Chander Dhingra's Blog

Wednesday, October 28, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -43

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II-     चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )  ( ४३ )         दिन यूँ ही बीतते जा रहे थे। पिंकी से बात होती तो समाप्त होने को न आती थी। इधर रोबी दा मुझे संगठन के कामों में व्यस्त कराते जा रहे थे। मेरी माँ थी जो हर दिन यहाँ-वहाँ ख़रीददारी में लगी हुई थी। बाबा भी अपने ही तरीके से व्यस्त थे। वह अपनी डायरी में न जाने क्या-क्या हिसाब -किताब लिखते रहते थे। वह आते-जाते माँ को कह जाते कि बजट बढ़ता चला जा रहा था। माँ उनकी बात की अनदेखी कर देती और कहती, ' एक ही तो बेटा है, उसकी शादी में ख़र्चा न करोगे तो कब करोगे ? बाबा झुंझला जाते थे। वह खुश तो थे परन्तु न जाने क्यों शंकित और चिंतित रहते थे। बेटे के विवाह-आयोजन में माता-पिता दोनों व्यस्त थे। परंतु दोनों की चिंता में एक तरह का मूलभूत अंतर था जो स्त्री और पुरुष के आध्यात्मिक असहमति को दर्शा रहा था और मुझे पिता के सांसारिक दायित्व भाव के प्रति शिक्षित किये जा रहा था। मैं इन दोनों के मध्य में था। माँ की तरह मुझे भी लगता कि हमें पिंकी के घर वालों को प्रभावित करना चाहिए और विवाह आयोजन में किसी तरह की कमी नहीं दिखानी चाहिए। साथ ही मैं पिता की तरह सोचता कि हमें शानो-शौकत और दिखावे से बचना चाहिए और ख़र्चों को बांध कर रखना चाहिए। एक बार इन्द्राणी से इस विषय पर बात हुई थी। उसने भी माना कि मेरा विवाह धूमधाम से किया जाना चाहिए, विशेष कर इसलिए कि यह सम्बन्ध एक धनाढ्य पंजाबी परिवार से होने जा रहा था। उसने हँसते हुए यह भी कहा कि हम बंगालियों की प्रतिष्ठा दाव पर थी।  एक दिन पिंकी ने बताया कि उसके मामा ने हम दोनों के गोवा यात्रा का प्रबंध कर दिया था। कलकत्ता में होने वाले रिसेप्शन के अगले दिन हमारी फ्लाइट बुक कर दी गयी थी। वहां पांच दिन रहने का कार्यक्रम था। उसने यह भी बताया कि मामा के एक मित्र जिनका गोवा में बड़ा व्यापारिक सम्बन्ध था, सारी व्यवस्था कर रहे थे। मैंने उसे फिर से बताया, ' रिसेप्शन नहीं बहुभात कहो..'  उसने दिन गिनकर बताया कि मात्र दस दिन ही रह गए थे। मैंने कहा कि इतने दिन न जाने कैसे फुर्र से निकल गए थे परन्तु अब एक-एक दिन भारी होता जा रहा था। पिंकी अपने घर और सम्बन्धियों में चल रही हलचल का बताती थी। उसने कहा कि उसके मम्मी-पापा बहुत खुश थे कि एक पढ़ा-लिखा, सुशील लड़का उनका दामाद बनने जा रहा था। उसने लवली के बारे में भी बताया कि वह अपने जीजा से वसूल की जाने वाली चीजों की लिस्ट लंबी करती जा रही थी। मैंने दो-तीन बार लवली से भी बात की थी और मैं जान चुका था कि एक अत्यंत चंचल चरित्र मेरे जीवन में आने वाला था। एक दिन तो उसने अपना नटखटपना दिखाते हुए कहा था कि दीदी तो शादी के बाद ही कलकत्ता आ पायेगी, तब तक मेरा दिल बहलाने के लिए वह आ सकती थी। मैं सामान्यतः ऐसी बातों को सहजता से नहीं ले पाता और संकोच कर जाता हूँ परन्तु उस दिन मैंने उसे कहा चिढ़ाते हुए कहा था कि उसे इतनी दूर आने का कष्ट करने की आवश्यकता न थी क्योंकि दिल बहलाने के लिए कलकत्ता में बहुत लोग थे। वह हूँ.. हूँ.. कहकर मुझे चिढ़ाने लगी, ' दीदी को बताती हूँ.. ये दिल बहलाने वाले लोगों की बात..'  