टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
( ३३-३४ ) मैं संतुष्ट था कि सब कुछ जैसा मैं चाहता था वैसा ही हो गया था। अगली सुबह माँ-बाबा दोनों ही खुश नज़र आये। मेरे प्रति उनका स्नेह साफ दिखाई दे रहा था। माँ ने आज अपने हाथ से मेरा ऑफिस का टिफ़िन बनाया। बिशाखा भी चुपके-चुपके मुस्कुरा रही थी। वो सब कुछ समझ गयी थी। मुझे एक ओर अलग देख, उसने चुटकी लेते हुए कहा, ' तो हमारे घर में बहू आ रही है.. ' मैंने कहा, ' हाँ, वो तो आनी ही थी..' बिशाखा बहुत उत्साहित हो रही थी, ' मेरे साथ बंगाली में बात कर पायेगी न ? मेरा बना खाना खायेगी न ? वह और भी बहुत कुछ कहना चाहती थी परन्तु माँ को आता देख, एक ओर निकल गयी। कुछ समय बाद मैं भी अपने ऑफिस के लिए निकल आया। आज माँ-बाबा दोनों न जाने क्यों दरवाजे तक आये थे और मुझे गली से जाता हुए देखते रहे थे ।
ऑफिस में कुछ समय बाद ही रोबी दा मिल गए। एक बार फिर उन्होंने मेरा और मेरे घर का हालचाल पूछा। मैंने हूँ-हाँ में जवाब दिया। वे न जाने मेरे अनमने से जवाब से क्या समझे, बस बोले, 'आता हूँ तुम्हारी माँ से मिलने..तुम चिन्ता मत करो..मैं उन्हें समझा दूँगा, तुम्हारे मन की बात, उन्हें मानना ही होगा.. मैं हूँ न.. ' मैं कुछ और कहता इससे पहले ही वे आगे बढ़ गए। मैं सोचने लगा अब ये क्या समझायेंगे मेरी माँ को ? वहां तो सब कुछ पहले ही से ठीक हो चुका था। इन्द्राणी दी ने तो पहले से ही समस्या को सुलझा और माँ को समझा दिया था। अब पिंकी को फोन करना था। कहाँ से शुरू करूँगा ? मैं उत्साहित था, रोमांचित भी और शायद चिंतित भी। मुझे लग रहा था कि यहाँ कलकत्ता में पहुंचे हुए मुझे तीन दिन हो गए थे, मेरे फोन न आने का पिंकी न जाने क्या सोचती होगी ? मन ने दिलासा दिया, उसके पापा को तो फोन कर ही दिया था और बता दिया था कि मैं बाद में फ़ुरसत से पिंकी-लवली को फोन करूँगा। फोन तो पिंकी को ही करना था परन्तु नाम दोनों का लिया था। मैं पिंकी से बात करने को बे चैन था परन्तु चाहता था कि मेरा फोन वह ही उठाये। यदि जोगेन्दर अंकल या आंटी ने उठाया तो खुलकर मन की बात न कर पाऊँगा, बस औपचारिक हैलो - हाय ही होकर रह जाएगी। अब जो भी हो, फोन तो करना ही था। सोचा, घर जाकर रात में फोन करूँगा।
घर में सब कुछ सामान्य था। शाम की चाय फिर टीवी पर समाचार और कुछ अन्य कार्यक्रम और फिर रात का भोजन। माँ-बाबा दोनों ही अपने सामान्य स्वरुप में थे। मुझे न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि वे अभी से ही घर में एक लड़की की उपस्थिति महसूस करने लग गए थे। वे इस कल्पना से ही खुश हो रहे थे कि घर में एक लड़की आएगी। माँ ने कहा कि मुझे चंडीगढ़ फोन करना चाहिए। मैं तुरंत उठ, माँ के कमरे में रखे फोन पर नंबर मिलाने लगा। माँ भी आ गयी और साथ में बैठ गयी। