Chander Dhingra's Blog

Wednesday, August 19, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 31

                                            टू स्टेट्स - एक नई कहानी 

( Two States - A New Story )
-II-
  चन्दर धींगरा / Chander Dhingra

( हर हफ्ते इस लम्बी कहानी को साझा किया जाना जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ... ) 
( ३१ )      चंडीगढ़ से लौटने के बाद आज ऑफिस में पहला दिन बिता कर घर आया था। माँ का स्नेह उमड़-उमड़ पड़ रहा था। उन्होंने संध्या की चाय के साथ मेरी पसंद की चीजें बिशाखा के हाथों मँगवाकर रखी हुई थी। मैंने माँ को अन्य सब चीजों को अलग कर केवल फिश फ्राई देने को कहा। बिशाखा के हाथ में उसका पैकेट मैंने घर में घुसने से पहले ही देख लिया था। माँ ने कहा, ' ये क्या बात हुई ? ' मैंने कहा, ' कुछ नहीं बस मीठा खाने का मन नहीं है..'  माँ एक प्लेट में फिश फ्राई लेकर आई और उन्होंने हँसते हुए कहा, ' तो क्या यही वहां मिस करते थे ?  मैंने कहा कि ऐसी बात नहीं है, गेस्ट हाउस में शाम को चाय के साथ पकोड़े मिला करते थे और वो भी बहुत अच्छे होते थे।  फिर कुछ याद करते हुए मैंने कहा, ' माँ, क्या तुम्हें ब्रेड पकोड़ा बनाना आता है ? एक दिन बनाओ न.. ' उन्होंने तुरंत उत्तर दिया, ' छी.. वो भी कोई चीज है..  खैर, तुमने कहा है तो एक दिन बना दूंगी.. परन्तु तुम्हारे पिता तो एकदम नहीं खाएंगे..एक बार बनाया था तो हँसने लगे थे कि ब्रेड तो टोस्ट के लिए होती है.. उसका पकोड़ा ?  मैंने कहा, ' और ये जो हम मछली को फ्राई कर उसका पकोड़ा बना देते हैं, वो क्या ?  माँ भी हँसने लगी, ' कल बना दूंगी.. परन्तु, मछली की तुलना ब्रेड से मत करो.. ' मैं आनंद के साथ अपनी मनपसंद चीज़ खाने लगा। मुझे लगा बंगाल की फिश फ्राई का जवाब नहीं। पिंकी यहाँ आएगी तो उसे गरियाहाट के खास होटल का यह आइटम खिलाया जायेगा।  

