Chander Dhingra's Blog

Wednesday, December 2, 2020

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 48

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II-      चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                      ( हर हफ्ते इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे )  ( ४८ ) रात के खाने के समय माँ और बाबा दोनों पिंकी का ही ख्याल रखे हुए थे। बंगाली भोजन था। उन्हें चिंता थी कि नई दुल्हन को असुविधा न हो रही हो। माँ बार-बार पिंकी से पूछ रही थी कि उसे हमारे घर का खाना कैसा लग रहा था। माँ और बिशाखा ने अपने हिसाब से सुरुचिपूर्ण ही बनाया था परन्तु मैं समझ पा  रहा था कि उसे कुछ तो परेशानी हो रही थी जो स्वाभाविक थी। पिंकी अपनी ओर से सहज हो रही थी। हम लोगों को हाथ से खाता देख वह वह कुछ पल को सहमी थी। मैं जानता था इसलिए उसे सहज करने के लिए कहा, ' हम बंगाली लोग घर में हाथ से ही खाते हैं, तुम बे झिझक स्पून ले लो..' उसने कहा, ' नहीं, मुझे तो अच्छा लग रहा है.. सिर्फ ये मछली बहुत काँटे वाली है..' बाबा ने तुरंत बिशाखा को बुला एक मछली का नाम बताया जिसमे काँटे कम होते हैं और कहा कि कल वही मछली बनाना। ये सब चल ही रहा था कि टेलीफ़ोन की घंटी सुनाई दी। मैं उठा ही था कि माँ ने मुझे रोक दिया और खुद उठ गयी थी। माँ कुछ देर बाद वापिस आयी तो चुपचाप बैठ गई थी। मैंने पूछा, 'क्या हुआ ? किसका फोन था ? उन्होंने कहा कि खाना खा लो फिर बताती हूँ। हम लोग तो लगभग खा ही चुके थे। मीठा खा रहे थे। इन बंगाली मिठाइयों को देख और इनके स्वाद से पिंकी अभिभूत थी। वह बार बार यम्मी यम्मी कह रही थी। मैंने और बाबा ने माँ से फिर एक बार टेलीफ़ोन के बार में पूछा। अब माँ के चेहरे पर एक छिपी सी मुस्कान, धीरे से खिलने लगी थी। उन्होंने कहा कि पार्टी के अध्यक्ष का फोन था। उन्होंने माँ को सूचना दी थी कि उनका नाम राज्य की महिला आयोग की अध्यक्षा के लिए चुना गया था। मैंने यह सुन सबसे पहले जोर से ताली बजायी थी । फिर सभी ताली बजाने लगे थे। अब तक माँ की ख़ुशी खुलकर सामने आ गयी थी। उन्होंने कहा, ' ये बहुत ज़िम्मेदारी का पद है..और उनके साथ उनके पिता का सु-नाम जुड़ा है..'  पिंकी ने भी कहा कि यह बहुत बड़ी खबर थी। अब माँ उठी और उन्होंने पिंकी के पास जाकर स्नेह से उसका माथा चूम लिया, ' तुमने हमारे घर में कदम रखा और आते ही ये बड़ी खबर आ गई.. शुभ कदम हैं हमारी बहू के ..'  पिंकी ने उत्साहित होते हुए कहा, 'मैं अपने पापा को बताती हूँ..' माँ ने उसे रोक दिया क्योंकि पार्टी की ओर से अभी किसी को बताने से मना किया गया था। कल तक समाचार आ जायेगा तब बताना उचित होगा। मैं सचमुच बहुत खुश हो रहा था। मैंने कहा, ' माँ तुम्हें तो अब ड्राइवर के साथ गाड़ी मिलेगी .. लाल बत्ती वाली ..' माँ ने कहा, ' गाड़ी दिखाई दे रही है.. साथ में जो भारी ज़िम्मेदारी आ रही है वह दिखाई नहीं दे रही..' माँ ने बताया कि एक अन्य महिला जिसका