Chander Dhingra's Blog
Wednesday, December 30, 2020
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 52
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. )
( ५२ ) कुछ समय बाद माँ और पिंकी लौट आये थे। बाबा के मित्र भी अपने घर जाने का मन बना चुके थे। माँ को देखा तो वह उठ खड़े हुए थे। माँ ने लगभग चिढ़ाते हुए स्वर में कहा, ' ये क्या दादा, मैं आई और आप चल दिए ? काका ने सौम्य सी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ' नहीं ऐसी बात नहीं है, काफी समय से आया हुआ हूँ, अब तो जाने ही वाला था.. अच्छा हुआ जो आप से और बहू माँ से भी मिलना हो गया..' पिंकी समझ गयी थी कि वह पापा जी के घनिष्ट दोस्त थे। उसने माँ की बात सुनी तो तुरंत बोली, ' नहीं अंकल, अब तो आप को कुछ देर रुकना ही होगा.. चलिए, मैं आपको अपने हाथ की पंजाबी चाय पिलाती हूँ..' काका ने कहा कि वह बिशाखा के हाथ की चाय पहले ही पी चुके थे। पिंकी ने हँसते हुए कहा, 'अंकल, जो बिशाखा दीदी ने आपको सर्व की होगी वह तो बंगाली चाय रही होगी और उसे आपने खाया होगा.. मेरी तो पंजाबी चाय होगी, उसे तो पीना पड़ेगा .. ' उसकी इस बात पर सब हँस पड़े थे। माँ भी मुस्कुरायी परन्तु उन्होंने पिंकी से कहा कि वह ज़बरदस्ती चाय पिला रही थी, अब इस कारण उसके अंकल अंकल जी को जो एसिडिटी होगी तो उसके लिए दवा भी पिंकी को ही देनी होगी। ख़ुशी का सा माहौल बनता जा रहा था। पिंकी, बिशाखा का हाथ पकड़ रसोई घर में घुस गयी थी। कुछ की मिनटों में वह एक ट्रे में चाय लेकर आयी साथ में काजू-बादाम भी थे। काका ने देखा तो मुस्कुराते हुए कहा कि वह इन महंगी चीजों के योग्य न थे। उन्हें तो चाय के साथ दो बिस्कुट मिल जाएं, वही यथेष्ट था। पिंकी ने कहा, ' ये क्या बात हुई,अंकल ? आज तो आप जल्दी में हैं वरना आप को चाय के साथ गर्मागर्म पकोड़े भी खिलाती..' पिंकी का मिज़ाज अब काका को समझ आ रहा था। उन्हें आभास हो गया था कि ये लड़की बहुत खुश दिल है। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' हाँ, पंजाबी स्टाइल के फूलगोभी के पकोड़े मुझे बहुत पसंद हैं..एक दिन आऊंगा खाने..' माँ ने सुना तो अपने अंदाज़ में चुटकी लेते हुए कहा, ' लो, और चाय ऑफर करो, इन्होंने तो अगली चाय के साथ पकोड़ों का भी प्रबंध कर लिया है..ये बंगाल है, बेटी.. यहाँ सोच-समझ कर बोलना पड़ता है..' पिंकी ने कहा, ' नो वरी, मम्मी .. अंकल आएँगे तो पापा का दिल भी लगा रहेगा.. दोस्तों के साथ, चाय का मज़ा ही कुछ और होता है..पर यह फूलगोभी क्या होता है, हम तो केवल गोभी ही जानते हैं..' मेरे बाबा और काका दोनों बहुत खुश थे। जब काका घर से निकलने को हुए तो उन्होंने बहुत स्नेह से पिंकी को आशीर्वाद दिया और मुझे कानों में कहा, ' बहुत भाग्यशाली हो,बेटा..' वह चले गए थे तो हम सब एक जगह आकर बैठ गए थे। पिंकी ने कहा कि उसे अंकल बहुत अच्छे लगे थे और यह भी कि वह उनका आतिथ्य अच्छे से नहीं कर पाई थी। माँ ने कहा कि ऐसी कोई खास बात न थी और वह तो अपने घर के सदस्य जैसे थे और अक्सर आते-जाते रहते थे। पिंकी ने यह भी कहा कि उसके सामान में दो टी-सेट भी थे और उन्हें उपयोग में लाया जाना चाहिए। वह साथ-साथ उठी और टी-सेट निकालकर ले आयी थी। उसने बिशाखा से कहा कि अब से नया सेट अतिथियों के लिए उपयोग में लाया करे। माँ कुछ नाराज़ सी लगी उन्होंने कहा कि ये बहुत महंगे सेट थे और इन्हें नियमित उपयोग में लाना उचित न था। इन्हें कुछ खास अवसर पर ही निकालना चाहिए। पिंकी ने प्रतिक्रिया दी, ' हाँ, मम्मी यह बात तो ठीक है परन्तु खास अवसर की प्रतीक्षा करते-करते ये ऐसे ही न रखे रह जाएं.. और पुराने न हो जाएं.. किसी भी अवसर को खास अवसर तो हमें ही बनाना होगा..'