रात के खाने के लिए भी माँ ने बहुत कुछ बना रखा था। उन्होंने मुझे सब बताया। मैंने कहा, ' इतना सब कुछ क्यों.. एक-दो आइटम ही काफी थे..'  माँ हैरान हो गयी। उन्होंने बहुत प्यार से सब बनाया था। मेरा उत्तर उन्हें अच्छा न लगा। उन्होंने कहा कि क्या हो गया था मुझे ? उन्हें लगा कि चंडीगढ़ से आने के बाद से मैं कुछ शांत सा हो गया था और खाने -पीने में भी रूचि नहीं ले रहा था। मैंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं था। माँ नहीं मानी। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फैराते हुए कहा, ' कुछ तो है ? मैं तुम्हारी माँ हूँ.. समझ सकती हूँ.. बताओ क्या बात है ?  मैं,माँ का मुख देखता रह गया। अपनी ओर मुझे इस तरह से देखते हुए माँ के चेहरे पर चिंता के भाव आ गए थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने कमरे के एक कोने में बने मंदिर के सामने ले गयी। माँ के इष्ट बाबा लोकनाथ की मूर्ति के आसपास कई देवी-देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियां सजी हुई थी। एक रंगीन बल्ब जल रहा था जिसका प्रकाश बाबा की मूर्ति पर पड़ रहा था। सुबह जो फूलों की माला उन पर चढ़ाई गयी थी, उसके फूल अब तक मुरझा गए थे। धूप-दीये की बत्तियाँ भी अपना दायित्व पूर्ण कर, नीचे बिखरी हुई थी। माँ ने मुझे मंदिर के सामने बिठाया और मुझे आदेश दिया कि आँखे बंद कर शांति से बाबा का ध्यान करूँ। सामान्यत: मैं माँ कि ऐसी बातें अनसुनी सी कर देता हूँ और इधर-उधर निकल जाता हूँ। परन्तु आज मैंने ऐसा कुछ न किया। मैं आंखे मूंद शांति से बैठ गया। माँ मेरे साथ बैठी हुई थी। मैं तो खुद को बहुत सक्षम समझता था और इन बातों से अलग था किंतु आज कुछ भिन्न सा था। मैंने मन में सोचा कि मैं माँ को अपनी बात सही से बता सकूँ और कोई विघ्न न आये। ये सोचना एक तरह की प्रार्थना ही तो थी। मैं कुछ समय तक ध्यान मुद्रा में बैठा रहा और बाद में हाथ जोड़ उठ खड़ा हुआ। माँ भी कुछ समय बाद वहां से उठ गयी। उन्होंने अत्यंत धैर्य से कहा, ' अब बताओ बात क्या है ? मैंने भी उतने ही धैर्य से कहा, ' कुछ भी तो नहीं..'  माँ का दिल अपनी संतान के दिल को देख पाता है, पढ़ पाता है। शायद माँ समझ गयी थी कि कुछ तो बात थी जिसे मैं बताना तो चाहता था परन्तु बता न पा रहा था। उन्होंने मेरा अंतर्मन टटोलने के लिए बात को आगे बढ़ाया,  ' तो चंडीगढ़ कैसा लगा ? मैंने कहा, 'बहुत अच्छा ..'  ' और वहां के लोग ?  माँ किसी तह तक पहुंचना चाहती थी।  ' लोग भी बहुत अच्छे, बहुत फ्रेंडली हैं ..' मैं संक्षिप्त में उत्तर दे रहा था। माँ ने पूछा, ' जोगेन्दर कैसा लगा तुम्हें ? मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा, ' जोगेन्दर अंकल ? वो लोग तो बहुत अच्छे हैं.. बहुत केयरिंग हैं.. मेरा बहुत सपोर्ट किया उन लोगों ने.. गेस्ट हाउस का सामान, बेड शीट्स और टॉवेल्स साफ-सुथरे नहीं थे तो उन्होंने अपने घर से भिजवा दिए..मुझे अमृतसर भी घूमवा दिया, उन लोगों ने.. गोल्डन टेम्पल तो अति सुन्दर है..तुमने तो देखा हुआ है, नाना के साथ गयी थी न एक बार ? माँ ने मेरे उत्साह को देख लिया था,  ' जोगेन्दर की तो दो लड़कियां  हैं न ? ' मैंने कहा, ' हाँ, पिंकी और लवली.. पिंकी बड़ी है और लवली छोटी.. पिंकी भी बैंक में काम करती है.. वह सीरियस टाइप है परन्तु लवली नटखट है..' न जाने क्यों मैं खुद से आगे बढ़ कर सब कुछ बताते जा रहा था। माँ ने अब मेरा सामान्य रूप देखा। उन्होंने कहा, ' तुम्हें कौन सी अच्छी लगी ? मेरा तात्पर्य है किसने तुम्हें प्रभावित किया ?  