फिल्म उद्योग से सम्बन्ध था, इस पद के लिए उसका नाम भी आ रहा था। अगले दिन बैठक थी, उसमें ही सब कुछ स्पष्ट हो जाना था। माँ ने कहा कि हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए और हम सब को ऊपर जाकर बाबा लोक नाथ जी के सामने हाथ जोड़कर बैठना चाहिए कि सब कुछ ठीक से हो जाये। हम सभी माँ के कमरे में गए और उनके मंदिर के सामने बैठ गए। अचानक पिंकी उठी और अपने सूट केस से एक फोटो फ्रेम निकालकर लायी और उसे मंदिर में रख दिया। यह बाबा गुरु नानक का सुन्दर चित्र था।  हम सब ध्यान मुद्रा में बैठ गए। मैं मन ही मन सोच रहा था कि यह माँ और हमारे परिवार के लिए एक बहुत बड़ा सम्मान था। माँ ध्यान मुद्रा में अवश्य थी परन्तु बेचैनी उनके चेहरे पर झलक रही थी। उन्होंने शीघ्रता में अपनी प्रार्थना की और हाथ जोड़ कर उठ खड़ी हुई थी। वह उठकर फोन करने बैठ गयी थी। उन्होंने एक नंबर घुमाया और आदर से प्रणाम करते हुए बात आरम्भ की। मैं समझ गया कि दूसरी ओर नाना के एक पुराने साथी थे जिन्हें माँ काका कहकर संबोधित कर रही थी। माँ ने कुछ समय पूर्व मिली सूचना की खबर उन्हें दी थी परन्तु जिनसे वह बात कर रही थी उन्हें पहले से ही यह बात मालूम थी। माँ की बातों से हम दूसरी ओर की बात का अंदाज़ा लगा रहे थे। मैं और बाबा एक ओर खड़े थे। पिंकी अनजान सी दूर रखी कुर्सी पर बैठी थी। माँ, हाँ-न ही कह रही थी। माँ ने कहा कि अच्छा होता यदि उन्हें इस दायित्व से मुक्त रखा जाता। परन्तु माँ के आग्रह में सत्यता वाला जोर न था। उन्होंने तो एक बार यह भी कहा कि विधानसभा का एक पद जो विधायक की अकस्मात मृत्यु के कारण रिक्त हुआ था, उसके लिए उन्हें चुना जाना अधिक उपयुक्त होता। कुछ समय तक बातचीत होती रही थी। माँ ने फोन रखा तो बताया कि दुलाल काका ने ही उनका नाम प्रस्तावित किया था। दुलाल काका पार्टी में विशेष प्रभाव रखते थे। उन्हें मेरे नाना ही राजनीति में लाये थे और वह नाना एवं हमारे परिवार का बहुत सम्मान करते थे। वह चाहते थे कि माँ, इस महिला आयोग वाले पद को अवश्य स्वीकार करें क्योंकि यह एक गरिमामय पद था और इसमें राजनैतिक झमले अपेक्षाकृत कम थे। मैंने भी कहा कि दुलाल दादू ठीक ही कह रहे थे। वह अक्सर नाना के पास आया करते थे और मैं उन्हें दादू कहा करता था। माँ ने एक बार फिर कहा कि हमें कल की पार्टी की बैठक में लिए जाने वाले निर्णय को देखना चाहिए। वैसे दुलाल दादू से बातचीत के बाद माँ निश्चिंत सी थी कि उनका नाम ही स्वीकार किया जायेगा। मैं भी खुश हो रहा था कि नाना के जाने बाद अब मेरी माँ पार्टी में स्थान लेने जा रही थी। अगले दिन बहूभात का कार्यक्रम था। मैं जानता था कि शाम तक माँ के आयोग की अध्यक्षा होने का निर्णय आ चुका होगा और यह समाचार वहाँ हमारे उत्सव में चर्चा का मुख्य विषय होगा।  