' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा
CHANDER DHINGRA
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे...
( १५ ) मुझे नीचे गेट पर छोड़, पिंकी अपने घर चली गयी। मैं हर बार की तरह अपने बिस्तर पर धम से आ गिरा। यहाँ मेरे पास हॉस्टल का छोटा सा कमरा और बिस्तर ही तो था जहाँ मैं खुद में सिमट सकता था। मेरा मन अपनी आदत से मजबूर इधर-उधर भटक रहा था। मैं कभी अपनी माँ को याद करता, कभी अपने बाबा को। घड़ी में समय देखा तो अचानक नाना की याद हो आयी। वे अपने कमरे से चिल्ला रहे होंगे, ' रविवार है, एक कप एक्स्ट्रा चाय तो पिला दो ..' आज का अख़बार तो उन्होंने पूरा चबा लिया होगा, अब तक। कुछ कटिंग्स भी रख ली होंगी। संडे का वह स्टेट्समैन जिसका कुछ घंटों पहले तक उन्हें बेसब्री से इंतज़ार था, अब तक कोने में रखी टेबल के नीचे रद्दी में जा चुका होगा। अपने दूर दराज के मित्रों को एक-दो पत्र भी लिखे जा चुके होंगे। उनका रविवार ऐसे ही बीतता है। आज उन्हें लंच में अपनी पसंद की मछली के साथ-साथ गोश्त की भी तड़प रहती है। संध्या में उन्हें कुछ दोस्तों के आने का इंतज़ार रहता है। वे स्वयं इन दिनों घर से कम ही निकलते हैं। उनके गिरते स्वास्थ्य को देख माँ ने उन पर कई तरह की पाबंदियाँ लगायी हुई हैं। कलकत्ता के अपने घर से भटकता हुआ मेरा मन फिर इधर चंडीगढ़ की डाल पर आ बैठा। मैं पिंकी के बारे में सोचने लगा। उसे अपने धर्म और रीति-रिवाजों के बारे में सब कुछ पता है। वह आधुनिक समाज की होते हुए भी परम्परा के साथ बंधी है। माता-पिता से कोई गहरा विरोध नहीं। बड़ों का सम्मान जैसे पारिवारिक संस्कार हों। उसमें दूसरों से भी बहुत कुछ जानने की इच्छा है। मैं देख चुका था कि कैसे उसने बंगाल और कलकत्ता के बारे में अपनी जिज्ञासा दिखाई थी। मैं मन ही मन योजनाएं बनाने लग गया था। जब पिंकी कलकत्ता आएगी तो उसे कहाँ-हाँ ले जाऊंगा और क्या-क्या दिखलाऊंगा ? वो तो मुझे अपने स्कूटर में यहाँ वहां ले जा सकती है, पर कलकत्ता में क्या उसे बस में घुमाऊंगा ? ये ऊँचे लोग हैं, इन्हें बस में ? और वो भी कलकत्ता की बस में ? सोच कर ही मुझे घबराहट होने लगी। दिमाग ने सहारा दिया, 'अरे चिंता की क्या बात है ? टैक्सी हैं न ? नहीं, टैक्सी बहुत महंगी पड़ेगी..' खुद को ही मेरा सपाट उत्तर था। फिर सोचा, चाचा हैं उनकी कार और ड्राइवर ले लेंगे। एक दिन में कलकत्ता के सारे विजिटिंग स्पॉट्स हो जायेंगे और दूसरे दिन इधर-उधर। अचानक दिमाग ने मन को डांटा, ' अरे, उसे कलकत्ता आने तो दो.. तब देखा जायेगा.. '
