' टू स्टेट्स - नई कहानी '
' Two States - A New Story '
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चन्दर धींगरा
Chander Dhingra
इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा करने का सिलसिला शुरू है। आज गुरुवार है, आगे बढ़ते हैं ...
( २३ ) हम दोनों मंदिर के पवित्र सरोवर की सीढ़ियों पर खामोश बैठे थे। बाहर मौन था परन्तु दोनों के भीतर संवाद चल रहा था। मन के इसी वार्तालाप में मैंने खुद से कहा, ' मैं अपने से ही बातें कर रहा हूँ, पर क्या पिंकी मेरा मन सुन पा रही है ? स्वर्ण मंदिर का दिव्य दर्शन सामने था। न जाने कितने सत्य छिपे हुए थे इस दिव्यता की छांव में ? इस तरह की दिव्यता संभवतः कलकत्ता के समीप बेलूर मठ में ही महसूस होती है। वहां के किसी अन्य मंदिर में नहीं। हम दोनों के बीच छाए मौन को तोड़ते हुए, मैंने बात आरम्भ की। कहीं से तो करनी थी, लगा क्यों न किसी फिल्म की बात से शुरू करूँ ? हमारे समाज में फिल्म और राजनीति ऐसे विषय हैं जिन पर पर कभी भी बात की जा सकती है। मैंने कहा, ' पिंकी क्या तुमने देवदॉस फिल्म देखी है ? उसका न सुन मैं हैरान रह गया। उसने कहा कि फिल्म तो नहीं देखी थी परन्तु यह उपन्यास उसने दो बार पढ़ा था और उसने इसके सम्बन्ध में एक लेख लिखा था जो कॉलेज की अंग्रेजी की पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ था। उसने कहा कि वह इस कहानी के पात्रों से बहुत प्रभावित हुई थी। ' कौन सा पात्र सबसे अधिक प्रभावशाली लगा है? मैंने पूछा। न जाने क्यों मैं इस विषय को आगे बढ़ाना चाहता था। 'ऑफ़ कोर्स, पारो..' उसने अपने पंजाबी अंदाज़ में कहा। इसके बाद उसने कहा कि देवदॉस की कहानी को दुनिया की श्रेष्ठम प्रेम कहानियों में रखा जाना चाहिए। मुझे उसकी यह बात अच्छी लगी। मैंने कहा कि क्या उसे कहानी का दुखद अंत पसंद आया था और क्या इसका सुखद अंत नहीं किया जा सकता था ? वो हंसने लगी, ' तुम्हारा मतलब है देवदॉस और पारो अंत पति-पत्नी की तरह मिल जाते.. अरे, तुम तो इस कहानी को बॉम्बे की फिल्म बना देते..' मुझे उसकी बात प्रभावशाली लगी। मैंने कहा, ' तुम्हें नहीं लगता, दुनिया में हर किसी के पास अपनी एक कहानी छिपी होती है..' ' हाँ, जरूर, सबकी अपनी-अपनी कहानी है.. मेरे पापा-मम्मी की भी एक प्रेम कहानी है... इन दोनों ने अपने पेरेंट्स की इच्छा के विरुद्ध शादी की थी..' वह मुस्कुराने लगी। मैंने कहा, ' अच्छा.. तो सुनो, मेरे माँ-बाबा की भी लव स्टोरी है..' मैं झूठ बोल रहा था और उसे प्रभावित करना चाहता था। मेरे माँ-बाबा की तो सामान्य दो परिवारों के बीच तय की हुई शादी थी। वह बाबा शब्द पर अटकी। उसने पूछा, ' बाबा..माने ? मैंने उसे स्पष्ट किया कि बंगाली भाषा में बाबा का अर्थ है पिता.. जैसे वह मम्मी-पापा कहती है वैसे ही हम माँ-बाबा कहते हैं..' मैं अपने माँ-बाबा की लव स्टोरी पर बे वजह का झूठ बोल गया था। अब पिंकी ने उनकी लव स्टोरी जाननी चाही। लड़कियों को इस तरह के विषयों में खासी रूचि रहती है। मैंने कहा कि कुछ विशेष नही था। अब मैं इस विषय को यहीं समाप्त करना चाहता था। परन्तु वह ज़िद करने लगी। मुझे एक कहानी गढ़नी पड़ी। मैं कहानी गढ़ने की अपनी क़ाबलियत पर मुग्ध हो रहा था। मैंने माँ के ब्राह्मण तथा बाबा के कायस्थ होने के साथ साथ कई इधर-उधर की बातें जोड़ी और एक अनोखी प्रेम कथा उसे सुना दी। पिंकी ने सुना और सरलता से कहा कि वह तो बंगाली लोगों को बहुत पढ़ा-लिखा और खुले दिमाग वाला समझती थी। परन्तु वहां भी इस तरह की जात-पात की बातें थीं।