अगली सुबह माँ सामान्य से पहले उठ गयी थी। वह स्नान और पूजा-पाठ कर चुकी थी। मैं जब नीचे आया तो उन्होंने पिंकी के बारे में पूछा। पिंकी सो रही थी। माँ कुछ चिंतित सी थी। एक तो आज शाम का समारोह था और दूसरे पार्टी की बैठक का निर्णय। बहूभात के लिए सारी व्यवस्था एक व्यावसायिक संस्था को दी गयी थी, हमें कुछ न करना था। दक्षिण कलकत्ता के एक बैंक्वेट हॉल को संध्या के लिए ले लिया गया था और साज-सज्जा और खाने-पीने की व्यवस्था वहीं होनी थी। जो छोटे-मोटे काम थे, उनका दायित्व बाबा ने ले रखा था। पिंकी सो कर उठी तो माँ के पास गयी थी। माँ ने उसे स्नेह से गले लगाया और कहा कि आज का दिन बहुत व्यस्त होने वाला था। उन्होंने वह साड़ी दिखाई जो उसे संध्या को को पहननी थी। पिंकी को साड़ी तो पसंद आयी पर उसने कहा,' इतनी भारी ? मैं तो संभाल ही न पाऊँगी.. मुझे तो वैसे भी साड़ी का बहुत अनुभव नहीं है..' माँ ने कहा, ' इन्द्राणी है न, वह तुम्हें तैयार कर देगी.. आज तो सब हमारी बहू को देखते ही रह जायेंगे..यह साड़ी खास आज के लिए ही बनवाई है, बाजार में ऐसी साड़ी दूसरी न मिलेगी..' दिन यूँ ही व्यस्तता में बीतता जा रहा था। पिंकी संध्या वाले कार्यक्रम के लिए उत्साहित थी। मैंने उसे बताया कि इन्द्राणी उसे एक ब्यूटी पार्लर ले जायेंगी। मैं माँ के समाचार की भी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा था। माँ भी अधीर हो रही थी। चार बजे के आसपास दुलाल दादू का फोन आया। उन्होंने माँ को बधाई दी कि वह राज्य के महिला आयोग की अध्यक्षा होने जा रही थी। मैंने माँ को बाहों में ले लिया था। अब फोन का ताँता लग गया था। रोबी दा का भी फोन आया था। उन्होंने मुझे बधाई दी और कहा कि संध्या में तो मिलेंगे ही।  सच, संध्या में पिंकी को सब देखते ही रह गए थे। पंजाब की सुंदर लड़की, बंगाली साड़ी में अभूतपूर्व सौंदर्य बिखेर रही थी। माँ को दो ओर से बधाइयाँ मिल रही थी। सुन्दर बहू  के लिए एवं महत्वपूर्ण पद पाने के लिए।  राजनैतिक हलकों के कई लोग आये हुए थे। दुलाल दादू की सलाह पर मेरे नाना की एक बड़ी फोटो भी एक ओर लगायी गयी थी। दुलाल दादू इन दिनों काफी सुर्ख़ियों में थे। राज्य की वामपंथी सरकार की ओर से केंद्र की सरकार के साथ समन्वय के कार्यों के लिए उन्हें ही चुना जाता था। ऐसा माना जाता था कि कई केंद्रीय मंत्रियों के साथ उनके अच्छे सम्बन्ध थे। वे मझे हुए राजनैतिक खिलाड़ी के रूप में उभरकर आ रहे थे। माँ ये सब जानती थी। वह उनसे धीरे-धीरे घनिष्टता बढ़ा रही थी। आज का दिन माँ के पास एक सुअवसर के रूप में आया था। घर के आयोजन में, माँ की भूमिका से अधिक वह महिला आयोग की अध्यक्षा अधिक नज़र आ रही थी। मैंने पिंकी से पूछा,' पिंकी, कैसा लग रहा हैं, यहाँ  ..' उसने कहा, ' अच्छा लग रहा है, पर मुझे हमेशा पिंकी ही बुलाओगे या कभी मनप्रीत भी कहोगे ? मैंने कहा, ' पिंकी ही अच्छा लगता है..' वह मुस्कुरा दी। उसने कहा, ' मम्मी जी तो पूरी मिनिस्टर जैसी लग रही हैं..' मैंने कहा, ' सच बताऊँ, उनका तो एक छिपा सपना है.. मंत्री सभा में जाने का.. '( आज यहीं तक, आगे गुरुवार को, यहीं पर ...) 

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