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा। माँ उत्सुक थी कि मैं क्या बात करता हूँ। भाग्य ने साथ दिया। फोन पिंकी ने ही उठाया। मैंने हेलो कहा ही था कि उधर से आवाज़ आयी, ' तो बाबू मोशाय, फ़ुरसत मिल गयी हमें याद करने की ? मैंने कहा, ' अरे, ऐसा नहीं है..अंकल को तो फोन कर ही दिया था.. ऑफिस में बहुत कुछ पेन्डिंग हो गया था..चलो अब तो कर ही लिया ही न.. और हाऊ आर यू ? हाऊ इज नाटी गर्ल लवली ? पिंकी ने कहा सब ठीक था। मुझे महसूस हो रहा था कि उसके मन में क्या चल रहा था। उसने पूछा, ' आंटी से बात हुई ? मैं कहा, ' हाँ, बात हुई है.. ' माँ ने अचानक मेरे हाथ से फोन ले लिया और पिंकी से बात करने लगी, ' बेटा कैसी हो ? तुम सब ने इसका बहुत ख्याल रखा..थैंक यू .. ये तो जब से आया है, तुम सब की बहुत तारीफ ही किये जा रहा है..' माँ अपनी टूटी फूटी बंगाली-मिक्स हिंदी में बात कर रही थी। इस दो तीन मिनट में उसने पंजाब-बंगाल के पुराने संबंधों, उसके पापा और उसके सुखबीर अंकल की प्रशंसा और उसे कलकत्ता आने का निमंत्रण दे दिया था। मैं मुस्कुराता रहा। मुझे माँ की बातें अच्छी लग रही थीं। माँ मुझे फोन दे कमरे से बाहर निकल गयी। अब मैंने कहा, ' मैंने तो यहाँ बात कर ली है, अब तुम भी अपने घर में बात कर लो.. ' पिंकी ने कहा, ' पापा को कुछ आईडिया हो चुका है.. लवली ने हँसी-हँसी में माँ को कुछ हिन्ट दिया है..वो ऐसा ही करती है..तुम अपनी मम्मी से कहना, वो मेरे घर बात करें.. पर देर नहीं होनी चाहिए..' मैंने कहा, ' ठीक है, मेरी माँ आज-कल में ही बात करेंगी.. लेकिन उस से पहले तुम भी कुछ बात कर लेना.. ऐसा न हो कि मेरी माँ की बात किसी शॉक जैसी लगे.. अपना ख्याल रखना..फिर कभी फोन करूँगा.. तुम दिन में मुझे ऑफिस नंबर पर सकती हो ..' मैंने उसे ऑफिस नंबर दिया और बाय और गुड नाइट कहकर फोन रख दिया। मेरे दिल की धड़कन तेज चल रही थी। कुछ समय वही बैठा रहा फिर नीचे आया और माँ से जोगेन्दर अंकल से बात करने को कहा। मैंने कहा कि विलम्ब ठीक नहीं था क्योंकि पिंकी तनाव में थी। माँ ने कहा कि वे कल फोन करेंगी। पहले लुधियाना में सुखबीर से बात करना ठीक होगा। वे सुखबीर से कहेंगी कि वह चंडीगढ़ में अपने भाई से बात करे। माँ ने कहा कि मेरे पिता भी यही ठीक समझते थे कि हमें सुखबीर से ही पहले बात करनी चाहिए। माँ अपने में ही मंद-मंद मुस्कुरा रही थी, ' अरे, इन पंजाबी भाइयों को ऐसा सुशील और पढ़ा-लिखा लड़का कहाँ मिलेगा.. अब तुम चिन्ता न करो, सब ठीक हो जायेगा..'
