Chander Dhingra's Blog
Wednesday, November 4, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -44
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )-II- चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ४४ ) मैं पिंकी से मिलने को बे चैन हो रहा था परन्तु मिलने का कोई पथ नहीं सूझ रहा था। लंच हो जाने के बाद इन्द्राणी दी ने शायद मेरे मन की सुन ली थी और वो बात कह दी जो जिसकी चाह मैं शर्माते हुए छिपा रहा था। उन्होंने सुझाव दिया कि कोई जरूरी सामान खरीदने के बहाने से निकल जाते हैं और पिंकी से मिल आते हैं। मैंने कहा, ' ठीक है..' मेरा उतावलापन देख वह हंसने लगी थी। उसने कहा, ' अरे कल तो सज धज कर मिलने जा ही रहे हो.. एक दिन की ही तो बात है, प्रतीक्षा करो..' मैंने कहा, ' चलो ना, शादी से पहले एक बार तुम भी लड़की से मिल लो.. ' मैंने पिंकी को फोन किया। उसने एक खास रेस्टोरेंट में पहुँचने की बात कही थी। मैं और इन्द्राणी दी एक गाड़ी ले निकल गए। ये दिल्ली के कैलाश क्षेत्र का एक रेस्टोरेंट था। हमारे पहुँचने से पहले ही वह वहाँ आ गयी थी। कोने की एक टेबल पर वह और लवली बैठे हुए थे। उनके साथ एक और सिख लड़का भी था। मुझे देखते ही लवली दौड़ते हुए आयी और जीजाजी कह लिपट गयी थी । वह एक निर्मल हृदया साली थी। उसका इस तरह मिलना, मुझे अच्छा लगा था। टेबल पर बैठते ही मैंने कहा, ' ये मेरी कजिन इन्द्राणी हैं..' पिंकी तो कुछ न बोली परन्तु लवली ने हँसते हुए पास बैठे सिख युवक की ओर इशारा कर कहा, ' और ये हमारे कजिन बँटी साहब हैं, ये कनाडा से आये हैं..' बंटी ने अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाया और गर्मजोशी से हेलो कहा। वह अच्छी कदकाठी वाला स्मार्ट युवक था। वह अंग्रेजी में ही बात कर रहा था। बाद में पता चला कि बचपन में ही उसके माता-पिता कनाडा चले गए थे। वहां उन्होंने अपना अच्छा खासा कारोबार बना लिया था। बंटी उनका इकलौता बेटा था। बातों-बातों में पता चला कि उसने पढाई-लिखाई अमेरिका में की थी और अब वह वहीं किसी कम्पनी में काम करता था और कनाडा में अपने माता-पिता के पास आता-जाता रहता था। उसकी भी तमन्ना थी कि अपना कारोबार बसाया जाये। कॉफी चल रही थी और इधर-उधर की बातें भी। बंटी पूरी तरह से महफ़िल पर छाया हुआ था। लवली और बंटी खूब खिलखिला रहे थे। मैं और पिंकी बे वजह हर बात पर मुस्कुरा रहे थे। इन्द्राणी समझ ही न पा रही थी कि क्या किया जाये ? कुछ समय बाद बंटी ने सुझाव रखा कि लड़के-लड़की यानि मुझे और पिंकी को एकांत दिया जाना चाहिए। हम दोनों को वहीँ छोड़ वे लोग बाहर निकल गए थे। बाहर जाने से पूर्व बंटी ने सेवा कर रहे वेटर को कुछ और ऑर्डर दिया और कहा कि हम दोनों का हर तरह से ख्याल रखा जाये। उसकी आवाज़ में एक तरह का आदेश और प्रभाव था। उसका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि धनाढ्यता साफ झलकती थी। वेटर उसकी हर बात पर मुस्कुरा रहा था और यस सर .. यस सर.. ही उसके मुख से निकल रहा था। इन्द्राणी बाहर जाते जाते मेरे कानों में कह गयी, ' मैं तो अकेले फंस गयी.. इस अमेरिकन सरदार जी के साथ..'
