Chander Dhingra's Blog

Wednesday, August 26, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -32

 टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
( Two States - A New Story )
-II-
  चन्दर धींगरा / Chander Dhingra

( हफ्ते वार  इस लम्बी कहानी को साझा किया जाना जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ... )
  ( ३२ )    सुबह देखा, माँ और बाबा दोनों सामान्य से दिखे। वे जैसे संतुष्ट थे कि रात को उन्होंने जो मुझे समझाया था, वह काम कर गया था। माँ बार बार मेरे आसपास आ रही थी किंतु कुछ बोल नहीं रही थी। बाबा भी चुपके से मुझे देख ले रहे थे परन्तु शांत थे। माँ ने अचानक बिशाखा को पुकारा, ' बाबू को आज ऑफिस के टिफिन में क्या दे रही हो ? मैंने सुना तो बिशाखा की ओर से उत्तर दिया, ' आज टिफिन नहीं देना..'  माँ ने कारण जानना चाहा।  मैंने कहा कि कुछ विशेष नहीं, बस आज घर के खाना का मन न था। माँ को थोड़ा गुस्सा तो आया होगा परन्तु उन्होंने संयम रखते हुए व्यंग्य भाव से कहा, ' घर का या बंगाली खाने का मन नहीं है..या पंजाबी स्वाद अभी तक जीभ पर अब तक चिपका हुआ है ?  मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है.. आज चाइनीस मँगवा लूंगा..किमलिंग से..'  किमलिंग हमारे ऑफिस के निकट  एक छोटा सा चाइनीज़ होटल है। हम लोग ऑफिस में कभी-कभी वहां से मंगवा लेते हैं। माँ कुछ नहीं बोली, बस बिशाखा को कुछ दूसरा काम समझाने लगी। मुझ से केवल इतना ही कहा कि रात को तो घर में ही खाऊंगा न ? मैं सुबह की दिनचर्या में लग गया। बाबा ने उस दिन के समाचार पत्र में कुछ विशेष देखा तो मुझे बुलाया, ' ये देखो, क्या छपा है ?  मैं उनके पास गया तो उन्होंने ने एक समाचार दिखाया जिसमें बैंकों के अधिकारी संघ ने एक दिन की हड़ताल की चेतावनी दी थी। मैंने कहा, ' काम कुछ करेंगे नहीं, बस हड़ताल करेंगे..'  उन्हें मेरी इस प्रतिक्रिया की आशा न थी परन्तु उन्होंने भी मेरा साथ देते हुए, ' ठीक कहते हो.. इस काम चोरी की वजह ही से तो हमारा बैंकिंग सिस्टम डूब रहा है..'  अचानक उन्होंने विषय को बदल दिया। शायद इस बेकार के समाचार के ज़रिये वो मुझे अपने पास बुलाना चाहते थे और मुझसे कुछ वार्तालाप करना चाहते थे। उन्होंने अपने मन में दबी बात को सामने लाते हुए बहुत प्यार से कहा, ' माता-पिता जो कहते हैं और करते हैं वह संतान की भलाई के लिए ही होता है, हमनें तुम्हें कल रात जो समझाया, वह तुम्हारे हित के लिए ही है.. आशा है तुमने हमारी बातों को सही अर्थ में लिया होगा..'  मैंने उनकी बात का उत्तर नहीं दिया और वहां से उठकर जाने लगा। बाबा ने मुझे रोकते हुए कहा, ' ये बातें आरम्भ में समझ नहीं आती परन्तु इनका भविष्य से सम्बन्ध होता है.. भावुकता में आकर छोटी सी भूल जीवन भर के लिए गंभीर समस्या बन जाती है.. तुम समझ रहे हो न ?  मैंने अब भी उनकी बातों पर प्रतिक्रिया नहीं दी। शायद उन्हें मेरा बर्ताव अच्छा नहीं  लगा। उन्होंने माँ को आवाज़ दी,' देखो, ये कुछ बात ही नहीं कर रहा..' माँ लपकती सी आ गयी और पिता के साथ सहमति मिलाते हुए बोली, ' अपने पिता की बात हर बेटे को सुननी चाहिए और माननी भी चाहिए..' माँ अधिकतर बाबा की बातों के विपरीत जाती थी परन्तु उस दिन लगभग वही बातें दोहरायी जो मेरे बाबा ने कही थीं। मैं खामोश था और अपने ऑफिस जाने की तैयारी में लगा था। बाबा अपनी कुर्सी पर बैठे हुए थे परन्तु माँ एक तरह की बेचैनी दिखाती हुई, मेरे आसपास घूम रही थी। अचानक उन्होंने दबाव देते हुए कहा, ' जोगेन्दर को तो तुमने फोन कर ही दिया है.. उस लड़की को फोन करने की आवश्यकता नहीं है..' मैंने माँ को इस तरह से देखा कि उन्हें समझ आ गया कि मुझे उनकी यह बात अच्छी नहीं लगी थी। माँ ने कहा, ' आज  धैर्य से हमारी बातों को सोचना.. ' अब मैंने कहा, ' आप दोनों भी मेरे मन को समझने की कोशिश करना.. मुझे पिंकी को फोन करना है और आपका मत बताना है..'  माँ मुझे देखती रह गयी। मैंने अपना ऑफिस बैग उठाया और घर से बाहर निकल आया। 

