Chander Dhingra's Blog
Wednesday, October 7, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 39 & 40
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )( ३९ - ४० ) रात के खाने पर फिर से वही बातें शुरू हो गयी थीं। मुख्य बात यह थी कि कलकत्ता से कौन-कौन दिल्ली जायेगा ? अब जो नाम आये वे सब मिलाकर पंद्रह हो रहे थे। इन्द्राणी अपनी एक सहेली को भी साथ ले जाना चाहती थी। बाबा ने तो साथ ही साथ हाँ कर दी थी परन्तु माँ ने बात को बनाते हुए, ' बाद में देखेंगे ' कहकर लगभग इसे निरस्त ही कर दिया था। एक बात यह भी आड़े आ रही थी कि अमीर लोगों से सम्बन्ध बन रहा था, इसी हिसाब से, वर पक्ष वाले लोगों को तय किया जाना चाहिए था। ये बात बाबा के एक पुराने मित्र को साथ ले जाने के साथ उठी थी। मैं उनको जानता था और काका कहकर बुलाता था। वह बाबा के स्कूल के दिनों के साथी थे। बाबा को वह और उनका परिवार बहुत प्रिय था। वह विद्वान किंतु अपने में ही सिमटे रहने वाली प्रकृति के व्यक्ति थे। उनका बाहरी व्यक्तित्व, आजकल के प्रचलन के हिसाब से प्रभावित करने वाला न था। माँ उन्हें अधिक पसंद नहीं करती थी। मैं भी प्रारम्भ में माँ की ही तरह सोचा करता था परन्तु जब से मैंने उनसे बातचीत करना शुरू किया था, मैं उनसे धीरे-धीरे प्रभावित होता चला गया था। बांग्ला साहित्य पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी। वह कविता भी लिखा करते थे। यदाकदा उनकी कविता प्रकाशित भी होती थी। उनका लेखन प्रभावशाली था परन्तु उनका नाम न हो पाया था। उनका नाम हो जाता तो शायद उनके प्रति माँ का नज़रिया भी बदल जाता। मैंने बाबा का साथ देते हुए कहा, ' बाबा चाहते हैं तो उन्हें ले ही जाना चाहिए..' माँ ने कुछ न कहा था, बस मेरी बात को अनसुनी कर कमरे से निकल गयी थी। किसी बात को अस्वीकार करने का यह माँ का अपना तरीका था। मेरे बाबा भी चुपचाप अपनी डेस्क पर रखी पुस्तक के पन्ने पलटने लग गए थे। अपनी नाराज़गी और निराशा दर्शाने का यह उनका भी यही तरीका था। इंद्राणी ने एक सुझाव रखा कि सभी संभावित नामों का रेल रिजर्वेशन करवा लेना चाहिए और बाद में आवश्यकता अनुसार रद्द करना सरल होगा। इस प्रकार बीस लोगों के नाम लिस्ट में रखे गए थे।