फिर खुद ही उत्तर भी दे दिया, ' मैं जानती हूँ, तुम्हें बड़ी वाली ही अच्छी लगी होगी.. है न ?  मैंने कहा, ' हाँ, पिंकी तो पंजाबी लगती ही नहीं..वो तो हमारे जैसी बंगाली है..'  माँ को मेरे उत्तर ने कुछ सचेत सा कर दिया था। वो अब तक बिस्तर पर तकिये के सहारे लेटी हुई थी, अब तकिये को गोद में लेकर बैठ गयीं, ' तुम्हारा समय तो वहां अच्छे से बीता, है न ? माँ ने मुस्कुराते हुए कहा। मैंने कहा, ' हाँ, वे लोग सच में अच्छे लोग हैं.. पंजाबियों के प्रति तो मेरी धारणा ही बदल गयी है.. ' माँ ने कहा, ' पंजाबी लोग बिज़नेस प्रवर्ति के लोग होते हैं..अपना लाभ-नुकसान पहले देखते हैं..जोगेन्दर ने तुम्हारे प्रति जो इतना किया वह तो तुम्हारे नाना के कारण किया होगा..याद नहीं है उसका भाई सुखबीर जब एक मामले में फँस गया था तो तुम्हारे नाना के पास दौड़ा आया था..नाना तब पार्लियामेंट के मेंबर थे..वह पंजाब के सी एम के लिए एक चिट्ठी ले गया था.. उसका काम हो गया था.. तब ही से तो वह हम लोगों को बहुत मानता है..'  मैंने कहा, ' ये तो कोई बात न हुई.. क्या पंजाब के सभी लोग बिज़नेस प्रवर्ति के होते हैं ..अपना लाभ, अपना स्वार्थ तो हम बंगाली भी खूब देखते हैं.. तुम्हें और नाना को कितने लोगों ने बेवकूफ बनाया हुआ है.. भूल गयी हो.. वे तो अधिकतर बंगाली ही थे..पॉलिटिक्स में नाना को नीचा दिखाने वाले कौन-कौन थे, याद नहीं रहा ?  माँ ने हलकी सी हामी भरी पर कहा, 'अच्छे-बुरे सब जगह होते हैं परन्तु पंजाबियों विशेष कर सरदार जी लोगों का दिमाग अपने हित की ओर अधिक होता है, ऐसा सामान्यत: माना जाता है.. '  माँ ने एक बात ओर कही की कि हर समाज की अपनी विशेषता और दुर्बलता होती है। अचानक माँ के मन में क्या आया कि उन्होंने पूछा, 'क्या वे लोग तुम्हें छोड़ने स्टेशन पर आये थे ? ये प्रश्न इतना अचानक से आया था कि मेरे पास किसी तरह की युक्ति बनाने का अवसर ही न था। मैंने सरलता से कहा, ' हाँ, पिंकी अपने पापा के साथ आयी थी और मेरे खाने के लिए लिए काफी कुछ बनाकर भी लायी थी..'  माँ ने मुस्काते हुए कहा कि इसीलिए मैं ब्रेड पकोड़ा बनाने को कह रहा था। अब माँ को मानों सब कुछ स्पष्ट हो चला था। उन्होंने कहा कि सब कुछ साफ-साफ और सच-सच बताऊँ। मैंने भी अपने भीतर दब रहे गुबार को निकाल देने का यह सही अवसर देखा और सब कुछ एक कहानी सा, माँ को सुना दिया। मैंने वह भी कहा जो पिंकी ने ट्रैन छूटते समय मुझे कहा था कि माँ को जल्दी से जल्दी सब बता देना। मैंने कहा,' मुझे पिंकी को फोन करना है, बोलो, तुम्हारी तरफ से क्या कहूँ ?  माँ लगभग सकते में आ चुकी थी। वो आँखें बंदकर चुपचाप बैठी थी। मैं भी चुप था। कुछ समय बाद हम दोनों सामान्य हुए। माँ ने कहा कि मुझे अपने कलकत्ता पहुँचने की खबर तो जोगेन्दर को देनी चाहिए। मैंने कहा कि मुझे तो पिंकी से बात करनी थी। माँ ने कहा, ' अभी नहीं, तुम्हारे पिता से बात करनी होगी.. ये कोई छोटी बात नहीं है..अभी तो तुम जोगेन्दर को फोन करो, बस.. '  शायद माँ नहीं चाहती थी कि मैं पिंकी को फोन करूँ। इस समय मैंने चुप रहना ही उचित समझा परन्तु मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं फोन अवश्य करूँगा और उसे बता दूँगा कि मैंने माँ से बात कर ली है। यदि माँ अपना निर्णय आज ही बता देती तो यह समाचार भी उसे दे देता। 

