Chander Dhingra's Blog

Wednesday, September 23, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 37

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra    ( हफ्ते वार साझा किये जाने वाली इस लम्बी कहानी का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ३७ )         मुझे सब के बीच में बिठाया गया। जोगेन्दर आंटी ने स्नेह से मेरे सिर पर अपना हाथ फेरा और मुझे एक लिफाफा थमा दिया। मेरी माँ ने देखा तो कहा कि ये तो आप कल दे चुकी थीं। आंटी ने तुरंत उत्तर देते हुए कहा, ' शगुन तो देना ही होता है, जी..' इसके बाद उन्होंने सब के हाथ में एक-एक लिफाफा पकड़ाया। माँ को, बाबा को, इन्द्राणी दीदी को और सभी को जो भी वहां मौजूद थे। उन्होंने एक कोने में खड़ी बिशाखा को अपने पास बुलाया और उसे भी एक लिफाफा दिया। मैंने देखा कि ये लिफाफे तीन रंगों के थे। सबको दे देने के बाद भी, आंटी के हाथ में अतिरिक्त लिफाफे थे। शायद वे अधिक बनाकर लायीं थीं। अंकल ने मेरे बाबा से जो टोकरियाँ और बक्से थे, उन्हें भीतर रखवाने का आग्रह किया। माँ ने आंटी का हाथ पकड़ा और उन्हें अपने कमरे में बने छोटे से मंदिर में ले गयी। माँ ने मंदिर को सुबह फूलों से अच्छे से सजा दिया था। लोक नाथ बाबा की मूर्ति के ऊपर नीला बल्ब जल रहा था और उसका प्रकाश संगमरमर की प्रतिमा को एक तरह की दिव्यता दे रहा था। माँ ने उन्हें बाबा के बारे में बताया कि कैसे वे दयानिधान हैं और कैसे उनका आशीर्वाद परिवार पर है। दोनों महिलाएं मंदिर के सामने हाथ जोड़, ध्यान की मुद्रा में बैठ गयी। कुछ समय बाद वे उठी। माँ अपने नित्य वाले मंत्रोचारण कर रही थी। आंटी ने कहा कि उनका मंदिर बहुत सुन्दर था। यह बात सुनते ही माँ अभियोग वाली मुद्रा में आ गयी, ' घर में मैं ही हूँ जो पूजा और मंदिर को बनाये रख रही हूँ..किसी के पास इस ओर देखने का समय नहीं है.. सबके पास अन्य बहुत कुछ करने का समय है, बस मंदिर के लिए समय नहीं है..' आंटी मुस्कुराने लगी जैसे वे समझ रही हों कि ये तो घर-घर की बात थी। उन्होंने कहा, ' मेरी दोनों बेटियां इस दिशा में बहुत अच्छी हैं..नित्य नियम से पूजा-पाठ करती हैं  ..' फिर अचानक उन्हें क्या याद आया, ' सुना है यहाँ का गुरुद्वारा बहुत सुन्दर है.. आज का दिन बहुत शुभ है..चलो जी मत्था टेक कर आते हैं..' माँ को उनकी बात साथ-साथ समझ न आयी परन्तु कुछ क्षण बाद उन्होंने हाँ कहा, ' हाँ खाने में तो अभी समय है.. गुरुद्वारा पास ही है..चलो आप को दिखा लाते हैं .. ' माँ ने मेरे बाबा से कहा। गाड़ी तो नीचे खड़ी ही थी। माँ, आंटी, इन्द्राणी दी और मैं वहां जाने के लिए निकल आये। बाबा और अंकल घर पर ही रुक गए। बाबा ने माँ से विलम्ब न करने का निर्देश दिया क्योंकि होटल से लंच पहुँचने ही वाला था। हमारे घर की दो दिशाओं में दो गुरूद्वारे हैं। दोनों ही लगभग समान दूरी पर हैं। इन्द्राणी दी, जो रास बिहारी चौराहे के पास था, वहां जाना चाहती थी किन्तु मेरा मन हरीश मुख़र्जी रोड वाले गुरूद्वारे का था। मैं ऑफिस आते-जाते इसके सामने से ही गुजरता था। मैंने ड्राइवर को वहीँ चलने को कहा। लगभग दस मिनिट में हम वहां पहुँच गए। गुरूद्वारे में लोग आ-जा रहे थे। मुझे मालूम था कि रविवार को यहाँ रौनक रहती थी। गुरूद्वारे के पास ही दो चाय