Chander Dhingra's Blog

Wednesday, October 14, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-41

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )( ४१ )         मैंने सोचा अब ये किस झमेले में मुझे फंसा रहे हैं, रोबी दा ? मैं तो एक ही जगह फंसना चाहता था और वह था विवाह। मैं सब कुछ भूल अपने ऑफिस के कार्य से जूझना चाहता था परन्तु मेरा मन स्थिर न हो पा रहा था। टेलीफ़ोन की ओर दृष्टि जाती, हाथ बढ़ता और रुक जाता था। ऐसा कुछ समय तक होता रहा था। अंततः मैंने चंडीगढ़ का नंबर घूमा ही दिया था। पिंकी भी अपने ऑफिस में मेरी ही तरह बे चैन सी थी। हालाँकि उसने कहा कि वह सामान्य थी। मैंने उससे पूछा कि शादी के बाद कहाँ जायेंगे ? वह हंसने लगी, ' अरे ! तुम्हें तो हनीमून कहने में भी शर्म आ रही है ? मैंने कहा कि हाँ वही। वह हँसे जा रही थी। उसने कहा,' कहीं न कहीं चले जायेंगे, क्या फर्क पड़ता है, वैसे मामा जी कहीं विदेश जाने की बात कर रहे थे, कुआलालंपुर या बैंकॉक..' मैं चौंका, ' अरे नहीं,यहीं कहीं भारत में ही जायेंगे, बहुत अच्छी-अच्छी जगह हैं.. दार्जिलिंग ? वह जोर से हंसी, 'अपने बंगाल से बाहर नहीं निकलोगे क्या ? दार्जिलिंग तो कभी भी जा सकते हैं.. गोवा कैसा रहेगा ?  मैंने कहा कि गोवा ठीक था। हम दोनों इसी तरह की बातें करते जा रहे थे। पिंकी ने कहा कि ऑफिस का फोन था इसलिए हमें गपशप के लिए इस पर चिपके नहीं रहना चाहिए था।  मैंने कहा, ' छोड़ो इस बात को, फोन मिला है तो लाभ उठाना चाहिए.. वैसे भी हमें सैलरी हमारे काम के हिसाब से कहाँ मिलती है.. '  फोन कॉल समाप्त करने से पहले मैंने उससे वायदा लिया कि प्रतिदिन एक बार मुझे फोन अवश्य किया करेगी। मैं काम में जुट गया। मैं खुश था और अनायास एक प्रसिद्द फ़िल्मी गाने को गुनगुनाए जा रहा था। कहा जाता है कि यदि गृहिणी रसोई में और अधिकारी अपने कार्यालय में गाना गाते हुए काम करते दिखें तो समझ लेना चाहिए कि वे संतुष्ट हैं। मैं काम में लगा रहा। संध्या होते और ऑफिस के बंद होने से पहले रोबी दा का सन्देश आया कि आज मुझे उनके साथ कहीं जाना होगा। उन्होंने कहा कि मुझे अपनी माँ को सूचित कर देना चाहिए कि आज घर लौटने में कुछ विलम्ब हो सकता था। मैंने  माथा पकड़ लिया किंतु बाद में सोचा कि रोबी दा भी तो संगठन के लिए अपना इतना समय देते थे तो हमें भी उनका साथ देना चाहिए। मैंने माँ को फोन कर बता दिया था। माँ कुछ नाराज़ हुई परन्तु मान गयी कि रोबी कुछ कहे तो मानना ही होगा, वह भी तो मेरे नाना की हर बात मानते रहे थे। शाम को रोबी दा के साथ संगठन की एक बैठक में जाना पड़ा। यह नगर के संगठनों की समन्वय समिति की बैठक थी। करीब बीस लोग होंगे। मैं चुपचाप एक ओर बैठा था। अधिकांश बुजुर्ग लोग थे और बातचीत कुछ ही लोगों के मध्य ही हो रही थी। मुझे जो समझ आया वो ये था कि केंद्र की सरकार कुछ ऐसी नीतियों पर कार्य कर रही थी जहाँ समस्त व्यवस्था नष्ट हो जाने वाली थी और इसका विरोध किया जाना आवश्यक हो चुका था। मैंने देखा कि रोबी दा की बात को महत्व दिया जा रहा था। रोबी दा ने युवा शक्ति को प्रोत्साहित किये जाने की बात की और फिर मेरी ओर इशारा कर मेरा परिचय दिया था। मुझे अचानक खड़ा हो जाना पड़ा और मुस्कुराते हुए, सभी को नमस्कार करना पड़ा था। यह बैठक लगभग दो घंटे तक चली थी। इस बीच प्लास्टिक के कप में चाय और बिस्कुट बांटे गए