Chander Dhingra's Blog
Wednesday, October 21, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -42
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )
( ४२ ) हर दिन पिंकी से बात होती थी, हर दिन बाकि बचे दिन गिने जाते थे। इस बीच रोबी दा थे, जो हर दिन कुछ नया बता जाते थे और मुझे कुछ कागज़ात पढ़ने को दे जाते थे। वह मुझे तीन-चार बैठकों में भी ले गए थे। एक बैठक तो संगठन के नाम पर राजनैतिक दल की बैठक थी। मेरे नाना के दो-तीन परिचित वहां मिले थे। उन्होंने मेरे प्रति स्नेह दिखाया था। उन्होंने भी कहीं न कहीं वही बातें कही थी जो रोबी दा कहते रहते थे कि मेरे जैसे युवकों को आगे आना चाहिए और संगठन को सुदृढ़ करना चाहिए। मुझे अच्छा लगता कि नाना का सम्मान किया जाता था हालाँकि कहीं न कहीं मुझे ऐसा भी लगता था कि यह आदर का भाव मात्र औपचारिकता थी क्योंकि नाना को गए अभी अधिक समय न हुआ था और वक्त के साथ सब धूमिल होता चला जायेगा। मैंने जब पिंकी से इन बैठकों में अपने उपस्थित होने का जिक्र किया तो वह तुरंत तो कुछ न बोली पर बाद में उसने एक बात कही थी कि सब काम सोच-समझ के साथ करना ही उचित होता है।
इन दिनों इन्द्राणी भी फोन करती रहती थी और घर भी आती रहती थी। उसने बताया कि कैसे वह मेरी शादी की तैयारी में जुटी हुई थी। उसने शादी वाले दिन के लिए विशेष साड़ी खरीद ली थी परन्तु उस शाम को होने वाली पार्टी के लिए पसंद की साड़ी नहीं मिल रही थी। एक दिन उसने मेरे साथ हिंदी पिक्चर देखने की योजना बनायी। उसने बताया कि इस फिल्म का रिव्यू टेलीग्राफ में पढ़ा था। वह प्रभावित थी। मैंने हां कर दी और कहा कि मैं ऑफिस से पहुँच जाऊंगा। उसने कहा कि उस शाम का खर्चा उसी के नाम था। मैं उसकी इस बात पर मुस्कुरा दिया था। मैं जानता था कि इस तरह के ख़र्चों में वह मितव्ययी न थी और पहले भी कई बार मेरे लिए खर्च कर चुकी थी। वास्तव में मुझे अपराध बोध सा होता था कि मुझे अपनी पॉकेट हल्की करनी चाहिए थी परन्तु वह हर बार मुझे रोक देती थी और न जाने क्यों मैं रुक भी जाता था। इधर माँ और बाबा भी शादी की तैयारियों में जुटे हुए थे। बाबा ने राजधानी ट्रैन से जाने-आने की सीट्स बुक कर दी थीं। वह सुबह-शाम माँ को याद दिला जाते थे कि जो-जो साथ जा रहे थे उन्हें टिकट का पैसा दे देना चाहिए था और जो नहीं जा पा रहे थे उन्हें समय से बता देना चाहिए ताकि टिकट रद्द करवा सकें और कोई नुकसान न हो। उनकी इन बातों से माँ चिढ़ जाती थी और कहती, ' सबसे पैसे नहीं लिए जा सकते.. हम लोग साथ ले जा रहे हैं तो हमें ही खर्चा वहन करना होगा..' बाबा बुड़बुड़ाते हुए, दूसरी ओर निकल जाते थे। मुझे भी लगता कि इस तरह से पैसे लेना उचित नहीं था परन्तु मैंने माँ को कहा कि कोई रिश्तेदार यदि खुद से दे तो ले लेना चाहिए। मैंने यह भी कहा कि यदि इन्द्राणी दें, तो भी मत लेना। माँ ने मेरी बात में सहमति दिखाई और कहा कि वह तो अपने ही घर की सदस्य जैसी थी।
एक दिन बाद इन्द्राणी दी का फोन आया कि फिल्म की टिकट ले ली गयी थी और उसी शाम का शो था। मैंने कहा कि ठीक था मैं पहुँच जाऊँगा, सीधे ऑफिस से। मैंने घर में फोन कर माँ को बताया और फिर पिंकी को भी। अभी फोन रखा ही था कि रोबी दा की तरफ से सूचना आयी कि आज ऑफीस के बाद एक बैठक रखी गयी थी। मैंने उन्हें अपना कार्यक्रम बताया तो उन्होंने कहा कि अच्छा ठीक है, साथ ही यह भी कहा कि अब मुझे संगठन के प्रीति अपनी ज़िम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिए और सिनेमा आदि से ऊपर उठना चाहिए। वह हल्के से ना खुश दिखे थे। मैंने उन्हें संतुष्ट करने के लिए कह दिया कि यदि पहले से बैठक की खबर मिल गयी होती तो मैं इन्द्राणी को मना कर देता। इस पर उन्होंने प्रतिक्रिया दी कि संगठन के कार्य ऐसे ही होते हैं। वे किसी पिक्चर रिलीज़ की तरह नहीं होते कि पहले से मालूम हो कि अमुक शुक्रवार को रिलीज़ होना है। मैं उनकी बात पर क्षुब्ध तो अवश्य हुआ परन्तु मुझे लगा कि वे भी तो अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा संगठन के कार्यों पर खपा रहे थे।
