' टू स्टेट्स - एक कहानी '
( ' Two States - A Story ' )
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चन्दर धींगरा
CHANDER DHINGRA
हर हफ्ते इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे..
( २१ ) अगले दो दिन इधर-उधर के श्राद्ध सम्बन्धी कार्यों में ही बीत गए। पंडित जी दोनों दिन आये और न जाने माँ से क्या-क्या करवाते रहे। बारह दिन बाद नाना का श्राद्ध था। इस दिन बहुत लोगों के आने की सम्भावना थी। माँ चाहती थी कि ये सब काम अच्छे से होना चाहिए। मेरे बाबा इस कार्यक्रम को घर पर ही करवाना चाहते थे परन्तु माँ का मानना था कि घर पर स्थान छोटा था और व्यवस्था ठीक से न हो पायेगी। एक बार पुनः बाबा को पराजित होना पड़ा और श्राद्ध के लिए रासबिहारी इलाके का गौड़िया मठ चुना गया। मैं और माँ वहां जाकर सब बात कर आये। ये एक पैकेज जैसी व्यवस्था थी। सब कुछ मठ वाले करने वाले थे हमें केवल भुगतान कर देना था। नियम अनुसार हमने अग्रिम भुगतान कर दिया। जब हम वहाँ पहुंचे तो किसी के श्राद्ध का कार्यक्रम चल रहा था। प्रबंधक ने बताया कि सुबह एक और अपरान्ह ने दूसरा श्राद्ध का कार्यक्रम था। उन्होंने ये भी कहा कि अच्छा हुआ की हम समय से पहुँच गए वर्ना शायद बुकिंग न मिल पाती। मुझे लगा कि शादी-ब्याह के लिए, यदि समय से बुक न किया जाये तो जैसे बैंक्वेट हॉल नहीं मिल पाते, वैसे ही श्राद्ध आदि के लिए इन मठों की भी बहुत मांग है। हम लोग श्राद्ध के कार्ड्स प्रिंटिंग प्रेस में छपने को देते हुए घर आये। प्रेस वाले को निर्देश दिया गया कि यह काम आज ही हो जाना चाहिए। शाम को घर पर कार्ड्स पहुँच गए। माँ विलम्ब नहीं चाहती थी। मेरे चंडीगढ़ लौटने से पहले वह चाहती थी कि ये कार्ड्स सबको नहीं तो कुछ खास खास लोगों को तो पहुँचा ही दिए जाएँ । माँ का मानना था कि मेरे लौट जाने पर वह फिर से अकेली पड़ जायगी। न जाने उसे क्यों लगता था कि मेरे बाबा ये सब काम न कर पाएंगे ?
माँ के साथ कार्ड्स वितरित करते हुए रविवार आ गया। आज मुझे आ लौट जाना था। माँ ने फिर से कहा कि रुक जाता तो अच्छा था परन्तु बाबा ने कहा, 'ड्यूटी तो ड्यूटी है..' माँ और बाबा दोनों की आँखे नम थी। टैक्सी में बिठाने के लिए दोनों आये। व्यस्तता ने मुझे ऐसा उलझा दिया था कि मैं सब कुछ भूल ही गया था। माँ के साथ यहाँ-वहां दौड़ता रहा। अब टैक्सी में निढाल हो बैठा तो पहली बात दिमाग में यह आयी कि पिंकी दिल्ली एयरपोर्ट पर आएगी तो ? यदि न आई तो समस्या हो जाएगी। मुझे एक बार फिर से फोन करना चाहिए था। वैसे वह बात की पक्की लड़की थी। उसने कहा था एयरपोर्ट पर मिलेगी, तो जरूर मिलेगी ही। उसे मेरी फ्लाइट की पूरी जानकारी थी। मैं नाहक परेशान हो रहा था, पिंकी नहीं आयी तो देखा जायेगा। बस से चंडीगढ़ निकल जाऊँगा परन्तु, बस से बहुत वक्त लग जायेगा। पहुँचते-पहुँचते रात हो जाएगी। सोचा, एयरपोर्ट पर किसी बूथ से उसे फोन कर लूंगा। मैं पूरी हवाई यात्रा में चिंतित सा रहा। परन्तु कुछ भी इधर उधर न हुआ। समय से दिल्ली पहुँच गया। एयरपोर्ट से बाहर निकल देखा, दूर एक ओर पिंकी मुस्कुरा रही थी। उसने हाथ उठा हेलो कहा और मेरा सूटकेस ले लिया। चंडीगढ़ से आया ड्राइवर साथ था। सूटकेस ले वह आगे आगे बढ़ा और हम दोनों उसके पीछे। ' सब ठीक ठाक .. कोई परेशानी तो नहीं हुई न ? मैंने ना में सिर हिलाया। उसने कहा कि मामा जी के घर से होते हुए जाना था, वे मुझसे मिलना चाहते थे। मुझे असुविधा सी लगी परन्तु मैं कुछ कह न सका सिर्फ यही कहा, ' मुझे कल सुबह क्लास अटेंड करनी है..' पिंकी हंसी, ' कल सुबह न ? हम लोग तो आज शाम को ही पहुँच जाएंगे..'
