Chander Dhingra's Blog
Wednesday, September 30, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -38
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ३८ ) उन लोगों के वहां से निकल जाने के साथ ही मैं दौड़ता हुआ ऊपर के कमरे में आया। मैं हाँफ रहा था। मैंने चंडीगढ़ का नंबर मिलाया। कुछ गड़बड़ हो गया था। शायद चंडीगढ़ का कोड ही भूल हो गया था। दोबारा मिलाया। अब उधर से हेलो की आवाज़ आई तो मैंने कोई उत्तर न दिया। मैं जानता था कि उस तरफ पिंकी ही थी। वह हेलो.. हेलो.. कह रही थी और मैं खुद में ही मुस्कुराता जा रहा था। अंत में मैंने कहा, ' हेलो.. क्या मैं मनप्रीत जी से बात कर सकता हूँ..' उधर से किसी ने कहा, ' जी वो तो घर पर नहीं हैं..आप कौन बोल रहे हैं..' मैंने सोचा ये तो गड़बड़ हो गया। फोन शायद उसकी बहन ने उठाया था। मैंने कहा, ' कब तक आएँगी .. मैं बाद में फोन कर लूंगा ..' अब उधर से हंसी की आवाज़ आयी, ' अरे, मैं मनप्रीत ही बोल रही हूँ, अभिजीत साहब.. मैं झुंझला गया, मैंने कहा, ' मुझे तो अभी दस मिनट पहले ही तुम्हारा नाम पता चला है, मनप्रीत.. परन्तु तुम्हें मेरा नाम कैसे पता चल गया...' वह हंसती ही जा रही थी, ' अरे, तुम्हारी कलकत्ता की फ्लाइट तो मैंने ही बुक की थी मिस्टर अभिजीत रॉय..' अब मैं भी हंसने लगा। मैंने उसे दिन भर जो-जो हुआ था सब विस्तार से बताया। मैंने बताया कि सब कुछ ठीक से हो गया था। उसके मम्मी-पापा और मामा जी कुछ समय पहले ही हमारे घर से निकले थे। मैंने कहा, ' दो महीने बाद नवंबर में उसे मिसेज मनप्रीत रॉय बनकर कलकत्ता आना था। वह बहुत खुश लग रही थी। उसने कहा, ' मनप्रीत रॉय नहीं मनप्रीत कौर रॉय..' मैंने कहा, ' हाँ..बिलकुल सही कहा.. तुम्हारा कौर तुम्हारे साथ ही रहेगा..' हम लोग काफी देर तक बातें करते रहे। दोनों ही रोमांचित थे। अचानक माँ की आवाज़ आयी। वह मुझे बुला रही थीं। मैंने फोन रखते हुए कहा कि रात में एक बार फिर से बात होगी।
नीचे आया तो देखा भेंट में आयी सभी चीजों को खोलकर देखा जा रहा था। इनमें ड्राई फ्रूट्स के पैकेट्स थे। बादाम,अखरोट, काजू, किशमिश,पिस्ता आदि। जो टोकरे थे वे बहुत खूबसूरत ढंग से सजाये हुए थे और इनमें तरह-तरह के फल थे। कुछ फल तो वे थे जो सामान्य फल की दुकानों पर नहीं मिलते। अचानक मुझे टोकरों के ऊपर लगे स्टीकर दिखे। ये सभी कलकत्ता की एक प्रसिद्द मार्किट से आये थे। मैं समझ गया कि इन सभी की व्यवस्था पहले कर ली गयी थी और आज सुबह इन्हें हमारे घर के पते पर डिलीवरी करा दिया गया था। माँ बहुत खुश थी कि इतना सब कुछ मिला था। इन्द्राणी दीदी भी हैरान थी। माँ ने कहा कि वे लोग रोका के नाम पर सगाई ही करके गए थे। अब जो सगाई होगी वह मात्र औपचारिकता होगी। इन्द्राणी दीदी को एक बात परेशान कर रही थी कि शादी