Chander Dhingra's Blog
Wednesday, January 6, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -53
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. )
( ५३ ) मैंने चार सप्ताह की छुट्टी ली हुई थी तो ऑफिस की ओर से निश्चिंत था। न सुबह की दौड़ा-दौड़ी और न शाम को देर से घर लौटने की चिंता। मैं और पिंकी एक बेसुध से संसार में थे। पिंकी ने सुबह जॉगिंग जाना शुरू कर दिया था। पहली सुबह माँ ने उसके साथ बिशाखा को भेजा था परन्तु दूसरे दिन से उसने अकेले जाना शुरू कर दिया था। उसका कहना था कि उसने लेक का क्षेत्र और पथ समझ लिया था। पिंकी ने कहा कि साथ चलना हो तो मुझे ही चलना चाहिए वर्ना वह अकेले ही जाया करेगी। मैं एक दिन गया भी था। पिंकी पूरी तैयारी के साथ जाती थी। जॉगिंग सूट, जॉगिंग शू, सिर पर कैप और पीछे पैंट के पॉकेट में छोटी सी वाटर-बॉटल। दो-चार दिन में ही उसने कुछ मित्र भी बना लिए थे जो हमारे घर के आसपास ही रहते थे। ये मारवाड़ी परिवार से थे और अब पिंकी उन्हीं के साथ वापिस आती थी। एक दिन वह मुझे उनसे मिलाने ले गयी थी। मैं नानुकर करता रहा परन्तु अंततः एक दिन जाना ही पड़ा था। ये दो दंपति थे जो गुरुसदा रोड के एक महंगे आवासीय परिसर में रहते थे और हमारे घर के पास से गुजरते थे। वे अपनी अपनी कार लेकर उस खूबसूरत लेक तक जाते थे और लौटते में पिंकी को ड्राप कर देते थे। मैं उनसे मिला तो थोड़ा सा असहज महसूस कर रहा था। पिंकी तो उनसे घुलमिल गयी थी। अब तो सच ही लिखने बैठा हूँ और सच कहूं तो मैं हीन भावना से ग्रस्त हो रहा था। पिंकी ने बाद में मुझे मेरी असहजता का अहसास दिलाया था। उसने कहा, 'तुम्हारा व्यवहार ऐसा नहीं होना चाहिए..जिस से भी मिलो, खुलकर मिलो..' मैंने कहा, ' मुझे न जाने क्यों इन व्यापारी लोगों से असुविधा सी होती है..और मैं हिंदी में बातचीत भी नहीं कर पाता..' पिंकी ने हैरान होते होते हुए कहा, ' पर वे लोग तो तुमसे बंगाली में बात कर रहे थे ..उन्हें तो बड़ा अच्छा लगा था जब मैंने उन्हें बताया था कि मैं एक सिख पंजाबी हूँ और मेरे हस्बैंड बंगाली.. इसीलिए तो वे तुमसे मिलना चाहते थे ..उन्होंने तो हमें सैटरडे शाम को घर पर बुलाया भी है.. कोई पूजा-पाठ है .. मैंने ये सुना तो तपाक से कहा, ' मैं नहीं जाऊँगा..तुम चली जाना..' पिंकी ने भी उतने ही तपाक से जवाब देते हुए कहा, ' अरे ये क्या बात हुई, मैं अकेले ? दोनों को बुलाया है, दोनों जायेंगे..' मैंने फिर से ना - ना किया तो उसने कहा कि अकेले तो वह बिल्कुल नहीं जाएगी और उन्हें मना कर देगी। पिंकी का मिज़ाज देखते हुए मैंने कहा, ' ठीक है, तुम ज़िद कर रही हो तो चलेंगे परन्तु मेरा मन तो नहीं है..' दो दिन बाद ही शनिवार था। उस सुबह ही पिंकी ने मुझे याद दिला दिया था कि शाम को केडिया भाभी के घर जाना है। ये सुन स्वतः ही मेरा मुँह बन गया था और पिंकी ने देख भी लिया था। उसने कहा, ' ऐसा मुँह मत बनाओ, मैं कह रही हूँ न कि वे अच्छे लोग हैं, तुम्हें वहां अच्छा लगेगा.. तुम्हें ऐसे लोगों के साथ उठना-बैठना चाहिए..वहां और भी कई लोग मिलेंगे..' मैंने कुछ न कहा परन्तु मैं जानता था कि वहाँ मुझे कैसा लगेगा।
