' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '---
चन्दर धींगरा
CHANDER DHINGRA
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे...
( १८ ) मैंने ऐसा महसूस किया था कि जब भी मैं जोगेन्दर अंकल-आंटी के घर पर कुछ समय बिताकर लौटता तो खुद को अधिक अकेला सा पाता था। पंजाबियों के प्रति मेरी सोच कुछ ऐसी रही थी कि ये लोग बहुत मेहनती होते हैं और व्यापार आदि में बहुत सफल हैं। मैं हमेशा से केवल सिखों को ही पंजाबी कहता रहा हूँ। अधिकतर बंगाली यही समझते हैं। इन सिखों का भारतीय सेना में बड़ा योगदान है। मेरी इधर-उधर की जानकारी यह भी थी कि बंगाल के बाद, देश के स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब का सबसे बड़ा योगदान रहा है। नाना से मुझे पंजाब और पंजाबियों के सम्बन्ध में कई कहानियां सुनने को मिलती रही हैं। मुझे यह भी लगता रहा है कि बौद्धिक स्तर पर ये सरदारजी लोग पीछे हैं। खाना-पीना और मौज मस्ती ही इनकी प्राथमिकता है। पिछली शाम ने मुझे अलग से सोचने पर मज़बूर किया कि गीत-संगीत में भी इनकी रूचि है। मेरा मन हमेशा मुझे उलझा देता है। एक सामान्य सी बात से आरम्भ हो, मैं न जाने कहाँ तक निकलता जाता हूँ। आज भी ऐसा ही हो रहा था। मैंने सोचा कि यह तो एक पंजाबी परिवार के साथ मेरा अनुभव है। अधिकतर सिख लोग ऐसे न होते होंगे ? मेरी इस धारणा के पीछे सरदारों के साथ जुड़े हुए हंसी-मज़ाक के किस्से भी थे जो यार-दोस्तों की महफ़िलों में चलते हैं। आज पहली बार मुझे ऐसा लगा कि बिना अधिक जानकारी लिए हमें समाज के किसी वर्ग के बारे में कोई धारणा नहीं बना लेनी चाहिए। यह बात बिहारियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतियों के बारे में भी प्रासंगिक है। मैं अच्छे से समझता था कि हमारा बंगाली वर्ग इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है ?
नाना से ऐसे विषयों पर अक्सर बातें होती रहती हैं। उनका एक संतुलित दृष्टिकोण रहा है। इस विषय पर सोचते हुए मैं उन्हें ही याद करने लगा। न जाने अब उनकी सेहत कैसी होगी ? मैंने माँ को फोन करने की सोची। आज जब यह सब लिख रहा हूँ, आपस में संपर्क कितना सरल हो चुका है। सबके हाथ में मोबाइल फोन है। कहीं भी कभी भी किसी से संपर्क किया जा सकता है परन्तु उन दिनों यह इतना सरल न था। मोबाइल गिनेचुने लोगों के पास ही होता था। मैं बाहर आया और गेस्ट हाउस के दाहिने छोर से आगे निकल एक टेलीफोन बूथ में चला आया। यह एक छोटी सी दैनिक सामान की दुकान थी और यहीं से मैं पहले भी घर पर फोन कर चुका था। फोन मिलाया, दूसरी ओर से माँ की आवाज़ सुनाई दी। वे शायद मेरे फोन की ही प्रतीक्षा कर रही थीं। मेरे हेलो कहते ही उन्होंने मेरा हालचाल पूछना शुरू कर दिया। उन्हें मेरे खानपान की चिंता थी। हर माँ का दिल ऐसा ही होता है। मैंने किसी तरह उन्हें आश्वस्त किया कि सब ठीक ठाक है और उनसे नाना के बारे में पूछा