अगले दिन ऑफिस में लंच ब्रेक के बाद एक घंटा ही बीता होगा कि पिंकी का फोन आ गया। उसने उत्साहित स्वर में कहा, ' क्या चल रहा है ? मैंने कहा, ' ऑफिस में हूँ.. पेंडिंग काम को देख रहा हूँ.. तुम भी तो ऑफिस में ही होगी..' उसने कहा, ' नहीं, आज घर में हूँ.. मन नहीं किया ऑफिस जाने का, कभी कभी बे मतलब भी छुट्टी ले लेनी चाहिए.. ऑफिस इसीलिए तो कैसुअल लीव देता है..' उसकी आवाज़ में उत्तेजना साफ दिखाई दे रही थी। मैं उससे असली बात जानना चाहता था, 'आंटी-अंकल से बात हुई ? वह कुछ क्षण के लिए रुकी। मैंने अपनी बात दोहराई। वो फिर भी चुप रही। मैं परेशान हो रहा था और वो खामोश थी। मैंने जोर देते हुए फिर से पूछा, ' क्या आंटी-अंकल से बात हुई है ? अब उसने हल्के से स्वर में हाँ कहा। इससे आगे उसने कुछ नहीं कहा। मुझे ही पूछना पड़ा कि उनका क्या रिस्पांस था। पिंकी ने कहा कि अब तक उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी और ये कि उनका मूड ठीक नहीं लग रहा। कुछ समय तक दोनों ओर से चुप्पी रही। फिर पिंकी ने पूछा कि क्या मैं घबरा रहा था ? मैंने कहा ' थोड़ा-बहुत, परन्तु अब जो भी होगा देखा जायेगा..' अब मुझे उधर से खिलखिलाने का आभास मिला। पिंकी ने कहा, ' बाबू मोशाय, घबराने की आवश्यकता नहीं है.. मम्मी-पापा कुछ तो परेशान हुए परन्तु अंत में उन्होंने कहा कि मैं समझदार और पढ़ी-लिखी हूँ और अपने सम्बन्ध में निर्णय लेने में सक्षम हूँ..' मैंने कहा ये क्या मज़ाक किया। फिर वो हंसने लगी, ' अरे, मैंने जरा सा मज़ाक किया, आप तो सीरियस हो गए.. ' सच, मैं घबरा तो गया ही था। पिंकी ने बताया कि उसके पापा लुधियाना में सुखबीर अंकल से बात करेंगे और उनसे कलकत्ता में मेरे माता-पिता से बात करने को कहेंगे। लगता है पिंकी के घर पर भी वैसा ही चल रहा था जैसा मेरे घर पर था। दोनों ओर से सुखबीर सिंह जी से मध्यस्था करने को कहा जा रहा था। हम दोनों के माता-पिता तो राज़ी हो चुके थे। मैं कुछ हद तक आश्वस्त हो चुका था। मैं चाहता था कि कुछ अंत रंग बात हो पर झिझक रहा था। पिंकी ने कहा, ' नींद ठीक से आ रही है तो ? मैंने कहा, ' तुम अपना बताओ, तुम्हें आ रही है ? वह हँसने लगी, ' बिलकुल, हम तो मज़े से सो रहे हैं.. मैं तो आज भी सुबह दस बजे तक सोती रही.. ' पिंकी की बातों से मैं खुश तो हो रहा था परन्तु अपनी ख़ुशी दिखा नहीं पा रहा था। मैं कभी भी रोमांटिक मिज़ाज नहीं दिखा पाया हूँ। इन्द्राणी दी के साथ एक बार इंग्लिश फिल्म देखने गया था। उन्होंने ने ही फिल्म देखने का निमंत्रण दिया था। कलकत्ता के ग्लोब नाम के सिनेमा हाल में यह फिल्म चल रही थी जिसका काफी नाम हुआ था। इन्द्राणी दी घर से पहुंची थी और मैं ऑफिस से। ये एक प्रेम कथा थी और इसमें कई प्रेम प्रसंग थे। इन्द्राणी दी बहुत खुश दिख रही थी। उन्होंने कहा कि कॉलेज के दिनों में वे एक मित्र के साथ अक्सर पिक्चर देखने जाया करती थी और आज उन्हें उन दिनों जैसा ही आभास हो रहा