की दुकाने हैं जो बहुत प्रचलित हैं। दिन भर यहाँ चाय पीने वालों का आना-जाना लगा रहता है। इन्द्राणी दी ने गाड़ी से उतरते ही पहले चाय पी लेने की इच्छा जाहिर की। माँ ने उसे हल्का सा डाँट दिया, ' पहले अंदर जाकर पूजा तो करो..' मुझे भी उनका इस तरह से चाय-चाय करना अच्छा न लगा था वह भी पंजाब से आयी आंटी के सामने। इन्द्राणी दी कुछ ज्यादा ही चुलबुली हो रही थी। मैंने अब ध्यान दिया था, वह उस दिन अपने मेकअप आदि में भी कुछ ज्यादा ही शोख़ दिख रही थीं। उनका ब्लाउज भी कुछ अधिक ही प्रदर्शनकारी और नटखट हो रहा था। वैसे हमारे परिवार में इन्द्राणी दी की आकर्षण करने की क्षमता और जिंदादिली को सभी पसंद करते थे। परन्तु मुझे न जाने क्यों ऐसा लगा था कि आज उन्हें बंगाली पारम्परिक लड़की के रूप में दिखना चाहिए था। अक्सर बंगाली लड़कियां जब सौम्यता प्रदर्शित करना चाहती हैं तो साड़ी की सहायता लेती हैं और इसी तरह जब किसी को लुभाना या बहकाना चाहती  हैं तब भी वे साड़ी पर ही भरोसा करती हैं। साड़ी एक ऐसा परिधान है जो पहनावे के स्वरूप से अपना रंग बदल लेता है।   हम गुरूद्वारे के अंदर गए। माँ तो यहाँ पहले भी आ चुकी थी। इन्द्राणी दी के लिए शायद पहला अवसर था । मुझे उन्हें सिर पर पल्लू लेने के नियम का बताना पड़ा था। मैंने देखा, पल्लू से सिर ढकने पर वह स्वयं से गंभीर हो गयी थी। जोगेन्दर आंटी को भी उनका ये रूप अच्छा लगा था और उन्होंने मुस्कुराकर इसका इशारा दिया था। हम लोग वहां कुछ समय के लिए शांत हो, ध्यान मुद्रा में बैठे रहे। बाहर आने पर एक बार फिर से वहां की प्रसिद्ध चाय की बात उठी परन्तु माँ ने समय नहीं है कहकर सबको गाड़ी में बैठ जाने का आदेश दिया। इन्द्राणी दीदी कुछ नाराज़ हुई थी। उन्होंने कहा कि मेरी शादी हो जाने दो फिर देखना वह कैसे मेरी पत्नी को यहाँ की चाय की लत लगवायेंगी। ऑन्टी कलकत्ता के गुरूद्वारे से बहुत प्रभावित थी। उन्होंने वहां एक अच्छी खासी धनराशि का दान भी दिया था। घर पर खाने की तैयारी हो रही थी। बाबा के साथ पंजाब से आये दोनों अंकल लोग न जाने कौन कौन से विषयों पर चर्चा में लगे हुए थे। माँ ने वहां पहुँच कर अपना रौब दिखाना शुरू कर दिया था। वह हमेशा ऐसा ही करती थीं। खाने की टेबल पर सब आ गए थे। बिशाखा ने इस तरफ का मोर्चा संभाला हुआ था। पंजाबी खाना देख, जोगेन्दर अंकल निराश हो गए। उन्होंने कहा कि वह तो बंगाली खाने का मूड बनाये बैठे थे। बाबा ने कहा, ' पंजाबी खाना है परन्तु इसमें बंगाली टच है.. इसके बाद बंगाल की विश्व प्रसिद्ध मिठाई और दोई भी है.. आपको वाह करने पर मजबूर कर देंगी.. '   जो भी हो सब बहुत स्वाद लेकर खा रहे थे। पिंकी के मामा ने कहा, ' ऐसा स्वादिष्ट पंजाबी खाना तो दिल्ली में भी नहीं मिलता..'  वह जिसे कहते हैं, उँगलियाँ चाट-चाट कर खाना, वैसे खा रहे थे। मामाजी से मैं दिल्ली में थोड़े ही समय के लिए मिला था, आज उनका व्यवहार देखा तो बहुत अच्छा लगा। वह बहुत हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति लगे। हमारा घर आज मस्ती के मूड में था। खाना निपट जाने के बाद सब एक तरफ आकर बैठ गए। बाबा ने कहा, ' अब आगे का क्या कार्यक्रम है ?  