' टू स्टेट्स - एक कहानी '
( Two States - A Story )
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चन्दर धींगरा
CHANDER DHINGRA
हर हफ्ते इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे..
( २० ) फ्लाइट समय से कलकत्ता एयरपोर्ट पर उतरी। बाबा मुझे लेने आये हुए थे। टैक्सी से हम दोनों कुछ समय में घर पहुँच गए। माँ के पांव छुए तो उन्होंने गले लगा लिया और रोने लगी। मैं नाना के चले जाने के दुखद समाचार मिलने से अब तक रोया न था। शायद मेरे आँसू सही अवसर की प्रतीक्षा में थे। माँ से मिलना वही अवसर था। माँ से लिपट मैं भी रोने लगा। आंसू थे कि बहे जा रहे थे। माँ को सहसा अहसास हुआ कि मैं बहुत दूर से अकेला आया हूँ। उन्होंने खुद को संभाला और मुझे ढाढ़स देने लगी। मेरा हाथ पकड़ वे मुझे नाना के कमरे में ले गयी। यहाँ उनका पार्थिव शरीर रखा हुआ था। माँ ने बताया कि अंतिम कार्य मेरी प्रतीक्षा में रुका हुआ था। नाना को इस रूप में देखने की मैंने कभी कल्पना न की थी। मुझे लगा कि वे शांत सोये हुए थे, जैसे हमेशा थक जाने पर सो जाते थे और अभी उठकर मुझसे सुखबीर सिंह, उसके चंडीगढ़ वाले भाई, उनके परिवार और पंजाब के बारे में पूछेंगे। क्षण भर को मैं भूल गया कि वे चिरनिद्रा में थे। मैं सच में उनके उठने और बोलने की प्रतीक्षा में था परन्तु ऐसा न होना था और न हुआ। मेरे नाना, जिन्होंने हमारी आज़ादी की लड़ाई में सबके साथ मिलकर भाग लिया था, जिन्होंने कई बार जेल यात्राएं और कई तरह की प्रताड़नाएं सही थी, आज अपने में हज़ारों अनकही कहानियां और स्वतंत्र भारत के लिए कई कई अपूर्ण सपने लिए चुपचाप हमेशा-हमेशा के लिए सोये थे। माँ लगातार रोये जा रही थी। मेरे बाबा ने हम दोनों को सँभालने की कोशिश की और हमें कमरे से बाहर ले आये।
घर पर सगे-सम्बन्धियों, आसपड़ोस के साथ-साथ कई अन्य लोग आये हुए थे। नाना के परिचितों और प्रशंसकों का एक बहुत बड़ा दायरा था। वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे एवं राज्य सभा के सदस्य भी रह चुके थे। मुझे घर में ऐसी ही भीड़भाड़ की आशा थी। मेरे यहाँ पहुँचने के बाद से ही हलचल आरम्भ हो गयी थी। शव यात्रा के सारे प्रबंध हो चुके थे। मैं घर के किसी कोने में एकांत में कुछ क्षण बैठना चाहता था परन्तु माहौल कुछ ऐसा था कि सभी विलम्ब नहीं चाहते थे। मुझे मेरे चाचा का स्वर सुनाई दिया, ' केवराटोला में कभी कभी बहुत भीड़ होती है .. और विलम्ब किया तो आधी रात के बाद नंबर आएगा..' माँ ने उन्हें रोकते हुए कहा, ' बेटा अभी अभी दूर से आया है..चंडीगढ़ से दिल्ली और फिर कलकत्ता.. उसे साँस तो ले लेने दो..' चाचा खामोश हो गए, कुछ ऐसा सोचकर कि उनका कर्तव्य था सो उन्होंने कह दिया। माँ ने मुझसे पूछा कि मैंने कुछ खाया था कि नहीं ? मैं माँ को देखता रह गया। ये माँ ही होती है जिसे अपने पिता के शव के दूसरे कमरे में होने पर भी दूर से घर लौटे बेटे ने कुछ खाया है या नहीं, यह चिंता रहती है।
मैंने माँ को आश्वस्त किया कि मैंने खाना खाया हुआ था और मैं ठीक था। माँ ने मुझे तैयार होने को कहा और फिर बाबा से कहा कि अब शव को ले चलना चाहिए। मैं ऊपर वाले कमरे में चला आया। यहाँ मेरा और माँ-बाबा के साथ साथ सटे दो कमरे थे। मैंने माँ के कमरे में रखे फोन से जोगेन्दर अंकल का नंबर मिलाया और उन्हें अपने ठीक ठाक से कलकत्ता पहुँच जाने की खबर दी। उन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाते हुए बताया कि लुधियाना से उनके बड़े भाई सुखबीर भी कलकत्ता आने की सोच रहे थे और वे मेरी माँ से एक बार फिर से बात करेंगे। जोगेन्दर अंकल से फोन पर बस इतनी ही बात हुई। हमेशा की तरह मुझे अकेलापन सा लग रहा था। मैंने अपनी पॉकेट से छोटी सी डायरी निकाली। इस डायरी में खास टेलीफोन नंबर रखा करता था। मैं जल्दी में किसी एक नंबर को खोज रहा था। मुझे नीचे उतर अपनी माँ और बाबा के साथ नाना की अंतिम यात्रा के कार्य में जुटना भी था। परन्तु मैं एक फोन कर लेना चाहता था। मैंने दिल्ली का एक नंबर घुमाया। ये पिंकी के मामा के घर का नंबर था जो उसने मुझे दिल्ली एयरपोर्ट पर लिखवाया था। जिन्होंने फोन उठाया न मालूम कौन थे परन्तु मेरे मुँह से कलकत्ता का नाम सुनते ही उन्होंने अपनी ओर से अफ़सोस जाहिर करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि देश ने एक बहुत बड़े शख्स को खो दिया था। उन्होंने बताया कि कई साल पहले जब नाना दिल्ली आये थे तब वे उनसे मिलने बंगाल भवन गए थे। मैं समझ गया था कि वे बंग भवन कहना चाह रहे थे क्योंकि दिल्ली आने पर नाना यही रुकते थे। फोन पर पिंकी के मामा ही थे। वे अंग्रेजी में बात कर रहे थे। मैं तो यस सर- यस अंकल ही कर रहा था। अपने भीतर मुझे पिंकी से बात करने की उत्सुकता थी। संकोच करते हुए मैंने कहा, ' पिंकी है, अंकल ? पिंकी फोन पर आयी और उसने मेरा हालचाल पूछा। मेरी तरह वह भी कुछ जल्दी में थी। उसने कहा कि बाद में अच्छे से बात करेंगे। फोन रख मैं नीचे आ गया। शव यात्रा की तैयारी हो चुकी थी। नाना जीवनपर्यन्त रूढ़िवादिता का विरोध करते रहे परन्तु आज उनकी बेटी अंतिम संस्कार पूरे हिंदू विधि-विधान और मान्यताओं के साथ करना चाहती थी। दो पंडित आये हुए थे। वे माँ को पग पग पर सलाह दे रहे थे। बाबा हमेशा की तरह लाचार और तटस्थ से, माँ द्वारा की जा रही व्यवस्था को देख रहे थे। मुझे सुनाई दिया कि मृत देह को ले जाने हेतु जो वाहन आने वाला था,वह स्थानीय गुरूद्वारे से बुलाया जा रहा था। शव यात्रा निकलने को ही थी कि खबर आयी कि राज्य शासन के एक बड़े मंत्री जो श्मशान घाट पहुँचने वाले थे,अब यहीं आ रहे थे और श्मशान घाट तक साथ जाने वाले थे। यात्रा को रोक दिया गया। बाबा ने कहा कि इस तरह विलम्ब करना उचित नहीं परन्तु माँ ने कहा कि एक बड़े मंत्री राज्य की मंत्री सभा का प्रतिनिधित्व करने आ रहे थे, तो रुकना ही होगा और साथ ही वे नाना के पुराने मित्र भी थे। कुछ ही समय में मंत्री जी की गाड़ी और दो अन्य गाड़ियां वहां पहुंच गयीं। हम लोग उनकी प्रतीक्षा में बाहर ही खड़े थे। हमारा घर मुख्य सड़क से भीतर आती हुई गली के एक छोर पर है। मंत्री जी के साथ पुलिस के अधिकारी भी थे। उन्होंने माँ और मुझे सांत्वना दी। मेरे बाबा साथ ही खड़े थे। उन्होंने मेरे चंडीगढ़ से आने और विलम्ब के बारे में बताया। मंत्री जी ने साथ आये पुलिस अधिकारी से बात की और फिर माँ को बताया कि श्मशान घाट में किसी तरह की देरी और असुविधा न होगी। वहां पर सूचना भिजवा दी गयी थी। शव यात्रा आरम्भ हो गयी। घर से मुख्य सड़क तक मंत्री जी साथ चले फिर अपनी गाड़ी में बैठ गए। गुरूद्वारे वाले वाहन मैं, बाबा और चाचा तथा अन्य गाड़ियों में सभी लोग केवराटोला श्मशान घाट की ओर बढ़ गये। हमारे घर के आसपास रहने वाले परिचित लड़के, शव वाहन के ऊपर आ गए थे। वे हरि बोल..हरि बोल की ध्वनि कर रहे थे। उनके हाथ में कुछ बड़े पैकेट मुड़ी के थे जो पूरी शव-यात्रा में वे लोग बिखेर रहे थे। घर से चलते वक्त कुछ सिक्के भी बिखेरे गए थे जिसे बटोरने के लिए आसपास रहने वाले गरीब बच्चे पहले से ही तैयार थे। हरि बोल.. हरि बोल..की ध्वनि सुन मुझे कलकत्ता में होने वाली राजनैतिक जलूसों में की जाने वाली चोलबे ना..चोलबे ना.. की ध्वनि सुनाई दे रही थी। ये चोलबे ना..चोलबे ना.. उन दिनों बहुत प्रचलित था और विरोध प्रदर्शन का सूत्र जाना जाता था।
मंत्री जी और पुलिस के साथ होने के कारण सभी कार्य सुविधापूर्वक संपन्न होता चला गया। कुछ घंटों बाद कार्य पूर्ण कर सब लौट आये। घर पहुँचने पर लगा कि मुझे अब विश्राम की आवश्यकता थी। माँ ने कहा कि वे मेरे उच्च अधिकारियों से बात करेंगी कि मुझे वापिस न जाना पड़े और मुझे इस प्रशिक्षण के अगले सत्र में भेजा जाये। उन्होंने मंत्री जी को भी इस सम्बन्ध में बताया था। मेरे कार्यालय के अधिकारियों के साथ रोबी दा भी आये थे। उन्होंने माँ को आश्वस्त किया था कि चिंता न करें। मैंने जब ये सुना तो अपना विरोध जताया। मैंने कहा कि आधा कोर्स हो चुका था, इसे पूरा कर लेना ही ठीक था और मैं पूरा सामान भी लेकर नहीं आया था। माँ ने कहा, ' देखा जायेगा..' मैं कहीं न कहीं मन बना चुका था कि निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही लौटूंगा। बात करने को मेरा लहजा देख, माँ भी समझ चुकी थी कि इस विषय को यहीं रोकना उचित होगा और यह कि मैं मन बना चुका था। उन्हें लग रहा था कि मैं अब किसी की भी नहीं सुनने वाला था।
( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )
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