थे। थकावट के  कारण ये  चाय-बिस्कुट एक तरह का आराम दे गए थे। बाहर आने पर रोबी दा ने बताया कि वरिष्ठ लोगों पर मेरा प्रथम परिचय प्रभावशाली रहा था। मैं क्या समझता ? बस उनकी बात पर मुस्कुरा दिया था। ये वो दिन थे जब वामपंथी विचार धारा की लहर अपने उफान पर थी। पश्चिम बंगाल में तो विशेष रूप से इसका प्रभाव था। इस विचार धारा के राजनैतिक दल संयुक्त हो एक मोर्चा बना, राज्य की बागडोर संभाले हुए थे। शिक्षण संस्थानों, कर्मचारी और व्यापारिक संगठनों में इन्हीं का वर्चस्व था। बसों, ट्रकों और अन्य वाहनों, यहाँ तक कि रिक्शाओं पर भी लाल झंडे लहराते दिखते थे। मौसम की मार झेलते-झेलते अधिकांश झंडे चीथड़ों में बदल जाते थे। उन्हें केवल किसी बड़े आयोजन के अवसर पर ही बदला जाता था। इस राजनैतिक परिवर्तन से मैं भी, बहुत से बंगाली युवाओं की तरह प्रभावित था और मुझे लगता था कि राज्य में एक नया युग आने को था और सब कुछ बदल जाने वाला था। कॉलेज में, मैं वामपंथी विद्यार्थी संघ का सदस्य रह चुका था। आज की इस बैठक में मैंने महसूस किया था कि रोबी दा सही कह रहे थे कि परिवर्तन की इस लहर को सशक्त करने हेतु युवा लोगों को आगे आना चाहिए। घर पहुँचते पहुँचते काफी विलम्ब हो गया था। माँ-बाबा दोनों प्रतीक्षा में थे। मुझे देखते ही वे दोनों बोल उठे, ' चलो हाथ धो लो और खाना खा लो.. हम लोग भी इंतज़ार में भूखे बैठे हैं..'  मैं उनके साथ बैठ गया था। भूख तो मुझे भी लगी ही थी। बैठते ही मैंने पूछा, ' किसी का फोन तो नहीं आया था ?  माँ मुस्कुरा दी और कहा कि किसी का फोन नहीं आया था। खाना खाते हुए कुछ अधिक बात नहीं हुई थी। बाबा ने हलके से सलाह देते हुए कहा, ' संगठन आदि के साथ जुड़ना ठीक है परन्तु अपना लक्ष्य सामने रख, आगे बढ़ना चाहिए..कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिन पर चलने से, वापिस लौटना असंभव सा हो जाता है..' मैं चुपचाप खाता  रहा। मुझे पता था कि माँ-बाबा खाना खा, लगभग दो घंटे तक नीचे ही रहते थे। यही समय था जब मैं ऊपर उनके कमरे में जा पिंकी को फोन कर सकता था। मैं ऊपर चला आया और चंडीगढ़ का नंबर घुमाया। आंटी ने फ़ोन उठाया और बेटा-बेटा कह बात करने लगी। वह मेरी माँ के बारे में बार-बार पूछ रही थी। कुछ समय बाद पिंकी ने फोन संभाला। उसने कहा कि वह शाम से ही प्रतीक्षा में थी। मैंने उसे दिन भर का वृतांत बताया। वह चुपचाप सुनती रही और अंत में कहा कि मुझे इन सब राजनैतिक और यूनियनबाजी की बातों से अलग रहना चाहिए था। फिर इधर-उधर की बातें हुई। हम दोनों ही आने वाले दिनों के प्रति उत्सुक थे और न जाने क्या-क्या सपने बुन रहे थे।  अगले दिन फिर बात होगी कह, फोन रखा ही था कि वह फिर बज उठा। यह इन्द्राणी का फोन था। उन्होंने बात कुछ इस तरह से आरम्भ की, ' ये क्या अभी तो सिर्फ मिनी सगाई ही हुई है और हमें भूल भी गए ? मैंने कहा, यह मिनी सगाई क्या होती है ?  ' अरे वही तुम्हारा पंजाबी रोका न ठाका ..' वह हंसने लगी। उन्होंने फिर से पिंकी की फोटो, उसकी सुंदरता और आकर्षित कर देने वाली भाव-भंगिमा की बात की थी और कहा कि वह जल्दी-से जल्दी पिंकी से मिलना चाहती थी। उन्होंने कुछ दिन गिने और कहा कि अब भी बत्तीस दिन बचे थे। अचानक मुझे भी लगा कि इतने दिन कैसे कटेंगे ?( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर .. )

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