' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा
CHANDER DHINGRA
हर सप्ताह इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे...
( १६ ) पिंकी ने मंगलवार को अपने क्लब के समारोह में मुझे ले चलने को कहा था। सच कहूँ, सोमवार का पूरा दिन मंगलवार की प्रतीक्षा में ही कटा। अगले दिन यानि मंगलवार को सुबह से ही मुझे न जाने क्यों ऐसा लगने लगा कि आज का दिन बहुत व्यस्त वाला है। नाश्ते के समय एक मित्र ने सुझाव रखा कि आज का डिनर कैंटीन में नहीं करते। उसने बताया कि नगर के बाहरी छोर पर एक बहुत प्रसिद्द ढाबा है। बाहर से आये लोग एक बार तो यहाँ के खाने का स्वाद लेने आते ही हैं। सुझाव का सब ने स्वागत किया परन्तु मैंने आवश्यक व्यस्तता दिखाते हुए न कर दिया। मेरे कहने पर उन्होंने ये कार्यक्रम अगले दिन पर टाल दिया। दिन जैसे धीमी गति से गुजर रहा था। ऐसा होता ही है। जब आप किसी की प्रतीक्षा में हों तो ऐसा लगता है मानों घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे खिसकते और मुस्कुराते हुए आपको चिड़ा रही हों। घड़ी का इस तरह का बर्ताव मैं पहले भी कई बार देख चुका हूँ परन्तु आज कुछ ज्यादा महसूस हो रहा था।
शाम हो आयी। क्लब का फंक्शन है यह सोचकर मैंने अपने बॉक्स से काली टी शर्ट और आकाशी रंग की जीन्स निकाली। मैं पिंकी की प्रतीक्षा में तैयार होकर बैठ गया। समय की पक्की पिंकी आज कुछ विलम्ब कर रही थी या मेरी अपनी आतुरता सामान्य को विलम्ब दिखा रही थी। गेट से उसके आने की सूचना आयी तो मैं तुरंत वहां पहुँच गया। पिंकी ने अपनी घड़ी में देखते हुए कहा, ' सॉरी, थोड़ा लेट हो गयी.. चलो, समय से पहुँचना है.. ' मैं स्कूटर पर पीछे बैठ गया और पिंकी ने स्कूटर को गति दे दी। कुछ ही समय में हम क्लब पहुँच गए। मुझे लगा कि यह जगह अंकल के घर के आसपास ही कहीं है। मैंने पिंकी से पूछा तो उसने बताया कि यहाँ से दस-पंद्रह मिनिट की ड्राइव है। उसने ये भी बताया कि पापा, मम्मी और लवली भी आएंगे। बातों बातों में पता चला कि आज का यह कार्यक्रम क्लब का इनहॉउस कार्यक्रम है जो माह के एक खास दिन को होता है और क्लब के सदस्य या उनके मेहमान ही इसमें भाग लेते हैं। इस कार्यक्रम में कोई कुछ भी सुना सकता है, कुछ भी दिखा सकता है। गाना, नाच कुछ भी। क्लब अच्छा लग रहा था। मेरे बाबा भी कलकत्ता के एक नामी क्लब के सदस्य हैं। बाबा कभी कभार ही वहाँ जाते हैं। मैं और माँ, महीने दो महीने में एक बार तो वहां हो ही आते हैं। मैंने देखा है कि ऐसे क्लब में ज्यादातर लोगों की रूचि बार रूम और कार्ड रूम तक सीमित होती है। यहाँ का क्लब, कलकत्ता के क्लब जैसा बड़ा न लग रहा था परन्तु अच्छा था। साज़-सजावट सुरूचिपूर्ण थी। हमारे पहुँचने के कुछ समय बाद ही अंकल, आंटी और लवली भी पहुँच गए। क्लब में अधिक भीड़ न थी। पिंकी ने बताया कि वीक डे था और शाम का समय होने के कारण इस कार्यक्रम में कम ही लोग आते हैं। जितने भी लोग थे, वे हँसी-ख़ुशी और उत्साह के मूड में दिख रहे थे। हम लोग हॉल की ओर बढ़ रहे थे कि एक सरदारजी ने जोगेन्दर अंकल के सामने आकर हाथ मिलाया और बड़े जोश से मिले। एक दो बातें हुई तो अंकल ने उनसे कहा, ' सेक्रेटरी साहब, आइये आप को इनसे मिलाते हैं..' कहकर अंकल ने मुझे उनसे मिलवाया। वे क्लब के सेक्रेटरी थे। अंकल ने नाना का नाम भी लिया और बताया कि कैसे वे और उनके चाचा आज़ादी के दिनों के साथी रहे थे और देश के नामी फ्रीडम फाइटर्स में जाने जाते हैं। सेक्रेटरी महोदय ने सम्मान के साथ मेरा स्वागत किया, कहा कि ये उनका और क्लब का सौभाग्य है कि ऐसे सम्मानीय परिवार का एक सदस्य उनके बीच है। मुझ से इंजॉय करने का कहकर वे आगे बढ़े फिर अचानक रूक कर मुझसे बोले, 'आप चाहें तो आज हमें कोई बंगाली गाना सुना सकते हैं..' मुस्कुराते हुए वे अपने काम में व्यस्त हो गए। कार्यक्रम शुरू हो चुका था। हम सामने की दूसरी पंक्ति में बैठे थे।
