Chander Dhingra's Blog

Wednesday, August 26, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -32

 टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
( Two States - A New Story )
-II-
  चन्दर धींगरा / Chander Dhingra

( हफ्ते वार  इस लम्बी कहानी को साझा किया जाना जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ... )
  ( ३२ )    सुबह देखा, माँ और बाबा दोनों सामान्य से दिखे। वे जैसे संतुष्ट थे कि रात को उन्होंने जो मुझे समझाया था, वह काम कर गया था। माँ बार बार मेरे आसपास आ रही थी किंतु कुछ बोल नहीं रही थी। बाबा भी चुपके से मुझे देख ले रहे थे परन्तु शांत थे। माँ ने अचानक बिशाखा को पुकारा, ' बाबू को आज ऑफिस के टिफिन में क्या दे रही हो ? मैंने सुना तो बिशाखा की ओर से उत्तर दिया, ' आज टिफिन नहीं देना..'  माँ ने कारण जानना चाहा।  मैंने कहा कि कुछ विशेष नहीं, बस आज घर के खाना का मन न था। माँ को थोड़ा गुस्सा तो आया होगा परन्तु उन्होंने संयम रखते हुए व्यंग्य भाव से कहा, ' घर का या बंगाली खाने का मन नहीं है..या पंजाबी स्वाद अभी तक जीभ पर अब तक चिपका हुआ है ?  मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है.. आज चाइनीस मँगवा लूंगा..किमलिंग से..'  किमलिंग हमारे ऑफिस के निकट  एक छोटा सा चाइनीज़ होटल है। हम लोग ऑफिस में कभी-कभी वहां से मंगवा लेते हैं। माँ कुछ नहीं बोली, बस बिशाखा को कुछ दूसरा काम समझाने लगी। मुझ से केवल इतना ही कहा कि रात को तो घर में ही खाऊंगा न ? मैं सुबह की दिनचर्या में लग गया। बाबा ने उस दिन के समाचार पत्र में कुछ विशेष देखा तो मुझे बुलाया, ' ये देखो, क्या छपा है ?  मैं उनके पास गया तो उन्होंने ने एक समाचार दिखाया जिसमें बैंकों के अधिकारी संघ ने एक दिन की हड़ताल की चेतावनी दी थी। मैंने कहा, ' काम कुछ करेंगे नहीं, बस हड़ताल करेंगे..'  उन्हें मेरी इस प्रतिक्रिया की आशा न थी परन्तु उन्होंने भी मेरा साथ देते हुए, ' ठीक कहते हो.. इस काम चोरी की वजह ही से तो हमारा बैंकिंग सिस्टम डूब रहा है..'  अचानक उन्होंने विषय को बदल दिया। शायद इस बेकार के समाचार के ज़रिये वो मुझे अपने पास बुलाना चाहते थे और मुझसे कुछ वार्तालाप करना चाहते थे। उन्होंने अपने मन में दबी बात को सामने लाते हुए बहुत प्यार से कहा, ' माता-पिता जो कहते हैं और करते हैं वह संतान की भलाई के लिए ही होता है, हमनें तुम्हें कल रात जो समझाया, वह तुम्हारे हित के लिए ही है.. आशा है तुमने हमारी बातों को सही अर्थ में लिया होगा..'  मैंने उनकी बात का उत्तर नहीं दिया और वहां से उठकर जाने लगा। बाबा ने मुझे रोकते हुए कहा, ' ये बातें आरम्भ में समझ नहीं आती परन्तु इनका भविष्य से सम्बन्ध होता है.. भावुकता में आकर छोटी सी भूल जीवन भर के लिए गंभीर समस्या बन जाती है.. तुम समझ रहे हो न ?  मैंने अब भी उनकी बातों पर प्रतिक्रिया नहीं दी। शायद उन्हें मेरा बर्ताव अच्छा नहीं  लगा। उन्होंने माँ को आवाज़ दी,' देखो, ये कुछ बात ही नहीं कर रहा..' माँ लपकती सी आ गयी और पिता के साथ सहमति मिलाते हुए बोली, ' अपने पिता की बात हर बेटे को सुननी चाहिए और माननी भी चाहिए..' माँ अधिकतर बाबा की बातों के विपरीत जाती थी परन्तु उस दिन लगभग वही बातें दोहरायी जो मेरे बाबा ने कही थीं। मैं खामोश था और अपने ऑफिस जाने की तैयारी में लगा था। बाबा अपनी कुर्सी पर बैठे हुए थे परन्तु माँ एक तरह की बेचैनी दिखाती हुई, मेरे आसपास घूम रही थी। अचानक उन्होंने दबाव देते हुए कहा, ' जोगेन्दर को तो तुमने फोन कर ही दिया है.. उस लड़की को फोन करने की आवश्यकता नहीं है..' मैंने माँ को इस तरह से देखा कि उन्हें समझ आ गया कि मुझे उनकी यह बात अच्छी नहीं लगी थी। माँ ने कहा, ' आज  धैर्य से हमारी बातों को सोचना.. ' अब मैंने कहा, ' आप दोनों भी मेरे मन को समझने की कोशिश करना.. मुझे पिंकी को फोन करना है और आपका मत बताना है..'  माँ मुझे देखती रह गयी। मैंने अपना ऑफिस बैग उठाया और घर से बाहर निकल आया। 

