' टू स्टेट्स - एक कहानी '
' Two States - A Story '
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चन्दर धींगरा
CHANDER DHINGRA
हर गुरुवार को इस लम्बी कहानी ( उपन्यास ) को साझा किया जाता है। आज फिर एक गुरुवार है, अब आगे..
( २२ ) चंडीगढ़ का वो गेस्ट हाउस मेरे लिए अब पहले जैसा अनजाना न था। इन कुछ ही दिनों में यह अपना सा लगने लगा था। अक्सर ऐसा ही होता है, नया व्यक्ति हो या नया स्थान, आरम्भ में अपरिचित होता है परन्तु कुछ समय बाद वह परिचित और अपना सा हो जाता है। कभी कभी यह अपना हो जाने वाला समय कुछ मिनटों या घंटों का ही होता है। मुझे तो लगता है कोई-कोई अपरिचित तो मुलाकात के प्रथम कुछ क्षणों में ही परिचित हो जाता है और कभी अपना बनाने के प्रयास में हम सालों साल लगे रहते हैं परन्तु अपरिचय की यह दूरी तय ही नहीं होती।
आने वाले रविवार का इंतज़ार था। उस दिन अमृतसर जाना था। इस बीच एक दिन में जोगेन्दर अंकल के घर पर हो आया था। वो सभी मुझे सहज करने की कोशिश करते दिखे। पिंकी ने घर पर हमारे अमृतसर जाने की बात की हुई थी। बातों बातों में पता चला कि वे सभी जायेंगे। मैंने अंकल से कहा कि जो खर्च आ आएगा, उसमें मुझसे मेरा भाग लेना होगा। अंकल हँसने लगे। उन्होंने कहा, ' ये क्या बात हुई.. तुम अपने घर के ही हो.. दो बच्चे साथ हैं तो अब समझो तीन हैं.. ' उनकी बात में एक तरह की ग्रामीण सादगी थी। उन्होंने मेरी बात को अपनी बातों में इधर-उधर कर दिया। उन्होंने मुझे अमृतसर शहर के बारे में बताया। अमृतसर को पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण और विश्व का एक पवित्र नगर माना जाता है। दुनिया के बहुत ज्यादा लोग यहाँ के पवित्र स्वर्ण मंदिर को देखने आते हैं। उन्होंने बताया कि अमृतसर ने सबसे ज्यादा युद्ध और अत्याचार सहे हैं। देश के बंटवारे के समय भी सबसे बड़ी आग अमृतसर को ही सहनी पड़ी थी। उन्होंने कहा कि जलियांवाला बाग के बारे में तो सभी जानते ही हैं। मैंने कहा, ' अंकल उस नरसंहार को तो पूरी दुनिया जानती है.. हमारे रबीन्द्रनाथ टैगोर ने तो अंग्रेज़ों द्वारा दिया गया ' नाईटहुड ' सम्मान ही वापिस कर दिया था..' मैंने बताया कि जब अमृतसर में जलिआंवाला बाग को लेकर एक समारोह हुआ था तो नाना को भी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में वहां आमंत्रित किया गया था। उस समय बंगाल से कई लोग आये थे। अंकल ने कहा, ' संडे को तुम अंग्रेजों के अत्याचार की तस्वीर देखना..' रविवार को सुबह जल्दी निकल जाने का निर्णय हुआ क्योंकि संध्या तक वापिस लौट आना था। पिंकी ने सलाह दी कि मुझे पांच बजे तक तैयार रहना चाहिये और वो लोग मुझे गेस्ट हाउस से ले लेंगे क्योंकि वह रास्ते में ही पड़ता था। रविवार सुबह पांच बजे ? मुझे असुविधा लग रही थी। इतनी जल्दी शायद मैं जाग ही न पाऊँ ? मैंने पिंकी को बताया तो उसने सलाह दी कि मुझे गेस्ट हाउस के रात की ड्यूटी के चौकीदार को बता कर रखना होगा। वो मुझे उठा देगा।
शनिवार की रात को मैंने गेस्ट हाउस के गेट इंचार्ज को अपनी मुश्किल बता दी। सुबह चार बजे चौकीदार मुझे जगा गया। पांच बजे तक मैं तैयार था और गेट पर आकर बैठ गया। थोड़ी देर में जोगेन्दर अंकल अपनी गाड़ी में पहुँच गए। वे गाड़ी चला रहे थे। आंटी बगल वाली सीट पर थी। दोनों बहनें पीछे बैठी थी। पिंकी ने अपनी ओर वाला दरवाजा खोला और मुझे अंदर बुलाया। सभी लोग बहुत खुश नज़र आ रहे थे। लवली ने जरूर एक बार इतनी सुबह सुबह जाने पर पर मुँह बनाया। दोनों बहनें बहुत स्मार्ट दिख रही थी। पिंकी कुछ गंभीर सी दिखी। वह शायद हरमंदिर साहेब जाने के कारण अभी से गुरु स्मरण की मुद्रा में थी। गाड़ी जब शहर के बाहर आ गयी तो मैंने पिंकी की ओर नज़र घुमाई। वह आँखें मूंद गहन ध्यान मुद्रा में दिखी। आंटी भी हलके स्वर में भजन गुनगुना रही थीं। अंकल होशियारी से गाड़ी चला रहे थे। लवली पावर नेप ले रही थी। अंकल ने बताया कि चार घंटे में वे अमृतसर पहुँच जायेंगे परन्तु कुछ समय के लिए बीच में एक स्थान पर रुकेंगे। मैंने अंकल से पूछा कि पूरा रास्ता वह ही कार चलाएंगे तो थक जायेंगे। उन्होंने कहा, ' अरे, ऐसी कोई बात नहीं है .. जरुरत पड़ी तो तुम्हारी आंटी या पिंकी चला लेंगी..' लवली ने यह बात सुनी तो हंसने लगी, ' सभी थक गए तो मैं हूँ ना..' मुझे खुद में एक तरह की क्षीणता सी लगी कि यहाँ सभी कार चला सकते हैं सिवाय मेरे।
