Chander Dhingra's Blog

Wednesday, August 12, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी (Two States - A New Story ) -30

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
(Two States - A New Story ) 
                                                              ----II---                                                                     
     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra 
                    
 ( ३० )    ऑफिस में सब कुछ सामान्य था। ऐसा लग रहा था मानों एक वीकएण्ड था जिसे बिता, मैं फिर से अपनी सीट पर आ बैठा था। साथियों ने चंडीगढ़ के प्रवास और वहां हुई ट्रेनिंग के बारे में जानना चाहा। कुछ ने छेड़ते हुए लहज़े में कहा , ' क्या लाये हो, हमारे लिए ? मैं मुस्कुराता रहा। बस यही कहा, ' मैं खुद आ गया हूँ, यही क्या कम है ?  लेकिन भीतर मुझे लगा कि दोस्तों के लिए कुछ न कुछ तो लाना चाहिए था। दिन यूँ ही मिलने-मिलाने में बीत रहा था। मैं रोबी दा से मिलना चाहता था। वे अक्सर इधर-उधर दिख जाया करते थे परन्तु आज न जाने कहाँ थे ? मैं उनसे दिल की एक बात साझा करना चाहता था। संध्या के एक खास समय पर वे ऑफिस के बाहर एक चाय के स्टाल पर आया करते थे। उन्होंने एक बार बताया था कि शाम की यह चाय उनकी सालों की आदत थी। मैं उनसे मिलने को इतना उतावला हो रहा था कि घड़ी में समय देखा और तेजी से सीढ़ियां लांघता हुआ, ऑफिस से बाहर निकल आया और उस चाय के स्टाल पर पहुँच गया। जैसी आशा थी रोबी दा अपने कुछ खास साथियों के साथ वहां पर बैठे हुए थे। मुझे देखते ही उन्होंने.. आओ.. कह मुस्कुराते हुए मेरा हालचाल पूछा, ' चंडीगढ़ में कोई असुविधा तो नहीं हुई थी ? मैंने ना में सिर हिलाया तो उन्होंने मुझे अपने पास बैठने का संकेत किया और चाय वाले से चाय का एक कप अधिक करने को कहा। मैंने कहा कि चाय रहने दीजिये। वे हंसने लगे, 'अरे, चंडीगढ़ में ऐसी चाय थोड़े ही मिलती होगी ?  मैंने कहा, ' चाय ही नहीं, सड़क के किनारे लगे ऐसे टी-स्टाल भी वहां नहीं दिखते..'  उन्होंने मेरी बात को स्वीकार करते हुए कहा, 'हाँ यह बात तो सच है, कलकत्ता जैसी चाय कहीं नहीं..'  मैंने उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने सब कुछ सामान्य वाला संकेत दिया। कलकत्ता की सड़कों पर छोटे-छोटे टी-स्टालों पर मिलने वाली चाय की तरह यह सब कुछ सामान्य वाला, ' चोल छे ' यानि चलता है, भी केवल कलकत्ता में ही दिखता है। चाय की चुस्की लेते हुए मैंने कहा कि उनसे मुझे कुछ खास बात करनी थी। रोबी दा ने तुरंत कहा कि बताओ। उन्होंने खुद बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' क्या ऑफिस में कुछ प्रॉब्लम हुई है ? मैंने तो तुम्हारे बॉस से तुम्हारे नाना के देहांत की खबर दे दी थी और उन्हें कह दिया था कि तुम पर किसी तरह का प्रेशर न डाला जाये..'  मैंने उन्हें रोका और कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं था। अब वो उत्सुक हो गए। मैंने कहा कि कुछ व्यक्तिगत बातें थीं। वो वहीं पर सुनना चाहते थे परन्तु मैंने उनसे एकांत में बात करने को कहा। उन्होंने कहा ' ठीक है, जब तुम चाहो..' फिर वे उठ गए और उन्होंने कहा कि उस दिन वे अपनी कार लेकर आये थे। उन्होंने सुझाव दिया कि ऑफिस के बाद मैं उनके साथ कार में चलूँ और वो मुझे मेरे घर पर छोड़ देंगे और रास्ते में बात भी हो जाएगी। मुझे ये सुझाव अच्छा लगा।  