था। मैंने पूछा, ' क्या कोई बॉय फ्रेंड था ? उन्होंने हँसते हुए कहा था कि ऐसी कोई बात नहीं थी परन्तु वह कुछ अलग सा था और शायद उसके साथ उनकी सोच की समरसता थी। पूरी फिल्म में इन्द्राणी दी बहुत आनंदित थी। मैं उन्हें आनंदित देख मुस्कुराता रहा था। फिल्म समाप्त होने पर उन्होंने मुझसे जानना चाहा कि फिल्म कैसी लगी थी तो मैंने केवल गुड ही कहा था। ये छिपे से मेरे रोमांटिक मनोभाव आज फिर मुझसे खेल रहे थे। मैंने बात को समाप्त करने के इरादे से कहा, ' चलो, बाद में बात करते हैं .. बॉस मुझे बुला रहा है..' मैंने बाय बाय कह फोन रख दिया। मैं अपनी दोनों कोनियों को टेबल पर टिका बैठ गया। मन उमंगित हो रहा था। अब मेरी भी प्रेमिका थी जिसके साथ मिलकर मुझे अपना संसार रचाना था।
शाम को घर पहुँचा तो माँ को मंद मंद मुस्कुराते हुए पाया। मैंने उनसे पूछा कि दिन कैसा रहा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने ने लुधियाना में सुखबीर से बात कर ली थी और वह चंडीगढ़ में जोगेन्दर सिंह से बात कर, आज रात को ही उन्हें सूचित करने वाले थे। मैं माँ की तत्परता पर मुग्ध हो रहा था। मैंने माँ को प्यार से बाँहों में लपेट लिया। मैं नहीं जानता था कि सब कुछ कैसे इतनी सरलता से होता जा रहा था ? माँ ने स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ' चलो, पहले कुछ खा लो..' हमारी बंगाली माओं को न जाने क्यों अपने बच्चों को कुछ खिलाने की ही चिंता बनी रहती है। इस शाम के नाश्ते के साथ माँ अपनी बातें साथ लेकर बैठ गयी। माँ की न जाने क्या क्या योजनाएं बन चुकी थीं। खान पान, खरीदारी और मेरे कमरे की सुव्यवस्था.. वह बोलती जा रही थी किन्तु मैं अपने ही ख्यालों में खोया था। माँ ने जब चंडीगढ़ जाने की बात उठायी तो मैं चौंका गया। माँ ने कहा कि सुखबीर का फोन आने के बाद उन्हें चंडीगढ़ जाने का कार्यक्रम बनाना पड़ेगा। मैंने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब भी जाना हो तो एयर से ही जाना, इतनी लम्बी ट्रैन यात्रा न करना। माँ ने अधिक कुछ नहीं कहा, बस इतना कहा कि देखा जायेगा और यह कि रिश्ता पक्का करने के लिए वे लोग भी तो कलकत्ता आ सकते थे । माँ को सुखबीर के फोन का इंतज़ार था। उन्होंने कहा, ' हम यहाँ बैठे सब कुछ अपने से ही तय करते जा रहे हैं, क्या पता जोगेन्दर को यह सम्बन्ध पसंद न हो..' मैंने कहा, ' हो सकता है..' मैं आज पिंकी से हुई बातचीत को छिपा गया।
बिशाखा रात के खाने की सूचना देकर गयी ही थी कि फोन की घंटी बज उठी। मैं दौड़ा परन्तु माँ ने मुझे रोक दिया। माँ ने कहा कि शायद लुधियाना से सुखबीर का फोन होगा। माँ का अंदाज़ा सही था। यह उन्हीं का फोन था। मैं एक ओर खड़ा था। पहली बात ही बधाई हो और मिठाई खिलाओ से शुरू हुई। सुखबीर अंकल ने बताया कि जोगेन्दर ने इस सम्बन्ध को स्वीकार किया था। फिर इधर -उधर की बातें हुई। उनकी बातों से मुझे यह आभास हो गया कि जोगेन्दर अंकल का फोन भी अब