अगली सुबह ऑफिस जाने का मन न हुआ था। मैंने माँ को कहा कि मेरा लंच पैक न करें। माँ हैरान हो गयी थी। वह हमेशा मुझे घर का खाना ही खाने की सलाह दिया करती थी। वह कहने लगी कि घर से ही ले जाओ। मैंने जब बताया कि आज छुट्टी ले रहा था तो वह मुस्कुराने लगी। माँ जब नीचे उत्तरी तो मैंने तुरंत उनके कमरे में जाकर फोन घुमाया। अभी सुबह के साढ़े सात ही बजे थे परन्तु मैं उतावला हो रहा था क्यों कि रात को दोबारा फोन न कर पाया था। साथ ही मुझे पता था कि दोनों बहनें इस समय तक जॉगिंग करके घर आ चुकी होंगी। पिंकी ने ही फोन उठाया। वह नाराज़गी दिखाने लगी कि वह रात को फोन का इंतज़ार करती रही थी। मैंने उसे रात की सारी घटना बताई। उसने कहा,' मम्मी को तुम्हारे घर पर बहुत अच्छा लगा, तुम्हारी मम्मी भी बहुत स्वीट लगी.. और पापा तो लगता है वहां पर लंच खाकर मस्त हो गए.. ऐसा क्या खिलाया था ? मैंने कहा, ' यहाँ का एक मशहूर होटल है जिसे पंजाबी ढाबा कहते हैं, वहीं से खाना आया था..' उसने तुरंत कहा कि उसे भी वहां का खाना खिलाना पड़ेगा। मैंने कहा, ' जरूर.. तुम आओ.. और क्या कहा मम्मी-पापा ने ? उसने कहा, ' कुछ खास नहीं, यही कि सब ठीक था और तुम बहुत शरमा रहे थे..' इस बात पर मैंने कुछ उत्तर नहीं दिया।
मैंने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी तो घर पर मानों सभी छुट्टी पर थे। बिशाखा आराम से थी, माँ अपनी आरती-पूजा धीरे-धीरे कर रही थी। मैंने मन में सोचा, ' देखो, मेरे छुट्टी लेने से ईश्वर को भी आराम मिल गया है, उनका भोग आदि भी ठीक से लगाया जा रहा है..' अपने बिस्तर पर सुस्ताया सा मैं, कल्पना जगत में भ्रमण कर रहा था और अपने आसपास पिंकी की चहल कदमी महसूस कर रहा था। कल शाम से ही मुझे ऐसा लग रहा था कि वह हमारे घर आ चुकी थी। सोचा कुछ समय बाद उसके ऑफिस में फोन करूँगा और उसे अपने मन की स्थिति बताऊंगा। दो घंटे यूँ ही कट गए। बाहर कुछ समय के लिए आस-पड़ोस का चक्कर लगा आया था। एक सिगरेट भी फूंकी थी। घर आ सीधे पिंकी के ऑफिस का नंबर घुमाया। पता चला वह आज ऑफिस आई ही न थी। अब घर का नंबर घुमाया। पिंकी ही थी दूसरी ओर। इससे पहले कि मैं कुछ कहता, वह ही बोली,' आज ऑफिस क्यों नहीं गए ? मैंने कहा, ' तुम्हें कैसे पता चला ? ' अरे, अभी-अभी तुम्हारे ऑफिस के नंबर पर कॉल किया था ..' उसने कहा। मैं हंसने लगा। उसने हंसने की वजह पूछी। मैंने बताया कि मैंने भी उसके ऑफिस के नंबर पर फोन किया था। अब वह भी हंसने लगी। दोनों ओर एक सा ही हाल था। दोनों काफी देर तक बतियाते रहे थे। माँ ने आकर लंच के लिए बुलाया। फोन पर मुझे देखा तो कहा, ' इतना भी ज्यादा फोन नहीं किया करते.. इतनी आतुरता दिखाओगे तो बाद में संभाल न पाओगे..' मैं माँ की बात में छिपे संकेत को समझने का प्रयास करने लगा।
