' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
---
चन्दर धींगरा
CHANDER DHINGRA
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...
( १४ ) गुरूद्वारे से निकलकर पिंकी एक होटल में ले आयी। यह स्थान मुख्य शहर से कुछ दूर लग रहा था क्योंकि स्कूटर पर २०-२५ मिनिट्स लग गए थे। यह होटल ढाबानुमा या हाईवे के रिसोर्ट जैसा था। काफ़ी भीड़भाड़ थी यहाँ। सुन्दर माहौल था। साफ-सफाई भी दिख रही थी। बाहर बहुत सी कुर्सियां, बेंचें और टेबल्स लगी हुई थी। सर्विस करने वाले लड़के चुस्त और स्मार्ट दिख रहे थे। कुछ लड़कियां भी थी सर्विस टीम में। इन सर्विस वालों ने एक जैसी टी-शर्ट पहनी थी। लोग परिवार और बच्चों-बड़ों के साथ आये हुए थे। लग रहा था मानों यह रविवार के लिये आउटिंग का स्थान था। पिंकी खाली टेबल देखने लगी। फिर दूर एक तरफ उसे खाली टेबल दिखी और वह तेजी से उस ओर बढ़ गयी। उसने मुझे भी तेजी दिखाने को कहा। हम दोनों ने उस टेबल के पास रखी कुर्सियों को खींचा और बैठ गए। सर्विस वाला लड़का आया और पानी के दो गिलास रख गया। मैंने आसपास नज़र घुमाई। माहौल बहुत सुन्दर था। फूलों की छोटी-छोटी क्यारियां बनी हुई थी। सलीके से फूलों के बड़े-बड़े पॉट रखे हुए थे। कुछ टेबल्स के ऊपर रंगीन छाते भी थे। पिंकी ने पूछा, क्या खाएंगे ? यहाँ सब कुछ है परन्तु संडे को छोले-भठूरे की डिमांड रहती है..' मैंने कहा, ' मैंने ये पंजाबी खाना ज्यादा नहीं खाया है.. शायद एक दो बार ही खाया होगा.. ' ' क्या छोले-भठूरे आपके कलकत्ता में नहीं मिलते, चलो, आज खिलाते हैं, आपको..' पिंकी ने दो प्लेट छोले-भठूरे का आर्डर दिया और मुझसे पूछा ' लस्सी भी चलेगी न ? लस्सी का नाम सुन मैंने तुरंत हाँ में सिर हिलाया। मुझे लस्सी अच्छी लगती है। मैंने कई बार कलकत्ता के लिनसे स्ट्रीट में लस्सी पी है। लस्सी कलकत्ता के कई स्थानों पर स्ट्रीट फ़ूड की तरह मिलती है। छोले-भठूरे आये। सच में बहुत लज़ीज़ थे। मैंने सोचा इससे मिलता जुलता खाना हमारा घुघनी-लुची भी है। उसे भी ऐसे ही घूमते-फिरते खाया जाता है। हमारे आलू-राधा बल्ल्भी भी इसी तरह के खाने में आएंगे। मैंने खाते खाते, पिंकी को कलकत्ता के स्ट्रीट फूड्स और एग-रोल्स आदि के बारे में बताया। ये भी कि कैसे स्ट्रीट फ़ूड कलकत्ता में बहुत प्रचलित हैं और बहुत से ऑफिस में काम करने वाले दोपहर के भोजन के लिए स्ट्रीट फ़ूड पर निर्भर करते हैं। बातों बातों में कलकत्ता की डेकर्स लेन का ज़िक्र भी हुआ। मैंने उसे बताया कि ये छोटी सी गली खाने-पीने के लिए ही प्रसिद्द है। पिंकी बहुत उत्साहित लगी। उसने मुस्कुराते हुए कहा कि जब कभी भी वह कलकत्ता आएगी तो डेकर्स लेन जरूर देखना चाहेगी। उसके इस उत्साह पर मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने कहा, 'कलकत्ता में बहुत कुछ देखने को है, तुम आओगी तो सब जगह घुमाएंगे.. पर क्या तुम सच में आओगी.. तुम तो ऐसे औपचारिकता में ही कह रही हो न ? ' नहीं-नहीं, मैं तो पापा को कई बार कह चुकी हूँ.. मैंने कई बंगाली नॉवेल्स के इंग्लिश अनुवाद पढ़े हैं.. मैंने डोमिनिक लपिरे की 'सिटी ऑफ़ जॉय' को भी पढ़ा है.. और मदर टेरेसा की लाइफ को भी.. ' मैंने कहा, ' रबिन्द्रनाथ को पढ़ा है ? उसने कहा, ' यू मीन टैगोर ? कुछ शार्ट स्टोरीज पढ़ी हैं.. काबुलीवाला फिल्म देखी है.. उनकी नोबल प्राइज वाली गीतांजलि नहीं पढ़ी..मुझे डर लगता है, कहीं सिर के ऊपर से न निकल जाये..' हँसते हुए उसने बात आगे बढ़ाई, ' हम सरदार लोग ज्यादा गहरी बातों को नहीं पचा पाते..'