ऑफिस में चुपचाप अपना काम करता रहा। कुछ समय बाद रोबी दा मेरे पास आये। वे धीमा-धीमा मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने सामने रखी कुर्सी पर बैठते हुआ मेरा हालचाल पूछा, ' घर में बातचीत हुई ? मैंने कहा, ' हाँ '  उन्होंने कहा, ' सब ठीक है न ?  मैंने कहा , ' अभी पता नहीं..मैंने तो सब बता दिया है..'  रोबी दा ने अपनी ओर से मेरे घर आ मेरे माता-पिता से बातचीत करने का सुझाव रखा। मुझे पता था, रोबी दा को व्यक्तिगत समस्याओं में मध्यस्ता करने में बहुत आनंद आता था। वे अक्सर लोगों के घरेलू मामलों में दख़लअंदाज़ी करते देखे जाते थे और इन सब मामलों को, रस भरे अंदाज़ में यहाँ-वहाँ सुनाते हुए भी देखे जाते थे। मैं नहीं चाहता था कि वे घर आएं। उन्होंने उठते हुए कहा, ' अगर आवश्यक लगे तो बताना.. ' मैं अपने कार्य में व्यस्त हो गया। दिन धीरे धीरे निकला जा रहा था। मैं कुछ चिंतित था कि घर जाकर कैसा माहौल होगा ?  मेरी टेबल पर रखा फोन बज उठा। इन्द्राणी दी का फोन था। उन्होंने बताया कि मेरी माँ ने उन्हें फोन किया था और उन्हें बुलाया था कि कोई आवश्यक बात थी। इन्द्राणी दी ने मुझसे जानना चाहा कि क्या हुआ था ?  मेरी माँ ने उन्हें कुछ नहीं बताया था। मैंने सोचा अब ये माँ ने अच्छा झमेला किया था। मैं क्या कहता इतना ही कहा, ' मुझे कुछ नहीं पता.. माँ को कुछ काम होगा..' इन्द्राणी दी संतुष्ट न हुई, ' मुझे लगता है तुम्हारा ही कोई मामला है, क्या तुमने चंडीगढ़ वाली बात बता दी है ? मैं कहा, ' हाँ, बताना तो था ही..'  इन्द्राणी दी ने कहा, ' चलो तुम्हारे घर आती हूँ..सब पता चल जायेगा..' कहकर फोन रख दिया। माँ, मेरी और इन्द्राणी दी की दोस्ती को जानती थी। वे अक्सर कहती थी कि हम उम्र होने के कारण दोनों एक-दूसरे को अच्छे से समझते थे। शायद उन्हें लगा होगा कि इन्द्राणी मुझे समझा सके। वे ये भी कहती थी कि इन्द्राणी मुझसे केवल एक-दो वर्ष ही बड़ी थी किंतु समझदारी में मुझसे बहुत आगे थी। मेरी माँ सही सोचती थी। इन्द्राणी दी वास्तव में किसी भी बात की तह में जाने में गुणी थी। हमारे परिवार में मेरी केवल मेरी माँ ही नहीं, सभी उन्हें पढ़ी-लिखी और समझदार मानते थे। मैंने सोचा, अच्छा हुआ कि वह घर आ रही थी। मैंने भी तो सबसे पहले उनसे ही अपने मन को खोला था। ये सब सोचते सोचते ऑफिस से घर जाने का समय हो आया। ऑफिस से बाहर आ, एक पीली टैक्सी को रोका और घर के लिए निकल आया। आज इतने बरसों बाद जब उन दिनों को याद करता हूँ तो एक तरह की सिहरन सी होने लगती है। मेरे जीवन के सबसे कठिन दिन थे वे। एक ओर माता-पिता का स्नेह और उनके प्रति मेरा दायित्व था और दूसरी ओर मेरा अपना वजूद और अपने लिए निर्णय लेने का बोध। आज घर पर होने वाले वाद-विवाद का विषय मैं ही था जिसको लेकर चर्चा होने जा रही थी। माता-पिता अपनी ओर से सही थे और मेरा मन अपनी ओर से। अब इन्द्राणी दी न जाने अपना मत किस ओर दें ? अचानक मन में एक विचार कौंधा। मैंने एक मिठाई की दुकान के सामने टैक्सी को रुकवाया और वहां से कुछ मिठाई खरीदी। ये एक ऐसी मिठाई थी जिसे सामान्यतः गैर-बंगाली मिठाई कहा जाता है। मैं जानता था कि इन्द्राणी दी को यह पसंद थी। वो आज घर आ रही थी, उन्हीं का सोचकर खरीद लिया था। 

