Chander Dhingra's Blog

Wednesday, November 25, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी : Two States - A New Story - 47

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                      ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे ) ( ४७ )     दिल्ली एयरपोर्ट पर पिंकी की मम्मी का रोना रुक ही न रहा था। उसके पापा और मामा की भी आंखे नम थी। भावुक तो मैं भी हो रहा था। मैं खुद को दोषी मान रहा था। मैंने आंटी से कहा, ' मम्मी, चिन्ता न करें, हम सब उसका ख्याल रखेंगे.. सब कुछ ठीक रहेगा..' उन्होंने मुझे गले लगा लिया, ' हाँ बेटा, मुझे मालूम है, तुम सब हो, मेरी बेटी को कभी अकेलापन न लगेगा..फिर भी बेटा, लड़की की विदाई है..माँ-बाप के दिल का एक टुकड़ा अलग हो रहा है..'  मेरी तो कोई बहन न थी परन्तु मैं इस विदाई का अहसास समझ पा रहा था। मैं कल्पना कर रहा था कि यदि मेरी बहन की विदाई हो रही होती तो मैं भी ऐसे ही रो रहा होता और मेरे माता-पिता भी चिंतित और दुखी हो रहे होते। मैंने कई बार बेटी की विदाई का यह दृश्य देखा था और प्रत्येक बार मैं भावुक होता रहा था। यहाँ तो कुछ ही लोग थे, मेरी ओर से अकेला मैं ही था। मेरे साथ अपने घर को छोड़ जो लड़की जा रही थी, वह मेरी मित्र थी और हम दोनों एक-दूसरे को समझते थे। वह भी जानती थी कि वह किसी अपरिचित के साथ न थी परन्तु माता-पिता और पिता तुल्य मामाजी से बिछुड़ना उसे भी कष्ट दे रहा था। मैं चाहता था कि जल्द से जल्द हम आगे बढ़ जाएं और इस भावुक होती जा रही स्थिति से दूर हो जायें। हम सुरक्षा क्षेत्र में आये तो संतोष सा लगा। पिंकी अभी भी दूर तक अपने लोगों को ताके जा रही थी। उसकी आँखें अभी भी भीगी हुई थीं। फ्लाइट के ऊपर उठते ही उसने अपनी आँखें बंद की और ध्यान की मुद्रा में आ गयी। वह निश्चय ही अपने नानक बाबा से संवाद कर रही थी, ' बाबा, मैं एक नए संसार को उड़ चली हूँ.. मेरा साथ देना .. आप साथ हो तो मैं क्यों फ़िक्र करूँ..' मैं उसका मुख देखता रह गया था। एक दिव्य प्रकाश था जो मुझे अभिभूत कर रहा था। कुछ समय बाद उसने आँखें खोली तो मैंने पूछा, ' क्या माँगा ? उसने कहा, 'मैं कभी कुछ माँगती नहीं..केवल चाहती हूँ वे मेरा हाथ पकड़े रहें..'  हम इस दो-अढ़ाई घंटे के सफर में एक-दूसरे को आश्वस्त ही करते रहे थे। अचानक घोषणा हो गयी कि हम कलकत्ता पहुँच चुके थे। एयरपोर्ट से बाहर आये तो माँ-बाबा को इंतज़ार करते पाया था। पिंकी ने दोनों के पांव छुए थे। मैंने भी उसका साथ दिया था। माँ ने पिंकी को गले लगा लिया था। हमारा सामान देख माँ मुझ से बोली, ' अब तुम भी इतना कुछ ले आये ..' मैंने कुछ न कहा, बस पिंकी की ओर देख मुस्कुरा दिया था। मैंने वो लड्डू का डिब्बा माँ को थमाया और कहा, ' ये केवल मेरे लिए है..मम्मी जी ने खास मेरे लिए दिया है..' मेरे मुख से निकला मम्मी शब्द माँ को चौंका गया था। उन्हें कुछ क्षण लगे यह समझने में कि अब माँ के साथ-साथ एक मम्मी जी भी आ चुकी थी, मेरे जीवन में। वह कुछ कहना चाहती थी परन्तु रुक गयी थी, न जाने क्या सोचकर। मैं जानता था मेरे मुख से मम्मी शब्द उन्हें भीतर कहीं बींध गया था। मैं विवश था। मैं तो केवल पिंकी को जताना चाहता था कि उसकी मम्मी अब मेरी भी थी।  घर पर माँ ने नयी बहू के लिए खास व्यवस्थाएं की हुई थी। घर अच्छे से सजाया हुआ था। मुख्य कमरे के चारों कोनों पर बड़े-बड़े फूल दान रखे थे। कमरा फूलों से महक रहा था। साफ सफाई भी हुई थी। लगता था, बिशाखा पूरा दिन जुटी रही होगी। मैंने अलग से बिशाखा से अपने कमरे के बारे में पूछा तो वह हंसने लगी, ' सब ठीक कर दिया है..ऊपर जाकर अपनी आँख से देख लो..'  पिंकी थोड़ा बहुत शरमा रही थी। यह स्वाभाविक था। उसने मुझे अपने कमरे में ले जाने की इच्छा जाहिर की। माँ, चाय की तैयारी कर रही थी। मैंने कहा कि चाय पीकर ऊपर अपने कमरे में चलते हैं। बिशाखा चाय लेकर आ गयी। साथ में मिठाई थी और कुछ कटलेट आदि थे। मैं जानता था की ये सब कौन सी दुकान से लाये गए थे। मैं क्रॉकरी आदि देख कर थोड़ा विचलित हुआ। मुझे पिंकी के घर की व्यवस्था याद आ रही थी। मुझे लगा कि हम वैसा क्यों नहीं कर पाते। मैंने मन ही मन में सोचा कि कल ही कुछ नयी क्रॉकरी लेकर आऊँगा। मैंने पिंकी से पूछा कि क्या खाओगी ? वह धीमे से मुस्कुरायी। उसने कहा, ' फ्लाइट में तो इतना कुछ खा लिया था .. अब मन नहीं है ..' मैंने कहा, ' ये चॉप यहाँ का मशहूर है..