टू स्टेट्स - एक नई कहानी
(Two States - A New Story)
-----II-----
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
( २५ - २६ )
अगले तीन दिन ऐसे ही बीत गए। यह प्रशिक्षण मेरे लिए अर्थहीन हो चुका था। मैं किसी तरह समय बिता रहा था। अपने आप से द्वन्द करते हुए मैंने सोचा कि अंतिम बार अंकल के घर हो ही आता हूँ। शाम को एक प्लास्टिक बैग में उनकी बेड शीट्स और टॉवल रखे और उनके घर पहुँच गया। मन में भीतर कहीं यह भी लग रहा था कि क्या मेरा उनके घर जाना ठीक था ? मैं तो खुद ही प्रश्न करता हूँ और खुद ही निर्णयात्मक उत्तर भी दे देता हूँ, ' हाँ ठीक ही तो है..उनका सामान तो मुझे लौटना ही है..' हालाँकि मैं जानता था कि ये सामान लौटना महज एक बहाना था। भीतर ही भीतर मन वहाँ जाना चाहता था। घर पर आंटी अकेली थी। मुझे देख वे हैरान सी हो गयी। उन्होंने पूछा, ' सब ठीक है न, बेटा..' मैंने कहा, ' हाँ आंटी सब ठीक है.. अब अगले सप्ताह वापिस चले जाना है.. आपका सामान था.. लौटने आ गया..' उन्होंने कहा कि ऐसी क्या जल्दी थी। किसी दिन पिंकी ऑफिस से लौटते वक्त ले आती। उन्होंने मुझे अंदर बिठाया और अपने काम में लग गयीं। उन्होंने कहा कि पिंकी और लवली अपने पापा के साथ मार्किट गयी हुई थीं और थोड़ी देर में आ जाएँगी। उनके आने पर एक साथ बैठकर चाय पियेंगे। वे आते-जाते और काम करते-करते बात कर रही थीं। मैं चुपचाप एक ओर बैठा हुआ था। मुझे लगा कि मुझे इस समय यहाँ नहीं आना चाहिए था। इस बार जब आंटी कमरे में आयी तो मैंने कहा, 'अच्छा आंटी मैं चलता हूँ ..' उन्होंने कहा, ' अरे रुको.. सब लोग आते ही होंगे..' वे पास की कुर्सी पर बैठ गयी। बातचीत के मकसद से उन्होंने मेरा हालचाल फिर से पूछा। उन्होंने मेरी वापसी के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि सोमवार को चले जाना था ।
कुछ ही देर में अंकल और पिंकी -लवली आ गए। उनके आते ही घर का माहौल बदल गया। अंकल ने अपने पंजाबी अंदाज़ में वाह..वाह.. आओ जी.. कहा। पिंकी और लवली से हेलो हुई। पिंकी ने किनारे पर रखे हुए बैग को देखा तो हैरान हो पूछा, ' अरे, तुम इसे ले आये .. मैं आकर ले जाती.. मैं सोच ही रही थी, तुम्हारे पास आने का..' मैंने कहा, मंडे यहाँ से चले जाना है.. सोचा अंकल-आंटी से मिलना भी हो जायेगा..' कुछ ही समय में आंटी चाय लेकर आ गयी। बातें होती रही, कुछ मेरी ट्रेनिंग की, कुछ कलकत्ता की और कुछ तब के राजनैतिक माहौल की। पिंकी ने कहा कि उसके कमरे में चलते हैं। हम तीनों अपने अपने चाय के कप लेकर उसके कमरे में आ गए। पिंकी ने कमरा बहुत अच्छे से सजाया हुआ था। सब सामान क़ायदे से रखा हुआ था। एक और बुक शेल्फ था जिसमें कई अंग्रेजी की पुस्तकें रखी हुई थी। ये देख मुझे अच्छा लगा। मैंने पिंकी से कहा कि सोमवार की मेरी ट्रैन थी और मुझे अब चले जाना था। उसने तुरंत प्रतिक्रिया दी, ' ठीक है तो यह यहाँ तुम्हारा अंतिम संडे है, तुम्हें चंडीगढ़ घुमाते हैं..' मैंने कहा, ' एक बार फिर से यहाँ के गुरुद्वारे जाने की इच्छा है, मेरी..' उसने कहा, ' ओके, गुरूद्वारे भी चलते हैं..' मैं सच में गुरूद्वारे जाने का इच्छुक न था। मैं तो पिंकी को प्रभावित करना चाहता था। उसने कहा कि संडे वह मुझे गेस्ट हाउस में मिलेगी और हम दिन भर साथ रहेंगे, लंच भी बाहर ही करेंगे। हम तीनों इधर -उधर और फिल्मों की बातें करते रहे। कुछ समय बिता, मैं वहां से लौट आया।