मेरे बाबा आज न जाने क्यों घर लौटने में विलम्ब  कर रहे थे। सामान्यतः वे सात बजे तक आ जाते थे। माँ इधर-उधर चहल कदमी कर रही थी। उनकी बेचैनी देखी जा सकती थी। मुझे दुःख हुआ कि माँ की बेचैनी का सबब मैं ही था। मैं भी तो खुद में परेशान था। क्या किया जा सकता था ? माँ कुछ बोल नहीं रही थी। बस एक कमरे से दूसरे कमरे, खुद को बे वजह व्यस्त कर रही थी। डोर बेल बजी तो माँ ने लपकते हुए दरवाज़ा खोला। बाबा आ गए थे। माँ ने पूछा, ' आज इतनी देर ? बाबा ने हमेशा वाला उत्तर दिया, ' आज कुछ काम अधिक था..' माँ ने आज चाय की तैयारी की हुई थी। बाबा जूते उतार कर बैठे ही थे कि माँ पानी का ग्लास लेकर आ गयी, ' चाय तैयार है ..आ जाइये..' उन्होंने कहा। माँ के बदले व्यवहार पर बाबा हैरान थे। सामान्यतः ये सब काम बिशाखा किया करती थी।  बाबा ने कहा, 'चाय रहने दो.. देर हो चुकी है, आज सीधा खाना ही खा लेते हैं.. '  फिर उन्होंने मेरे बारे में पूछा। माँ ने सीधे सीधे कहा, ' आ गया है.. ' उनके इस उत्तर छोटे से उत्तर में नाराज़गी और परेशानी का स्वर साफ दिखाई दे रहा था। मैं अपने में परेशान और खिन्न था। बार बार यही ख्याल आता था कि अभी तक चंडीगढ़ में फोन नहीं किया था। पिंकी प्रतीक्षा में होगी। चलो अभी कर लेता हूँ। माँ ने भी कहा है कि मुझे जोगेन्दर अंकल को अपने ठीक ठाक घर पहुँच जाने की सूचना देनी चाहिए। शायद पिंकी ही फोन उठाये। मैं माँ के कमरे में आया क्यों कि फोन वहीं था। माँ भी कमरे ही थी। मैंने फोन उठाया ही था कि माँ ने पूछा, ' जोगेन्दर को कर रहे हो ? मैंने हाँ में सिर हिलाया। दूसरी ओर से जोगेन्दर अंकल की आवाज़ सुनाई दी। मैंने उन्हें अपने पहुँच जाने और आज से ऑफिस ज्वाइन कर लेने की सूचना दी। वे संतुष्ट दिखे और मेरे माता-पिता का हालचाल पूछने लगे। मैंने उनका धन्यवाद किया कि उन्होंने मेरे लिए इतना कुछ किया। मैंने पिंकी-लवली का हाल पूछा और कहा कि उनसे बाद में कभी बात करूँगा। माँ ने मेरे हाथ से फोन लिया और जोगेन्दर अंकल से बात करने लगी। माँ ने कहा कि मैं उनकी बहुत प्रशंसा कर रहा था और ये भी उनके कारण मुझे कुछ भी असुविधा नहीं हुई थी। मैं सोच पा रहा था कि दूसरी ओर से जोगेन्दर अंकल, ' ओह..  नहीं जी..ऐसी कोई बात नहीं है.. अपना घर है जी.. आप भी कभी आइये.. ' ऐसी ही सब बातें कह रहे होंगे। माँ ने एक बात और कही कि मेरे नाना उन सब को अपना मानते थे और ये भी कि उन्हें भी कभी कलकत्ता आना चाहिए। फोन रख माँ कमरे से निकल गयी। बाबा फ्रेश होकर आ गए थे और खाने की टेबल पर थे। हम तीनों बैठे थे,अपने में सिमटे हुए। बिशाखा ने खाना परोसा। बाबा ने हँसते हुए कहा कि आज बेटे की आवभगत  में उन्हें भी अच्छे पकवान मिल रहे थे। बाबा ने खाना खा कहा कि वे थके हुए थे और जल्दी सोना चाहते थे। किन्तु माँ ने कहा कि आज उनको बहुत आवश्यक बात करनी थी, उनके सोने से पहले। दोनों में देर तक बातचीत चलती रही। मैं भी जगा रहा और सोचता रहा कि सुबह न जाने कैसी होगी ? रात को दोनों मेरे कमरे में आ गए। उन्हें पता चल गया था कि मैं जाग रहा था। बाबा ने बात शुरू की। उन्होंने कहा कि माँ ने सब कुछ बता दिया था। उन्हें नहीं लगता कि ये एक सफल सम्बन्ध होगा। माँ ने भी ऐसा ही कहा। बाबा का मानना था कि दोनों समाजों में बहुत भिन्नता थी, संस्कृति भिन्न-भिन्न थी और ये सम्बन्ध मेरे और परिवार के हित में नहीं थे। माँ ने सांत्वना देते हुए कहा कि उम्र के इस पड़ाव में लड़का-लड़की में इस तरह का आकर्षण स्वाभाविक होता है जो समय के साथ यह मिट जायेगा। वो दोनों ही बोल रहे थे, मैं तो किसी आज्ञाकारी विद्यार्थी की तरह सुनता चला जा रहा था। रात काफी बीत चुकी थी।  मेरी खामोशी से दोनों बहुत संतुष्ट से थे। बाबा ने मुझे सो जाने को कहा। माँ ने स्नेह से सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ' सब ठीक हो जायेगा ..' दोनों मेरे कमरे से निकल गए। मैंने अपने मन में  एक निश्चय को दोहराया। माता-पिता सामान्य की तरह एक बेटे को समझा रहे थे किन्तु मुझे हर तरह की स्थिति से मुकाबला करना था। मेरे भीतर किसी कोने में दुबक कर बैठा मेरा विद्रोही मन, धीरे-धीरे अंगड़ाई ले रहा था। 
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ) 

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