मैं भी हँस दिया था। पिंकी के पापा ने उनकी और से सम्बन्धी-मित्रों में बाटें गए निमंत्रण पत्र हमें भी भेजे गए थे। ये उनकी ओर से हमारे सम्बन्धियों को निमंत्रण था। मैं निमंत्रण पत्र देखता ही रह गया। इतना महँगा, इतना आकर्षक .. माँ ने ये कार्ड्स कुछ खास सम्बन्धियों को भिजवा दिए थे। इन्द्राणी के घर तो मैं स्वयं ही देने गया था। उसने देखा तो मेरी ही तरह आश्चर्यचकित रह गयी थी। वह तो सीधे ही इसके दाम पर आ गयी थी, ' बहुत महँगा होगा न, यह कार्ड.. ' साथ ही उसने इस तरह के महंगे कार्ड को बेकार का खर्चा भी बताया।  अंततः वह दिन भी आ गया जब हमें दिल्ली के लिए राजधानी एक्सप्रेस पकड़नी थी। सुबह से ही घर में चहल-कदमी थी। जो लोग साथ जा रहे थे उनके फोन आ रहे थे। बाबा हमेशा की तरह झुंझलाये हुए थे। वह सबको सीट नंबर और बोगी नंबर बताये जा रहे थे। उनका निर्देश था कि पांच बजे की ट्रैन थी तो दो बजे तक हावड़ा स्टेशन के लिए निकल जाना चाहिए था। उन्होंने कौन किस सीट पर बैठेगा, इसका एक चार्ट भी बना रखा था। माँ यह सब देख चिढ़ जाती और कहती, ' क्या स्कूल के बच्चों का ट्रिप लेकर जा रहे हों ?  बाबा तो हर छोटी-बड़ी बात का ख्याल रख रहे थे। उन्होंने आपात काल के लिए एक फ़र्स्ट-एड टाइप का डिब्बा भी बना लिया था। जब मैंने कहा कि इसकी आवश्यकता नहीं थी तो उनका उत्तर था कि जब हम लेकर जा रहे थे तो ज़िम्मेदारी भी हमारी थी, सफर में किसी की तबियत बिगड़ गयी तो प्रबंध होना ही चाहिए। मैं अपने बाबा को जानता था। मुझे मालूम था कि हमारी कोई कोशिश काम न आएगी। वह अपने हिसाब से यात्रा की व्यवस्था को पुख्ता करते रहेंगे। धीरे धीरे सभी सम्बन्धी स्टेशन पर पहुँच गए और गाड़ी में अपना स्थान लेने लगे। सभी बहुत खुश थे और मुझ पर अपना स्नेह दिखा रहे थे। मेरे चाचा ने कहा कि बंगाली तो हमेशा से वीर रहे हैं और अभी तक हैं। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' देखो, हमारे इस वीर पुरुष को, कैसे इसने पंजाबी सिख लड़की को फँसाया है और अपनी ज़िंदगी को एक तरह के खतरे में डाल दिया है..' उनकी इस बात पर सभी की ओर से एक जोर का ठहाका लगा था। माँ ने बात को हल्के में उड़ाने का प्रयास किया, ' हाँ, वीर तो है.. इसके नाना भी तो वीर थे, उन्होंने तो देश को एक समझा था..'  हंसी -मज़ाक और पिकनिक जैसा माहौल था। ट्रैन समय से छूटी तो एक और बैठी मेरी छोटी दादी ने जोर थे प्रार्थना करते हुए दुर्गा..दुर्गा.. कहा और सभी ने उनका साथ दिया। इन्द्राणी बहुत आनंदित थी। उसने तो मुख में ऊँगली घुमाते हुए अशुद्धता को दूर करने वाली परंपरागत ध्वनि निकाली थी।   