पिंकी के मामा का घर तो जोगिन्दर अंकल के घर से भी अधिक शानदार था। एक विशाल भवन था जो दिल्ली के महंगे इलाके में था। मैं देखता ही रह गया। उन्होंने बहुत गर्मजोशी से मुलाकात की। एक बार पुनः नाना के न रहने पर मुझे सांत्वना दी। वे नाना की बहुत प्रशंसा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग अब धीरे धीरे चले जा रहे थे। उन्होंने कहा,' इन लोगों ने देश को आज़ाद कराया और आज के नेताओं को देखो, कैसे स्वार्थी हैं ? उनकी बातों में एक सामान्य नागरिक की वाणी थी। उनका घर और वैभवता देख मैं सोचने लगा, ये सरदारजी बड़ी बड़ी बातें तो कर रहे हैं परन्तु खुद कैसे कैसे हथकंडे किये होंगे जो ऐसी भव्यता हासिल की है ? ये भी तो देश की आज़ादी के बाद दूर पंजाब के किसी गांव से दिल्ली में विस्थापित बन आये होंगे और छोटा-मोटा व्यापार शुरू किया होगा। मैंने चंडीगढ़ में जोगेन्दर अंकल का घर देखा और अब यहाँ दिल्ली में इनका। मैं आश्चर्यचकित था। हम बंगाल में इतना कुछ हासिल न कर सके। हालात तो दोनों राज्यों में एक से थे। क्या हम लोग केवल राजनीति ही करते रह गए और नए मिले अवसरों का लाभ न ले सके ? मुझे यह भी लगा कि न जाने क्यों हम बंगाली लोग मेहनत करने में पीछे रह गए ?
हमने वहां लंच किया। एक बेहतरीन पंजाबी लंच। घर से निकलते समय पिंकी की मामी ने मेरे हाथ में एक पैकेट पकड़ाया। मैंने पिंकी की ओर जिज्ञासा से देखा। उसने कहा रख लीजिये। मामी ने प्यार जतलाते हुए कहा, ' हमारे घर पहली बार आये हो...खाली हाथ थोड़े ही जाओगे..' मैंने संकोच के साथ ' थैंक यू आंटी' कहा। हम कार में पीछे की सीट पर बैठ गए और चंडीगढ़ की ओर निकल गए। कार थोड़ी दूर ही गयी होगी कि मैंने कहा, ' देखें, तुम्हारी मामी जी ने क्या दिया है ? मैंने पैकेट खोला। सुन्दर और महँगा सूट का सेट था। मन ने एक बार फिर से प्रश्न किया। पैसे वाले हैं तो ऐसी महंगी गिफ्ट ही देंगे, कोई दूसरी गिफ्ट जैसे पुस्तक आदि देने का विचार इन सरदारजी लोगों को थोड़ा ही आएगा ?