मैं बेचैन हो रहा था,आने वाले संडे के लिए और साथ ही उत्साहित भी था अपने घर कलकत्ता लौटने के बारे में सोचते हुए। बचपन से ही मैं घर से बाहर जाने के लिए जितना उत्साहित होता हूँ, वापिस घर लौटने के लिए भी उतना ही बेचैन भी होता हूँ। मेरी माँ कहती है कि मैं छुट्टियों में कहीं बाहर जाने की बहुत ज़िद किया करता था और नयी जगह पहुँच कर दो-चार दिन में ही वापिस घर चलो की रट लगाने लगता था। शायद मेरा बचपन अभी तक मेरे साथ था। हम लोग शाम को कहीं निकल जाते थे और रात का खाना बाहर से खाकर आते थे। इन दिनों मैं अपनी मर्जी का नॉन-वेजीटेरियन खा रहा था और संतुष्ट था। मैंने कुछ सामान भी खरीदा था । बाबा के लिए एक टी-शर्ट लेते हुए, अपने लिए भी शोख रंग की टी-शर्ट ले ली। मैंने यहाँ के युवकों को ऐसी टी-शर्ट पहने देखा था। मन में कहीं था कि रविवार को इस नई टी-शर्ट को पहना जायेगा।
पहली बार की तरह, रविवार को पिंकी की प्रतीक्षा में ब्रेकफास्ट करने के बाद ही तैयार हो गया था। वह देर से आयी ग्यारह बजे के बाद। आज पहली बार वह मेरे कमरे में आयी और कमरे की दशा देख हँसने लगी। उसने जल्दी जल्दी में इधर उधर पड़ी चीजों को व्यवस्थित किया। उसने पूछा कि क्या मेरा कलकत्ता वाला कमरा भी ऐसा ही रहता था ? मैं थोड़ा संकोच में आ गया। मैंने कहा, ' कलकत्ता में तो मम्मी हैं, वह ठीक कर देती हैं..' आज शायद पहली बार मैंने अपनी माँ के लिए मम्मी शब्द का प्रयोग किया था। मन ही मन मैं चाहता था कि वह कहे कि जब मैं आ जाऊंगी तो सब ठीक कर दूंगी। पर उसने ऐसा नहीं कहा। मेरा दिमाग कुछ ज्यादा चतुर है। मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' मेरी माँ कहती है, मेरी पत्नी आ जाएगी तो वह मुझे अनुशासित कर देगी..' पिंकी मुस्कुराने लगी। उसने कहा, ' और, कब आ रही है आपकी वाइफ मेरा मतलब आपकी पत्नी ? मेरे मुख से अनायास ही निकल गया, ' तो कब आ रही हो तुम ? पिंकी ने सिर घुमा लिया और कुछ नहीं कहा। बाद में उसने जल्दी चलने के लिए कहा क्यों कि मुझे चंडीगढ़ की बहुत सी जगह दिखानी थी और लंच भी करना था। वह कई जगह मुझे अपनी स्कूटी में बिठा घुमाती रही। एक अच्छे रेस्टॉरेंट में हमने लंच किया। शाम हो आयी थी। हम दोनों गुरूद्वारे गए। पिंकी ने आज फिर मुझे सिर ढकना सिखाया। वह आज भी घर से मेरे लिए एक स्कार्फ़ लेकर आयी थी। मत्था टेक हम दोनों ध्यान की मुद्रा में बैठे रहे। काफी समय निकल गया। मेरे लिए यह पहला अनुभव था जब में मौन की स्थिति में इतनी देर तक बैठा रहा। बाहर आ स्कूटी पर बैठने से पहले मैंने उससे पूछा, ' मंदिर में ध्यान में बैठी, क्या सोच रही थी ? उसने कहा, ' कुछ नहीं, अपने बाबा नानक से प्रार्थना कर रही थी कि उनकी कृपा हमेशा बनी रहे..' मैंने कहा, 'और कुछ ? उसने कहा, ' बाबा की कृपा रहे, और क्या चाहिए .. ' मैंने कहा, ' पिंकी, चिंता मत करो, अगर तुम कलकत्ता आने का निश्चय करती हो तो मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूँ कि सब ठीक रहेगा.. विश्वास रखो.. ' उसने अब मेरी तरफ देखा। उसकी आखों में एक जिज्ञासा भरी चमक थी। उसने कहा, ' चलो तुम्हें तुम्हारे गेस्ट हाउस में छोड़ दूँ.. अब रेलवे स्टेशन पर ही मुलाकात होगी.. छोड़ने आऊंगी..'