पिंकी ने दिन में ही मेरे और अपने लिए, शाम को पहनी जाने वाली ड्रेस निकाल कर रख दी थी। मेरे लिए उसने काली टी-शर्ट और हल्के नीले रंग की जीन्स चुनी थी। मैंने देखा तो थोड़ा उखड़ गया, ' ये क्या ? मैं अपनी बंगाली पोशाक में ही जाऊँगा..मेरा कुरता-पजामा ही ठीक है..' पिंकी ने विरोध सा दिखाते हुए कहा कि ये टी-शर्ट मुझ पर बहुत खिलेगी। उसने यह भी कहा कि उसी के साथ मैच करती ड्रेस उसने अपने लिए भी निकाली है। दोनों अच्छे दिखेंगे। मैं न-न करता रह गया था परन्तु शाम को उसकी चुनी ड्रेस पहन तैयार हो गया था। हम दोनों नीचे आये तो मेरी माँ हमें देखती ही रह गयी थी। उन्होंने बिशाखा को लाल मिर्च जलाकर लाने को कहा, ' क्या जोड़ी सजी है.. आओ नज़र उतार दूँ .. ' फिर उन्होंने पूछा, ' वहां कैसे जाओगे ? पिंकी ने मेरी ओर देखा था। मैंने कहा, ' पास में ही तो जाना है.. पैदल ही चले जायेंगे या फिर टैक्सी ले लेंगे हैं..' अब पिंकी ने कहा, ' यहाँ की टैक्सी की हालत में देख चुकी हूँ..सो डर्टी एंड खटारा .. मैं टैक्सी में नहीं जाऊँगी.. वाक ही कर लेते हैं..' माँ ने कहा कि उनकी ऑफिस की कार आयी हुई थी क्यों कि उन्हें कहीं जाना था, वह हमें छोड़ देंगी। अब पिंकी ने कहा कि अपनी एक कार होनी चाहिए। फिर आवेश में उसने कहा कि उसके मामाजी के पास तीन कारें थी और जब उसने ऑफिस ज्वाइन किया था तब वे एक छोटी कार उसे देना चाहते थे। वह उनसे कहेगी तो वह भिजवा देंगे। माँ ने कहा, ' तुम दोनों देख लो ..जैसा ठीक लगे, करो..' मैंने कहा कि मामाजी से कार लेना उचित न था। पिंकी ने कहा कि संकोच की कोई बात न थी क्यों कि उस कार को ऐसे ही रखा हुआ था। मामाजी के लिए उसका कुछ उपयोग नहीं था। वह जब भी दिल्ली जाती थी तो इस कार को निकालती थी। उसने कहा कि वह रात को ही अपने मामाजी को फोन करेगी। मैंने न तो कहा था परन्तु उसमें एक तरह का हाँ छिपा था। मैं भीतर ही भीतर कुछ और ही सोच रहा रहा था कि कार आएगी तो पिंकी ही चलाएगी मुझे तो ड्राइविंग नहीं आती थी। माँ भी तैयार हो चुकी थी। उन्होंने हमें साथ लिया और अपने ड्राइवर से कहा, ' शिबू, इन्हें गुरुसदा रोड पर छोड़ते हुए जाना है..' रास्ते में उन्होंने बताया कि अगले दिन किसी क्लब के महिला विभाग की ओर से उन्हें एक गोष्ठी में आमंत्रित किया गया था और मनप्रीत को भी उनके साथ जाना होगा।
हम केडिया भाभी के नौवें फ्लोर के फ्लैट में पहुंचे तो वहां काफी धूमधाम देखी थी। मैंने पिंकी से पूछा, ' केडिया भाभी कहती हो परन्तु उनका नाम क्या है ..' पिंकी ने कहा, ' कोमल .. कोमल केडिया ..' उनका बहुत बड़ा फ्लैट था। लिफ्ट से उनके फ्लोर पर उतरते ही उनके घर पर हो रही पूजा का माहौल दिखने लग गया था। फूलों से पूरे फ्लोर को भव्य रूप से सजाया गया था। केडिया भाभी बहुत प्यार से मिली थी। उन्होंने पिंकी को गले लगाया, ' मनप्रीत, बहुत आभार, तुम आई हो, मेरे घर..चलो पहले मंदिर में दर्शन कर लो..' मुझे भी उन्होंने भैया कहकर नमस्ते कहा था। वह पिंकी को हाथ पकड़कर पूजा घर ले गयी। मैं पीछे पीछे था। उनका पूजा घर एक बड़े कमरे में था। एक ओर संगमरमर का अति सुन्दर मंदिर था। उसके सामने महिलाएं बैठी हुई थी। राधा-कृष्ण की मूर्तियां सजी हुई थी और भजन की ध्वनि महक रही थी। मैं अपरिचित और ठगा सा एक ओर खड़ा था। केडिया भाभी, पिंकी को अपनी माँ और अन्य महिलाओं से मिलवा रही थी। अचानक मैंने देखा कि बांग्ला टीवी की एक प्रसिद्द समाचार वाचिका भी वहां थी। भाभी ने पिंकी को उससे मिलवाया, ' ये मेरी नयी फ्रेंड हैं, मनप्रीत कौर.. ये चंडीगढ़ से आयी है..