आएगा। माँ ने फोन रखने के बाद मेरे बाबा को सब बताया। रात के नौ बज चुके थे। जोगेन्दर अंकल का भी फोन आ गया। उन्होंने देर रात को फोन करने के लिए क्षमा चाही। माँ ने हँसते हुए कहा कि हम बंगालियों के लिए यह देर रात नहीं थी। जोगेन्दर अंकल ने जो कहा वो कोई खुले दिमाग वाला ही कह सकता था। उन्होंने कहा कि बच्चे पढ़े-लिखे और समझदार थे, उनके निर्णय को हमें खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए। माँ ने इस बार फोन मेरे बाबा को पकड़ाया। उन्होंने कहा, ' सिंह साहेब, रॉय साहेब भी आप से बात करेंगे..' मैं आसपास ही घूम रहा था। इधर की बातें सुन, मैं उधर की बातों का अंदाज़ा लगा रहा था। मेरे बाबा धैर्य से सुलझे हुए अंदाज़ से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ये अच्छा था कि बच्चों ने एक-दूसरे को समझ-परख लिया था और दोनों अपना संसार सजाने में सक्षम थे। बाबा ने कहा कि दोनों परिवारों का सम्बन्ध सुखद ही होगा। उन्होंने ये भी कहा कि उन दोनों को भी मिलना चाहिए। शायद जोगेन्दर अंकल इस बात के लिए तैयार थे। उनकी बात से मुझे संकेत मिला कि वे शीघ्र ही कलकत्ता आने का कार्यक्रम बनाएंगे और एक-दो दिन में ही सूचित करेंगे। माँ संतुष्ट लग रही थी कि वो लोग कलकत्ता आ रहे थे। माँ कहीं न कहीं चाहती थी कि लड़की वालों को ही उनके पास औपचारिक प्रस्ताव लेकर आना चाहिए था।
अगले दिन जोगेन्दर अंकल का फोन आया। माँ और बाबा दोनों से उन्होंने बात की। माँ ने बाद में मुझे सब बताया कि उन्होंने बात विषय से ही शुरू की कि बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो अपनी मर्जी के मालिक होते हैं। माँ-बाप को उनके साथ ही चलना होता है। माँ ने कहा कि वह तो बातचीत के दौरान अधिकतर हाँ..हाँ.. कर रही थी। माँ ने बताया कि वे अगले शनिवार को अपनी वाइफ और लड़की के मामा कलकत्ता आ रहे थे। माँ को उनके कलकत्ता में ठहराने की चिंता हो रही थी। माँ ने अपनी ओर से कहा कि हमारे घर पर तो उनको बंगाली भोजन ही मिलेगा। इस पर जोगेन्दर अंकल ने बताया कि पिंकी के मामा कलकत्ता के किसी क्लब में रहने की व्यवस्था करेंगे और हमें किसी बात की फ़िक्र नहीं करनी चाहिए। वे लोग एक दिन के लिए ही आ रहे थे। उन्हें अगले दिन ही लौट जाना था। उन्होंने माँ से रोका और ठाका की रस्म करने की भी बात की थी। माँ ये शब्द समझ न पायी परन्तु उन्हें ये आभास हो गया कि यह लड़की वालों की ओर से की जाने वाला कोई अनुष्ठान था और इसके लिए रविवार की सुबह तय कर दी। जोगेन्दर अंकल को भी शायद रविवार उचित लगा। उन्होंने कहा कि रोका कर के वे लोग संध्या की फ्लाइट से लौट जायेंगे। माँ ने जोर देकर कहा कि लड़की की फोटो जरूर लेते आएं। अंकल ने कहा, ' एक फोटो नहीं, पूरी एल्बम ही ले आएंगे जी, लड़की तो अब हमारी नहीं आपकी है जी ..'
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ... )
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