Chander Dhingra's Blog

Wednesday, July 15, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ' Two States - A New Story ' -24

टू स्टेट्स - एक नई कहानी 
' Two States - A New Story ' 
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चन्दर धींगरा 
Chander Dhingra 
      (२४ )    चंडीगढ़ वापसी की यात्रा में सभी शांत थे। सभी थके और नींद से भरे हुए थे। मैं पिंकी के संग स्वर्णमंदिर में हमारे बीच चल रही बातचीत को आगे बढ़ाना चाहता था परन्तु यहाँ कार में ऐसा माहौल न था। पिंकी खुद भी आँखें मूंद सो रही थी या किसी चिंतन में थी। न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा कि मेरी ही तरह वह भी अपने आप से जूझ रही थी। मैं पिंकी को लेकर न जाने क्या-क्या सोचने लग गया था। मैं अपने भीतर एक परिवर्तन सा महसूस कर रहा था। जोगेन्दर अंकल ने कार के भीतर चल रही शांति को तोड़ते हुए कहा, ' ओये .. सभी थक गए हो क्या ?  भई हमें तो ऐसी खामोशी पसंद नहीं है.. '  लवली जो अब तक शांत थी, सबसे पहले बोल उठी, ' पापा, सभी तो आप के जैसे स्ट्रांग नहीं हो सकते हैं.. दिन भर आप हमें इधर-उधर घूमाते रहे हो.. अब जरा आराम कर लेने दो और चुपचाप गाड़ी चलाओ ..'  आंटी ने सलाह दी कि आगे रास्ते में किसी अच्छी जगह रुक कर चाय पियेंगे। चाय के नाम पर पिंकी भी उठ बैठी। ' हाँ, चाय तो पीनी है और हमारे बाबू मोशाय तो चाय-कॉफी के खास शौकीन हैं..' उसने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा। मैंने एक बार बातों-बातों में उसे अपनी चाय-कॉफ़ी की रूचि के बारे में बताया था। मुझे अच्छा लगा कि उसे ये बात याद रही थी। मैंने कहा ' हाँ, चाय तो ऐसे लम्बे ड्राइव में मिलनी ही चाहिए..' अपनी बात को पक्का करते हुए मैंने उन्हें बताया कि जब कभी भी हम कलकत्ता से दीघा के समुद्र तट पर जाते हैं तो बीच रास्ते में एक-दो जगह टी-ब्रेक लेते ही हैं। अंकल ने मुझ से दीघा के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें इस सुन्दर सागर तट के बारे में बताया कि कैसे कलकत्ता के लोग यहाँ दो-तीन दिन का विश्राम लेने आते हैं। अंकल-आंटी पुरी-भुवनेश्वर घूम कर आये हुए थे। आंटी ने वहां के अपने ट्रिप के बारे में बताया। उन्हें पुरी का समुद्र तट बहुत सुहाना लगा था। उन्होंने कहा कि जब वे पुरी गए थे तब पिंकी का जन्म नहीं हुआ था। पिंकी तो चुप रही परन्तु लवली ने कुछ जिद सा भाव दिखते हुए कहा कि वो इस दीवाली के समय पुरी जाएगी। अब पिंकी ने भी हाँ मिलायी कि दीघा और पुरी दोनों जगह जाना चाहिए। उसने मेरी तरफ देखकर कहा, ' क्यों ठीक है न ? हमारे गाइड तो आप ही रहोगे..'  एक शरारत भरी मुस्कान उसके चेहरे पर थी। मैंने कहा, ' क्यों नहीं.. तुम लोग जब भी कलकत्ता आओगे  तो..मैं ऑफिस से छुट्टी ले लूंगा, जितने दिन आप लोग वहां रहोगे.. लेकिन वहां पंजाबी खाना नहीं मिलेगा.. बंगाली  मछली-चावल खाना पड़ेगा..' मैं शायद पहली बार इतनी लम्बी बात कह गया था। इस पंजाबी सिख परिवार के साथ जो प्रारंभिक असुविधा हो रही थी, वह धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। दोनों बहनों ने एक साथ प्रतिक्रिया देते हुए जोर से कहा, ' श्योर..' लवली तो एक कदम आगे बढ़ गयी, उसने हँसते हुए कहा, ' फिश-राइस एंड रसगुल्ला... ' मैं भी हँसने लगा। मुझे लगा बंगाल से बाहर लोगों को हमारे बारे में केवल इतना ही पता है। मछली और रसगुल्ला। मैंने सोचा ये वक्त है इनका सामान्य ज्ञान बढ़ाने का। मैंने उन्हें बताया कि बंगालियों के लिए मछली एक ही आइटम नहीं है। तरह-तरह की मछलियाँ और उनसे बने तरह तरह के व्यंजन होते हैं और बंगाली मिठाइयां तो विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। मैंने लवली की ओर देखते हुए कहा, ' कभी बंगाल की दही खाई है ? मैंने कहा तो था लवली को देखते हुए परन्तु मेरे मन में पिंकी थी और उसने मेरी बात को सुना भी। इससे पहले की लवली कोई उत्तर देती वह बोल उठी, ' हाँ मैंने खाई है.. यह सादी सामान्य दही नहीं, मीठी दही होती है.. यह एक तरह का डस्सेर्ट है.. मेरी एक फ्रेंड ने एक बार खिलाई थी...सो यम्मी..'  अपनी मिष्ठी दही की तारीफ मुझे अच्छी लगी परन्तु इसके लिए यम्मी शब्द कुछ अटपटा लगा। हमारी मिष्ठी दही इससे कुछ ऊपर है। मैं सोचने लगा कि ये आजकल का यम्मी शब्द किस बंगाली व्यंजन के साथ जायेगा ? अचानक दिमाग ने साथ दिया कि हमारी आम-खजूर वाली चटनी को यम्मी कहा जा सकता है। मैंने कहा, 'पिंकी, हमारे बंगाल में आम-खजूर की चटनी होती है.. उसे यम्मी कहना सटीक होगा..' वह हँसने लगी। सटीक शब्द उसे अच्छा लगा। बंगाली मिठाइयों को लेकर बचपन में सुनी एक छोटी सी कविता मुझे याद आ रही थी। लगा वो कविता सुना दूँ परन्तु दूसरे ही क्षण लगा कि इन पंजाबी लड़कियों का कविता से क्या सम्बन्ध ? कविता सुनाऊँ और कहीं खुद मैं ही हँसी का पात्र न बन जाऊँ ?