क्या हम दोनों बिना अधिक बात किये, कुछ निश्चित कर चुके थे ? इन कुछ दिनों में ही हम दोनों के मध्य एक संवाद सा बन चुका था। जो दिखता न था पर चल रहा था। मैं तो कहीं बहुत पहले ही निश्चित कर चुका था कि मेरी इच्छा क्या थी और मुझे करना क्या था? पिंकी की ओर से मैं समझ न पा रहा था। कोई संकेत न था। क्या पिंकी जैसी सिख धर्म की लड़की मुझ जैसे बंगाली लड़के के प्रति आकर्षित होगी ? मुझे तो अपनी पराजय ही दिखती थी। मैं अपने आप में कहीं आत्मविहीन सा था। मुझे यहाँ चंडीगढ़ के जीवन-व्यवहार ने सोचने को विवश कर दिया था कि मैं क्यों ऐसा न हो सका था। मुझे तो मोटर साइकिल तक चलाना नहीं आता था। आजकल की आधुनिक लड़की मुझ में क्या देख पायेगी ? परन्तु आज के पिंकी के व्यवहार ने स्पष्ट कर दिया कि कुछ तो ऐसा है जिसे उसने मुझ में देखा था। एक गुदगुदी सी थी मेरे भीतर। मैं एक जगह स्थिर न हो पा रहा था। बिस्तर पर लेट जाता, फिर दूसरे क्षण ही उठ बैठता। बाहर निकल आता। प्यास महसूस करता, पानी के दो-चार घूंठ पीता। बे मन से किसी पुस्तक के पन्ने पलटता। फिर बिस्तर पर आ गिरता। ये कैसा बर्ताव था मेरा,अपने ही साथ ? मैं खुश था,उदास था या व्याकुल ? यूँ ही इधर-उधर उड़ते मन को बांधने की कोशिश में मैं उस दिन को याद करने लगा जब मैं चंडीगढ़ पहुंचा था। कैसे कलकत्ता से निकलते वक्त अनिश्चितता में था ? कैसे गेस्ट हाउस के खाने से विचलित था ? कैसे इन दिनों जब घर से दूर था, मैंने अपने नाना को खो दिया था ? और कैसे अब अंतिम दिन में मुझे लग रहा था कि कुछ दिन और यहाँ रहने को मिल जाता तो अच्छा होता ? मैं अपने घर तो पहुंच,अपने माता-पिता से मिलना तो चाहता था परन्तु मैं यह भी चाहता था, ऐसा कुछ हो जाये कि दो-तीन यहाँ और मिल जायें । कल की ट्रैन यदि कैंसिल हो जाय तो क्या ही अच्छा हो। ये क्या हो गया था मुझे ? ये कैसी स्कूल के बच्चों जैसी सोच कि आज वर्षा हो जाये तो छुट्टी मिल जाये और फिर मज़ा ही मज़ा ?
रात देर तक जागता रहा। पिंकी के बारे में सोचता रहा। उसके साथ कलकत्ता की सड़कों, बाज़ारों में घूमता रहा। कल बहुत जल्दी उठना भी था क्यों कि सामान पैक करना था, साथ ही सब से अंतिम बार मिलना भी था। मुझे कभी इस बात का अंदेशा न था कि इस चंडीगढ़ नगर से, यहाँ के गेस्ट हाउस से कुछ ऐसा गहरा सा रिश्ता बन जायेगा। मैं तो यही सोचकर कलकत्ता से चला था कि एक सामान्य ट्रेनिंग कोर्स था, जो आपको पसंद हो या न हो करना ही था। मैंने तो यही सोचा था कि चंडीगढ़ घूमना ही हो जायेगा और अपने सर्विस रिकॉर्ड में भी आ जायेगा। आज की रात न जाने कैसे कटेगी? अब तो रेलवे स्टेशन पहुंचना था और पिंकी से अंतिम बार मिलना था। बहुत सी बातें थी जो मेरे मन की खिड़की से इधर-उधर झांक रही थी। न जाने कल क्या होगा ? क्या वह अकेली ही आएगी ? शायद सभी आयें ? शायद पिंकी और उसके पापा ही आयें ?
