Chander Dhingra's Blog

Wednesday, July 29, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) 27 - 28

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
( Two States - A New Story ) 
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      चन्दर धींगरा / Chander Dhingra 
 
 ( २७-२८ )                चंडीगढ़ से दिल्ली और वहाँ से हावड़ा यानि मेरे शहर कलकत्ता की यह ट्रैन यात्रा बहुत लंबी प्रतीत हो रही थी। यात्रा के हर क्षण पिंकी मेरे साथ थी। मैं और वह न जाने क्या क्या बातें कर रहे थे। लगता था सामने की सीट पर वह बैठी थी और मुझे मेरे प्रत्येक कार्य के लिए आदेशपूर्ण सलाह दे रही थी। मैं सीट पर विश्राम के लिए लेटा तो उसने कहा, ' क्यों थक गए हो क्या ? जब चाय दी गयी तो उसने कहा, ' चाय तो एक बार पी चुके हो, अब ये फिर से..' मैंने कहा, ' तुम पंजाबी लोग चाय पीते हो, हम बंगाली तो चाय खाते हैं, पहली तुम्हारी ओर से मैंने पी थी, अब ये दूसरी वाली मेरी ओर से तुम खा लो..'  उसने हँसते हुए उत्तर दिया, ' हम पंजाबी जब चाय पीते हैं तो उसके साथ कुछ खाते भी हैं, अब तुम बंगाली चाय खिला रहे हो तो साथ में कम से कम एक बिस्कुट भी तो पिलाओ.. '  यात्रा में ऐसी न जाने कितनी बातें होती चली गयी। बीच-बीच में पिंकी के साथ में होने का भ्रम टूट जाता और मैं वास्तविक जगत में लौट आता था। राजधानी एक्सप्रेस के उस  कम्पार्टमेंट में बैठे अन्य यात्री ऐसे लगते मानों मुझे घूर रहे हों और कह रहे हों, ' हम तुम्हारी सब बातें जानते हैं ..'  मैं खुद को सहज करने का प्रयास करता। एक बात जो मेरे अंतर्मन के साथ जुड़ गयी थी वह थी मेरे ट्रैन में चढ़ते समय पिंकी द्वारा कहे गए शब्द,  ' घर में जल्दी बात करना.. देर मत करना..'  शायद वह जान गयी थी कि मैं अपने माता-पिता से अपने अनजाने और स्वतः से बन गए प्रेम सम्बन्ध को सरलता से न बता पाऊँगा। हम दोनों के बीच जो कुछ भी बातें हुई थी उसमें किसी भी ओर से कोई प्रस्ताव या प्रस्ताव का इशारा नहीं था। हम तो सामान्य परिचितों के बीच होने वाली बातें ही किया करते थे। परन्तु शायद हम दोनों के अंतर्मन कुछ और ही वार्तालाप में लिप्त रहते थे। जिसे केवल हम दोनों ही सुन और समझ पाते थे। बातों बातों में उसने एक बार कहा था कि जब से उसने शिक्षा समाप्त कर नौकरी आरम्भ की थी, उसके माता-पिता उसके विवाह को लेकर सोचने लगे थे। मैंने उस समय इस बात को सामान्य दोस्ती की बात के रूप में लिया था परन्तु आज  इस  बात का कुछ अन्य ही अर्थ निकालने लगा था। कहीं किसी खास वजह से तो पिंकी ने ये बात नहीं उठाई थी ? अगर कहीं उसके विवाह की बात कुछ आगे बढ़ चुकी होगी तो ये सिख लोग हैं, पीछे न हटेंगे। ट्रैन की गति तेज थी और मेरे विचारों की भी। मैंने निश्चय किया कि घर पहुँच कर ही माँ से बात करूँगा और उन्हें अपना मन दिखा दूँगा। सोचता, माँ कैसी प्रतिक्रिया देगी ? और बाबा ? वे तो तुरंत हां कर देंगे और शायद न करें। वे तो माँ की ओर देखने लगेंगे। माँ, उनकी ओर देखती मानों कह रही हो, 'अब सम्भालो अपने लाड़ले को..आप ने ही इसे खूब छूट दी है...अब पंजाबियों को अपना रिश्तेदार बनाओ..'  घर में काफी उथल-पथल चलेगी और कई दिनों तक चलेगी परन्तु मैं अपने माता-पिता को अच्छे से जानता था। अंततः मेरी बात माननी ही होगी। बंगाली परिवार में पंजाबी - सिख बहू ? ये विचार ही बहुत रोमांटिक लग रहा था। मन ने कहा, जो होगा उसे देखा जायेगा। पहले कलकत्ता पहुँचने तो दो। 

