Chander Dhingra's Blog
Friday, September 18, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 36
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
हफ्तेवार इस लम्बी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ..
( ३६ ) हम सभी रविवार सुबह समय से पहले बिस्तर छोड़ चुके थे। बिशाखा न जाने कब की जगी हुई थी ? बाबा ने बताया कि आज वह तो पांच बजे ही जाग गए थे और उन्होंने देखा था कि बिशाखा का स्नान और पूजा-पाठ हो चुका था। हम सब में एक तरह का उतावलापन सा साफ दिखाई दे रहा था। माँ ने हमारे घर की एक अन्य सहायिका को सुबह-सुबह आ जाने की हिदायत दे रखी थी। वह आयी तो घर की साफ-सफाई में जुट गयी। घर के बैठक खाने को व्यवस्थित कर दिया गया था। माँ ने सभी को समय से तैयार हो जाने के लिए कहा और मुझे घर से बाहर कहीं भी न जाने का आदेश दिया। न जाने हमारी मायें विशेष कर बंगाली मायें, परिवार में कुछ भी विशेष होने के अवसर पर घर में ही रहने का आदेश क्यों देती हैं ? उन्हें अंतिम क्षणों में कुछ अनहित घट जाने की आशंका न जाने क्यों बनी रहती है ? माँ ने इन्द्राणी दीदी और उनकी माँ के साथ-साथ कुछ अन्य सम्बन्धियों को भी आज आमंत्रित किया हुआ था। दस बजे से उन सबका आना आरम्भ हो गया था। इन्द्राणी दी बहुत सज धज कर आयीं थी। वह आते ही सीधे ऊपर मेरे कमरे में आयीं और हँसते हुए कहने लगी, ' कैसी दिख रही हूँ मैं, पंजाबी सम्बन्धियों को प्रभावित कर सकूँगी तो ? मैं मुस्कुरा दिया, ' सावधान रहना कहीं वो लोग तुम्हें अपने साथ ही न लेते जायें ? हम दोनों हँसते हुए नीचे आ गए। सब मुझे बधाई देने लगे परन्तु उनकी बधाई में मुझे एक छिपी सी बात सुनाई दे रही थी और वह थी, ' क्या बंगाली लड़कियों का अकाल पड़ गया था जो पंजाब से लड़की लेकर आ रहे हो ?
तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। बाबा होटल में फोन कर पक्का कर रहे थे कि खाना समय पर पहुँच जाना चाहिए। उन्होंने अपने ऑफिस के एक सहकर्मी को मिठाई की दुकान पर से आर्डर के हिसाब से सामान ले आने को कहा और एक कार उसे ले जाने के लिए कहा। दूसरी कार जोगेन्दर अंकल लोगों के लिए जाने वाली थी कि उनकी ओर से फोन आ गया। उन्होंने बताया कि ठीक ग्यारह बजे वे लोग पहुँच जायेंगे। बाबा ने उन्हें ले आने के लिए कार भेजे जाने की बात कही तो उन्होंने कहा कि इसकी आवश्यकता नहीं थी। उनकी ओर से सभी प्रबंध किया जा चुके थे। उन्होंने यह भी पूछा कि इस अवसर पर कितने लोग होंगे ? माँ ने जब यह सब सुना तो थोड़ा तेश में आ गयी क्यों कि वह कल से कह रही थीं कि जोगेन्दर से पूछ कर ही गाड़ी की व्यवस्था करो। अब बे वजह एक गाड़ी का भाड़ा देना होगा। बाबा उन्हें समझाने की कोशिश करने लगे। वह खीज़ गए थे उन्होंने कहा, ' ऐसा हो जाता है, आज के दिन तो इन छोटी-छोटी बातों में मत उलझो .. सब का मिज़ाज मत बिगाड़ो ..' मुझे हमेशा की तरह उनकी बात में सत्य दिखा। माँ को अपने पर नियंत्रण रखना चाहिए था। इन्द्राणी दी इधर-उधर झांकती फिर रही थी। माँ ने उसे बताया कि वो पूछ रहे थे कि आज के आयोजन में कौन कौन रहेगा ? उन्होंने उसका नाम भी बताया था और यह भी कि वह हमारे घर की सदस्य की तरह थी। वैसे भी इन्द्राणी दी से वे लोग एयरपोर्ट पर मिल चुके थे। घर में चल-पहल बढ़ गयी थी। बाबा को इस तरह का पारिवारिक माहौल बहुत पसंद था। वे उत्साहित थे और साथ ही साथ बहुत प्रसन्न भी थे।