रास्ते में फिर से विविध विषयों पर बातें हुई। पिंकी नाना जी के अंतिम संस्कार के बारे में जानना चाहती थी। मैंने उसे सब बताया। मैंने गुरूद्वारे से आये शव वाहन और अंतिम यात्रा में एक वरिष्ठ मंत्री जी के आने के बारे में भी बताया और ये भी कि बहुत लोग आये थे। पिंकी प्रभावित थी परन्तु वह चाहती थी कि इतने बड़े स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि और अधिक सम्मान से दी जानी चाहिए थी। उसने कहा, ' तुम्हारे नानाजी यदि पंजाब में होते तो देखते.. कैसे भव्य रूप से विदा किये जाते..' मैं उसका मुख देखता रह गया। वह सत्य कह रही थी। मैंने नाना से पंजाब में शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों को दिए जाने वाले सम्मान के बारे में बहुत कुछ सुना हुआ था। पंजाब ने भगत सिंह की माँ को 'पंजाब माता' के ख़िताब से सम्मान दिया है। बातों बातों में अमृतसर के जलियांवाला बाग़ की चर्चा भी हुई। अचानक पिंकी ने उछलते हुए कहा, ' चलो तुम्हें अमृतसर घूमाकर लाते हैं..' अगले संडे चलते हैं.. स्वर्णमंदिर, जलियांवाला बाग और वागा बार्डर..' उसके निर्मल उत्साह को मैं देखता ही रह गया। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ' अरे.. मेरे लिए इतना करोगी.. पर जब तुम कलकत्ता आओगी तो मैं इतना कुछ न कर पाऊंगा.. कलकत्ता का हिसाब ऐसा नहीं है..' पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' मत करना यार.. ' उसके मुख से यार शब्द सुनना मुझे अच्छा लगा। ' तो फिर संडे सुबह मैं, तुम और लवली.. अमृतसर ट्रिप.. फाइनल.. ओके ..' पिंकी का उत्साह बढ़ता जा रहा था। मैं भीतर ही भीतर खुश हो रहा था कि चलो, जलियांवाला बाग़ घूमना हो जायेगा। मैंने नाना से इसकी पूरी कहानी सुनी हुई थी। मुझे गर्व होता था कि कैसे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ने इसका विरोध किया था और अंग्रेज़ों द्वारा दिए गए सम्मान को लौटा दिया था। मेरे नाना जब भी दिल्ली आते तो मौका मिलते ही अमृतसर का चक्कर लगा लेते। वह अमृतसर के खाने की बहुत प्रशंसा किया करते थे। माँ उन्हें चिढ़ाने के लिए कभी कभी कहती, ' तुम तो पिछले जन्म के पंजाबी हो .. '
यूँ ही हँसते हंसाते हम चंडीगढ़ की ओर बढ़ रहे थे। मैं कलकत्ता के अपने घर और नाना के चले जाने की वेदना को भूल गया था। पिंकी के कारण ही यह हुआ था। अचानक ड्राइवर ने पंजाबी भाषा में पिंकी से कुछ कहा और पिंकी ने मुझसे पूछा कि वो रिसोर्ट जहाँ हमने दिल्ली जाते समय लंच किया था आ रहा था और क्यों न हम छोटा सा ब्रेक वहीँ ले लें। मुझे लगा मानों पिंकी ने मेरा मन पढ़ लिया था क्योंकि मैं स्वयं ही इस ढाबे के बारे में सोच रहा था। हम लोग वहां कुछ देर रुके और गरम गरम पकोड़े और चाय ली। मुझे दिखा कि आसपास की टेबल्स पर भी कुछ ऐसा ही चल रहा था। मन में आया कि पिंकी से चिकन के पकोड़े और फिश फ्राई के बारे में पूँछू पर संकोच कर गया। मुझे अपने कलकत्ता की याद आ रही थी कि कैसे कभी कभी हम वहां गरियाहाट जाकर, एक खास जगह से फिश फ्राई खाया करते थे। ये पनीर और आलू के पकोड़े उसका मुकाबला नहीं कर सकते थे। हरी पुदीने की चटनी खाते वक्त मुझे अपनी सरसों की सॉस जिसे कासुंदी कहा जाता है, याद आई। मैंने पिंकी से पूछा कि इस तरफ पंजाब में फिश आदि नहीं मिलते। पिंकी ठहाका लगा हंसने लगी। उसने कहा, ' वाह, हमारे बंगाली बाबू मोशाय को अपनी प्यारी मछली की याद आ गई... थोड़ा रुको, अगले संडे अमृतसर जा ही रहे हैं, तुम्हें असली अमृतसरी फिश खिलाएंगे...उसे खा कलकत्ता की मछली भूल जाओगे...'
( आज बस, आगे यहीं पर, अगले गुरुवार को.. )