घर पहुंचा तो देखा कि इन्द्राणी दीदी पहले से ही आयी हुई थी। मैंने पूछा कि वे कब आयीं तो पता चला कि वे काफी पहले से ही आयी हुई थीं। शायद उन्होंने खाना भी मेरी माँ के साथ ही खाया था। बाबा भी उस दिन घर पर थे। तीनों ने जमकर चर्चा की होगी। मैंने मिठाई का वो टिब्बा इन्द्राणी दी के हाथों में रखा, ' आपके लिए लाया हूँ..'  इन्द्राणी दी मुस्कुराने लगी, उन्होंने तुरंत डिब्बा खोला, ' वाह, तुम्हें याद रहा, ये तो मेरी पसंद की मिठाई है..'  मैं अपने कमरे में चला आया। मेरे पीछे ही इन्द्राणी दी भी आ गयी। उन्होंने कहा, ' मैंने सबको ठीक से समझा दिया है..तुम चिंता मत करो.. तुम्हारे माता-पिता पहले तो विरोध कर रहे थे परन्तु अंततः मान गए हैं..'  बाद में माँ और बाबा भी वहीँ आ गए। बाबा ने कहा, ' तुम बड़े हो गए हो.. अपने लिए उचित निर्णय ही लोगे..'  माँ ने सहमति जताते हुए कहा, ' माँ-बाप एक उम्र तक ही रास्ता दिखा सकते हैं.. अब तुम्हारा जीवन, तुम्हारा निर्णय.. तुम जोगेन्दर की लड़की को बता देना..मेरी ओर से हाँ है..'  ये क्या हुआ ? मैं तो न जाने क्या-क्या सोच रहा था। यहाँ तो सब कुछ सुलझा हुआ था और मेरे मन के अनुसार था। इन्द्राणी दीदी को मानना पड़ेगा। कुछ समय बाद इन्द्राणी दी को मैंने इशारों में पूछा कि ये सब कैसे हुआ ? उन्होंने मुझे एक ओर ले जाकर कहा, ' मैंने कुछ अधिक नहीं कहा.. यही कहा कि तुम समझदार हो और तुम्हारी बात मान लेना ही उचित है.. यदि ज़िद पर अड़ गए तो समस्या बढ़ जाएगी.. मैंने ये भी कहा कि यदि तुम्हारे नाना जीवित होते तो कभी भी इस सम्बन्ध को अस्वीकार न करते.. यदि जात-पात और भाषा जैसे विषयों पर एक प्रेम सम्बन्ध को रोका गया तो परिवार की बहुत बदनामी होगी और फालतू का बवाल बन जाएगा..तुम्हारे नाना को गए हुए अधिक समय भी नहीं हुआ है..' मैं चुपचाप सुनता चला जा रहा था। इन्द्राणी दी ने बताया कि मेरी माँ, नाना वाली लेफ्ट की पार्टी की सदस्य थी और पार्टी नाना की सुकीर्ति को यूँ ही समाप्त नहीं होने देना चाहती थी। माँ के अपने भी कुछ छिपे-छिपे से सपने थे। लेफ्ट फ्रंट में उन्हें महिला आयोग के अध्यक्ष के पद दिए जाने की बातें चल रही थी। उन्होंने कहा, ' ऐसे में इस तरह की बातों को फ्रंट के विरोध में जाने की सम्भावना है.. मिडीया इसे एक मुद्दा बनाकर उछालेगा.. माँ को ये सब बातें समझ आ गयी..और वह शांत हो गयी..तुम्हारे पिता तो अपनी पत्नी की ओर ही देखते हैं.. उन्होंने भी सहमति दे दी ' 

( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर  .. ) 

Wednesday, August 19, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 31

                                            टू स्टेट्स - एक नई कहानी 

( Two States - A New Story )
-II-
  चन्दर धींगरा / Chander Dhingra

( हर हफ्ते इस लम्बी कहानी को साझा किया जाना जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ... ) 
( ३१ )      चंडीगढ़ से लौटने के बाद आज ऑफिस में पहला दिन बिता कर घर आया था। माँ का स्नेह उमड़-उमड़ पड़ रहा था। उन्होंने संध्या की चाय के साथ मेरी पसंद की चीजें बिशाखा के हाथों मँगवाकर रखी हुई थी। मैंने माँ को अन्य सब चीजों को अलग कर केवल फिश फ्राई देने को कहा। बिशाखा के हाथ में उसका पैकेट मैंने घर में घुसने से पहले ही देख लिया था। माँ ने कहा, ' ये क्या बात हुई ? ' मैंने कहा, ' कुछ नहीं बस मीठा खाने का मन नहीं है..'  माँ एक प्लेट में फिश फ्राई लेकर आई और उन्होंने हँसते हुए कहा, ' तो क्या यही वहां मिस करते थे ?  मैंने कहा कि ऐसी बात नहीं है, गेस्ट हाउस में शाम को चाय के साथ पकोड़े मिला करते थे और वो भी बहुत अच्छे होते थे।  फिर कुछ याद करते हुए मैंने कहा, ' माँ, क्या तुम्हें ब्रेड पकोड़ा बनाना आता है ? एक दिन बनाओ न.. ' उन्होंने तुरंत उत्तर दिया, ' छी.. वो भी कोई चीज है..  खैर, तुमने कहा है तो एक दिन बना दूंगी.. परन्तु तुम्हारे पिता तो एकदम नहीं खाएंगे..एक बार बनाया था तो हँसने लगे थे कि ब्रेड तो टोस्ट के लिए होती है.. उसका पकोड़ा ?  मैंने कहा, ' और ये जो हम मछली को फ्राई कर उसका पकोड़ा बना देते हैं, वो क्या ?  माँ भी हँसने लगी, ' कल बना दूंगी.. परन्तु, मछली की तुलना ब्रेड से मत करो.. ' मैं आनंद के साथ अपनी मनपसंद चीज़ खाने लगा। मुझे लगा बंगाल की फिश फ्राई का जवाब नहीं। पिंकी यहाँ आएगी तो उसे गरियाहाट के खास होटल का यह आइटम खिलाया जायेगा।  