लंच हो जाने के बाद, मैं घर के भीतर ही इधर से उधर होता रहा था। कभी सोफे पर, कभी बिस्तर पर, कभी बालकनी पर, कभी रसोई घर में। एक असंतुलित सी स्थिति हो रही थी। मैं अपने घर में तो अवश्य था परन्तु मेरा मन एक अस्थाई से बंजारापन से गुजर रहा था। मैं समझ न पा रहा था कि मैं प्रसन्न था या अधीर हो रहा था ? मैंने देखा कि माँ नीचे के कमरे में ही विश्राम कर रही थी। उसकी आँखे नींद से बोझिल हुई जा रही थी। मुझे मालूम था, वह अब नींद से लगभग एक घंटे बाद ही उठेगी और बिशाखा को चाय हेतु आवाज़ लगाएगी। मैं ऊपर गया और फोन उठाया। फिर न जाने क्या सोच रख दिया। माँ के बिस्तर पर, यूँ ही लेटा रहा। एक बार पुनः फोन की ओर हाथ बढ़ा और रुक गया। शायद माँ की कही बात का दबाव बन रहा था। अचानक फोन की घंटी बजी। मैं फोन के लिए लपका, लगा जिसे मैं फोन करना चाहता था, उस ही का फोन होगा। मैंने हेलो कहा तो उधर से रोबी दा की आवाज़ सुनाई दी। मैंने खिन्न होते हुए कहा, ' हाँ, रोबी दा.. आज मन नहीं हुआ ऑफिस आने का..' उन्होंने चिंता का भाव दिखाया कि मेरे न आने से वह चिंतित हो गए थे। उन्होंने कहा, ' घर में सब ठीक है न ? इससे पहले कि मैं उन्हें कुछ बताता उन्होंने मुझे आश्वस्त करना आरम्भ कर दिया कि वह मेरी माँ का समझायेंगे और मेरी समस्या को सुलझा देंगे। मैं कहता रह गया कि सब ठीक था। उन्होंने यह कह कर फोन रख दिया कि वह आज शाम को मेरे घर आएंगे। मैंने सोचा, ' लो अब ये घर आकर न जाने क्या-क्या बात करें..'
शाम को वह समय से आ ही गए। माँ से बात करते हुए उन्होंने इस तथ्य पर जोर दिया कि बच्चों को अपने माता-पिता की सलाह को अवश्य मानना चाहिए। उनका कहना था कि माता-पिता बच्चों का भला ही चाहते हैं। माँ, उनकी हाँ में हाँ मिलाती रही परन्तु कहा कि आजकल के बच्चे खुद में बहुत समझदार हैं और उनकी बात को ना कारा नहीं जा सकता। फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने मेरी पसंद की पंजाबी लड़की को अपनी बहु बनाने की स्वीकृति दे दी थी। इस पर रोबी दा मेरी ओर देखते हुए कहा, ' इनकी ख़ुशी ही हमारी ख़ुशी है..' रोबी दा मामले के ऐसे सरल से अंत के लिए तैयार न थे। वह संभवत: एक प्रभावशाली मध्यस्थ की भूमिका के लिए तैयार होकर आये थे। उन्हें आशा थी कि वह, मेरे और माँ के बीच होने वाले कुछ गरम तर्क-वितर्क में एक निर्णायक की भूमिका निभाएंगे। उनके चेहरे पर निराशा के भाव थे। उन्हें कर्मचारी यूनियन के नेता होने के कारण समस्या का सरलता से समाप्त होना या किया जाना, आघात सा दे गया। वह जाने को उठे और मेरी ओर कुछ ऐसे अंदाज़ में देखा मानों कह रहे हों, ' मुझे अनभिज्ञ रख, तुमने ठीक नहीं किया..'