पिंकी, लवली और मैं एक साथ बैठे थे। पिंकी मेरी बगल वाली सीट पर थी। उसने धीरे से कहा कि मुझे सेक्रेटरी के सुझाव पर गौर करना चाहिए और एक बंगाली गाना सुना देना चाहिए। मैंने कहा कि ये यहाँ संभव नहीं है। स्टेज पर एक महिला हिंदी फिल्म का एक ग़ज़लनुमा गाना सुना रही थी। उनसे पहले भी एक सज्जन फ़िल्मी गाना सुना गए थे। पिंकी ने जोर देते हुए कहा, ' शर्माने की बात नहीं है.. अगर आप को आता है तो सुना सकते हैं.. घर जैसा ही माहौल है ' मैंने कहा, ' यहाँ नहीं, अलग से बाद में तुम लोगों को सुना दूंगा.. मुझे रबिन्द्र संगीत पसंद है.. पर पता नहीं, तुम लोगों को पसंद आये या न आये..' पिंकी ने हँसते हुए ओके कहा और तुरंत अपने पापा को ये बात बता दी। अंकल-आंटी खुश हो गए और अंकल ने कहा, ' तो कल ही हो जाये, घर पर महफ़िल..' मुझे उनका यह झटपट और हाथोंहाथ कुछ तय कर देने का बर्ताव बहुत प्रभावित कर गया। आंटी ने बात आगे बढ़ाई, ' तो फिर अपने बंगाली बाबू को मैं भी अमृतसरी फिश बनाकर खिलाऊंगी..' मैं समझ न पा रहा था कि क्या रिएक्शन दूँ ? मैंने कहा, 'आंटी, कल नहीं किसी और दिन.. कल तो हम सभी दोस्त कहीं डिनर पर जा रहे हैं ' अंकल ने सुना और एक बार फिर से तुरंत तय कर दिया , 'ओय, ठीक है जी, कल नहीं तो परसों..' लवली ने ताली बजाकर ख़ुशी जाहिर की परन्तु पिंकी सहज ही रही। लगता है लवली को उसकी मम्मी का अमृतसरी फिश वाला सुझाव बहुत पसंद आ गया था। स्टेज पर कार्यक्रम चल रहा था। मैं अपने आप में एक बार फिर से व्यस्त हो रहा था। मुझे इन लोगों को बंगाली गाना सुनाना होगा, क्या गाऊंगा ? मेरी तो रबिन्द्र संगीत में रूचि है और मेरी पकड़ भी है। स्कूल, कॉलेज और ऑफिस के कार्यक्रमों में सुनाता रहा हूँ परन्तु यहाँ पंजाबियों के बीच ? इन्हें तो रबिन्द्र संगीत की गहराई ही समझ न आएगी। मेरे पास तो रबिन्द्र संगीत के सिवा कोई चारा भी नहीं है। बीच बीच में पिंकी मुझ से कुछ बात कहती तो मैं जरुरत भर उत्तर दे देता। मुझे लगा कि मेरा यह व्यवहार उसे रूखापन न लग जाये। मैंने अपनी ओर से बात की, ' अंकल -आंटी को कैसे गाने पसंद हैं ? पिंकी ने बताया कि मम्मी-पापा दोनों को पुरानी फिल्मों के गाने पसंद हैं। मुझे लगा अपनी झिझक दूर करने और इन लोगों को प्रभावित करने का यह अवसर है। वहीं बैठे-बैठे मैंने मन ही मन एक रबिन्द्र संगीत का गीत सोच लिया जो मुझे सुनाना चाहिये। यह गीत मैं तीन-चार बार यहाँ-वहाँ सुना चुका हूँ और प्रशंसा भी पा चुका हूँ। मुझे कुछ हिंदी गाने भी आधे-अधूरे याद आये परन्तु उनके बारे में मैं आश्वस्त न था। उसी क्षण मन ने कहा, ' तुम गुलाम अली की वो ग़ज़ल भी सुना सकते हो.. अभी तुम्हारे पास कल का दिन है, तैयार कर लेना..'
कार्यक्रम समाप्त होने को था। घोषणा कर दी गयी थी कि अब कुछ अंतिम प्रस्तुतियां ही रह गयी हैं। आंटी को मज़ा नहीं आ रहा था। उन्होंने चलने को कहा। अंकल का मन भी कार्यक्रम में नहीं रम रहा था। वे तुरंत उठ खड़े हुए और उनके साथ ही हम तीनों भी। हॉल से बाहर आ हम लोग लाउन्ज में बैठ गए। आंटी का चाय का मूड था सो चाय मंगवाई गयी। चाय पी हम लोग बाहर निकल आये। तय हुआ कि पिंकी और लवली स्कूटर से घर चली जाएं।अंकल-आंटी कार में मुझे मेरे गेस्ट हाउस छोड़कर आएंगे। अंकल तो चाहते थे कि मैं उनके साथ घर चलूँ और वहां से डिनर कर लौटूं परन्तु मुझे वहीं से सीधा लौटना उचित लगा। उन्होंने मुझे गेस्ट हाउस के गेट पर उतार दिया। गाड़ी को यू टर्न कराते हुए अंकल ने मुझे याद दिलाया कि हम लोग एक दिन बाद फिर से उनके घर पर मिल रहे हैं।
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )
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