पिंकी ने कहा कि हम दोनों के माता-पिता प्रेम विवाह से बंधे थे तो कहीं न कहीं हमारे परिवारों में कुछ समानता थी। मैं भीतर तक शंकित सा हो गया था। अब लगा कि मुझे ये झूठी कहानी नहीं बनानी चाहिए थी। कहीं यह बात उठ गयी तो ? दिमाग ने हमेशा की तरह फिर से मेरा साथ दिया, 'अब जो होगा देखा जायेगा..' पिंकी ने जब परिवारों की समानता की बात की तो मैंने उसकी भाव भंगिमा पढ़नी चाही। शायद वह सामान्य थी परन्तु मुझे लगा कि कोई सन्देश देना चाहती थी। मैंने कहा कि वह अपने लिए कैसा विवाह चाहेगी, प्रेम विवाह या पारिवारिक विवाह। पिंकी ने तुरंत कहा कि वह कुछ कह नहीं सकती परन्तु अपने होने वाले जीवन-साथी को बिना जाने-समझे वह कैसे किसी से विवाह कर सकती थी। मैंने पूछा, ' क्या तुम इंटरकास्ट मैरिज करोगी ? उसने हँसते हुए कहा कि पारिवारिक व्यवस्थित विवाह हो या कुछ और, वह अपने होने वाले पति को अच्छे से जानना और समझना तो अवश्य ही चाहेगी। मैंने भी उसकी बात में हामी भरी, ' हाँ, होने वाले जीवन साथी को जानना तो आवश्यक है..परन्तु एक दो बार मिलने-मिलाने से कितना जान सकते हैं.. हमारी परम्परा में पारिवारिक जानकारी का आधार होना एक अधिक अच्छी प्रणाली है.. परिवार की पृष्ठभूमि सभी कुछ स्पष्ट कर देती है..' अब उसके हाँ कहने की बारी थी, ' दोनों बातें अपनी-अपनी जगह हैं..' मैं विषय से अलग नहीं होना चाहता था। मैंने हलके अंदाज़ में पूछा, ' अच्छा, हम दोनों कुछ दिनों से एक-दूसरे से मिल रहे हैं, तुम मुझे कितना जान सकी हो ? पिंकी इस तरह मुस्कुराई मानों मेरी चतुराई को भांप रही हो। उसने कहा, ' सच कहूँगी तो तुम बुरा मान जाओगे..' मैंने कहा कि नहीं ऐसा नहीं होगा। उसने उसी अंदाज़ में कहा, ' तो सुनो..तुम पढ़े-लिखे सिंपल टाइप हो..पर अच्छे हो..अपनी वाइफ को खुश रखोगे.. परन्तु अभी मैं पूरे विश्वास के साथ नहीं कह सकती..' यह कह कर वह हँसने लगी। उसकी सरल स्पष्टता प्रभावशाली थी। मैं न जाने क्यों झेंप रहा था। सामने की ओर देखा, अंकल,आंटी और लवली मंदिर का चक्कर लगाकर वापिस चले आ रहे थे। हम दोनों खड़े हो गए। पिंकी ने मंदिर की ओर शीश झुका कर प्रणाम किया। उसने मुझे भी ऐसा करने का इशारा किया। मैंने भी झुक कर नमन किया। मैं स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझता रहा हूँ कि मैं ईश्वर और प्रार्थना आदि को नहीं मानता कि मैं बंगाल की प्रगतिशील विचारधारा में बड़ा हुआ था। मुझे मंदिर और पूजा-पाठ सदैव से एक तरह का आडम्बर लगते रहे थे। मेरे हिसाब से ये बातें मनुष्य की दुर्बलता दर्शाती थी। परन्तु आज न जाने मेरे मन ने भीतर ही भीतर क्यों कहा ' हे ! पवित्र मंदिर, तुम्हारे दर्शन को पुनः आऊँगा, अपने माँ, बाबा और पत्नी के साथ..' अचानक मुझे लगा कि क्या मैं भी दुर्बल हो रहा था ? मेरे दिमाग ने हमेशा की तरह मेरा साथ दिया कि नहीं यह कोई प्रार्थना नहीं थी। यह तो मैं केवल अपनी इच्छा को अपने से ही व्यक्त कर रहा था।
( आज यहीं तक, इससे आगे गुरुवार को, यहीं पर )
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