रोबी दा माँ को प्रणाम कर घर से निकल गए। एक तरह की हताशा उनके चेहरे पर दिखाई दे रही थी। मैं उन्हें नीचे तक छोड़ने आया था। उन्होंने कुछ अधिक बात नहीं की थी। हँसते हुए मुझसे पूछा, ' कल तो ऑफिस आ रहे हो न ? मैंने हाँ कहा तो उन्होंने कहा, 'ठीक है, कल मिलना..' उनकी कार निकल गयी। मैं सोचने लगा कि अब इनकी बे वजह की नाराज़गी को दूर करना होगा। मैं कर ही क्या सकता था। सब कुछ ऐसी सरलता से होता चला जायेगा, यह तो मैंने कभी सोचा ही न था। घर में शायद विरोध हो, इसलिए रोबी दा और इन्द्राणी को बताकर रख दिया था। मुझे ऐसा लगा था कि आवश्यकता होने पर ये दोनों मेरी तरफदारी करेंगे और मेरी माँ को राजी करवा लेंगे।
रात को एक बार फिर से चंडीगढ़ में फोन किया। इस बार लवली ने उठाया और वह खिलखिलाते हुए मज़ाक करने लगी। वह जीजाजी - जीजाजी कर रही थी। उसने मज़ाक में कहा कि वह तो सोचती ही रह गयी और बिग सिस्टर हाथ मार गयी। लवली एक साली की तरह पेश आ रही थी। उसने फोन छोड़ने से मना कर दिया था। मैं बार-बार कहता रहा, ' पिंकी को फोन दो..' और वह हँसते हुए इधर-उधर की बातें किये जा रही थी। अंत में मैंने कहा, ' मैं फोन रख रहा हूँ..' अब उसने पिंकी को बुलाया और उसे फोन दिया। मैंने उसे दिन भर की बातें बताई। रोबी दा के बारे में सुन वह हंसने लगी। उसने कहा कि ऐसे लोग सब जगह होते हैं। उसने यह भी कहा कि वह उन्हें रोबी दा नहीं कहेगी और मिस्टर रवि कहेगी। रोबी शब्द उसे धोबी जैसा लग रहा था। मैंने कहा कि यदि उसे हर रोबी शब्द में धोबी शब्द दिखेगा तो यह अच्छी बात न होगी। बातों बातों में मैंने उसे कहा कि मैं एक सीधा-सादा विवाह चाहता था, आडम्बर भरा नहीं। उसने कहा कि चाहती तो वह भी थी कि दिखावों से दूर रहा जाये परन्तु उसके मामा ने बहुत से सपने सजा रखे थे। उनके लिए यह उनकी अपनी ही बेटी का विवाह था। इसीलिए इसे चंडीगढ़ की जगह दिल्ली में आयोजित किया जा रहा था जहाँ सब कुछ उनकी इच्छानुसार ही होने वाला था। उसने ये भी बताया कि दिन में गुरूद्वारे में विवाह की रस्म के बाद, शाम को एक पांच सितारा होटल में पार्टी का कार्यक्रम निश्चित किया गया था। मैं ना-ना कहता रहा परन्तु मेरे भीतर कहीं उत्साह भी था। मैंने उसे बताया कि शादी के बाद कलकत्ता आने पर, हमारी ओर से भी एक प्रीतिभोज का कार्यक्रम रखा जायेगा। उसने पूछा, ' रिसेप्शन ? मैंने कहा, ' हाँ वही समझो.. हम बंगाली उसे बहुभात कहते हैं..यह लड़के वालों का आयोजन होता है.. यह कार्यक्रम भी अच्छे स्तर पर किया जायेगा..' मैंने उसे बताया कि इस आयोजन में उसे एक परंपरागत बंगाली दुल्हन के रूप में उपस्थित होना होगा और मेरी माँ ने अपनी पुत्रवधू के लिए, इस अवसर हेतु, एक खास साड़ी बहुत पहले से खरीद ली थी। पिंकी की ओर से भी ख़रीददारी शुरू हो चुकी थी। वह मेरे लिए एक सूट खरीदने वाली थी। मैंने फिर एक बार न-न कहा परन्तु उसके उत्साह से मैं प्रसन्न तो हो ही रहा था। मैंने भी अपनी ओर से कहा कि मैं भी उसके लिए एक पंजाबी स्टाइल का सूट खरीदने वाला था। वैसे ये विचार मेरे मन में ताज़ा ताज़ा ही आया था परन्तु बात को रंग देने के लिए मैंने एक कहानी बना दी और कहा कि चंडीगढ़ में किसी को पहने देखा था। तुम्हें देखा तो लगा था कि तुम पर बहुत फबेगा। वो हंसने लगी। उसने कहा कि गहरे रंग का न खरीदना क्यों कि उसे गहरे रंग पसंद नहीं थे। यूँ ही बातें होती रही।