ऑफिस समाप्त कर मैं नीचे कार पार्किंग में आ गया और रोबी दा की प्रतीक्षा करने लगा। मैं उनकी कार को पहचानता था। उनके ड्राइवर से भी मेरा परिचय था। ये एक पुरानी काले रंग की एम्बेसेडर कार थी। रोबी दा कभी-कभी ही इस कार से ऑफिस आते थे। उनका मानना था कि ट्राम उनके लिए अधिक सुविधाजनक थी। उनका ड्राइवर भी प्रतीक्षा में था। मुझे देख वह पास आया और मेरा हालचाल पूछने लगा। दो-चार बार मैं रोबी दा की कार में इधर-उधर जा चुका था और वह मुझे पहचानता था। मैं कहा, ' आज तुम्हारे साथ जा रहा हूँ..' उसने ख़ुशी जताई। उसे भी मेरे नाना के गुजर जाने की खबर थी। वह ही रोबी दा को हमारे घर लेकर गया था। वह कहने लगा कि मेरे नाना जैसे अच्छे लोग धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे थे और उन जैसे लोगों के लिए ही देश आज़ाद हुआ था। नाना के प्रति ऐसी बातें मैं अक्सर सुनता रहता था। मैं उसे क्या कहता ? कुछ ही समय में रोबी दा आ गए। हम दोनों पीछे बैठ गए। रोबी दा ने ड्राइवर से जल्दी चलने को कहा। उन्होंने उसे हिदायत दी कि मुझे मेरे घर छोड़, उन्हें किसी अन्य से मिलने भी जाना था और उनके पास काम अधिक और समय कम था। मैंने मन ही मन सोचा यह स्थिति तो हम सबके साथ थी। कार ऑफिस के गेट से निकली ही थी कि रोबी दा ने कहा, ' हाँ, अब बताओ क्या समस्या है ?  मैंने कहा कि समस्या तो कुछ नहीं है बस ऐसे ही। वे मुस्कुराने लगे। उन्होंने कहा कि उनकी ज़िंदगी गुजरी है लोगों के बीच। ऐसे ही कोई बात नहीं करता। उन्होंने मुझसे खुलकर बात करने को कहा। ' तुम्हारे नाना मेरे आदर्श रहे हैं.. अब वो नहीं हैं.. उन्होंने एक बार मुझसे तुम्हारा ख्याल रखने को कहा था..जो कुछ भी समस्या है, मुझे बताओ..'  मैंने संकोच करते हुए उन्हें चंडीगढ़ और जोगेन्दर अंकल के बारे में बताया। मैंने कहा कि वे बहुत अच्छे लोग थे और इन्होंने मेरा पूरा ख्याल रखा था और मेरे स्थानीय अभिभावक की ज़िम्मेवारी निभाई थी। रोबी दा ने कहा कि ये सब मेरे नाना की  सुकीर्ति के कारण हुआ था। उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए मुझसे जोगेन्दर साहब के परिवार के बारे में जानना चाहा। मैंने उन्हें उनके व्यवसाय और पिंकी-लवली के बारे बताया। घर पहुँचने से पहले ही मैं उन्हें पिंकी के बारे में बता देना चाहता था। रोबी दा अनुभवी व्यक्ति थे। जोगेन्दर सिंह जी की दो लड़कियों के बारे में जानते ही उनकी उत्सुकता बढ़ गयी। उन्होंने साफ शब्दों में जानना चाहा कि दोनों बहनों में मुझे किसने अधिक प्रभावित किया। मैंने तुरंत पिंकी का नाम लेना चाहा परन्तु बात को सँभालते हुए कहा, ' बड़ी वाली ने..छोटी वाली तो नासमझ जैसी है..' अब रोबी दा असल मुद्दे पर आ गए, ' तो तुम बड़ी यानि पिंकी के प्रति आकर्षित हो गए..' मैंने कोई उत्तर न दिया।  रोबी दा ही बोलते गए, ' ऐसा हो जाता है.. ये उम्र का तकाजा है..इसमें कुछ अनहोना नहीं है..तुम्हें किसी तरह का अपराध बोध नहीं होना चाहिए.. परन्तु समाज की कुछ बाध्यताएँ हैं, उनका पालन तो करना होता है.. क्या तुमने उस लड़की से इस सम्बन्ध में बात की है ? मैने कहा, ' सीधे सीधे तो नहीं परन्तु हम दोनों के बीच सांकेतिक संवाद तो अवश्य हुआ है.. ' रोबी दा ने जानना चाहा, ' क्या तुम ने उसका मन टटोलने की कोशिश की ? इस बात के उत्तर में मैंने पिंकी की रेलवे स्टेशन पर की गयी बात बताई। रोबी दा  इस पर हल्के से मुस्कुरा दिये मानों कह रहे हों, ' तो आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी.. है न ? मैंने कहा, 'रोबी दा, ये सब छोड़िये,अब आगे क्या किया जाये,ये बताइये, मैंने इसलिए तो आपसे बात की है ?  