मामा जी ने अपने अंदाज़ में कहा, ' अब पंजाब क्लब जायेंगे, अपना सामान लेंगे और एयरपोर्ट रवाना हो जायेंगे.. रात को नौ बजे दिल्ली में उतरेंगे और अपने घर जायेंगे.. ' बाबा भी हंसने लगे। उन्होंने कहा, ' मेरा मतलब शादी के कार्यक्रम से था.. सगाई और शादी..' पिंकी के पापा कुछ कहने ही वाले थे कि मामाजी ने कहा, ' ओये जी..जब आप कहो जी.. आप तो हुकुम करो.. अगले हफ्ते ही कर देते हैं.. ' अब माँ सामने आयी, ' मुझे तो अपनी बेटी लानी है.. कहो तो मैं लेने आ जाऊँ या फिर आप ही उसे छोड़ने आ जाओ.. ' माँ चालाकी से कह रही थी कि शादी चंडीगढ़ में होगी या कलकत्ता में ? मैं अपनी माँ की राजनैतिक तरीके से बात करने की प्रतिभा को जानता था। अब जोगेन्दर अंकल ने कहा कि जैसा हम लोग चाहें वैसा ही होगा। हंसी मज़ाक में गंभीर बातें होती चली गयीं। इस बीच मामा ने कहा, ' न चंडीगढ़ न कलकत्ता.. बीच में आता है दिल्ली, तो शादी दिल्ली में करते हैं.. पिंकी तो मेरी भी लड़की है..'  मैं एक ओर बैठा सबकी सुन रहा था। मुझे लगा, पिंकी के मामा और पापा पहले से ही दिल्ली का तय कर चुके थे। माँ को भी दिल्ली वाला सुझाव सही लगा। यही तय हुआ कि शादी में विलम्ब नहीं किया जाना चाहिए। शादी वाले दिन ही सगाई की रस्म भी की जाएगी। मैं हैरान था कि कैसी आसानी से सब काम होता जा रहा था। मुझे एक बार को लगा कि माँ जो सुबह-शाम बाबा लोकनाथजी का पूजन करती थीं, सच में यह उन्हीं की कृपा थी। वैसे तो मैं इसे माँ का आडम्बर ही मानता रहा था। इन्द्राणी दीदी दूसरे कोने में बैठी मुस्कुरा रही थी। मेरी माँ और जोगेन्दर ऑन्टी बहुत खुश दिख रही थी। वे न जाने क्या क्या बातें कर रही थीं। अचानक माँ ने मुझे अपने पास बुलाया। उन्होंने मुझे नवंबर माह के बारे में पूछा, ' ऑफिस में कोई समस्या तो न होगी.. छुट्टी तो मिल जाएगी न ? मैंने कहा कोई समस्या नहीं थी परन्तु वह किसलिए पूछ रही थीं ? माँ हँसने लगी, ' अरे तुम्हारी शादी की तारीख तय कर दी है .. ' मैंने कहा, ' इतनी जल्दी ? मुझे आश्चर्य हुआ था क्यों कि नवम्बर एक महीने बाद ही था। अब मेरी बात का आंटी ने उत्तर दिया, ' अरे, देरी क्यों ? पिंकी को भी नवंबर सूट करता है..' उन्होंने विषय को विराम देते हुए कहा, ' चलो सब पक्का, नवंबर दिल्ली में ..डेट्स जो तीन आयी हैं उनमें से कौन सी है, ये आप एक-दो दिन में बता देना..'     कुछ समय बाद पिंकी के मामा चलने की आतुरता दिखाने लगे। उन्होंने कहा कि क्लब से चेक आउट करना था और कलकत्ता से कुछ खरीदना भी था। वह बार बार कह रहे थे कि उन्हें हमारा घर और लंच बहुत अच्छा लगा था। पिंकी के पापा भी अब उठ खड़े हुए थे। माँ ने अपनी ओर से तीनों को गिफ्ट के पैकेट दिए। कलकत्ता के मशहूर रसगुल्ले के टिन भी आये हुए थे, वे भी दिए। सब घर से निकलने वाले ही थे कि माँ ने ऊँची आवाज़ में कहा,' सिर्फ पिंकी-पिंकी सुन रहे हैं, ये तो डाक नाम यानि घर का नाम है.. अरे, हमारी बहू का असली नाम क्या है, वह तो बताओ..'  सभी हंसने लगे। आंटी ने कहा, ' हमारी बेटी तो मन से प्यार करती है, वह तो मनप्रीत है जी.. मनप्रीत कौर.. ' अब अंकल ने ठहाका लगाते हुए कहा, ' जोड़ी बहुत अच्छी रहेगी जी .. मनप्रीत और अभिजीत .. वाह क्या बात है..रब दी बनाई जोड़ी है जी .. वाहे गुरु..'( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर   .. )

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