अगले दिन ऑफिस में पहुँचते ही मुझे रोबी दा का स्मरण हो आया था। मुझे मालूम था कि कुछ ही समय में वह मुझे बुला भेजेंगे या खुद ही चले आएंगे। वही हुआ, वह मुस्कुराते हुए चले आये थे। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' और सुनाओ.. हमारे पंजाबी सरदार जी के जमाई बाबू..' मैं खड़ा हो गया था। कुर्सी खींच वह बैठे और उन्होंने ख़ुशी दिखाई कि मेरे माता-पिता ने इस इंटर कास्ट विवाह में रूकावट नहीं की थी। उन्होंने कहा कि ऐसा ही होना ही चाहिए था। फिर उन्होंने आश्वस्त होते हुए कहा कि ये वैवाहिक रिश्ता पूरी तरह से सफल रहेगा क्यों कि हमारे परिवार के गैर-बंगालियों से अच्छे सम्बन्ध रहे थे। माँ ने घर में आयी मिठाई में से एक डिब्बा मुझे ऑफिस के मित्रों के लिए दिया था। उसे खोल रोबी दा के सामने किया। उन्होंने कहा कि ये सब क्या था ? मैंने उन्हें सारा वृतांत बताया। वह चौंक गए, ' अच्छा तो सगाई कर गए हैं वे पंजाबी लोग ? मैंने उन्हें बताया कि सगाई जैसी कोई बात न थी। ये उनका सम्बन्ध बनाने का तरीका था। वह बहुत विचित्र सी स्थिति में थे। हैरान थे परन्तु स्वाभाविक दिखना चाहते थे। उनके मुख पर स्पष्ट दिख रहा था कि कह रहे हों, ' इतना सब कुछ हो गया और मुझे पता ही न चला..' अपने को स्थिर करते हुए उन्होंने कहा, ' तुमने एक खुश खबर दी है तो एक खुश खबर मेरी ओर से तुम्हें भी है.. हमारे संगठन की ओर से राज्य स्तर पर गठित परिषद में मैंने तुम्हारा नाम रखा है..ये बहुत दायित्व पूर्ण कार्य है और मैं चाहता हूँ कि कोई युवा इसमें मेरे साथ रहे.. और धीरे-धीरे पूरी ज़िम्मेदारी संभाल ले..तुम पढ़े-लिखे हो और बहुत अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि से हो.. देखना तुम बहुत आगे जाओगे..' मैं असमंजस में था। मैंने कहा कि मुझे क्षमा किया जाये। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता था। युवा शक्ति को संगठन हेतु आगे आना ही होगा। मैंने कहा कि मैं मानसिक रूप से भी इस तरह के कार्य के लिए तैयार नहीं था। परन्तु वह तो जैसे पक्के होकर आये थे। उन्होंने कहा, ' अरे, तुम चिंता मत करो, अपनी शादी-वादी की तैयारी करो.. अभी तो मैं हूँ.. सब कुछ मैं ही करूँगा.. तुम केवल साथ रहना और कार्य-पद्धति को देखना.. ' उन्होंने अपनी फाइल से टाइप किया हुआ एक कागज निकाल, मुझसे हस्ताक्षर कर देने को कहा। मैंने पूछा कि यह क्या था। वे मुस्कुराने लगे, ' ये तुम्हारी ओर से एक छोटा सा सर्टिफ़िकेट है कि तुम इस कार्य के लिए राजी हो.. एक औपचारिकता है..' क्या लिखा था, मैं पढ़ भी न पाया था और उन्होंने मेरे हस्ताक्षर ले लिए थे। उन्होंने कुर्सी से उठते हुए व्यंग्यात्मक भाव में कहा, ' अच्छा चलता हूँ, मुझे बहुत काम हैं.. तुमने चुपचाप सगाई तो कर ली है, अब बिना बताये शादी मत कर लेना..' ( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर )
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