लस्सी आ गयी थी। मैंने आज तक जितनी भी लस्सी पी थी, ये सबसे ऊपर थी। मैंने मन में सोचा, पंजाब का दूध-दही तो बहुत अच्छा माना जाता है, लस्सी तो अच्छी होगी ही। मुझे पिंकी की बातें अच्छी लग रही थीं। मैंने रबीन्द्रनाथ वाली बात को आगे बढ़ाया, ' तुम्हें पता है, टैगोर का संगीत भी है जिसे रबिन्द्र संगीत कहते हैं ? उसने अपनी अनभिज्ञता दर्शायी। मैंने कहा, ये बहुत मधुर संगीत है.. कलकत्ता आओगी तो ये भी सुनाएंगे..' उसने कहा, ' कलकत्ता क्यों, तुम्हें आता हो तो यहीं चंडीगढ़ में हो जाये.. मैं मुस्कुरा दिया। मैं जानता था कि रबिन्द्र संगीत पर मेरी थोड़ी-बहुत पकड़ है, कम से कम यहाँ पंजाब के लोगों को तो प्रभावित कर ही सकता हूँ। दूसरे ही क्षण सोचा ये भंगड़ा और बल्ले-बल्ले का देश है। यहां रबिन्द्र संगीत ? भैंस के आगे बीन बजाने जैसा होगा। आज मुझे पिंकी के साथ समय बिताना अच्छा लग रहा था पर उसने कहा, ' चलें या कुछ और खाने का मन है ? मैंने कहा नहीं, ' पेट भर गया है, लस्सी तो बहुत रिच और हैवी थी.. चलो, चलते हैं..' अचानक उसकी कलाई पर पड़े लोहे के रिंग पर मेरी नज़र गयी, ' ये क्या है, सिंगल रिंग ? उसने कहा, ' ये हमारा पवित्र कड़ा है, सिखों के पांच ' के ' बताये थे न ? उनमें से एक ये है.. मैंने सोचा हमारे यहाँ भी तो बंगाली महिलायें शाखा पहनती हैं और उसे शुभ मानती हैं।
पिंकी ने मेरे गेस्ट हाउस के गेट पर जाकर स्कूटर रोका। ' चलो अब आराम करो, किसी चीज़ की जरुरत हो तो बताना '.. मैं चाहता था पिंकी कुछ देर और रुके। पंजाब और सिखों के बारे में बहुत कुछ बातें मेरे दिमाग में चल रहीं थीं। मैं उससे चर्चा करना चाहता था। लुधियाना में जो उसके चचेरे अंकल थे, उनके पिता और उनके साथियों ने आज़ादी की लड़ाई में बहुत कुछ न्यौछावर कर दिया था। हर तरह की प्रताड़नाएं सही। वे और मेरे नाना एक साथ जेल में भी रहे थे। मैं उनके बारे में भी जानना चाहता था। मैंने हल्का सा झिझकते हुए कहा, 'अब कब मिलेंगे ? उसने कहा, ' जब आपका मन हो मैं आ जाऊंगी, वैसे दो दिन बाद हमारे क्लब में एक कल्चरल फ़ंक्शन है, आप चाहो तो चल सकते हो.. फिर सोचते हुए तारीखों का हिसाब लगाया, ' हाँ, मंगलवार को ही है, पक्का करो तो ऑफिस के बाद आपको लेती चलूंगी..' मैंने कहा, ' ठीक है, मंगलवार को तैयार रहूँगा.. '
( आज यहीं तक, आगे गुरुवार, यहीं पर )
Good effort my well wishes to you
ReplyDeleteGood effort my well wishes to you
ReplyDeleteवाह
ReplyDelete