तो वो विचलित हो गयीं। उन्होंने बताया कि वे अभी भी अस्पताल में थे बल्कि पिछली रात से उन्हें आई सी यू में रखा गया था। कई तरह की स्वास्थ्य सम्बन्धी जटिलताएं देखी जा रही थीं। उनकी बढ़ती आयु और दुर्बलता सबसे बड़ी समस्या थी। माँ ने बताया कि उन दिनों वे बहुत दबाव में थीं। सब कुछ उन्हें ही संभालना पड़ रहा था। मैंने बाबा के बारे में पूछा तो जैसा अपेक्षित था, माँ से वैसा ही उत्तर मिला कि उनका होना न होना एक सामान था। उन्हें ही घर-बाहर सब अकेले देखना पड़ रहा था। बाबा के बारे में मुझे अपनी माँ की ये बात अच्छी न लगी। मेरे बाबा ऐसे नहीं हैं पर माँ उन्हें कुछ करने ही न देती होंगी। बात समाप्त करने से पहले मैंने कहा कि क्या मैं वापिस आ जाऊं तो उन्होंने जोर देकर कहा कि नहीं, वे संभाल लेंगी।
उस रात नींद न आयी। मैं अपने घर, माँ, बाबा और नाना के बारे में ही सोचता रहा। अगला दिन भी ऐसे ही बीत गया। मुझे लग रहा था कि इस समय मुझे घर पर अपने माँ-पिता के पास होना चाहिए था। मैं इस ट्रेनिंग से भी धीरे-धीरे ऊब रहा था। ऐसा लगता ये सब लेक्चर बेमानी हैं। मुझे इस विषय पर पिंकी की कही बातें अब सार्थक लग रही थीं। रात इधर-उधर होते कटी। अगली सुबह भी बोझ सी लगी। मन किया कि बच्चों सा कोई बहाना बनाऊँ और क्लास न जाऊँ। परन्तु बेमना और लाचार, मैं यह सोचकर क्लास में चला गया कि दिन भर कमरे में अकेले पड़ा भी क्या करूँगा ? क्लास का पहला घंटा अभी आधा भी न हुआ था कि एक चपरासी सूचना दे गया कि मेरा फोन आया है। मैं तेजी से निकला। न जाने किसका फोन है ? शायद पिंकी का हो ? क्लास रूम के दाहिने छोर पर ऑफिस में एक ओर फोन रखा था। मैंने हेलो कहा तो उधर से जोगेन्दर अंकल की आवाज़ आयी। उन्होंने धीरे से कहा, ' बेटा कैसे हो ? मैंने सीधे सीधे कहा, ' हाँ अंकल मैं बिलकुल ठीक हूँ..' वे क्षण भर को शांत रहे। मैं भी सोचने लगा कि उन्होंने अचानक फोन क्यों किया ? अंकल ने बात आगे बढ़ाई, ' बेटा, एक ख़राब खबर है, तुम्हारे नानाजी नहीं रहे..' खराब खबर का सुनते ही मुझे अनुमान हो गया था कि कौन सी खबर है। मैंने उनसे पूछा कि ये कब हुआ। उन्होंने बताया कि अभी लुधियाना से सुखबीर भाई साहब का फोन आया है। मेरी माँ ने उन्हें फोन किया था। उन्होंने मुझे ढाढ़स बांधते हुए कहा कि उन्होंने भी कलकत्ता में मेरे घर पर बात की थी। वे मेरा कलकत्ता जाने का इंतेज़ाम कर रहे थे। उन्होंने एक बार फिर से मुझे तसल्ली दी और कहा कि सब वाहे गुरूजी की इच्छा है, इंसान के हाथ में कुछ नहीं होता, धैर्य रखना होता है। किसी अपने की मृत्यु पर ऐसी बातें हम सब एक-दूसरे से कहते रहते हैं। प्रेम निवेदन और सांत्वना प्रदर्शन के ही कुछ शब्द हैं जो संभवतः दुनिया के प्रत्येक समाज, प्रत्येक भाषा में एक से हैं।
( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को यहीं पर )
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