दिन में होगी। माँ ने उसे बताया कि रात में पार्टी भी होगी। बाबा ने कहा अब उनकी बात तो माननी ही होगी। हम लोग बारात लेकर दिल्ली जा रहे थे, वहां जैसा प्रबंध वे लोग करेंगे, हमें स्वीकार कर लेना होगा। बाबा तो दिल्ली जाने की व्यवस्था में लग चुके थे। उनका कहना था कि तुरंत ही सब कुछ कर लेना होगा। उन्होंने अपनी डायरी में कुछ नाम भी लिख लिए थे, जिन्हें बाराती के रूप में दिल्ली लेकर जाना था। ये करीब बारह लोगों की लिस्ट थी। उनका मानना था कि बहुत अधिक लोगों को ले जाना उचित न होगा। उन्होंने बताया कि ये सभी जानकारी दिल्ली में जोगेन्दर के साले को देनी थी जिससे कि वह रहने आदि की व्यवस्था कर सकें। बाबा हर समय रेल रिजर्वेशन फॉर्म्स अपने पास रखते थे। उन्होंने अपनी टेबल की कुर्सी पर बैठते हुए कहा, ' एक फॉर्म में छह लोगों के नाम आ सकते हैं, मैं राजधानी ट्रैन के दो फॉर्म भर रहा हूँ.. नवंबर की तारीख बताओ.. देर कर दी तो बुकिंग नहीं मिलेगी..' माँ उनकी इस बात पर परेशान हो गयी थी। उन्होंने कहा कि अभी तुरंत तारीख नहीं बताई जा सकती थी। उन्होंने आदेश के स्वर में कहा, ' कल तक रुको.. इस तरह की जल्दबाज़ी मत करो.. सब कुछ सोचना-समझना पड़ेगा..' बाबा निराश हो गए थे। उन्होंने खिन्न होते हुए माँ से कहा, ' जो करना है करो, विलम्ब किया तो ट्रैन के टिकट नहीं मिलेंगे और दिल्ली में लड़की वालों को भी अच्छी जगह ठहराने की मुश्किल होगी ..' माँ ने कुछ नहीं कहा परन्तु ऐसा संकेत अवश्य दिया कि एक-दो दिन में कुछ फर्क नहीं पड़ता था। माँ ने बिशाखा को कहा कि सब सामान ठीक से ऊपर के उनके कमरे में रख दे। इधर इन्द्राणी दी और उनकी माँ घर जाने की मुद्रा में आ गए थे। माँ ने उन्हें रोक लिया कि दोपहर का बहुत खाना बचा हुआ था सो उन्हें रात को खाकर ही अपने घर जाना होगा। मैंने भी इन्द्राणी दी को रुकने को कहा। हम दोनों ऊपर छत पर चले गए। इन्द्राणी दी के पास वो फोटो वाला लिफाफा था। उन्होंने एक कोने में बैठते हुए कहा, ' चलो, अब आराम से सब फोटो देखते हैं..' उन्होंने एक फोटो निकाली और घूमा-घूमा कर देखने लगी। उन्होंने वो फोटो मुझे दी और दूसरी निकाली। पहली फोटो अब मेरे हाथ में थी। मैं देखता ही रह गया। इन्द्राणी दी एक-एक कर फोटो मुझे दे रही थी। आज मैं पहली बार पिंकी को इतने करीब से देख रहा था। इन्द्राणी दी ने कहा, ' भई, बहुत सुन्दर है..