पूरा सफर आनंद से बीतता चला गया था। यहाँ-वहाँ की बातें होती रही थी। माँ सभी से कुशलता पूछती। ट्रैन में दिए गए भोजन को कुछ ने संतोषजनक कहा तो कुछ ने एकदम बेकार। सालों से बेचारी राजधानी ट्रैन के भोजन के साथ उसके अतिथियों का यही व्यवहार होता चला आ रहा है। कुछ के लिए  अच्छा, कुछ के लिए एकदम बेकार। रात देर तक सभी बातचीत में लगे रहे थे और न जाने कब जाने सो गए थे। सुबह आराम से उठे।  बाबा ने सबसे पहले जानने की कोशिश की कि क्या ट्रैन समय से तो चल रही थी ? उन्हें संतोष हुआ कि ट्रैन विलम्ब से तो थी परन्तु भारतीय समय के हिसाब से ठीक ही थी। हमारे देश में यदि ट्रैन मिनटों में देरी से चल रही हो तो उसे समय से माना जाता है। विलम्ब की श्रेणी में आने के लिए उसे घंटो की देरी करनी होती है। नाश्ता आदि से निवृत हो सभी तैयार होकर बैठे थे। दिल्ली अब कुछ मिनटों की दूरी पर थी। मैं सबसे घुलने-मिलने का प्रयास तो कर रहा था परन्तु सत्य यह था कि मैं बेचैन था। मैं बार बार इन्द्राणी के पास जाकर बैठ जाता था। मेरी बेचैनी उसे दिख रही थी और वह मुझे देख मुस्कुरा देती थी। वह हमेशा की तरह आकर्षित दिख रही थी। माँ उसे प्रोत्साहित कर रही थी कि दिल्ली में उसे ही सबसे आगे रहना था और सब कुछ संभालना था। स्टेशन पर उतरने पर हमने देखा की पिंकी के मम्मी-पापा, मामा-मामी के साथ साथ कुछ और लोग भी आये हुए थे। एक स्वागत का बोर्ड था जिस पर बड़े आकर में अंग्रेजी में वेलकम लिखा था और उसके नीचे मेरा और मनप्रीत का नाम था। जो लोग साथ में आये थे, वे सहायक थे। उन्होंने हम सबका सामान संभाल लिया था। मैंने जोगेन्दर अंकल-आंटी के साथ साथ मामा-मामी के पाँव छुए। उन्होंने मुझे गले से लगाया और आशीर्वाद दिया। स्टेशन के बाहर गाड़ियाँ लाइन से लगी हुई थी। हर गाड़ी पर मनप्रीत-अभिजीत के विवाह की सूचना थी और जिस होटल में हमारे रहने की व्यवस्था थी, उसका नाम था। गाड़ियों का काफिला तेजी से कनॉट प्लेस से होता हुआ, एक नामी होटल में पहुँच गया था। होटल में बारातियों का तिलक और पुष्प गुच्छ से स्वागत किया गया था। भीतर लॉबी में बैठते ही शरबत सर्व किया गया और सब को अपने अपने कमरे की चाबी दे दी गयी थी। सभी कमरे एक ही फ्लोर पर साथ साथ थे। हम सभी व्यवस्था से अभिभूत थे। मामा जी ने मेरे बाबा को एक कागज़ देते हुए बताया कि ये पाँच गाड़ियों के नंबर थे जो तीन दिनों तक हमारे पास ही रहने वाली थीं।  जोगेन्दर अंकल ने माँ से कहा, ' बहन जी, अभी आराम करो जी, सारा प्रबंध यही होटल में है.. लंच, डिनर सब.. कहीं घूमने-फिरने का मन हो तो गाड़ियाँ बाहर लगी हुई हैं..' वे हाथ जोड़कर खड़े थे। उन्होंने कहा कि वे तो लड़की वाले थे जो भी आवश्यकता हो, हुक्म करें। मुझे ये हम तो लड़की वाले हैं, बात सुन अच्छा न लगा था। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )

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