रात के खाने के लिए भी माँ ने बहुत कुछ बना रखा था। उन्होंने मुझे सब बताया। मैंने कहा, ' इतना सब कुछ क्यों.. एक-दो आइटम ही काफी थे..'  माँ हैरान हो गयी। उन्होंने बहुत प्यार से सब बनाया था। मेरा उत्तर उन्हें अच्छा न लगा। उन्होंने कहा कि क्या हो गया था मुझे ? उन्हें लगा कि चंडीगढ़ से आने के बाद से मैं कुछ शांत सा हो गया था और खाने -पीने में भी रूचि नहीं ले रहा था। मैंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं था। माँ नहीं मानी। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फैराते हुए कहा, ' कुछ तो है ? मैं तुम्हारी माँ हूँ.. समझ सकती हूँ.. बताओ क्या बात है ?  मैं,माँ का मुख देखता रह गया। अपनी ओर मुझे इस तरह से देखते हुए माँ के चेहरे पर चिंता के भाव आ गए थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने कमरे के एक कोने में बने मंदिर के सामने ले गयी। माँ के इष्ट बाबा लोकनाथ की मूर्ति के आसपास कई देवी-देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियां सजी हुई थी। एक रंगीन बल्ब जल रहा था जिसका प्रकाश बाबा की मूर्ति पर पड़ रहा था। सुबह जो फूलों की माला उन पर चढ़ाई गयी थी, उसके फूल अब तक मुरझा गए थे। धूप-दीये की बत्तियाँ भी अपना दायित्व पूर्ण कर, नीचे बिखरी हुई थी। माँ ने मुझे मंदिर के सामने बिठाया और मुझे आदेश दिया कि आँखे बंद कर शांति से बाबा का ध्यान करूँ। सामान्यत: मैं माँ कि ऐसी बातें अनसुनी सी कर देता हूँ और इधर-उधर निकल जाता हूँ। परन्तु आज मैंने ऐसा कुछ न किया। मैं आंखे मूंद शांति से बैठ गया। माँ मेरे साथ बैठी हुई थी। मैं तो खुद को बहुत सक्षम समझता था और इन बातों से अलग था किंतु आज कुछ भिन्न सा था। मैंने मन में सोचा कि मैं माँ को अपनी बात सही से बता सकूँ और कोई विघ्न न आये। ये सोचना एक तरह की प्रार्थना ही तो थी। मैं कुछ समय तक ध्यान मुद्रा में बैठा रहा और बाद में हाथ जोड़ उठ खड़ा हुआ। माँ भी कुछ समय बाद वहां से उठ गयी। उन्होंने अत्यंत धैर्य से कहा, ' अब बताओ बात क्या है ? मैंने भी उतने ही धैर्य से कहा, ' कुछ भी तो नहीं..'  माँ का दिल अपनी संतान के दिल को देख पाता है, पढ़ पाता है। शायद माँ समझ गयी थी कि कुछ तो बात थी जिसे मैं बताना तो चाहता था परन्तु बता न पा रहा था। उन्होंने मेरा अंतर्मन टटोलने के लिए बात को आगे बढ़ाया,  ' तो चंडीगढ़ कैसा लगा ? मैंने कहा, 'बहुत अच्छा ..'  ' और वहां के लोग ?  माँ किसी तह तक पहुंचना चाहती थी।  ' लोग भी बहुत अच्छे, बहुत फ्रेंडली हैं ..' मैं संक्षिप्त में उत्तर दे रहा था। माँ ने पूछा, ' जोगेन्दर कैसा लगा तुम्हें ? मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा, ' जोगेन्दर अंकल ? वो लोग तो बहुत अच्छे हैं.. बहुत केयरिंग हैं.. मेरा बहुत सपोर्ट किया उन लोगों ने.. गेस्ट हाउस का सामान, बेड शीट्स और टॉवेल्स साफ-सुथरे नहीं थे तो उन्होंने अपने घर से भिजवा दिए..मुझे अमृतसर भी घूमवा दिया, उन लोगों ने.. गोल्डन टेम्पल तो अति सुन्दर है..तुमने तो देखा हुआ है, नाना के साथ गयी थी न एक बार ? माँ ने मेरे उत्साह को देख लिया था,  ' जोगेन्दर की तो दो लड़कियां  हैं न ? ' मैंने कहा, ' हाँ, पिंकी और लवली.. पिंकी बड़ी है और लवली छोटी.. पिंकी भी बैंक में काम करती है.. वह सीरियस टाइप है परन्तु लवली नटखट है..' न जाने क्यों मैं खुद से आगे बढ़ कर सब कुछ बताते जा रहा था। माँ ने अब मेरा सामान्य रूप देखा। उन्होंने कहा, ' तुम्हें कौन सी अच्छी लगी ? मेरा तात्पर्य है किसने तुम्हें प्रभावित किया ?  