सुबह हो गयी थी।  चाय दी जा चुकी थी। राजधानी एक्सप्रेस की गति कुछ धीमी होती दिखी। मैंने अक्सर देखा है कि गंतव्य पर पहुँचने से पहले भारतीय रेल गाड़ियाँ धीमी हो जाती हैं। हावड़ा पहुँचने से पहले तो होता ही है। ये ऐसा समय होता है जब आप अपनों से मिलने को उत्सुक हो रहे होते हैं और आपकी ट्रैन आपका साथ नहीं दे रही होती। रेल व्यवस्था का यह एक प्रकार का षड्यंत्र प्रतीत होता है जो आपके मिलन को थोड़ा और गहरा बना देना चाहता है। खिड़की के सामने से मैंने पर्दे को एक ओर कर बाहर देखने की कोशिश की। सूर्य पृथ्वी को अपने दर्शन दे चुका था। उसकी नव किरणें चारों ओर फ़ैल चुकी थीं। दूर दूर तक हरियाली फैली हुई थी। कहीं कहीं गीली मिट्टी और वर्षा-जल से बन आये छोटे-छोटे गड्डे दिख जाते थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि माँ की बिछाई हरे पीले फूलों वाली चादर पर घर के बच्चों ने अपने छोटे छोटे खिलौने बिखरा दिए हों। ऐसा मनोरम दृश्य, मन में ताजगी भर गया। ट्रैन अब मेरे बंगाल में थी।  

बाबा कह रहे थे कि वे स्टेशन पर आएंगे। परन्तु मैंने जोर देकर मना कर दिया था। हावड़ा स्टेशन अपने आप में एक अद्भुत सी दुनिया है। लोग भाग रहे  होते हैं, एक दूसरे को रौंदते से। हर कोई जल्दी में होता है। ऐसा लगता है मानों हर किसी का कुछ न कुछ लुट चुका है या फिर विलम्ब हुआ तो लुट जायेगा। पिंकी यहाँ का नज़ारा देखेगी तो क्या सोचेगी ? नहीं वह तो फ्लाइट से आएगी। यही सब सोचते हुए मैं टैक्सी की लाइन में जा लगा। लम्बी लाइन और एक-दूसरे पर झुंझलाते लोग, अपने बच्चों, परिवारजनों और सामान को संभालते और इंचों में आगे की ओर खिसकते। बाहर कहीं से भी घर लौटने पर हमेशा खुश होता रहा हूँ परन्तु आज न जाने क्यों मैं निराश सा था। एक खिन्नता सी थी जो मुझे घेर रही थी। बस अब जितना जल्दी हो सके मुझे घर पहुँचना था। टैक्सी की लंबी लाइन में अपनी-अपनी सीट पर बैठे ड्राइवर, आने वाले ग्राहक की प्रतीक्षा में मेरी ही तरह खिन्न दिख रहे थे। हम लोग सोच रहे थे कि जल्दी से टैक्सी और अच्छा ड्राइवर मिले और वो सोच रहे थे कि दूर की अच्छी सवारी मिले। एक पुरानी टैक्सी में सरदार जी ड्राइवर दिखे। उनके चेहरे ने फिर से चंडीगढ़ की याद दिला दी। मन ने कहा यही टैक्सी मेरे भाग्य में हो। आज पहली बार मैंने सरदार जी टैक्सी वाला सोचा। अब तक मैं पंजाबी टैक्सी वाला ही कहा करता था। कलकत्ता में बहुत हैं। आज उनमें मुझे कोई अपना दिखा। भाग्य ने मेरा सुना और उन्हीं सरदार जी की टैक्सी मुझे मिली। एक बे मतलब सा संतोष हुआ। ड्राइवर सरदार जी बुजुर्ग थे। उन्होंने मेरा पता लिया और भीड़ में इधर-उधर टैक्सी को करते हुए, कलकत्ता की पहचान बन चुके, हावड़ा ब्रिज के ऊपर से, मुझे मेरे घर की ओर ले चले। टैक्सी की खिड़की से मैं अपने कलकत्ता की सड़कों, इमारतों और दोनों ओर फुटपाथ पर फैले संसार को ऐसे देख रहा था मानों इन सब से मेरा परिचय आज ही हो रहा हो। कुछ ही समय में मैं अपने घर के सामने था। टैक्सी से उतर और अपना सामान ले, मैंने सरदार जी से, सत श्री अकाल कहा। वे बुजुर्ग मेरी और देखते रह गए और मेरा अभिवादन स्वीकार किया। घर में मेरी प्रतीक्षा की जा रही थी। मैंने माँ और बाबा के पाँव छुए और आशीर्वाद लिया। हर माँ की तरह, अपनी माँ को मैं दुबला नज़र आया। उसने कहा, ' हाथ मुँह धो लो, मैं खाना लगाती हूँ ..'   