ऑफिस में चुपचाप अपना काम करता रहा। कुछ समय बाद रोबी दा मेरे पास आये। वे धीमा-धीमा मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने सामने रखी कुर्सी पर बैठते हुआ मेरा हालचाल पूछा, ' घर में बातचीत हुई ? मैंने कहा, ' हाँ '  उन्होंने कहा, ' सब ठीक है न ?  मैंने कहा , ' अभी पता नहीं..मैंने तो सब बता दिया है..'  रोबी दा ने अपनी ओर से मेरे घर आ मेरे माता-पिता से बातचीत करने का सुझाव रखा। मुझे पता था, रोबी दा को व्यक्तिगत समस्याओं में मध्यस्ता करने में बहुत आनंद आता था। वे अक्सर लोगों के घरेलू मामलों में दख़लअंदाज़ी करते देखे जाते थे और इन सब मामलों को, रस भरे अंदाज़ में यहाँ-वहाँ सुनाते हुए भी देखे जाते थे। मैं नहीं चाहता था कि वे घर आएं। उन्होंने उठते हुए कहा, ' अगर आवश्यक लगे तो बताना.. ' मैं अपने कार्य में व्यस्त हो गया। दिन धीरे धीरे निकला जा रहा था। मैं कुछ चिंतित था कि घर जाकर कैसा माहौल होगा ?  मेरी टेबल पर रखा फोन बज उठा। इन्द्राणी दी का फोन था। उन्होंने बताया कि मेरी माँ ने उन्हें फोन किया था और उन्हें बुलाया था कि कोई आवश्यक बात थी। इन्द्राणी दी ने मुझसे जानना चाहा कि क्या हुआ था ?  मेरी माँ ने उन्हें कुछ नहीं बताया था। मैंने सोचा अब ये माँ ने अच्छा झमेला किया था। मैं क्या कहता इतना ही कहा, ' मुझे कुछ नहीं पता.. माँ को कुछ काम होगा..' इन्द्राणी दी संतुष्ट न हुई, ' मुझे लगता है तुम्हारा ही कोई मामला है, क्या तुमने चंडीगढ़ वाली बात बता दी है ? मैं कहा, ' हाँ, बताना तो था ही..'  इन्द्राणी दी ने कहा, ' चलो तुम्हारे घर आती हूँ..सब पता चल जायेगा..' कहकर फोन रख दिया। माँ, मेरी और इन्द्राणी दी की दोस्ती को जानती थी। वे अक्सर कहती थी कि हम उम्र होने के कारण दोनों एक-दूसरे को अच्छे से समझते थे। शायद उन्हें लगा होगा कि इन्द्राणी मुझे समझा सके। वे ये भी कहती थी कि इन्द्राणी मुझसे केवल एक-दो वर्ष ही बड़ी थी किंतु समझदारी में मुझसे बहुत आगे थी। मेरी माँ सही सोचती थी। इन्द्राणी दी वास्तव में किसी भी बात की तह में जाने में गुणी थी। हमारे परिवार में मेरी केवल मेरी माँ ही नहीं, सभी उन्हें पढ़ी-लिखी और समझदार मानते थे। मैंने सोचा, अच्छा हुआ कि वह घर आ रही थी। मैंने भी तो सबसे पहले उनसे ही अपने मन को खोला था। ये सब सोचते सोचते ऑफिस से घर जाने का समय हो आया। ऑफिस से बाहर आ, एक पीली टैक्सी को रोका और घर के लिए निकल आया। आज इतने बरसों बाद जब उन दिनों को याद करता हूँ तो एक तरह की सिहरन सी होने लगती है। मेरे जीवन के सबसे कठिन दिन थे वे। एक ओर माता-पिता का स्नेह और उनके प्रति मेरा दायित्व था और दूसरी ओर मेरा अपना वजूद और अपने लिए निर्णय लेने का बोध। आज घर पर होने वाले वाद-विवाद का विषय मैं ही था जिसको लेकर चर्चा होने जा रही थी। माता-पिता अपनी ओर से सही थे और मेरा मन अपनी ओर से। अब इन्द्राणी दी न जाने अपना मत किस ओर दें ? अचानक मन में एक विचार कौंधा। मैंने एक मिठाई की दुकान के सामने टैक्सी को रुकवाया और वहां से कुछ मिठाई खरीदी। ये एक ऐसी मिठाई थी जिसे सामान्यतः गैर-बंगाली मिठाई कहा जाता है। मैं जानता था कि इन्द्राणी दी को यह पसंद थी। वो आज घर आ रही थी, उन्हीं का सोचकर खरीद लिया था। 

