टू स्टेट्स - एक कहानी
TWO STATES -A STORY
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चन्दर धींगरा
CHANDER DHINGRA
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे...
( १७ ) ट्रेनिंग को आरम्भ हुए आधा समय बीत चुका था। मुझे ऐसा लगने लगा था कि यह एक सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है। बैंक और अन्य विभागों के अधिकारियों को इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में समय समय पर भाग लेना ही होता है। मुझे पिंकी की बातें याद हो आयी कि सबसे पहले काम के प्रति दायित्व और उत्साह जाग्रत किया जाना चाहिए और उसके बाद ही सेवाओं को बेहतर बनाने के प्रयास होने चाहिए। ट्रेनिंग में आये साथियों से बात होती तो यही निष्कर्ष निकल कर आता कि रूटीन ट्रेनिंग है सो करनी पड़ती है। अधिकतर साथी इसे एक माह की 'पेड लीव' के रूप में देखते थे।
उस शाम हम सब दोस्त मिलकर उस प्रसिद्द स्थान पर गए। यह चंडीगढ़ नगर से बाहर की ओर जा रहे मार्ग पर है। गेस्ट हाउस के मैनेजर ने एक छोटी वातानुकूलित बस की व्यवस्था करवा दी थी। यह जगह नगर से लगभग पंद्रह-बीस किलोमीटर बाहर थी। यह एक रिसोर्ट है जहाँ लोग एक दो दिन के विश्राम या मौज़ मस्ती के लिए आते हैं। यहाँ का रेस्टोरेंट बहुत विख्यात है। कहना गलत न होगा कि यहाँ का वातावरण बहुत ही सुन्दर था और हर दृष्टि से विकसित था। उस दिन हमारी क्लास समय से पहले समाप्त कर दी गयी थी। शाम तक हम लोग वहाँ घूमते- घामते रहे। फिर उस प्रसिद्द रेस्टोरेंट में डिनर हेतु गए। हम सभी बहुत प्रभावित थे। जगह महंगी थी परन्तु सभी का यह मानना था कि अच्छी चीज़ चाहिए तो दाम देना ही पड़ेगा। वापिस लौटते समय मैं सोच रहा था कि कल पिंकी को इस जगह के बारे में बताऊंगा और उससे कहूंगा कि उसे भी यहाँ घूमने आना चाहिए। फिर दिमाग ने मेरी हंसी उड़ाई, ' तुम क्या समझते हो, अंकल- आंटी अपनी बेटियों को लेकर यहाँ न आये होंगे ? तुम तो एक शाम के लिए आये हो, वे लोग तो वीक-एन्ड बिताकर गए होंगे.. ' एक बार को मुझे लगा कि ऐसी सुन्दर जगह पर ट्रेनिंग वाले दोस्तों के साथ नहीं बल्कि पिंकी जैसी दोस्त के साथ आना चाहिए। शायद कभी संजोग बन जाये और हम दोनों यहाँ आयें।
अगले दिन पहले की तरह ही प्रतीक्षागत रहा। मैं सोचता रहा, ऑफिस से लौटते हुए, पिंकी यहाँ मेरे गेस्ट हाउस में आएगी और हम दोनों स्कूटर से उसके घर जायेंगे। मैं क्लास के समाप्त होते ही तैयार हो गया। बार बार घड़ी पर नज़र जाती। समय आगे बढ़ रहा था और साथ ही मेरी बेचैनी भी। देरी होती जा रही थी। पिंकी को अधिक से अधिक छह बजे तक आ जाना चाहिए था। अचानक नीचे गेट से सूचना आयी कि कोई गेस्ट आया है। मैं समझ गया कि पिंकी पहुँच गयी है। एक बार आईने में खुद को देखा, बाल सँवारे और तेजी से गेट की ओर बढ़ आया। बाहर पिंकी तो नहीं थी, अंकल अपनी कार के साथ टिके प्रतीक्षा कर रहे थे। ' मैं इस ओर आया हुआ था, तुम्हें लेते हुआ जाना था..परन्तु काम में थोड़ा विलम्ब हो गया..' उन्होंने कहा और मुझे कार में सामने बैठने का इशारा किया। घर पहुँचने पर देखा कि सभी इंतज़ार कर रहे थे। पिंकी भीतर कमरे में थी। हम लोगों के पहुँचने की आवाज़ पर वो तेजी से बाहर आयी। उसने कहा, ' इतनी देर कर दी.. पापा ही देर से आये होंगे.. मैं ही आपको स्कूटर से लेती आती तो ठीक होता.. ये पापा ऐसे ही काम में फँस जाते हैं और लेट हो जाते हैं..' पिंकी एक साँस में बोल गयी। जब हम किसी के प्रति उत्सुकता और बेचैनी में होते हैं तो हमें दूसरे में भी इसी तरह के भाव दिखते हैं। मेरी मनस्थिति भी ऐसी ही थी। शायद पिंकी भी मेरी ही तरह उत्सुक थी। मेरी मनस्थिति का एक दूसरा पहलू भी था जो मुझे कह रहा था कि एक बंगाली लड़के के प्रति एक पंजाबी लड़की क्यों उत्सुक और आकर्षित होगी ? मेरे मन का यह पक्ष मुझे भावुक होने से रोक रहा था और व्यवहारकुशल बना रहा था। वह मुझे समझा रहा था कि मुझे पारिवारिक संबंधों की मर्यादा में रहना चाहिए और इससे अधिक कुछ न सोचना चाहिए।