फिर खुद ही उत्तर भी दे दिया, ' मैं जानती हूँ, तुम्हें बड़ी वाली ही अच्छी लगी होगी.. है न ?  मैंने कहा, ' हाँ, पिंकी तो पंजाबी लगती ही नहीं..वो तो हमारे जैसी बंगाली है..'  माँ को मेरे उत्तर ने कुछ सचेत सा कर दिया था। वो अब तक बिस्तर पर तकिये के सहारे लेटी हुई थी, अब तकिये को गोद में लेकर बैठ गयीं, ' तुम्हारा समय तो वहां अच्छे से बीता, है न ? माँ ने मुस्कुराते हुए कहा। मैंने कहा, ' हाँ, वे लोग सच में अच्छे लोग हैं.. पंजाबियों के प्रति तो मेरी धारणा ही बदल गयी है.. ' माँ ने कहा, ' पंजाबी लोग बिज़नेस प्रवर्ति के लोग होते हैं..अपना लाभ-नुकसान पहले देखते हैं..जोगेन्दर ने तुम्हारे प्रति जो इतना किया वह तो तुम्हारे नाना के कारण किया होगा..याद नहीं है उसका भाई सुखबीर जब एक मामले में फँस गया था तो तुम्हारे नाना के पास दौड़ा आया था..नाना तब पार्लियामेंट के मेंबर थे..वह पंजाब के सी एम के लिए एक चिट्ठी ले गया था.. उसका काम हो गया था.. तब ही से तो वह हम लोगों को बहुत मानता है..'  मैंने कहा, ' ये तो कोई बात न हुई.. क्या पंजाब के सभी लोग बिज़नेस प्रवर्ति के होते हैं ..अपना लाभ, अपना स्वार्थ तो हम बंगाली भी खूब देखते हैं.. तुम्हें और नाना को कितने लोगों ने बेवकूफ बनाया हुआ है.. भूल गयी हो.. वे तो अधिकतर बंगाली ही थे..पॉलिटिक्स में नाना को नीचा दिखाने वाले कौन-कौन थे, याद नहीं रहा ?  माँ ने हलकी सी हामी भरी पर कहा, 'अच्छे-बुरे सब जगह होते हैं परन्तु पंजाबियों विशेष कर सरदार जी लोगों का दिमाग अपने हित की ओर अधिक होता है, ऐसा सामान्यत: माना जाता है.. '  माँ ने एक बात ओर कही की कि हर समाज की अपनी विशेषता और दुर्बलता होती है। अचानक माँ के मन में क्या आया कि उन्होंने पूछा, 'क्या वे लोग तुम्हें छोड़ने स्टेशन पर आये थे ? ये प्रश्न इतना अचानक से आया था कि मेरे पास किसी तरह की युक्ति बनाने का अवसर ही न था। मैंने सरलता से कहा, ' हाँ, पिंकी अपने पापा के साथ आयी थी और मेरे खाने के लिए लिए काफी कुछ बनाकर भी लायी थी..'  माँ ने मुस्काते हुए कहा कि इसीलिए मैं ब्रेड पकोड़ा बनाने को कह रहा था। अब माँ को मानों सब कुछ स्पष्ट हो चला था। उन्होंने कहा कि सब कुछ साफ-साफ और सच-सच बताऊँ। मैंने भी अपने भीतर दब रहे गुबार को निकाल देने का यह सही अवसर देखा और सब कुछ एक कहानी सा, माँ को सुना दिया। मैंने वह भी कहा जो पिंकी ने ट्रैन छूटते समय मुझे कहा था कि माँ को जल्दी से जल्दी सब बता देना। मैंने कहा,' मुझे पिंकी को फोन करना है, बोलो, तुम्हारी तरफ से क्या कहूँ ?  माँ लगभग सकते में आ चुकी थी। वो आँखें बंदकर चुपचाप बैठी थी। मैं भी चुप था। कुछ समय बाद हम दोनों सामान्य हुए। माँ ने कहा कि मुझे अपने कलकत्ता पहुँचने की खबर तो जोगेन्दर को देनी चाहिए। मैंने कहा कि मुझे तो पिंकी से बात करनी थी। माँ ने कहा, ' अभी नहीं, तुम्हारे पिता से बात करनी होगी.. ये कोई छोटी बात नहीं है..अभी तो तुम जोगेन्दर को फोन करो, बस.. '  शायद माँ नहीं चाहती थी कि मैं पिंकी को फोन करूँ। इस समय मैंने चुप रहना ही उचित समझा परन्तु मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं फोन अवश्य करूँगा और उसे बता दूँगा कि मैंने माँ से बात कर ली है। यदि माँ अपना निर्णय आज ही बता देती तो यह समाचार भी उसे दे देता। 