कुछ समय बाद अंकल ने एक ढाबा नुमा जगह पर गाड़ी रोक दी। वो तेजी से उतर टॉयलेट की तरफ दौड़े। मैं भी और बाद में तीनों महिलाएं भी। हल्के हो, हम टेबल पर आकर बैठे और वहां रखे मेनू कार्ड  देखने लगे। आंटी को पहले से ही अंदाज़ा था कि वहाँ क्या-क्या मिल सकता था। उन्होंने चाय और साथ में कुछ स्नेक्स मंगवाया। यहाँ भी मैं यही सोचता रहा कि यदि कभी ये लोग कलकत्ता आएँगे और हम लोग दीघा या कहीं और जा रहे होंगे और ऐसी ही परिस्थिति होगी तो चाय के साथ इन सब के लिए क्या क्या मँगवाऊंगा ? मैं पिछले वर्ष दोस्तों के साथ दीघा गया था। आज मुझे लगा कि यहाँ जैसे हाई वे रिसोर्ट या ढाबे वहां के रास्तों पर क्यों नहीं हैं ?  इन लोगों, विशेष कर पिंकी को वहां कैसा लगेगा ? मैं इन्हें हमारे कलकत्ता के चाइना टाउन के चाईनीज़ रेस्टोरेंट्स में ले जाऊँगा। बालीगंज के मशहूर बंगाली रेस्टॉरेंट में भी ले जाऊंगा। चौरंगी के एक ऊँचे होटल के बंगाली रेस्टॉरेंट में भी जा सकते हैं। मैं सोचता ही जा रहा था कि अंकल ने सबसे गाड़ी में जाकर बैठने को कहा।  'अब चलना चाहिए वरना बहुत देर हो जाएगी..'  उन्होंने आदेश के स्वर में कहा। मैंने देखा कि दोनों लड़कियाँ एकदम से चुपचाप कार में जाकर बैठ गयी। लगभग दो घंटे बाद हम चंडीगढ़ पहुँच गए। मेरा गेस्ट हाउस पहले आता था। मुझे अंकल ने गेट पर उतारा। सभी लोग कुछ समय के लिए कार से उतर आये। अंकल ने मुझे अपना ख्याल रखने को कहा। आंटी ने कहा कि किसी चीज़ की जरुरत हो तो निसंकोच बताना। पिंकी और लवली ने कहा, सत श्री अकाल, गुड नाइट, बाय। मैं दूर जाती उनकी कार को देखता रहा। आगे मोड़ पर जब वह ओझल हो गयी तब मैं गेस्ट हाउस के गेट के भीतर आया। कैंटीन का हॉल खाली पड़ा था और सामान समेटा जा रहा था। कैंटीन के मैनेजर ने पूछा कि आज बहुत देर हो गयी थी। मैंने उसे बताया कि अमृतसर गया था। उसने कहा, ' अच्छा, मत्था टेकने गए थे.. बैठो खाना लगता हूँ ..'  मैंने कहा, ' थोड़ा सा ही देना, ज्यादा भूख नहीं है..'  उसने एक प्लेट में दो गर्म रोटी, दाल, सब्जी और सलाद लगा दिया। मुझे याद आया कि पिंकी ने भी मंदिर में मत्था टेकने की बात कही थी न कि दर्शन करने की। भाव एक जैसा है परन्तु गुरु के सामने माथा टिकाना अधिक आस्था पूर्ण लगता है। 