ठीक ग्यारह बजे, बिसाखा दौड़ कर आयी और खबर दी कि वे लोग आ गए थे। मैंने तुरंत बालकनी से नीचे झाँका। तीन गाड़ियाँ खड़ी थी। मैं हैरान था। तीन लोग और तीन गाड़ियाँ ? फिर देखा, तीन नहीं छह लोग थे। वे लोग आगे की दो गाड़ियों से निकले। पीछे की गाड़ी से भी दो लोग उतरे और तीन गाड़ियों से सामान उतरवाने लगे। सामान में सजे हुए टोकरे और बॉक्स थे। उन दोनों ने सामान को घर के अंदर रखवाया और एक गाड़ी लेकर वापिस चले गए। इस सिख पंजाबी लोगों का एक साथ हमारे घर आना आस पड़ोस में उत्सुकता जगा रहा था। मैंने देखा कि सब इधर-उधर से झाँकने की कोशिश कर रहे थे। मुझे देख, सामने घर के काका ने चिल्लाते हुए पूछा ' क्या मामला है ? मैंने खीजते हुए कहा कि खुश खास नहीं था, पंजाब से कुछ मेहमान आ रहे थे। परन्तु वे संतुष्ट न हुए। उन्होंने कहा, ' तुम कुछ छिपा रहे हो..इतना सारा सामान लेकर आये हैं, मत बताओ, बाद में तो पता चल ही जायेगा ? मैं उनसे उलझना नहीं चाहता था। मैंने उन्हें शांत करने के लिए कहा कि मेरी माँ से बाद में बात करना वह सब बता देंगी और अभी उन्हें घर के अंदर जाकर विश्राम करना चाहिए। पर वह कहाँ मानने वाले थे, वहीं खिड़की में चिपके रहे। मैं ही भीतर आ गया और सोचने लगा कि इन लोगों को किसी की व्यक्तिगत आज़ादी का कुछ ख्याल नहीं था। किसी के घर कोई आये या कुछ भी हो, इन्हें पूरा विवरण चाहिए था।
अतिथि भीतर आ गए थे। एक और सरदार जी दम्पति भी थे। शायद मामाजी के कलकत्ता में रहने वाले परिचित थे। मैंने सब के पाँव छुए। जोगेन्दर आंटी ने मुझे गले से लगा लिया। उन्होंने मेरा हालचाल पूछा। माँ ने हँसते हुए कहा, ' जब से चंडीगढ़ से लौटा है, बस वहीं की बातें करता रहता है.. आपने न जाने इसे क्या-क्या खिला दिया है, मेरे हाथ का खाना तो अब इसे अच्छा ही नहीं लगता..' आंटी हँसने लगी। उन्होंने कहा, ' ये खाता कहाँ है, थोड़ा सा प्लेट में ले लेता है और बस..' अंकल और पिंकी के मामा मेरे बाबा के साथ व्यस्त थे। बाबा उन्हें मेरे नाना की विभिन्न अवसरों पर ली गयी तस्वीरें दिखा रहे थे। वे लोग इन तस्वीरों में बहुत रूचि ले रहे थे। मैं उनके साथ खड़ा हो गया। मुझे नाना की उस तस्वीर की याद आ गयी जिसमें वे पंजाब के मुख्यमंत्री के साथ खड़े थे। पंजाब सरकार ने उन्हें तब सम्मानित किया था। मैंने एल्बम से वह तस्वीर निकाली और उत्साहपूर्वक जोगेन्दर अंकल को दिखाने लगा। उन्होंने सम्मान के साथ कहा, ' सर जी तो पूरे देश के लिए आदरणीय थे..' माँ ने आकर जोगेन्दर अंकल का हाथ पकड़ कर, लगभग चिल्लाते हुए कहा, ' ये सब पुरानी फोटो देख रहे हो..हमारी बहू रानी की फोटो कहाँ है..मैंने कहा था न, लेकर आना ? अंकल ने कहा, ' हां जी एक फोटो नहीं, बहुत सारी फोटो लाये हैं ..' फिर उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कि फोटो कहाँ थीं। आंटी ने एक लिफाफा अपने बैग से निकाला और मेरी माँ के हाथ में दे दिया। माँ बहुत उत्साह के साथ और सब कुछ छोड़, कोने में रखी कुर्सी पर बैठ गयी और फोटो देखने लगी। इन्द्राणी दीदी भी उनके पास जा खड़ी हुई। बिशाखा भी पीछे जाकर झुकी ही थी कि माँ ने उसे भगा दिया और कहा कि अभी काम का वक्त था बाद में देखना। फोटो देखने के लिए अधीर तो मैं भी हो रहा था परन्तु खुद पर नियंत्रण कर गया था। दस फोटो रही होंगी। माँ से इन्द्राणी दी एक एक फोटो लेती, देखती और वाह वाह करती। माँ बहुत खुश दिख रही थी। मैं भीतर-भीतर मुस्कुराए जा रहा था। मुझे विश्वास था कि पिंकी का चेहरा माँ को प्रभावित कर गया होगा। अब माँ फिर से काम में जुट गयी थी और वो लिफाफा इन्द्राणी दी के हाथ में था। मैंने इशारे से उन्हें एक ओर आने के लिए कहा। वह मुझे चिढ़ाने लगी परन्तु बाद में कुछ समय के लिए लिफाफा मुझे दे दिया। माँ मुझे बुला रही थी। मैंने जल्दी जल्दी में फ़ोटोस पर नज़र डाली। पिंकी का मुस्कुराता चेहरा मुझे मुग्ध कर गया। कुछ चेहरे सुन्दर होते हैं परन्तु यदि सही तरीके से फोटो लिए जायें तो वे अद्वितीय हो जाते हैं। किसी भी फोटोग्राफर के लिए ऐसे चेहरे उनकी प्रतिभा को उभारने का काम करते हैं। पिंकी का चेहरा भी इसी श्रेणी का था। इन फोटो को देख कोई भी सास अपनी होने वाली बहू के लिए ख़ुशी से गर्वित हो जाएगी। लिफाफे में चार फोटो हमारे अमृतसर के ट्रिप की भी थीं।
( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को यहीं पर )
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