ये सब बातें चल ही रही थी कि फोन की घंटी बज उठी थी। मैंने ही फोन उठाया था। मंत्रालय से फोन आया था। किसी मंत्री जी के सचिव का था और वह माँ बात करना चाहते थे। माँ फोन पर बात सुनती गयी थी। बाद में उन्होंने बताया कि राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में किसी नेपाली लड़की के साथ कुछ अप्रिय घटना हुई थी। मंत्री जी एक स्टेटमेंट भिजवा रहे थे और माँ को हस्ताक्षर कर, महिला आयोग की ओर से जारी करना था। माँ ने कहा कि घटना की पूरी जानकारी के बिना वह कैसे आयोग की ओर से कोई प्रतिक्रिया जारी कर सकती थी ? मैंने कहा कि जब मंत्री महोदय स्वयं से भिजवा रहे थे तो ठीक ही होगा। पिंकी खामोश बैठी सब सुन रही थी। उसने मुझसे धीरे से नेपाली लड़की के बारे में पूछा था। मैंने उसे बताया की दार्जिलिंग के स्थानीय निवासियों को हम लोग नेपाली कहते हैं। अब उसने कहा कि बिना पूर्ण जानकारी प्राप्त किये, हस्ताक्षर कर देना ठीक न था। बाबा ने भी सहमति में सिर हिलाया परन्तु कहा कि घटना की जानकारी मिलती कहाँ से ? उसके लिए भी तो मंत्रालय की मशीनरी पर ही निर्भर करना होता है और यह बनी बनाई विज्ञप्ति वहीं से ही तो आ रही थी। माँ खामोश थी। अचानक उन्होंने फोन उठाया और एक नंबर घुमाया। मैंने पूछा, ' किस से बात करना चाहती हो ? माँ ने संक्षिप्त उत्तर दिया, ' रुको, बताती हूँ..' वह बात करने लगी और यह विज्ञप्ति वाली बात बताई थी। अब मुझे समझ आ गया था कि फोन के दूसरे छोर पर पार्टी के अध्यक्ष थे। ये मेरे नाना के मित्र थे और माँ किसी भी समस्या का निदान उन्हीं से पाया करती थी। कुछ समय बाद माँ ने बताया कि उनके काका घटना की विस्तृत जानकारी, पार्टी के संबंधित क्षेत्र के संचालक से प्राप्त कर, माँ को अवगत कराएँगे। उसके बाद ही विज्ञप्ति का जारी किया जाना उचित होगा। काफी देर रात तक बातें चलती रही थी। पिंकी का मत था कि पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए था। माँ भी यही चाहती थी। मैं मंत्रालय के पक्ष में था क्योंकि जनता के पक्ष की आधिकारिक ज़िम्मेदारी उन्हीं पर थी। पिंकी का मानना था कि महिला आयोग को स्वतंत्र और स्वायत संस्था होना चाहिए। माँ ने विषय को विराम लगाते हुए कहा, ' देखो, काका क्या रिपोर्ट देते हैं ? यदि आवश्यकता हुई तो मैं स्वयं उस पर्वतीय क्षेत्र में जाऊंगी..' उन्होंने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ' क्यों, ठीक है न मनप्रीत ? पिंकी ने सहमति में सिर हिलाया परन्तु मुझे माँ का प्रस्ताव उचित न लगा था। मैंने कहा कि इस तरह के आयोग दिखावे मात्र के लिए होते हैं और उनका महत्व आभूषण की तरह होता है। मैंने माँ को कहा कि यह सत्य उन्हें भी देर- सबेर समझ आ जायेगा।रात काफी आगे बढ़ चुकी थी। हम चारों अपने कमरों में सोने के लिए आ गए थे।
सुबह नाश्ते के समय सब मिले तो न जाने कहाँ से रात वाली बात की ही कड़ी मिल गयी थी। माँ को लग रहा था कि किसी कुछ ही समय में मंत्रालय से कोई विज्ञप्ति लेकर आ जायेगा। समस्या यह थी कि तुरंत हस्ताक्षर कर दिया जाना संभव न था क्यों कि पार्टी की ओर से घटना की जानकारी भी आने वाली थी। उस सुबह माँ को उलझा हुआ सा देखा था। पिंकी भी स्थिति को समझ रही थी। उसने अपनी ओर से माँ को कहा, ' मम्मी जी आप इस प्रेस-रिलीज़ को रख लेना और सोच-समझ कर उसे बाद में वापिस भेजना..' माँ ने कहा, ' बेटा, ऐसी बातों को साथ साथ निपटना होता है..सरकारी फाइल की तरह उन्हें रोक कर नहीं रखा जा सकता..प्रार्थना करती हूँ काका की तरफ से रिपोर्ट पहले मिल जाए.. आयोग की अध्यक्षा के नाते यह मेरा पहला महत्वपूर्ण कार्य है, मैं कोई त्रुटि नहीं चाहती..' पिंकी एक अच्छी बहू की तरह, अपनी सास की बातों को सिर हिलाकर सहमति दे रही थी। जैसी माँ की इच्छा थी, कुछ समय बाद उनके काका का फोन आ गया था और उन्होंने माँ को स्वीकृति दे दी थी कि मंत्रालय से आने वाली विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर कर दें। माँ ने उनसे पूछना चाहा कि क्या उन्हें अपने सूत्रों से घटना की जानकारी मिल गयी थी ? इस पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस इतना कहा कि हस्ताक्षर कर देना ठीक था। बाद में जब बात मेरे बाबा के कानों में आयी तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ' अरे, गणेश काका ने रात में ही सीधे मंत्री जी से बात कर ली होगी..और उन्हें अनुमान लगा लिया होगा कि मामला क्या है और आयोग की ओर से जनता में क्या सन्देश दिया जाना चाहिए.. इस स्तर पर इसी तरह से काम होते हैं..' उनकी इस बात पर मैं और पिंकी दोनों हँस दिए थे। माँ अब निश्चिंत थी। उन्होंने पिंकी को दुलारते हुए कहा, ' जब हमारी बहू सौभाग्यशील है तो सब काम सरलता से ही होने हैं..' ( आज बस, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर )
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