 खाना खा मैं अपने कमरे में आ बिस्तर पर धम से लेट गया। दिन भर की थकावट थी लेकिन मेरे भीतर चल रहे विचारों का अंत नहीं हो रहा था।  वे तेज प्रवाह से किसी पहाड़ी नदी की तरह  इधर-उधर बिखरे पत्थरों से टकराते हुए, बहे चले आ रहे थे। गुरुद्वारे में लंगर के समय एक बात और हुई थी। लंगर की पंक्ति में बैठने पर, सेवा करने वाले को मैंने एक रोटी देने को कहा था तो उसने मुझे रोटी नहीं ' प्रसादा ' बोलने को कहा था। उसने अतिविनम्रता के साथ कहा था परन्तु मुझे अच्छा न लगा था। बाद में पिंकी ने मुझे सिखाया था कि यह दो हाथों में स्वीकार किया जाता है और इसे प्रसादा कहते हैं। मैंने उस समय उसे बंगाल में साल भर होते रहने वाले तरह-तरह के पूजा आयोजनों और उन अवसरों पर वितरित होने वाले 'भोग' के बारे में बताया था। लेकिन अब मुझे लगने लगा था कि गुरुद्वारे के लंगर में जो श्रद्धा और आस्था का भाव मैंने देखा था वह बंगाल के भोग में नहीं दिखता। साथ ही मैंने स्वयं को एक स्पष्टीकरण भी दे दिया कि यहाँ के लोग अधिक सम्पन्न हैं और वे अधिक धनराशि ऐसे आयोजनों पर दान स्वरुप दे सकते हैं। इसीलिए यहाँ अधिक सुदृढ़  व्यवस्था होती है। याद आया कि नाना ने एक बार मुझसे कहा था कि जो भी काम किया जाये उसे पूर्ण निष्ठा के साथ करना चाहिए। आज अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में मैंने कार्य के प्रति जिस तरह की निष्ठा देखी थी, वैसी ही निष्ठा हमारे आयोजनों में भी होनी चाहिए। मैं यही सब सोचते-सोचते न जाने कब सो गया। 
 ( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार, यहीं पर  .. )

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