हुए मेरे पास आयी और बोली, ' दादा, आप कभी गुरद्वारे गए हो ? नहीं न ? चलो कल आपको गुरूद्वारे ले चलते हैं ..'  फिर अपने आप ही उसने सारा कार्यक्रम बना दिया। उसके प्लान के अनुसार, पिंकी  शाम को ऑफिस से थोड़ा जल्दी निकलेगी और मुझे गेस्ट हाउस से सीधे गुरूद्वारे ले आएगी। लवली अपने से वहां पहुँच जाएगी। यही नहीं, मिनटों में उसने गुरूद्वारे से आगे का भी कार्यक्रम बना दिया था। वहां से स्कूटर उसके पास रहेगा। वह एक ऐसी जगह की बात कर रही थी जहाँ गोलगप्पे और चाट बहुत बढ़िया मिलते हैं। शुक्र है मुझे पता था कि बंगाल के पुचकों को उत्तर भारत में गोलगप्पे कहते हैं। अगर मुझे पता न होता तो लवली मेरी अज्ञानता पर खिलखिलाने लगती। ये चाट वाली जगह गुरूद्वारे से वाकिंग दूरी पर ही थी। मुझे और पिंकी को वहां पैदल पहुंचना था। हम दोनों शांत थे और लवली के बनाये कार्यक्रम को सुन रहे थे। फिर पिंकी ने मेरी और देखा और हम दोनों ही मुस्कुरा दिए।  इस मुस्कराहट में एक छोटा सा संवाद था कि लवली नाम की इस लड़की के सामने किसी की नहीं चलती। लवली यहीं न रुकी। वह दौड़ते हुए अपनी मम्मी के पास गयी और उन्हें सारा कार्यक्रम बता दिया। आंटी को भी पता था कि लवली की बात को टाला नहीं जा सकता।  मुझे उनकी आवाज़ सुनाई दी।  उन्होंने हलके गुस्से और कुछ नाराजगी भरे स्वर में अपनी भाषा में कुछ कहा था किन्तु मुझे समझ आ गया था। उन्होंने कहा था, ' जो मर्जी आये करो, पढ़ना-लिखना नहीं.. तू किसी की सुनेगी तो नहीं..अपनी बहन से कुछ सीख..  '  
( आज बस, आगे अगले गुरुवार , यहीं पर  .. )

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