यहाँ कलकत्ता में इसकी बंगाली ससुराल है..' उस समाचार वाचिका से मैं बहुत प्रभावित हुआ करता था। उसका बांग्ला भाषा में वाचन और बंगाली साड़ी और माथे की बिंदिया मुझे बहुत प्रभावित किया करती थी। मेरा मन हुआ कि उससे मिलूं। तभी पिंकी ने मुझे इशारे से बुलाया और उससे कहा, ' ये हैं मेरे हस्बैंड, अभिजीत रॉय..' उसने मेरी ओर हाथ बढ़ा दिया और तपाक से हेलो कहा। उसके इस अंदाज़ से क्षण भर को मैं असहज हुआ क्यों कि समाचार पढ़ते उसे देखता था तो मुझे उसमें आदर्श बंगाली नारी दिखती थी। यहाँ वह एकदम आधुनिका नारी सी दिख रही थी। मैंने बांग्ला में कहा, 'आप यहाँ ? उसने केडिया भाभी की ओर इशारा करते हुए अंगेरजी में उत्तर दिया, ' कोमल मेरी पुरानी और बहुत अच्छी मित्र है ..' मैं कुछ और बात करता इससे पहले ही वह आगे बढ़ गयी थी और दूसरों से मिलने-जुलने लगी थी। मैं सोच में था कि दूरदर्शन पर ये कितनी सौम्य और बंगाली दिखती है और वास्तविकता में अत्यंत आधुनिक और फ़ास्ट लेडी। मैंने इधर-उधर नज़रें घुमाई। हर ओर मुझे वैभवता ही दिख रही थी। मैं सोचने लगा कि ये मारवाड़ी लोग कलकत्ता में आकर कितने धन वान हो जाते हैं। अपने क्षेत्र में तो ये लोग शायद किसी छोटी-मोटी दुकान के मालिक भी न हों। उस बंगाली समाचार वाचिका के व्यवहार और इस मारवाड़ी घर की भव्यता ने मुझे खिन्न सा कर दिया था। मैंने मौका लगते ही पिंकी से घर लौटने को कहा था। वह हैरान हो मुझे देखने लगी थी। उसने कहा कि अभी तो आरती होगी और उसके बाद खाना भी था, ऐसे में जल्दी से लौट जाना ठीक नहीं लगता। मैंने कहा कि किसी आवश्यक कार्य का बहाना बना दो। परन्तु उसने मेरी बात का नकार दिया था और मुझे भाभी के हस्बैंड के साथ बातचीत करने को कहा था। उसने दूर खड़े एक सज्जन की ओर इशारा करते हुए कहा, ' वह उधर खड़े हैं दिनेश भैया, आओ तुम्हें मिलवा दूँ ..' मुझे यह विचित्र सा लगा था। मैं जन्म से कलकत्ता का रहने वाला और यह पहली बार पंजाब से आयी लड़की, मुझे ही एक अन्य कलकत्तावासी से मिलवा रही थी। मैंने कहा, ' छोड़ो न, क्या करना है इनसे मिलकर..हमें तो अभी यहाँ से निकलना ही है ..' एक क्षण को मुझे उसका दिनेश भैया वाला संबोधन भी खटका था। मेरा शिकायती मन गतिशील हो रहा था। मैंने सोचा कि उन्हें मुझसे मिलना चाहिए था क्योंकि हम उनके घर आये हुए थे। पिंकी शायद मेरा मन भांप गयी थी। उसने कहा कि इतने लोग आये हुए थे शायद वह व्यस्तता में खुद से आगे बढ़ मिलने न आ पाए होंगे। उसने धीमे से यह बात कही थी। धीमी या मन ही मन में कही बात भी कभी कभी अपने गंतव्य तक पहुंच जाती है। कुछ ही समय में केडिया साहब, हम दोनों के पास चले आये और मुझसे से नमस्ते करते हुए कहा, ' बहुत अच्छा हुआ जो आप आये.. मनप्रीत जी से आपके बारे में सुना था .. आज मिलना भी हो गया.. आराम से बैठिये.. अपना ही घर समझिये ..' फिर उन्होंने आगे बढ़ते हुए कहा, ' आप भी सुबह मॉर्निंग वाक पर आया करिये..सुबह की सैर बहुत अच्छी होती है..हमारा ब्लड प्रेशर और शुगर तो इसी से कंट्रोल में रहता है..' मैं केवल मुस्कुरा दिया था और वह आगे बढ़ गए थे। पिंकी ने हल्की सी नाराज़गी दिखाते हुए मेरे कान में कहा, ' आपको कुछ कहना चाहिए था.. उन्हें अपने घर इन्वाइट करना चाहिए था..इसी तरह से तो दोस्ती बढ़ती है..' मैंने उसकी बात का उत्तर न दिया था परन्तु मेरा दिमाग़ संवाद कर रहा था। उसने कहा, ' ये व्यापारी और हर सम्बन्ध में लाभ-हानि सोचने वाले लोग, हमारे बंगाली स्वतंत्रता सेनानी के घर में क्या पाएंगे..'( आज यहीं तक, गुरुवार को आगे, यहीं पर ..)
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