मैं अपने कमरे में आ गया। इधर-उधर देखा। सब कुछ वैसा ही था जैसा छोड़ गया था। मेरी बुक सेल्फ व्यवस्थित सी दिखी। जरूर माँ ने इधर हाथ दिया होगा। मेरे अपने हिसाब से रखी पुस्तकों को यहाँ-वहाँ, ऊपर-नीचे कर दिया होगा। अब जरुरत के समय मुझे अपनी पुस्तक न मिलेगी। मैं चिल्लाऊंगा और माँ कहेगी, ' जैसा था वैसा ही तो है, मैंने कुछ नहीं किया..'  फिर मैं समस्त पुस्तकों को बिस्तर पर गिराऊंगा और वह पुस्तक जिसे मैं ऊपर के रैक में रखा करता हूँ मुझे नीचे के रेक में दबी हुई मिलेगी। माँ से झड़प होगी और वो कहेगी, ' मैंने तेरी चीजों को छुआ तक नहीं..'  सालों से यही होता आ रहा था।  

मैं ट्रैन यात्रा के बाद की सुस्ती में लेटा हुआ था कि अचानक उठ अपनी पुस्तकों में एक खास पुस्तक खोजने लगा। पुस्तक तो यहीं रहती थी पर आज नहीं थी। मैंने माँ को आवाज़ दी। वह दौड़ती हुई आई। उन्हें पता था कि कुछ है जो मुझे मिल नहीं रहा। एक बार फिर से माँ-बेटे में झड़प होने वाली थी। उन्होंने कहा, ' क्या हुआ, क्यों चिल्ला रहे हो ?  ' होना क्या है, फिर से मेरे कमरे से छेड़छाड़ की गयी है.. ' मैंने कहा। माँ ने रटी रटाई बात फिर से दोहरा दी कि उसे मेरे कमरे, मेरे सामान से क्या लेना। फिर उसने पूछा कि अब क्या नहीं मिल रहा। मैंने कहा, ' वो किताब कहाँ है जो नाना को उनके पंजाब के दोस्त देकर गए थे और नाना ने मुझे दे दी थी..' माँ ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, ' अरे वो.. वो तो साइड वाले रैक में पीछे की ओर रखी है..'  मैंने माथा पकड़ लिया, अगर माँ ने मेरे कमरे में हाथ नहीं दिया तो कैसे बता दिया कि वो किताब कहाँ रखी है ? मैंने किताब निकाली। यह किताब नाना से मिलने आये एक सरदारजी अंकल ने उन्हें दी थी। वे पंजाब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। अंग्रेजी भाषा की यह किताब सिख धर्म के बारे में थी। मैंने अपनी अन्य किताबों के साथ रख दिया था। इसके कवर पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का चित्र था जो मुझे याद था। मैंने इस किताब के पन्ने पलटना शुरू किया। मेरी स्मृतियों की किताब के हर पन्ने पर भी एक-एक चित्र उभर कर आ रहा था। माँ ने उस किताब के साथ मुझे देखा तो हैरान हो गयी। 
माँ ने मेरे पसंद की दो अन्य चीजें भी बनायीं हुई थी। एक थी आम-खजूर की मीठी चटनी और दूसरी चावल वाली गुड़ वाली पायस यानि खीर। मैंने भर पेट खा लिया था परन्तु इन दो चीजों का लोभ न छोड़ सका और दोनों को काफी मात्रा में खा गया। माँ मुझे भरपूर खाता देख संतुष्ट होती रही कि उन्होंने अच्छे से सब कुछ बनाया था। खाना खा मैं और बाबा दोनों विश्राम की मुद्रा में आ गए। माँ और उनकी सहायिका बिशाखा सामान समेटने में लगे हुए थे। हम दोनों सो गए। इतना भरपूर लंच लेने के बाद सोने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था। मुझे इतना हैवी लंच नहीं लेना चाहिए था। ' हैवी लंच ' का सोच मैं अपने भीतर ही मुस्कुराने लगा। पिंकी जब ये शब्द सुनेगी तो खूब हँसेगी। कोई भी बेहतरीन चीज बंगाल में हैवी हो जाती है।  हैवी पिक्चर,  हैवी एक्टिंग, हैवी ड्रेस ..और न जाने क्या क्या ? मैंने सोचा, जब पिंकी यहाँ आकर तांत की साड़ी पहनेगी तो मैं उसे जरूर कहूंगा, 'आज तो हैवी लग रही हो..' मैं जानता था वह क्या कहेगी। वह जोर से हँसेगी और कहेगी, ' मैं तो बंगाली साड़ी में हैवी लग रही हूँ परन्तु, आप क्यों इस नीली सी शर्ट में लाइट बने बैठे हो ? यूँ ही न जाने क्या क्या सोचते नींद में सो गया। उठा, तो संध्या ढल आयी थी। बाबा तो उठ चुके थे परन्तु माँ अपने ऊँचे पलंग पर अब भी सो रही थी। पलंग के एक ओर फर्श पर अपनी पुरानी चटाई बिछा, बिशाखा भी सो रही थी।  
( आज यही तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )

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