अब हम दोनों ही थे और दोनों शांत। विवाह से पूर्व यह हमारी अंतिम मुलाकात थी। पिंकी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ' कैसा लग रहा है, बाबू मोशाय ? ' मैं मुस्कुरा दिया। मैंने कहा, ' मुझे तो अच्छा लग रहा है.. हमारी पंजाबी कुड़ी को कैसा लग रहा है ? वह हंसने लगी। उसने कहा कि चलो मैंने एक पंजाबी शब्द तो सीख लिया था। मैंने कहा, ' अरे नहीं, मैंने तो आओजी, सत श्रीकाल और बहुत कुछ सिख लिया है ..' पिंकी ने पूछा कि मेरे घर में और परिवारजनों में इस अंतर्जातीय विवाह को कैसे लिया गया था ? मैंने उसे आश्वस्त किया कि सब ने सामान्य और समय के साथ होने वाली बात के रूप में लिया था। पिंकी, इन्द्राणी से प्रभावित लगी थी। उसने कहा कि वह बहुत सुन्दर और आकर्षित कर लेने वाली शख्सियत थी। फिर उसने पूछा कि उसने अब तक शादी क्यों नहीं की थी ? मैंने कहा कि उनकी मर्जी, जब चाहेगी कर लेगी। पिंकी ने भी हाँ करते हुए कहा कि उसे लड़कों की कमी थोड़े ही होगी। ऐसे ही न जाने क्या क्या बात होती रही थी। अचानक मुझे लगा कि अब वो तीन लोग किसी भी क्षण आ सकते थे। मैंने कहा, ' तुमने हिम्मत कर बंगाली परिवार में आने का निर्णय किया है, किसी तरह का संशय तो नहीं है ? उसने कहा, ' तुमने भी तो सिख परिवार से नाता जोड़ने का साहस दिखाया है.. अगर हम जुड़े रहेंगे तो सब कुछ ठीक रहेगा..' मैंने आगे बढ़ उसका हाथ अपने हाथ में लिया ही था कि उधर इन्द्राणी, बंटी और लवली आते दिख गए थे। एक बार फिर से बंटी छा गया था। वह मेरे लिए कुछ लाया था। उसने कहा कि बाहर घूमते हुए कुछ चीजें पसंद आ गयी थी तो एक अपने जीजू के लिए और एक अपनी बहन के लिए खरीद ली थी। ख़ुशी ख़ुशी हम सब रेस्टोरेंट से निकल आये थे। पिंकी ने मुझे हल्के से कहा, ' चलो अब कल मिलते हैं .. ऑल द बेस्ट..'
अगले दिन सुबह से हम सब के बीच शादी की तैयारियों की बातें होने लगी थी। हम सब कलकत्ता वालों के लिए यह शायद पहला अवसर था कि दिन की शादी में भाग ले रहे थे। सभी नाराज़ से थे कि सजने-संवरने का समय नहीं मिल रहा था। माँ सभी को समझाने की कोशिश करती फिर रही थी कि गुरुद्वारे की शादी में अधिक समय नहीं लगेगा। रात की पार्टी के लिए बहुत समय मिलेगा। वह हर किसी से कह रही थी कि गुरुद्वारा एक पवित्र स्थान है वहां नियम से हम सभी को समय पर पहुँच जाना चाहिए। कुछ विलम्ब से हम गुरुद्वारे पहुंचे थे। कुछ लोग हमें लेने आये थे। द्वार पर हमें सिर ढकने के लिए स्कार्फ़ दिए गए थे। मुझे और मेरे बाबा को सिख परंपरा की पगड़ी पहनाई गई थी। मुझे पगड़ी में देख इन्द्राणी मुस्कुराने लगी थी। माँ ने उसे इशारे से शांत और संयम में रहने को कहा था। इन्द्राणी ने इस अवसर के लिए एक विशेष पंजाबी ढंग का सूट बनवाया था। सलीके से सिर ढक वह पूरी तरह से पंजाबी महिला दिख रही थी। हमारी ओर से वही सबसे प्रभावित कर रही थी। अत्यंत आदर के साथ हमारा स्वागत किया गया था। भीतर हॉल में बहुत लोग थे। सुखबीर अंकल और जोगेन्दर अंकल आगे बढ़ सारी व्यवस्था को देख रहे थे। भजन की आवाज़ से माहौल पवित्र बना हुआ था। हम बंगालियों के लिए यह सब नया था। हम पंक्तिबद्ध हो मत्था टेक रहे थे। जोगेन्दर अंकल ने बताया कि पहले कुड़माई की रस्म की जाएगी। मुझे एक कड़ा पहनाया गया था। मैंने अमृतसर में एक कड़ा खरीदा था। स्टील का वो कड़ा मेरी कलाई पर था। अब जो पहनाया गया वह सोने का था। मुझे एक छोटी सी करपान भी दी गयी थी। हम शांत हो अरदास सुन रहे थे। सब कुछ अत्यंत पावनता के साथ हो रहा था। पिंकी ने मुझे धीरे से बताया था कि यह आनंद कारज था जो बहुत शुभ माना जाता है। हम बंगाली लोगों के लिए यह एक अपरिचित सा अनुभव था। हमें आशीर्वाद दिए गए थे। बधाइयाँ दी गयी थी। मुझे कहीं न कहीं यह सब अच्छा लगा था। बाद में हमें लंगर के लिए आमंत्रित किया गया था। पिंकी को उसके परिवार वाले नयी पोशाक पहनाने के लिए ले गए थे। कुछ समय बाद वह मेरी माँ की दी हुई साड़ी में वापस आयी थी। उस पर सुनहरी गहने सजे हुए थे। बंगाली साड़ी और पंजाबी लड़की, सभी उसे ताकते रह गए थे। मुझे अपनी किस्मत पर गर्व हुआ कि ऐसी सुन्दर लड़की मेरी पत्नी बन चुकी थी। मैं किसी दूसरे ही संसार में उड़ रहा था।
संध्या में पार्टी का नज़ारा अलग ही था। पांच सितारा होटल था। होटल वालों का ही सब प्रबंध था। हम तो कुछ ही लोग थे परन्तु दूसरी ओर से बहुत थे। मेरे लिए यह अनूठा अनुभव था। पूरा हॉल जगमगा रहा था। पंजाबी लोग और उनकी महिलाएं महंगे-महंगे परिधान और आभूषणों में सजी, हँसते-खिलखिलाते बधाई दे रहे थे। मेरे प्रति उनका स्नेह उमड़ रहा था। पिंकी और मेरे साथ, जोगेन्दर अंकल-आंटी खड़े थे। उपहारों और नगदी से भरे लिफाफों का ढेर जमता चला जा रहा था। फोटग्राफर्स और वीडियो वाले कुछ ऐसा अंदाज़ दिखा रहे थे मानों किसी राजकुमार की दावत हो। हम कलकत्ता वाले इस पांच सितारा चकाचोंध में दबे-दबे से तो जरूर थे परन्तु खाने-पीने का आनंद भी ले रहे थे। माँ बहुत गर्व से भरी दिख रही कि उसके सुपुत्र को ऐसी सुन्दर और धनवान परिवार की लड़की ने पसंद किया था। वह अपनों में कहती घूम रही थी कि कुछ ऐसा न कर देना जिससे हमें लज्जित हो जाना पड़े। सिख सम्बन्धियों में वह बहनजी बनी हुई, आदर और सम्मान पा रही थी। मैं दूर मंच से देख रहा था। इन्द्राणी थी जो यहाँ-वहाँ चहकती घूम रही थी। वह सरदारों की भीड़ में खुद को आकर्षण का केंद्र बनाये हुए थी। मैंने सोचा चलो हमारी ओर से एक तो है जो प्रभाव जमा रही थी। वह कभी कभी हमारे पास मंच पर भी आती और कुछ न कुछ कह जाती थी। एक बार उसने कहा कि पार्टी बड़ी शानदार थी और वह बहुत लुत्फ़ ले रही थी। उसने यह भी बताया कि उसने कुछ दोस्त भी बना लिए थे। पार्टी देर रात तक चल रही थी। हम नव दम्पति विश्राम और एकांत के लिए प्रतीक्षारत, हर मिलने वाले अतिथि को देख, लगातार चेहरे पर मुस्कराहट की लकीरें बनाये जा रहे थे। ( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर.. )
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