आंटी ने बाहर बरामदे में सबको बुलाया। उन्होंने वहाँ एक ओर कुर्सियां लगा दी थी। बीच में एक छोटी गोल मेज थी जिस पर सुन्दर कड़ाई किया हुआ टेबल क्लॉथ बिछा था। हम सब आराम से बैठ गए। आंटी ने सबको कोल्ड ड्रिंक्स दिया। अंकल ने अपने लिए गिलास में कुछऔर ही लिया, शायद विस्की थी। उन्होंने हल्के से मेरी ओर भी इशारा किया। मैंने मुस्कुराते हुए न कहा। मुझे बच्चों के बीच उनका इस तरह विस्की पीना उचित न लगा परन्तु पिंकी-लवली सामान्य दिख रही थी। लगता है अंकल का इस तरह का गिलास लेना, हर शाम की बात थी। अंकल ने कुर्सी पर टिकते हुए जोर देते हुए कहा, ' तो कौन शुरू कर रहा है ? आंटी ने कहा, ' शुरू तो लवली ही करती है.. लवली को कुछ संकोच नहीं था। उसने हिंदी फिल्म का गाना गाया। पर पिंकी ने मुझे धीरे से बताया कि वह गुरुद्वारों में गया जाने वाले भजन पर आधारित गीत था। लवली की आवाज़ मधुर थी और वह कुछ सुनाने को उत्सुक भी हो रही थी। उसने एक और फिल्म का गाना भी सुनाया। इस गाने को आंटी भी हलके हलके साथ में गुनगुना रही थीं। अंकल ने कहा, ' चलो जी अब बंगाली गाना सुनते हैं..' उनका इशारा मेरी ओर था। मैं अभी सहज न था। मैंने पिंकी से कहा कि वह कुछ सुना दे, उसके बाद मैं। पिंकी ने क्या सुनाऊँ करते हुए एक फ़िल्मी गाना सुनाया। लवली की तरह उसका गला भी मधुर था। जो गाना उसने सुनाया वह एक पुरानी हिंदी फिल्म का प्रचलित गाना था और कई बार सुना हुआ था। वह सहज रूप से गा रही थी। हिंदी गानों मेरी रूचि कम ही है पर न जाने क्यों मुझे पिंकी का गाया यह गाना प्रभावित कर गया था। अब मेरी बारी थी। मैं रबिन्द्र संगीत के एक गीत के साथ तैयार था। गाते गाते मैंने देखा लवली तो चंचल हो रही थी परन्तु पिंकी संजीदा थी और आँखे मूँदकर सुन रही थी। मेरी इस गीत पर अच्छी पकड़ थी। मैं सहजता से गा रहा था। गीत की समाप्ति पर लवली हंसने लगी। ' ये तो दुखभरा गाना था, कुछ मस्ती भरा सुनाइए.. ' आंटी ने उसे चुप रहने को कहा। पिंकी ने इस गीत का अर्थ जानना चाहा, उसने कहा, ' मुझे तो कुछ गंभीर बात सुनाई दे रही थी, इस गाने में... ' मैंने उसे बताया कि इस गीत में अपने मन की अशांति और असंतोष के लिए ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना की गयी है। पिंकी क्षण भर को रुकी और फिर सोचने लगी। उसने कहा, ' दादा, एक गाना और..' उसकी इस मांग पर लवली मुंह बनाने लगी, ' एक और इस तरह का गाना .. मुझे तो नींद ही आ जाएगी..' पिंकी ने कहा कि मुझे इस नादान लड़की की बातों की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए। मैंने एक और रबिन्द्र गीत सुनाया। अंकल-आंटी मौन से बैठे थे मानों घर आये अतिथि के सम्मान में मज़बूर हों। खाना खा, हम सब उठे तो अंकल ने कलकत्ता में सब का हालचाल जानना चाहा। मैं कहा,' दो दिन पहले माँ से बात हुई थी वैसे तो सब ठीक हैं परन्तु नाना बीमार हैं.. उन्हें इमरजेंसी में हॉस्पिटल में ले जाना पड़ा था.. देखो, अब कल फिर बात करूँगा..'
( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )
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