अमृतसर आने पर हम लोग सीधे स्वर्ण मंदिर गए। पिंकी ने मुझे सिर ढकने के लिए कहा। वह मेरे लिए एक स्कार्फ़ घर से ही लेकर आयी थी। मंदिर में बहुत रौनक थी। श्रद्धा से भरे लोग, कतार में लगे हुए थे। मैं मन्त्र मुग्ध था। क्या अनुशासन, क्या साफ-सफाई .. सब कुछ देखने लायक था। बहुत आस्था के साथ हम सब ने दर्शन किये और लंगर खाया। लंगर के बारे में मुझे पिंकी ने बहुत कुछ बताया। लवली और अंकल -आंटी आगे आगे चल रहे थे। मैं और पिंकी पीछे थे। सिख समाज के बारे में मुझे इतना कुछ मालूम न था। पिंकी से आज बहुत कुछ पता चल रहा था। मैं सोचता रह गया कि हमारे देश और संस्कृति के लिए इन लोगों ने कितना कुछ बलिदान किया था। मैंने भी पिंकी को बंगाल की कुर्बानियों के बारे में बताया। कुछ समय विश्राम कर हम लोग जलिआंवाला बाग पहुँच गए। यहाँ आकर ऐसा लगने लगा कि मानों हम इतिहास के उस दिन में आ गए हों जब ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर ने निहत्थे और शांति से सभा कर रहे भारतीय लोगों पर गोलियां बरसा दी थीं। पिंकी को यहाँ का पूरा इतिहास मालूम था। उसने मुझे कई बातें बताई कि कैसे रौलेट एक्ट के प्रति विरोध जाहिर करने को जमा लोगों को मार दिया गया था। उसने यह भी बताया कि शहीद भगत सिंह की सोच को बनाने में जलिआंवाला बाग़ की घटना प्रमुख है। पिंकी को काफी कुछ पता था। वह कई बार यहाँ आ चुकी थी परन्तु उसे अधिक जानकारी अपने स्कूल के एक टूर में मिली थी। उसने बताया कि कैसे सरदार उधमसिंह ने जलिआंवाला बाग का बदला इंग्लॅण्ड में डायर को मार कर लिया था। मैं उसकी इतिहास में रूचि पर मुग्ध था। साथ ही मैं बंगाल के ऐतहासिक घटनाओं के बारे में भी सोच रहा था। शहीद खुदीराम, मास्टर दा सूर्यसेन, बागा जतिन आदि मेरे दिमाग में आ रहे थे। मुझे लगा कि क्या ये लड़की जो मुझे इतना कुछ बता रही थी, उसे बंगाल के क्रांतिकारियों के बारे में भी जानकारी थी ? मैंने सोचा, मौका मिलेगा तो मैं भी पिंकी को अपने बंगाल के बारे में सब कुछ बताऊंगा।
हम सभी काफी थक गए थे। किसी का भी वागा बॉर्डर जाने का मन नहीं था। शायद मेरे लिए ही वे वहां जाने वाले थे। मैं वागा बॉर्डर का कार्यक्रम टीवी पर देख चुका था। मैंने एक बंगाली पत्रिका में इसके बारे में पढ़ा भी था कि यहाँ संध्या में होने वाली फौजी रस्म देशभक्ति को नहीं बल्कि दोनों ओर वहां आये दर्शकों के मध्य भावना भड़काने वाली जैसी होती है। मेरी भी वहां जाने की इच्छा न थी। जैसे ही मैंने वागा बॉर्डर न जाने की बात की, सभी के चेहरे खिल उठे। ये निश्चित किया गया कि एक बार फिर हरमंदिर साहेब जायेंगे और वहां कुछ समय बिताकर चंडीगढ़ लौट जायेंगे। मुझे अमृतसर का माहौल बहुत पसंद आ गया था। मैंने सोचा, माँ को फोन कर सब बताऊंगा। हम लोग स्वर्ण मंदिर आ गए और वहां सरोवर की सीढ़ियों पर बैठ गए। सभी आँखें मूंद ध्यान की मुद्रा में थे। लवली जो सामान्यतः चुलबुल सी रहती थी, इस समय अपने पापा के पास बैठी, ईश्वर की भक्ति कर रही थी। उसे इस तरह गंभीर देखना अच्छा लगा। कुछ समय बाद आंटी ने कहा, ' एक चक्कर लगा लेते हैं, फिर वापिस चलते हैं..' पिंकी ने कहा, ' मम्मी, आप लोग हो आओ मैं यहीं बैठी हूँ..' वो लोग आगे बढ़ गए। मैं उठा तो परन्तु फिर मुझे भी कुछ देर बैठ जाना ही अच्छा विकल्प लगा। मैं कहा, ' अंकल, मैं भी यहीं रुकता हूँ.. पिंकी के साथ ..'
( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )
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