मेरे बाबा आज न जाने क्यों घर लौटने में विलम्ब  कर रहे थे। सामान्यतः वे सात बजे तक आ जाते थे। माँ इधर-उधर चहल कदमी कर रही थी। उनकी बेचैनी देखी जा सकती थी। मुझे दुःख हुआ कि माँ की बेचैनी का सबब मैं ही था। मैं भी तो खुद में परेशान था। क्या किया जा सकता था ? माँ कुछ बोल नहीं रही थी। बस एक कमरे से दूसरे कमरे, खुद को बे वजह व्यस्त कर रही थी। डोर बेल बजी तो माँ ने लपकते हुए दरवाज़ा खोला। बाबा आ गए थे। माँ ने पूछा, ' आज इतनी देर ? बाबा ने हमेशा वाला उत्तर दिया, ' आज कुछ काम अधिक था..' माँ ने आज चाय की तैयारी की हुई थी। बाबा जूते उतार कर बैठे ही थे कि माँ पानी का ग्लास लेकर आ गयी, ' चाय तैयार है ..आ जाइये..' उन्होंने कहा। माँ के बदले व्यवहार पर बाबा हैरान थे। सामान्यतः ये सब काम बिशाखा किया करती थी।  बाबा ने कहा, 'चाय रहने दो.. देर हो चुकी है, आज सीधा खाना ही खा लेते हैं.. '  फिर उन्होंने मेरे बारे में पूछा। माँ ने सीधे सीधे कहा, ' आ गया है.. ' उनके इस उत्तर छोटे से उत्तर में नाराज़गी और परेशानी का स्वर साफ दिखाई दे रहा था। मैं अपने में परेशान और खिन्न था। बार बार यही ख्याल आता था कि अभी तक चंडीगढ़ में फोन नहीं किया था। पिंकी प्रतीक्षा में होगी। चलो अभी कर लेता हूँ। माँ ने भी कहा है कि मुझे जोगेन्दर अंकल को अपने ठीक ठाक घर पहुँच जाने की सूचना देनी चाहिए। शायद पिंकी ही फोन उठाये। मैं माँ के कमरे में आया क्यों कि फोन वहीं था। माँ भी कमरे ही थी। मैंने फोन उठाया ही था कि माँ ने पूछा, ' जोगेन्दर को कर रहे हो ? मैंने हाँ में सिर हिलाया। दूसरी ओर से जोगेन्दर अंकल की आवाज़ सुनाई दी। मैंने उन्हें अपने पहुँच जाने और आज से ऑफिस ज्वाइन कर लेने की सूचना दी। वे संतुष्ट दिखे और मेरे माता-पिता का हालचाल पूछने लगे। मैंने उनका धन्यवाद किया कि उन्होंने मेरे लिए इतना कुछ किया। मैंने पिंकी-लवली का हाल पूछा और कहा कि उनसे बाद में कभी बात करूँगा। माँ ने मेरे हाथ से फोन लिया और जोगेन्दर अंकल से बात करने लगी। माँ ने कहा कि मैं उनकी बहुत प्रशंसा कर रहा था और ये भी उनके कारण मुझे कुछ भी असुविधा नहीं हुई थी। मैं सोच पा रहा था कि दूसरी ओर से जोगेन्दर अंकल, ' ओह..  नहीं जी..ऐसी कोई बात नहीं है.. अपना घर है जी.. आप भी कभी आइये.. ' ऐसी ही सब बातें कह रहे होंगे। माँ ने एक बात और कही कि मेरे नाना उन सब को अपना मानते थे और ये भी कि उन्हें भी कभी कलकत्ता आना चाहिए। फोन रख माँ कमरे से निकल गयी। बाबा फ्रेश होकर आ गए थे और खाने की टेबल पर थे। हम तीनों बैठे थे,अपने में सिमटे हुए। बिशाखा ने खाना परोसा। बाबा ने हँसते हुए कहा कि आज बेटे की आवभगत  में उन्हें भी अच्छे पकवान मिल रहे थे। बाबा ने खाना खा कहा कि वे थके हुए थे और जल्दी सोना चाहते थे। किन्तु माँ ने कहा कि आज उनको बहुत आवश्यक बात करनी थी, उनके सोने से पहले। दोनों में देर तक बातचीत चलती रही। मैं भी जगा रहा और सोचता रहा कि सुबह न जाने कैसी होगी ? रात को दोनों मेरे कमरे में आ गए। उन्हें पता चल गया था कि मैं जाग रहा था। बाबा ने बात शुरू की। उन्होंने कहा कि माँ ने सब कुछ बता दिया था। उन्हें नहीं लगता कि ये एक सफल सम्बन्ध होगा। माँ ने भी ऐसा ही कहा। बाबा का मानना था कि दोनों समाजों में बहुत भिन्नता थी, संस्कृति भिन्न-भिन्न थी और ये सम्बन्ध मेरे और परिवार के हित में नहीं थे। माँ ने सांत्वना देते हुए कहा कि उम्र के इस पड़ाव में लड़का-लड़की में इस तरह का आकर्षण स्वाभाविक होता है जो समय के साथ यह मिट जायेगा। वो दोनों ही बोल रहे थे, मैं तो किसी आज्ञाकारी विद्यार्थी की तरह सुनता चला जा रहा था। रात काफी बीत चुकी थी।  मेरी खामोशी से दोनों बहुत संतुष्ट से थे। बाबा ने मुझे सो जाने को कहा। माँ ने स्नेह से सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ' सब ठीक हो जायेगा ..' दोनों मेरे कमरे से निकल गए। मैंने अपने मन में  एक निश्चय को दोहराया। माता-पिता सामान्य की तरह एक बेटे को समझा रहे थे किन्तु मुझे हर तरह की स्थिति से मुकाबला करना था। मेरे भीतर किसी कोने में दुबक कर बैठा मेरा विद्रोही मन, धीरे-धीरे अंगड़ाई ले रहा था। 
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ) 

