Chander Dhingra's Blog

Wednesday, June 10, 2020

' टू स्टेट्स - एक कहानी ' ' Two States - A Story ' -19



                                               ' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
---
चन्दर धींगरा 
CHANDER DHINGRA 

                             हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा किया जाता है। आज गुरुवार है, अब आगे..  
              
( १९ )       मैं सोच में आ गया कि जोगेन्दर अंकल ने यह कैसे कहा कि वे मेरा कलकत्ता जाने का प्रबंध कर रहे थे? मेरा कोर्स तो अभी चल रहा था। वैसे मैं नाना की खबर से दुखी था। मुझसे उन्हें बहुत प्यार था। उनसे मैंने देश की आज़ादी के संग्राम की और अंतरर्राष्ट्रीय समाज की बहुत सी बातें व किस्से सुने थे। वे खुले नज़रिये वाले शख्स थे जिन्हें  पंजाब और उससे आगे फ्रंटियर प्रान्त वाले लोगों से आंतरिक स्नेह रहा था। मैं नहीं चाहता था कि वे मुझसे मिले बिना चले जाएं। मैं तो खुद कलकत्ता वापिस लौटने पर उन्हें चंडीगढ़, जोगेन्दर अंकल के घर और यहाँ की बहुत सी बातें सुनाना चाहता था। मैं जानता हूँ वे बहुत खुश होते और मेरी एक एक बात के साथ अपने अनुभवों की पोटली से कई कई  संस्मरण निकालते जाते। मैं उदास था। क्लास में नहीं गया। नीचे आ एक बेंच पर चुपचाप बैठ गया, यूँ ही। न आँखों में आंसू थे, न कोई विशेष सी बेचैनी। मैं अकेला था और बस यही अकेलापन इस वक्त मेरे साथ था। अक्सर आंसू तब ही आते हैं जब उन्हें देखने और आपसे सहानुभूति दिखाने वाला कोई साथ हो। यह सहानुभूति भले ही औपचारिक ही क्यों न हो। मुझे क्लास में न लौटता देख कुछ साथी नीचे आ गए। वे शांत थे। मेरे नाना के इस दुनिया से चले जाने की खबर सुन वे सहानुभूति की मुद्रा में आ गए थे। एक ने नाना की आयु पूछी और अधिक आयु जानने पर कुछ संतोष का सा भाव दिखाया। मुझे लगा कि किसी का अधिक आयु में संसार से चले जाने को एक सामान्य घटना कैसे माना जा सकता है ? अब मेरी आंखे नम होने लगी थीं। इलाहाबाद वाला तपन भी वहीं था। वह मेरे पास आया और उसने धीरे से बांग्ला में मुझसे पूछा कि अब मेरा क्या करने का विचार था ? मैंने उसकी ओर देखा और कहा कि कुछ पता नहीं पर मेरा इस समय घर पर अपनी माँ के साथ होना आवश्यक था। आज यहाँ घर से दूर चंडीगढ़ में किसी से अपनी बांग्ला भाषा में संवाद करना अच्छा लग रहा था। 

थोड़ी देर में जोगेन्दर अंकल का फिर से फोन आया। उन्होंने कहा कि फ्लाइट से मेरे कलकत्ता जाने की व्यवस्था हो गयी थी। फ्लाइट दिल्ली से थी उन्होंने कहा कि वे मुझसे मिलने आ रहे थे और मुझे तैयार रहने को भी कहा क्यों कि तुरंत ही दिल्ली के लिए निकल जाना था। मैं चकित सा रह गया। कमरे में आ सामान अपने सूटकेस में रखने  लगा। तपन मेरे साथ था। अब मेरे मन की स्थिति ऐसी थी कि नाना की मृत्यु पीछे रह गयी थी और कलकत्ता वापिस लौटना, अपनों से अचानक मिलना और प्रथम हवाई यात्रा का होने वाला अनुभव आगे आ गये थे। कुछ ही समय में अंकल आ गए। उनके साथ पिंकी भी थी। उसे देख मैं हैरान रह गया। अब अंकल ने पूरी बात बताई। उन्होंने बताया कि कलकत्ता में मेरे ऑफिस में बात कर ली गयी थी और उन्होंने भी यहाँ मेरे इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर से बात कर ली थी। मुझे एक दिन का विशेष अवकाश दिया गया था। साथ ही रविवार और एक राष्ट्रीय अवकाश का दिन था। सो चार दिन हो गए। दिल्ली से शाम की फ्लाइट थी। पिंकी को दिल्ली में अपने मामा के पास जाना था। उन्होंने कहा कि वह मुझे एयरपोर्ट पर छोड़ देगी और वहां से अपने मामा के घर चली जाएगी। उसके मामा कुछ दिनों से चाह रहे थे कि पिंकी कुछ दिन उनके पास आकर रहे। तीन दिन बाद वह मुझे लेते हुए वापिस चंडीगढ़ आ जाएगी। एक साथ दोनों काम हो जायेंगे। वे अपने ड्राइवर के साथ पूरी तैयारी कर के आये थे। प्रशिक्षण को बीच में नहीं छोड़ा जा सकता था परन्तु मैं अपनी माँ को जानता था। उन्होंने नाना का नाम लेकर पूरा प्रभाव लगा दिया होगा तकि मैं कुछ दिन के लिए घर लौट सकूँ। मैं अपने कमरे में गया और सूटकेस लेकर नीचे आ गया। थोड़ी देर में मैं और पिंकी दिल्ली की ओर रवाना हो गए। 

रास्ते में पिंकी ने मुझे बताया कि किस तरह से सब संजोग बनते चले गए और सब कुछ ठीक से हो गया। उसके दिल्ली वाले मामा कई दिनों से उसे बुला रहे थे परन्तु जाना न हो पा रहा था। पिंकी ने पहली बार मुझे ढाढ़स बांधने की कोशिश की, बताया कि उसने भी अपने नाना को बचपन में ही खो दिया था। उसे अपने नाना की बहुत हल्की सी यादें थी। मेरे नाना के बारे में वह लुधियाना वाले सुखबीर अंकल से कई बार सुन चुकी थी। उसे बहुत गर्व था कि कैसे उस समय के लोग देश के लिए सब कुछ लुटा देने को तैयार रहते थे। मैं तो जोगिन्दर अंकल के स्नेह और प्यार से अभिभूत था। मैं उनका कोई सम्बन्धी न था और प्रथम बार उनसे मिला था परन्तु वह कैसे वे मेरे प्रति अपने दायित्व को निभा रहे थे। पिंकी और मैंने इस दौरान बहुत विषयों पर बातें की। चंडीगढ़ से दिल्ली का सड़क मार्ग अत्यंत साफ सुथरा और बेहतरीन था। गाड़ियाँ बहुत तेजी से दौड़ रही थीं। लगता था हम किसी विदेशी हाइवे पर थे। हम लोग मार्ग में एक ढाबे पर रुके। इस दिन को याद कर रहा हूँ तो यहाँ खाये भोजन को कैसे भूल सकता हूँ ? आज भी वो स्वाद मानों मुँह में बसा है। खाना जायकेदार था, पिंकी जैसी खुश मिज़ाज एक नयी दोस्त साथ में थी और मेरे मन में घर पहुँचने की प्रतीक्षा। मैं नाना के चले जाने की दुखद बात को भूल ही गया था। हम दोनों ने इन कुछ घंटों में कई बातें की। फिल्मों की, गीत-संगीत की और देश की। पिंकी हर बात को एक नया और आनंदभरा स्वर देने में माहिर लगी। किसी किसी बात पर तो वह ऐसा ठहाका लगाती कि लगता निर्मल आनंद का फुव्वारा फूट पड़ा हो। जब मैंने उसे किसी की मृत्यु पर होने वाली बंगाली रस्मोरिवाज के बारे में बताया तो वह आश्चर्यचकित हो सुनती रही। नियमभंग और इस अवसर पर होने वाले समाज भोज का सुन वह हंस पड़ी। मैंने अपने बंगाली आडम्बरों को न्यायसंगत करने की कोशिश न की। उसकी हंसी में मुझे समाज के प्रति तिरस्कार नहीं अपितु विडम्बना का भाव दिखा था। इन कुछ घंटों में मैं पंजाब और पंजाबियों को एक नयी नज़र से देखने में सक्षम हो गया था। हम दिल्ली पहुँच चुके थे। भीड़ भाड़ वाली सड़कों से होते हुए, हम एयरपोर्ट पर पहुंचे। गाड़ी से उतरने पर पिंकी ने मुझे उसकी ओर से घर में सभी को हेलो कहने को कहा। उसने मुझे गले लगाया और कहा कि तीन दिन बाद शाम को वह मुझे यहीं एयरपोर्ट पर मिलेगी। अपना ख्याल रखना कह, वह  कार  में बैठ अपने मामा के घर की ओर निकल गयी। मैं कु फिर से एक बार अकेलापन सा महसूस करने लगा। 

यह मेरी पहली हवाई यात्रा थी। मैं रोमांचित था। मुझे यह सोचकर एक सुखद अनुभूति हो रही थी कि अभी दिल्ली में था और दो-तीन घंटे में कलकत्ता में अपने घर पर पहुंच जाने वाला था। ज़िंदगी की कई पहली बातें हमेशा-हमेशा के लिए दिल पर जगह बना लेती हैं। यह यात्रा भी कभी न भूलेगी। पूरे सफर मेरा दिल पिंकी के साथ जुड़ा रहा। पिंकी दिल्ली में अपने मामा के घर चली गयी थी। मैंने उसके मामा को और उनके का घर को कभी न देखा था परन्तु मुझे लग रहा था कि वे जोगेन्दर अंकल जैसे ही रहे होंगे और उनका घर भी चंडीगढ़ के पिंकी के घर जैसा ही होगा। पिंकी ने बताया था कि उनकी कोई संतान नहीं थी। मामा-मामी, उसे और लवली को बहुत प्यार करते थे। बातों-बातों में यह भी पता चला था कि वे काफी अमीर थे। मैं पिंकी को अब तक काफी समझने लगा था। मैं कल्पना करने लगा कि अपने अकेले रह रहे, मामा-मामी के घर पहुँच कर, वह वहाँ कैसे खुशियां बिखेर रही होगी। मैंने बहुत पहले एक हिंदी फिल्म देखी थी। शायद मेरी पहली हिंदी फिल्म थी, ' खूबसूरत ' नाम याद आया, ये फिल्म मैंने घर में माँ के साथ टीवी पर देखी थी। न जाने क्यों मुझे पिंकी में उस फिल्म की नायिका का प्रतिबिम्ब दिख रहा था। सुन्दर, उन्मुक्त और निर्मल। इस फिल्म की नायिका रेखा थी जिसने फिल्म में चरित्र के साथ पूरा न्याय किया था। फिल्म में वह अपनी उपस्थिति से किसी भी माहौल को आनंदमय बना देती थी।
( आज बस, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर )

No comments:

Post a Comment