शाम को सिनेमा हॉल पैदल ही चलकर पहुँच गया था। मेरे ऑफिस से अधिक दूर न था। मैं इन्द्राणी की प्रतीक्षा करने लगा था। उसको न आता देख, सामने पान की दुकान से एक सिगरेट खरीदी और सुलगाई। मैं सामने की ओर देख रहा था कि पीछे से इन्द्राणी ने आकर, चौंका दिया था। मैंने सिगरेट छुपाने की कोशिश की तो वह हंसने लगी, ' अरे, शरमाओ मत.. जवान हो.. अच्छा खासा जॉब करते हो..सिगरेट तो बनती है..वैसे भी सिगरेट के साथ लड़कों की पर्सनल्टी बढ़ जाती है ..' मैंने कहा, ' ऐसी बात नहीं है दीदी.. आप बड़ी हैं, इसीलिए ..' उन्होंने इतराते हुए अंदाज़ में कहा, ' ये बड़ा-छोटा छोड़ो.. हम उम्र हैं.. और हाँ, मैंने पहले भी कहा था ये मुझे दीदी-दीदी कहना बंद करो और अब अंदर चलो.. फिल्म शुरू हो चुकी होगी..' वह आगे बढ़ गयी थी। अब अचानक मैंने ख्याल किया कि वह बहुत आकर्षित लग रही थीं। भीड़ में लोगों की निगाहें उन पर थी। वह साँवली सी, अच्छी कदकाठी और सुन्दर नाक-नक्शे वाली लड़की थी। पिक्चर हॉल में मैंने उन्हें यह बात बताई तो वह खुश हो गयी थी, ' अच्छा है यदि मैं लोगों को आकर्षित करती हूँ..यह तो एक तरह का कॉम्पलिमेंट है, किसी भी लड़की के लिए..' पूरी फिल्म में वह बहुत आनंद लेती हुई लगी। फिल्म की कहानी नायक के इर्दगिर्द घूमती है जिसे दो बहनें प्यार करती हैं परन्तु वह अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि और उसके पिता की हत्या के मानसिक तनाव के कारण बदले की भावना से ग्रस्त होते हुए, उन लड़कयों में से एक की हत्या कर देता है। वह अपने इस कार्य को उचित मानता है क्योंकि लड़की के पिता ने वर्षो पूर्व उसके परिवार के साथ अन्याय किया था और उसके पिता की हत्या कर, उनका सब कुछ हड़प लिया था। इन्द्राणी को फिल्म अच्छी लगी थी। उसे फिल्म के नायक की भूमिका प्रभावशाली लगी थी। साथ ही वह दोनों नायिकाओं की भी प्रशंसा कर रही थी जो इस फिल्म से पहली बार हिंदी फिल्म जगत में प्रवेश कर रही थीं। वो कह रही थी कि उन्हें बहुत आनंद आया था । फिल्म समाप्त होने पर बाहर आये तो इन्द्राणी ने खुद को स्थिर करने का प्रयास किया। एक अद्भुत सी चमक उसके मुख पर बिखरी जा रही थी जो उनके मन में उठ रही चंचलता को साफ प्रदर्शित कर जाती थी। रात का खाना पार्क स्ट्रीट के एक मशहूर चाइनीस रेस्टोरेंट में किया था। वह बहुत खुश थी। उसने चुटकी लेते हुए कहा,' आज तो सच में मज़ा आ गया..पिक्चर भी अच्छी थी, डिनर भी अच्छा रहा और सबसे बड़ी बात, साथी भी अच्छा था.. कॉलेज के दिन याद आ गए '
टैक्सी ने पहले उसे घर उतारा था और बाद में मैं अपने घर पहुंचा था। उस ने उतरने से पहले कहा कि अब तो मेरी शादी हो जाएगी और मैं अपनी पत्नी के साथ व्यस्त हो जाऊँगा इसलिए हमें ये जो कुछ दिन हैं, साथ साथ बिताने चाहियें। जैसे ही मैंने मुस्कुराते हुए हाँ कहा तो उसने अगले रविवार के लिए एक नया कार्यक्रम बना दिया, ' अगले सप्ताह इसी नायक की एक नयी फिल्म आ रही है..ये एक बड़े बैनर की फिल्म है और लगता है कि इसमें नए अंदाज़ की कहानी है.. मैं टिकट बुक करा देती हूँ.. ' इन्द्राणी एक साँस में कह गयी और ओके कह, हाथ हिलाते हुए घर में घुस गयी। ( आज यहीं तक, अगले गुरुवार आगे, यहीं पर )
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