छोले-भठूरे स्वयं में पूरा खाना है। मुझे लगा आज लंच को भूल जाना ही बेहतर होगा। परन्तु मैं जानता था बाद में भूख लग जाएगी। मैंने सोचा कैंटीन से कुछ लाकर कमरे में रख लेता हूँ। बाद में भूख लगने पर खा लूंगा। मैं नीचे कैंटीन में गया और उनसे कहा कि मेरा लंच पैक कर के दे दें। कैंटीन का वह लड़का इन कुछ ही दिनों मेरा मित्र जैसा हो चुका था। उसने कहा, ' दादा आप चलिए, मैं लेकर आता हूँ..' वहां से पानी की एक बोतल लेकर मैं ऊपर आ गया। मैंने कपड़े बदल, आरामदायक पजामा और बनियान पहनी। अपने बक्से से एक पुस्तक निकाली। तकिये को सीधा कर टिकाया और पुस्तक के पन्ने उलटने लगा। ये सुनील गंगोपाध्याय की चर्चित बांग्ला पुस्तक थी। मैंने काफी समय पूर्व इसे पढ़ा था परन्तु न जाने क्यों इसे अपने साथ रख लिया था। ये पुस्तक बंगाल नवजागरण से सम्बंधित घटनाओं का कथाकरण है। सुनील गंगोपाध्याय के लेखन से मैं बहुत प्रभावित रहा हूँ। उन्हें बांग्ला के पांच-छह श्रेष्ठम लेखकों में समझता हूँ। मैंने पुस्तक के बीच के किसी एक पृष्ठ को खोल, वहीं से पढ़ना शुरू कर दिया और पढता चला गया। पढ़ी हुई पुस्तकों को मैं ऐसे ही पढता हूँ। कहीं से भी, किसी भी पृष्ठ से। लेखक की शैली में ऐसा वर्णन-सौंदर्य था कि मैं पढ़ी हुई पुस्तक के प्रवाह के साथ बहता चला गया। कैंटीन के लड़के द्वारा दरवाजा खटखटाने पर मेरा यह प्रवाह रुका। मैंने पुस्तक को उसी पृष्ठ पर उलटकर रख दिया। दरवाजे पर कैंटीन का लड़का खड़ा था। वह एक चुस्त और सच्चा गढ़वाली लड़का था। सब उसे किशन कहकर बुलाते थे परन्तु मैं उसे कृष्णा कहता था। उसे यह अच्छा लगता था। एक दिन उसने कहा था, ' मेरा असली नाम तो मेरी माँ जानती है या आप जानते हो.. कृष्णा ..' खाने को टेबल पर रख मैं फिर से उस पुस्तक में उलझ गया। पढ़ते-पढ़ते कोई सन्दर्भ ऐसा आया कि मैं रुक गया। मुझे लगा कि पिंकी को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। मुझे लग रहा था कि इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद तो निश्चय ही अब तक नहीं हुआ होगा। हिंदी में ऐसी पुस्तकों के पाठक कहाँ ? इंग्लिश अनुवाद की ' फर्स्ट लाइट ' के नाम से प्रकाशन की योजना थी, यह मैंने कहीं पढ़ा था। मैंने सोचा कि पिंकी को इस पुस्तक को पढ़ने का सुझाव दूंगा। क्यों न उसे एक पुस्तक भेंट स्वरुप दी जाये ? मन ने सुझाव दिया और अपने ही सुझाव पर मैं हर्षित हो उठा। आज शाम को ही किसी बुक स्टोर में जाकर पता करता हूँ। मैं खुद से ही खुश हो रहा था कि क्या उम्दा ख्याल आया है? खाना तो अनमना सा खाया। एक तो आज भूख न के बराबर थी और दूसरे मुझे रविवार का अपने घर का, बंगाली खाना याद आ रहा था। रविवार के दिन मेरे बाबा घर से दूर गरियाहाट बाजार जाते थे। वे सब्जी आदि तो लाते ही थे परन्तु उनका विशेष फोकस मछली पर होता था। उनका मानना था कि कलकत्ता में सबसे अच्छी मछली तो गरियाहाट बाजार में ही मिलती है। बचपन में मैं भी अक्सर बाबा के साथ रविवार सुबह के बाजार में जाया करता था। मछलियों को देखना मुझे अच्छा लगता था। बाबा बाजार में घूम घूम कर मछली पसंद करते और कई तरह की मछलियाँ खरीदकर लाते थे।
खाना खाकर मैं कुछ देर के लिए सो गया। शाम को नीचे उतरा तो ट्रेनिंग में आया एक साथी मिल गया। शायद वह भी मेरी तरह अकेलापन महसूस कर रहा था। मैंने पूछा, ' क्या हो रहा है ? उसने कहा, ' कुछ नहीं..सोच रहा हूँ कुछ किया जाये.. चलो कहीं घूमकर आएं .. ' मैंने कहा ठीक है। हम आगे बढ़ गए। दोनों ही चंडीगढ़ की व्यवस्था से प्रभावित थे। इस शहर में कई बातें थी जो कलकत्ता से भिन्न थी। मेरे साथी का भी यही हाल था। वह तो मध्यप्रदेश के भोपाल से आया था और चंडीगढ़ की नगर व्यवस्था की प्रशंसा कर रहा था। मैंने उससे किसी बुक स्टोर में जाने की बात कही। मेरे मन में किसी अच्छी पुस्तक का विचार बार बार आ रहा था। हम ऐसे ही यहाँ-वहाँ भटक रहे थे। एक बुक स्टोर दिखा तो हम अंदर घुस गए। मैंने काउंटर पर खड़ी लड़की से पुस्तक के बारे में पूछा। सुनील गंगोपाध्याय के नाम से ही वह चौंक गयी। उसे पता न था। मैंने अन्य इंग्लिश टाइटल पूछा तो उसने चेक किया और सॉरी कह कर, मुझे कुछ दूसरी पुस्तकों के बारे में बताने लगी। जिन पुस्तकों का वह सुझाव दे रही थी, वे अंग्रेजी की प्रचलित पुस्तकें थी जो सब जगह मिल जाती हैं। कलकत्ता में तो पार्क स्ट्रीट और चौरंगी इलाके में ये पुस्तकें फुटपाथ पर सजे स्टालों पर आसानी से मिल जाती हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे हमारे समाज का एक प्रभावशाली हिस्सा इन गिनीचुनी अंग्रेजी की पुस्तकों के आधार पर स्वयं को बुद्धिजीवी वर्ग मानने लगा है। मैंने भोपाल के अपने मित्र को कलकत्ता के कॉलेज स्ट्रीट और वहां के पुस्तक बाजार के बारे में बताया। वह आश्चर्यचकित हो गया। मैंने भी सोचा कि पिंकी के कलकत्ता आने पर उसे कॉलेज स्ट्रीट भी दिखाएंगे। चंडीगढ़ के उस बुक स्टोर में मुझे 'गीतांजलि ' का छोटा सा संस्करण दिख गया था। जो मैंने खरीद लिया था। ये एक सुन्दर सा प्रकाशन था जिसके प्रत्येक पृष्ट पर चित्र थे। सोचा, पिंकी के साथ जब अगली मुलाकात होगी तो मैं उसे ये पुस्तक दूँगा। बाजार में समय बिता और चाय पी कर हम दोनों गेस्ट हाउस लौट आये।
कमरे में जाने से पहले हम दोनों बाहर लगी कुर्सियों पर बैठे। कुछ अन्य साथी भी आ गए थे। सब मिलकर हंसी मजाक करते रहे। मैं अपने ऑफिस की और अन्य मित्र मंडलियों में सरदारजी जोक्स सुनता रहा हूँ। यहां भी इस तरह के जोक्स बीच बीच में आ रहे थे। पहले मुझे कुछ मज़ा आया करता था परन्तु आज मुझे लगा कि जिन लोगों का समाज निर्माण में इतना बड़ा योगदान हो, उन्हें फूहड़ सी हँसी का पात्र बनाना कहाँ तक उचित है ? अचानक मैं सोचने लगा कि मेरी इस नयी और बदली हुई सोच में क्या मेरा पिंकी से मिलना और उसके व्यक्तित्व का मुझ पर पड़ा प्रभाव है ?
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )
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