घर पहुंचा तो देखा कि इन्द्राणी दीदी पहले से ही आयी हुई थी। मैंने पूछा कि वे कब आयीं तो पता चला कि वे काफी पहले से ही आयी हुई थीं। शायद उन्होंने खाना भी मेरी माँ के साथ ही खाया था। बाबा भी उस दिन घर पर थे। तीनों ने जमकर चर्चा की होगी। मैंने मिठाई का वो टिब्बा इन्द्राणी दी के हाथों में रखा, ' आपके लिए लाया हूँ..'  इन्द्राणी दी मुस्कुराने लगी, उन्होंने तुरंत डिब्बा खोला, ' वाह, तुम्हें याद रहा, ये तो मेरी पसंद की मिठाई है..'  मैं अपने कमरे में चला आया। मेरे पीछे ही इन्द्राणी दी भी आ गयी। उन्होंने कहा, ' मैंने सबको ठीक से समझा दिया है..तुम चिंता मत करो.. तुम्हारे माता-पिता पहले तो विरोध कर रहे थे परन्तु अंततः मान गए हैं..'  बाद में माँ और बाबा भी वहीँ आ गए। बाबा ने कहा, ' तुम बड़े हो गए हो.. अपने लिए उचित निर्णय ही लोगे..'  माँ ने सहमति जताते हुए कहा, ' माँ-बाप एक उम्र तक ही रास्ता दिखा सकते हैं.. अब तुम्हारा जीवन, तुम्हारा निर्णय.. तुम जोगेन्दर की लड़की को बता देना..मेरी ओर से हाँ है..'  ये क्या हुआ ? मैं तो न जाने क्या-क्या सोच रहा था। यहाँ तो सब कुछ सुलझा हुआ था और मेरे मन के अनुसार था। इन्द्राणी दीदी को मानना पड़ेगा। कुछ समय बाद इन्द्राणी दी को मैंने इशारों में पूछा कि ये सब कैसे हुआ ? उन्होंने मुझे एक ओर ले जाकर कहा, ' मैंने कुछ अधिक नहीं कहा.. यही कहा कि तुम समझदार हो और तुम्हारी बात मान लेना ही उचित है.. यदि ज़िद पर अड़ गए तो समस्या बढ़ जाएगी.. मैंने ये भी कहा कि यदि तुम्हारे नाना जीवित होते तो कभी भी इस सम्बन्ध को अस्वीकार न करते.. यदि जात-पात और भाषा जैसे विषयों पर एक प्रेम सम्बन्ध को रोका गया तो परिवार की बहुत बदनामी होगी और फालतू का बवाल बन जाएगा..तुम्हारे नाना को गए हुए अधिक समय भी नहीं हुआ है..' मैं चुपचाप सुनता चला जा रहा था। इन्द्राणी दी ने बताया कि मेरी माँ, नाना वाली लेफ्ट की पार्टी की सदस्य थी और पार्टी नाना की सुकीर्ति को यूँ ही समाप्त नहीं होने देना चाहती थी। माँ के अपने भी कुछ छिपे-छिपे से सपने थे। लेफ्ट फ्रंट में उन्हें महिला आयोग के अध्यक्ष के पद दिए जाने की बातें चल रही थी। उन्होंने कहा, ' ऐसे में इस तरह की बातों को फ्रंट के विरोध में जाने की सम्भावना है.. मिडीया इसे एक मुद्दा बनाकर उछालेगा.. माँ को ये सब बातें समझ आ गयी..और वह शांत हो गयी..तुम्हारे पिता तो अपनी पत्नी की ओर ही देखते हैं.. उन्होंने भी सहमति दे दी ' 

( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर  .. ) 

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