सुबह सब से पहले कैंटीन के स्टाफ से मिला। कृष्णा थोड़ा उदास दिखा। उसने कहा ' दादा फिर आना, आप बहुत अच्छे हो..' मैंने भी उसे कलकत्ता आने का निमंत्रण दिया। कुछ साथी भी मिले। हम सब गले मिल रहे थे। मैं इलाहाबाद वाले तपन को खोज रहा था। वह न जाने कहाँ था ? मैं गेट के इंचार्ज से मिलने गया। इन सरदारजी से मिलने तपन भी वहां आया हुआ था। वह गले मिला और स्नेहपूर्वक बात करने लगा। उसने कहा कि कलकत्ता आया तो मुझे अवश्य मिलेगा। उसने मेरा पता लिया और अपना इलाहाबाद का पता दिया। आज वह एक नया सा व्यक्ति लग रहा था। उसने एक बात और बताई कि उसकी बुआ जो कलकत्ता में रहती थी, राज्य सरकार के मुख्यालय में अच्छे पद पर कार्य करती थी और रबिन्द्र संगीत की गायिकाओं में उसका नाम था। वह आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अपने गायन का प्रदर्शन भी करती रहती थीं। तपन ने कहा कि कभी मैं उनसे मिलने जा सकता था, उन्हें अच्छा लगेगा। मैं हैरान था कि वह आज अंतिम मुलाकात में इतना सब कुछ क्यों बता रहा था ? वह खुलकर, अपनापन दिखाते हुए बात कर रहा था। आज वह बातचीत भी बांग्ला में ही कर रहा था। पहली बार जब मिला था तब वह मुझ से अनदेखी कर रहा था। आज स्थिति विपरीत थी। आज मेरा मन उससे घनिष्टता करने का न था। मैंने औपचारिक सी बात की और आगे बढ़ गया। गेस्ट हाउस का मैनेजर हाथ में एक लिस्ट लेकर घूम रहा था। मुझे देख वह दूर से चिल्लाया, ' दादा,आप तो आज ही निकल रहे हो न ? उसने लिस्ट में मेरा नाम देखा और कहा, ' आपकी दिल्ली शताब्दी है और वहां से कलकत्ता की राजधानी.. आपको ग्यारह बजे हमारी गाड़ी स्टेशन छोड़ आएगी ..' गेट पर समय से आ जाइएगा..वरना अपना इंतज़ाम खुद करना पड़ेगा..' समय से पहले ही मैं अपना सामान ले गेट पर आ गया। थोड़ी देर में दो और लड़के भी आ गए। इन्हें भी शताब्दी से ही जाना था। कुछ ही समय में हमें स्टेशन पर उतार दिया गया। मैं इधर-उधर पिंकी को ढूंढने लगा। मेरी ट्रैन का समय हो चला था। मैंने एक दोस्त से पूछा कि हमारी ट्रैन का समय तो हो गया था। उसने कहा कि अभी भी चालीस मिनट थे। सरदारों का शहर है तो हमारी ट्रैन भी बारह बजे ही चलेगी। वो हँस रहा था परन्तु मुझे परेशानी हो रही थी। पिंकी विलम्ब क्यों कर रही थी ? समय से आ जाती तो कुछ बातें जो मेरे मन में उठ रही थी, शायद वो हो जाती। मैं प्लेटफॉर्म पर इधर -उधर टहल रहा था। एक-एक मिनट भारी लग रहा था।
काफी समय बाद पिंकी और जोगेन्दर अंकल आते हुए दिखे। स्टेशन पर बहुत रौनक थी। गाड़ी चलने में कुछ ही समय बचा था। भीड़भाड़ के बीच पिंकी सबसे अलग और आकर्षित दिख रही थी। उसने हेलो कहा और जोगेन्दर अंकल ने मेरे साथ हाथ मिलाते हुए कहा, ' सो, चंडीगढ़ स्टोरी ओवर ...' मैंने मन ही मन में सोचा, स्टोरी तो अब शुरू हो रही थी। पिंकी ने सॉरी कहते हुए कहा कि पापा की वजह से देर हो गयी थी। पिंकी ने दो पैकेट मुझे पकड़ाए। उसने कहा, ' ये खाने के लिए है.. और ये दूसरा मम्मी ने तुम्हें गिफ्ट दिया है..' मैंने कहा, ' खाने के लिए ? यहाँ से शताब्दी है और दिल्ली से राजधानी.. दोनों में खाने की समस्या नहीं है.. तुम बेकार लायी हो..' पिंकी ने कहा कि रख लो। मैंने दूसरे पैकेट की ओर देखते हुए कहा, ' और इसमें क्या है, गिफ्ट तो तुम्हारे दिल्ली वाले मामाजी ने दे ही दिया ही था ? पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' वो दिल्ली का गिफ्ट था, ये चंडीगढ़ का.. देखकर बताना कहाँ का ज्यादा अच्छा है..' अंकल जो एक ओर खड़े थे, सामने आ गए। उन्होंने कहा, ' बेटा, कलकत्ता पहुँच कर खबर देना.. बहन जी और भाई साहब को सत श्री अकाल कहना.. बहन जी से कहना, हर बार लुधियाना में सुखबीर के पास जाती हैं, कभी चंडीगढ़ में जोगेन्दर के पास भी आयें..' ट्रैन छूटने ही वाली थी। उन्होंने मुझे ट्रैन पर चढ़ जाने को कहा और भीड़ के पीछे हो गए। पिंकी का चेहरा उदास सा दिख रहा था। वो मेरे पास आयी, मैं ट्रैन में चढ़ने के लिए आगे बढ़ रहा था। उसने धीरे से कहा, ' घर में जल्दी बात करना.. देर मत करना.. फोन करना .. बाय-बाय ..'
( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर..)
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