खाकर देखो..'  उसने कोने से छोटा सा टुकड़ा तोड़ लिया और कहा, ' अच्छा है..' मैंने भी मुँह में रखा और बिशाखा को आवाज़ लगायी, ' ये कब का लाकर रखा हुआ है ? एक दम ठंडा हो चुका है..' बिशाखा ने बताया कि वह शाम को ही लेकर आयी थी क्यों कि विलम्ब से जाने पर यह समाप्त हो चुका होता था। मुझे बिशाखा पर गुस्सा आ रहा था। माँ ने सुना तो मेरे हाथ से वह कटलेट लिया और कहा,' ठीक ही तो है..' मैं झुंझला गया, ' माँ ये चीज तो गरम ही खायी जाती हैं ..' माँ, हूँ  .. कह आगे बढ़ गयी थी । पिंकी ने बात संभाली, ' अरे लाओ, मैं माइक्रो में गर्म कर देती हूँ  ..'  ये माइक्रो तो उन दिनों हमारे घर में न था। पिंकी मुस्कुराने लगी। उसने बिशाखा का हाथ पकड़ा और उसे ले रसोई की ओर बढ़ गयी। उसने कहा, 'तवे पर गर्म कर लाती हूँ..' माँ दौड़ी आयी, ' अरे नहीं.. मुझे दो.. तुम बैठो.. अभी ही तो आयी हो ..' उन्होंने यह भी कहा कि मैं ऐसा ही खाता था, आज न जाने क्यों मुझे गर्म खाने का भूत चढ़ गया था।  मैं पिंकी को लेकर ऊपर अपने कमरे में आ गया था। पिंकी ने यहाँ-वहाँ देखा और कहा कि उसे कमरा ठीक करने में बहुत परिश्रम करना पड़ेगा। उसने कहा कि कमरे को एक ओर से बढ़ाना होगा। मैंने कहा, ' जो कुछ करना हो, कर लेना.. अभी तो आराम करो ..'  पिंकी ने अपना सामान खोलना आरम्भ किया। उसने कहा कि सामान सेट करने से पहले दिल्ली में फोन कर लेना चाहिए। मैंने हाँ कहा और उसे बताया कि फोन माँ के कमरे में था। वह मुस्कुरा दी और उसने अपने बैग से मोबाइल निकाला। उसने कहा कि अब तो इसे काम में लाना चाहिए। उसने दूसरे बड़े बैग से एक और मोबाइल का डिब्बा निकाल कर मुझे दिया और कहा, ' आपका भी तो है.. अब तो कहीं से भी मुझ से बात कर सकते हो..' मैंने कहा, ' हाँ, बात तो ठीक है परन्तु मोबाइल का बिल बहुत अधिक आता है..' उसने कहा, ' ये बिल-विल की बातें बाद में सोचेंगे..' उसने अपने मामाजी के घर का नंबर लगाया।  मामाजी, अपने मम्मी पापा और लवली से लम्बी बातचीत की। मैं अपना नया मोबाइल फोन देखने में लगा रहा परन्तु मेरा मन उसकी ओर भी था। मैं जानता था कि इतनी लम्बी बात का बिल भी वैसा ही आएगा। जोगेन्दर अंकल ने मुझ से भी बात करनी चाही तो मैंने पिंकी को इशारे से कहा कि कह दो कि मैं बाद में करूँगा। असल में मैं नए मोबाइल पर खुद को सहज न समझ रहा था और माँ के कमरे में जाकर अपने पुराने फोन से ही बात करना चाहता था। पिंकी सामान और कपड़े आदि सजाने-गुजाने में लग गयी थी। मैं माँ के कमरे में गया और दिल्ली फोन लगाया। वो सब लोग एक-एक कर मुझसे बात करने लगे थे। सब की एक सी बात थी, ' हमारी पिंकी का ध्यान रखना..कोई भूल हो जाये तो अनदेखी कर देना  .. ' मैं क्या कहता, यही दोहराता रहा कि चिंता न करें, सब ठीक रहेगा। जोगेन्दर अंकल ने अगले दिन हमारी ओर से होने वाली रिसेप्शन पार्टी के बारे में पूछा। मैंने उन्हें भी वही कहा जो पिंकी को कहा था, ' अंकल, हम लीग इसे बहू भात कहते हैं, यह आयोजन नयी बहू को सबसे परिचित करवाने के लिए किया जाता है  ..'  उन्होंने कहा कि वह भी इसमें भाग लेने के लिए आते परन्तु अपने काम-धंधे के कारण अधिक दिन तक दूर नहीं रह सकते थे। उन्होंने हमारे चंडीगढ़ आने की बात भी उठाई थी और कहा, ' बेटा, जल्दी यहाँ आने का कार्यक्रम बनाना   ..'  पिंकी अपने काम में व्यस्त थी। उसने कहा कि इस कमरे से जुड़ा हुआ एक और कमरा होता तो अच्छा होता। उसने इसकी गुंजाईश देख ली थी और बताया कि छत की एक ओर सरलता से एक कमरा निकाला जा सकता था। मैंने कहा, ' बाद में कभी देखा जायेगा ..इस बारे में माँ से बात करनी होगी.. बिना उनकी स्वीकृति के इस घर में कुछ भी नहीं होता..' ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर   .. )                                      

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