रोबी दा सीट पर पीछे की ओर टिक गए और उन्होंने कहा, ' घर में बात की है ?  मैंने न में सिर हिलाया। उन्होंने कहा, ' घर में तो बताना ही होगा..और इसमें विलम्ब करना ठीक नहीं.. मुझे नहीं लगता कि घर वाले सरलता से मान जायेंगे ?  लगता था रोबी दा को मेरी बातों में एक तरह का आनंद रस मिलने लगा था। वे बोलते गए, ' मैं तुम्हारी माँ को अच्छे से जानता हूँ.. तुम्हारे बाबा तो शायद समझ जायें परन्तु तुम्हारी माँ अवश्य समस्या खड़ी करेंगी.. तुम माँ-पिता से बात करो फिर देखते हैं.. मैं आऊंगा एक दिन तुम्हारे घर, चिंता मत करो..'  वह हंसने लगे, ' जब प्यार किया है तो फिर डरना क्या.. ' रोबी दा सदैव से हिंदी फिल्मों और गानों का मखौल उड़ाते रहे थे परन्तु आज अपनी बात को जमाने के लिए उन्होंने एक फ़िल्मी गाने का सहारा लिया था। मैं क्या कह सकता था ?  रोबी दा मेरे लिए एक समझदार व्यक्ति थे। मैंने उनको समस्त बात बता दी थी। वो जो कुछ कह रहे थे, मुझे पहले से ही पता था। मैं जानता था कि घर में इस बात को सुनते ही एक भूचाल सा आ जायेगा परन्तु घर में बात को उठाने से पूर्व मैं अपने मन के बोझ को कुछ हल्का कर लेना चाहता था। इसीलिए मैंने  इन्द्राणी दीदी और रोबी दादा के समक्ष खुद को खोल दिया था। अब शायद अपने माता-पिता के सामने मैं सहज हो सकूंगा।  मेरा घर आने ही वाला था। जिस भीड़ भरे बाजार के सामने से हम गुजर रहे थे उसके कुछ आगे जाकर ही एक बड़ा चौराहा और उससे बायीं ओर मुड़कर तीसरी गली के छोर पर ही हमारा घर था। रोबी दा ने बाजार का नज़ारा देखा तो अपने ही अंदाज़ में बोल उठे, ' तुम्हारा घर बहुत अच्छे इलाके में है, बाजार एकदम पास में है, कोई असुविधा नहीं, मछली-सब्जी सब कुछ आराम से हर समय मिलता है..यहाँ किसी तरह का गन्दा माहौल भी नहीं है.. कोई झगड़ा-झमेला नहीं होता..शांति और मिल मिलाप है.. '  कलकत्ता के लोगों में मुहल्लों से जुडी ऐसी बातें अक्सर सुनी जाती हैं। मैंने उन्हें हाँ कहा किन्तु सोचने लगा, चंडीगढ़ में भी तो मोहल्लों वाला झगड़ा-झमेला कहीं नहीं देखा था और न ही सुना था। वहां हर ओर माहौल शांति और दोस्ती भरा ही दिखता था। पिंकी ने भी कभी इस तरह की बात नहीं उठाई थी। कार ने हमारे घर वाली गली में प्रवेश ले लिया था। घर के सामने कार रुक गयी। रोबी दा ने एक बार फिर से मुझे आश्वस्त किया। उन्होंने कहा कि आज उनके पास समय कम था वर्ना वे मेरी माँ से मिलते हुए और उनके हाथ की चाय पीते हुए जाते। उन्होंने किसी एक दिन हमारे घर आने की बात की। मैं कार से उतरा तो लगा, एक बोझ कुछ कम हुआ है। रोबी दा की कार आगे बढ़ गयी। सामने से बिशाखा आते हुए दिखी। माँ ने शायद कुछ खरीद लाने के लिए उसे पास की दुकान में भेजा होगा। उसके हाथ में एक छोटा प्लास्टिक का पैकेट था। मैंने पूछा,' बिशाखा मासी क्या लेने गयी थी ? उसने कहा, ' तुम इतने दिन यहाँ नहीं थे, इसलिए माँ ने कुछ मिठाई लाने को कहा था, तुम ऑफिस से आते ही खाते हो न.. साथ में तुम्हारी पसंद की गर्मागरम फिश फ्राई भी लायी हूँ..' मैं सोचने लगा हमारी बंगाली माओं को अपनी संतान को उनकी पसंद का खिलाने की कितनी फ़िक्र होती है। ये बच्चों को खिलाने की उनकी प्रक्रिया स्कूल के दिनों से ही शुरू हो जाती है। मैं तेजी से घर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। मेरे मुँह में न जाने कहाँ से मेरी मनपसंद बंगाली भेटकी मछली से बनी फिश फ्राई और सरसों से बनी चटनी  का चटपटा स्वाद घुलता चला आ रहा था।
 ( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )  

No comments:

Post a Comment