एकदम किसी फ़िल्मी नायिका सी दिखती है..' मैंने कहा, ' ऐसी कोई बात नहीं है, बस ठीक है..' उन्होंने मुझे चिढ़ाते हुए कहा कि मुझे इतना भी सरल नहीं बनना चाहिए। फिर उन्होंने कहा कि लड़की एक तो सुन्दर थी फिर पढ़ी-लिखी और अमीर परिवार की भी। उनका कहना था कि मैंने कोई बड़ी लाटरी जीत थी। वह फोटो को बहुत गौर से देख रही थीं। एक फोटो पर वह बार-बार चली जाती थीं। ये फोटो अमृतसर की थी। इसमें मैं एक ओर था और दोनों बहनें मेरे दायीं ओर। पृष्ठभूमि में पवित्र स्वर्ण मंदिर था। ऑन्टी ने यह फोटो खींची थी। हम तीनों इसमें बहुत श्रद्धावान दिख रहे थे। पिंकी बहुत आकर्षित दिख रही थी। मैंने उनसे पूछा, ' इसमें सबसे अच्छा कौन लग रहा है ? इन्द्राणी दी ने तुरंत कहा, जिस पर तुम फ़िदा हो गए वही..' उन्होंने कहा इस फोटो से ऐसा लगता है कि अमृतसर जाकर ही मेरा मन इस लड़की पर आ गया होगा। मैं मुस्कुरा दिया, ' हाँ..आप ठीक कह रही हैं.. ' अब इन्द्राणी दी हंसने लगी, ' देखा हमारे तज़ुर्बे .. तुम्हारे चेहरे पर साफ दिख रहा है कि तुम क्या सोच रहे हो..और ये दीदी-दीदी क्या है ? मैं तुमसे बहुत बड़ी नहीं हूँ..हम तो दोस्त की तरह हैं..वो वाली बात याद नहीं है ? अब से मुझे नाम से ही बुलाओगे और मेरे संग एक दोस्त की तरह पेश आओगे.. ' मैंने कहा, ' ठीक है.. दोस्त इन्द्राणी या इसे भी और भी छोटा कर दूँ.. इंदु..' वह जोर से हंसने लगी। माँ की आवाज़ आई। शायद मेरे लिए किसी का फोन आया था।
हम दोनों नीचे आ गए। मैंने फोन उठाया। रोबी दा का फोन था। वह जानना चाहते थे कि मेरे क्या हालचाल थे। मैंने कहा कि सब ठीक था। उन्होंने ऑफिस की एक दो बात कही कि कैसे ऊपर के अधिकारी हमारे कार्यालय को बर्बाद करने पर तुले हुए थे और कैसे वे लोग कर्मचारियों के हित को नकार रहे थे। मैं चुपचाप सुनता जा रहा था। उन्होंने बताया कि इन्हीं सभी उलझनों के कारण वह उन दिनों बहुत व्यस्त चल रहे थे। उनकी पत्नी बीमार थी फिर भी वह रविवार के दिन वह ऑफिस गए हुए थे। उन्हें इस सप्ताह नगर के अन्य संघों के साथ बैठक आयोजित करनी थी। उन्होंने कहा कि अब उनका स्वास्थ्य बहुत ज्यादा भागदौड़ करने में आड़े आ रहा था। अब किसी युवा को उनका हाथ बाँटना चाहिए था। अचानक उन्होंने फिर से मेरा हालचाल पूछा, ' घर में सब ठीक है न ? मुझे लग रहा है, कुछ ठीक नहीं है और तुम कुछ संकोच कर रहे हो ..' मैंने कहा, ' नहीं दादा, सब ठीक है..' न जाने क्यों उन्हें मुझ पर विश्वास नहीं हो रहा था। मैं तो इस समय उनसे अधिक बात करने के मिज़ाज में न था। मैंने उन्हें आश्वस्त करने का प्रयास किया कि सब ठीक था और उनसे जब मिलूंगा तो सब बताऊंगा। इस पर तो वह और पक्का हो गए कि कुछ तो था जिसे मैं छिपा रहा था। उन्होंने अपनी ओर से कहा कि चिन्ता की कोई बात नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे मेरे घर आकर मेरी माँ से मिलेंगे और सब ठीक करा देंगे। मैं अपने में ही मुस्कुराए जा रहा था। सब कुछ तो माँ के बाबा लोकनाथ की कृपा से सरलता से पहले से ही ठीक हो चुका था। अब ये क्या ठीक करेंगे। ( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यही पर .. )
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