Wednesday, August 12, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी (Two States - A New Story ) -30

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
(Two States - A New Story ) 
                                                              ----II---                                                                     
     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra 
                    
 ( ३० )    ऑफिस में सब कुछ सामान्य था। ऐसा लग रहा था मानों एक वीकएण्ड था जिसे बिता, मैं फिर से अपनी सीट पर आ बैठा था। साथियों ने चंडीगढ़ के प्रवास और वहां हुई ट्रेनिंग के बारे में जानना चाहा। कुछ ने छेड़ते हुए लहज़े में कहा , ' क्या लाये हो, हमारे लिए ? मैं मुस्कुराता रहा। बस यही कहा, ' मैं खुद आ गया हूँ, यही क्या कम है ?  लेकिन भीतर मुझे लगा कि दोस्तों के लिए कुछ न कुछ तो लाना चाहिए था। दिन यूँ ही मिलने-मिलाने में बीत रहा था। मैं रोबी दा से मिलना चाहता था। वे अक्सर इधर-उधर दिख जाया करते थे परन्तु आज न जाने कहाँ थे ? मैं उनसे दिल की एक बात साझा करना चाहता था। संध्या के एक खास समय पर वे ऑफिस के बाहर एक चाय के स्टाल पर आया करते थे। उन्होंने एक बार बताया था कि शाम की यह चाय उनकी सालों की आदत थी। मैं उनसे मिलने को इतना उतावला हो रहा था कि घड़ी में समय देखा और तेजी से सीढ़ियां लांघता हुआ, ऑफिस से बाहर निकल आया और उस चाय के स्टाल पर पहुँच गया। जैसी आशा थी रोबी दा अपने कुछ खास साथियों के साथ वहां पर बैठे हुए थे। मुझे देखते ही उन्होंने.. आओ.. कह मुस्कुराते हुए मेरा हालचाल पूछा, ' चंडीगढ़ में कोई असुविधा तो नहीं हुई थी ? मैंने ना में सिर हिलाया तो उन्होंने मुझे अपने पास बैठने का संकेत किया और चाय वाले से चाय का एक कप अधिक करने को कहा। मैंने कहा कि चाय रहने दीजिये। वे हंसने लगे, 'अरे, चंडीगढ़ में ऐसी चाय थोड़े ही मिलती होगी ?  मैंने कहा, ' चाय ही नहीं, सड़क के किनारे लगे ऐसे टी-स्टाल भी वहां नहीं दिखते..'  उन्होंने मेरी बात को स्वीकार करते हुए कहा, 'हाँ यह बात तो सच है, कलकत्ता जैसी चाय कहीं नहीं..'  मैंने उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने सब कुछ सामान्य वाला संकेत दिया। कलकत्ता की सड़कों पर छोटे-छोटे टी-स्टालों पर मिलने वाली चाय की तरह यह सब कुछ सामान्य वाला, ' चोल छे ' यानि चलता है, भी केवल कलकत्ता में ही दिखता है। चाय की चुस्की लेते हुए मैंने कहा कि उनसे मुझे कुछ खास बात करनी थी। रोबी दा ने तुरंत कहा कि बताओ। उन्होंने खुद बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' क्या ऑफिस में कुछ प्रॉब्लम हुई है ? मैंने तो तुम्हारे बॉस से तुम्हारे नाना के देहांत की खबर दे दी थी और उन्हें कह दिया था कि तुम पर किसी तरह का प्रेशर न डाला जाये..'  मैंने उन्हें रोका और कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं था। अब वो उत्सुक हो गए। मैंने कहा कि कुछ व्यक्तिगत बातें थीं। वो वहीं पर सुनना चाहते थे परन्तु मैंने उनसे एकांत में बात करने को कहा। उन्होंने कहा ' ठीक है, जब तुम चाहो..' फिर वे उठ गए और उन्होंने कहा कि उस दिन वे अपनी कार लेकर आये थे। उन्होंने सुझाव दिया कि ऑफिस के बाद मैं उनके साथ कार में चलूँ और वो मुझे मेरे घर पर छोड़ देंगे और रास्ते में बात भी हो जाएगी। मुझे ये सुझाव अच्छा लगा।  ऑफिस समाप्त कर मैं नीचे कार पार्किंग में आ गया और रोबी दा की प्रतीक्षा करने लगा। मैं उनकी कार को पहचानता था। उनके ड्राइवर से भी मेरा परिचय था। ये एक पुरानी काले रंग की एम्बेसेडर कार थी। रोबी दा कभी-कभी ही इस कार से ऑफिस आते थे। उनका मानना था कि ट्राम उनके लिए अधिक सुविधाजनक थी। उनका ड्राइवर भी प्रतीक्षा में था। मुझे देख वह पास आया और मेरा हालचाल पूछने लगा। दो-चार बार मैं रोबी दा की कार में इधर-उधर जा चुका था और वह मुझे पहचानता था। मैं कहा, ' आज तुम्हारे साथ जा रहा हूँ..' उसने ख़ुशी जताई। उसे भी मेरे नाना के गुजर जाने की खबर थी। वह ही रोबी दा को हमारे घर लेकर गया था। वह कहने लगा कि मेरे नाना जैसे अच्छे लोग धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे थे और उन जैसे लोगों के लिए ही देश आज़ाद हुआ था। नाना के प्रति ऐसी बातें मैं अक्सर सुनता रहता था। मैं उसे क्या कहता ? कुछ ही समय में रोबी दा आ गए। हम दोनों पीछे बैठ गए। रोबी दा ने ड्राइवर से जल्दी चलने को कहा। उन्होंने उसे हिदायत दी कि मुझे मेरे घर छोड़, उन्हें किसी अन्य से मिलने भी जाना था और उनके पास काम अधिक और समय कम था। मैंने मन ही मन सोचा यह स्थिति तो हम सबके साथ थी। कार ऑफिस के गेट से निकली ही थी कि रोबी दा ने कहा, ' हाँ, अब बताओ क्या समस्या है ?  मैंने कहा कि समस्या तो कुछ नहीं है बस ऐसे ही। वे मुस्कुराने लगे। उन्होंने कहा कि उनकी ज़िंदगी गुजरी है लोगों के बीच। ऐसे ही कोई बात नहीं करता। उन्होंने मुझसे खुलकर बात करने को कहा। ' तुम्हारे नाना मेरे आदर्श रहे हैं.. अब वो नहीं हैं.. उन्होंने एक बार मुझसे तुम्हारा ख्याल रखने को कहा था..जो कुछ भी समस्या है, मुझे बताओ..'  मैंने संकोच करते हुए उन्हें चंडीगढ़ और जोगेन्दर अंकल के बारे में बताया। मैंने कहा कि वे बहुत अच्छे लोग थे और इन्होंने मेरा पूरा ख्याल रखा था और मेरे स्थानीय अभिभावक की ज़िम्मेवारी निभाई थी। रोबी दा ने कहा कि ये सब मेरे नाना की  सुकीर्ति के कारण हुआ था। उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए मुझसे जोगेन्दर साहब के परिवार के बारे में जानना चाहा। मैंने उन्हें उनके व्यवसाय और पिंकी-लवली के बारे बताया। घर पहुँचने से पहले ही मैं उन्हें पिंकी के बारे में बता देना चाहता था। रोबी दा अनुभवी व्यक्ति थे। जोगेन्दर सिंह जी की दो लड़कियों के बारे में जानते ही उनकी उत्सुकता बढ़ गयी। उन्होंने साफ शब्दों में जानना चाहा कि दोनों बहनों में मुझे किसने अधिक प्रभावित किया। मैंने तुरंत पिंकी का नाम लेना चाहा परन्तु बात को सँभालते हुए कहा, ' बड़ी वाली ने..छोटी वाली तो नासमझ जैसी है..' अब रोबी दा असल मुद्दे पर आ गए, ' तो तुम बड़ी यानि पिंकी के प्रति आकर्षित हो गए..' मैंने कोई उत्तर न दिया।  रोबी दा ही बोलते गए, ' ऐसा हो जाता है.. ये उम्र का तकाजा है..इसमें कुछ अनहोना नहीं है..तुम्हें किसी तरह का अपराध बोध नहीं होना चाहिए.. परन्तु समाज की कुछ बाध्यताएँ हैं, उनका पालन तो करना होता है.. क्या तुमने उस लड़की से इस सम्बन्ध में बात की है ? मैने कहा, ' सीधे सीधे तो नहीं परन्तु हम दोनों के बीच सांकेतिक संवाद तो अवश्य हुआ है.. ' रोबी दा ने जानना चाहा, ' क्या तुम ने उसका मन टटोलने की कोशिश की ? इस बात के उत्तर में मैंने पिंकी की रेलवे स्टेशन पर की गयी बात बताई। रोबी दा  इस पर हल्के से मुस्कुरा दिये मानों कह रहे हों, ' तो आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी.. है न ? मैंने कहा, 'रोबी दा, ये सब छोड़िये,अब आगे क्या किया जाये,ये बताइये, मैंने इसलिए तो आपसे बात की है ?  रोबी दा सीट पर पीछे की ओर टिक गए और उन्होंने कहा, ' घर में बात की है ?  मैंने न में सिर हिलाया। उन्होंने कहा, ' घर में तो बताना ही होगा..और इसमें विलम्ब करना ठीक नहीं.. मुझे नहीं लगता कि घर वाले सरलता से मान जायेंगे ?  लगता था रोबी दा को मेरी बातों में एक तरह का आनंद रस मिलने लगा था। वे बोलते गए, ' मैं तुम्हारी माँ को अच्छे से जानता हूँ.. तुम्हारे बाबा तो शायद समझ जायें परन्तु तुम्हारी माँ अवश्य समस्या खड़ी करेंगी.. तुम माँ-पिता से बात करो फिर देखते हैं.. मैं आऊंगा एक दिन तुम्हारे घर, चिंता मत करो..'  वह हंसने लगे, ' जब प्यार किया है तो फिर डरना क्या.. ' रोबी दा सदैव से हिंदी फिल्मों और गानों का मखौल उड़ाते रहे थे परन्तु आज अपनी बात को जमाने के लिए उन्होंने एक फ़िल्मी गाने का सहारा लिया था। मैं क्या कह सकता था ?  रोबी दा मेरे लिए एक समझदार व्यक्ति थे। मैंने उनको समस्त बात बता दी थी। वो जो कुछ कह रहे थे, मुझे पहले से ही पता था। मैं जानता था कि घर में इस बात को सुनते ही एक भूचाल सा आ जायेगा परन्तु घर में बात को उठाने से पूर्व मैं अपने मन के बोझ को कुछ हल्का कर लेना चाहता था। इसीलिए मैंने  इन्द्राणी दीदी और रोबी दादा के समक्ष खुद को खोल दिया था। अब शायद अपने माता-पिता के सामने मैं सहज हो सकूंगा।  मेरा घर आने ही वाला था। जिस भीड़ भरे बाजार के सामने से हम गुजर रहे थे उसके कुछ आगे जाकर ही एक बड़ा चौराहा और उससे बायीं ओर मुड़कर तीसरी गली के छोर पर ही हमारा घर था। रोबी दा ने बाजार का नज़ारा देखा तो अपने ही अंदाज़ में बोल उठे, ' तुम्हारा घर बहुत अच्छे इलाके में है, बाजार एकदम पास में है, कोई असुविधा नहीं, मछली-सब्जी सब कुछ आराम से हर समय मिलता है..यहाँ किसी तरह का गन्दा माहौल भी नहीं है.. कोई झगड़ा-झमेला नहीं होता..शांति और मिल मिलाप है.. '  कलकत्ता के लोगों में मुहल्लों से जुडी ऐसी बातें अक्सर सुनी जाती हैं। मैंने उन्हें हाँ कहा किन्तु सोचने लगा, चंडीगढ़ में भी तो मोहल्लों वाला झगड़ा-झमेला कहीं नहीं देखा था और न ही सुना था। वहां हर ओर माहौल शांति और दोस्ती भरा ही दिखता था। पिंकी ने भी कभी इस तरह की बात नहीं उठाई थी। कार ने हमारे घर वाली गली में प्रवेश ले लिया था। घर के सामने कार रुक गयी। रोबी दा ने एक बार फिर से मुझे आश्वस्त किया। उन्होंने कहा कि आज उनके पास समय कम था वर्ना वे मेरी माँ से मिलते हुए और उनके हाथ की चाय पीते हुए जाते। उन्होंने किसी एक दिन हमारे घर आने की बात की। मैं कार से उतरा तो लगा, एक बोझ कुछ कम हुआ है। रोबी दा की कार आगे बढ़ गयी। सामने से बिशाखा आते हुए दिखी। माँ ने शायद कुछ खरीद लाने के लिए उसे पास की दुकान में भेजा होगा। उसके हाथ में एक छोटा प्लास्टिक का पैकेट था। मैंने पूछा,' बिशाखा मासी क्या लेने गयी थी ? उसने कहा, ' तुम इतने दिन यहाँ नहीं थे, इसलिए माँ ने कुछ मिठाई लाने को कहा था, तुम ऑफिस से आते ही खाते हो न.. साथ में तुम्हारी पसंद की गर्मागरम फिश फ्राई भी लायी हूँ..' मैं सोचने लगा हमारी बंगाली माओं को अपनी संतान को उनकी पसंद का खिलाने की कितनी फ़िक्र होती है। ये बच्चों को खिलाने की उनकी प्रक्रिया स्कूल के दिनों से ही शुरू हो जाती है। मैं तेजी से घर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। मेरे मुँह में न जाने कहाँ से मेरी मनपसंद बंगाली भेटकी मछली से बनी फिश फ्राई और सरसों से बनी चटनी  का चटपटा स्वाद घुलता चला आ रहा था।
 ( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )