Chander Dhingra's Blog

Wednesday, January 27, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -56

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra   http://chander1949.blogspot.com/?m=1                    (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  )   ( ५६ ) उस समय पिंकी ने मुझे इशारे से कहा था कि वह मम्मी जी को बाद में समझा देगी। जब वह मुझे एकांत में मिली तो परेशान सी दिखी थी। उसने कहा कि ये क्या बात हुई कि हम जवान लोग ड्राइविंग का आनंद न लें और ड्राइवर रखें ? मैंने उसे माँ की मंशा समझाने की कोशिश की थी कि कलकत्ता का ट्रैफिक बहुत भयंकर था और यहाँ खुद से गाड़ी चलाना सरल न था। परन्तु मेरी बात से वह संतुष्ट न हुई थी। उसका कहना था कि यदि कोई अन्य व्यक्ति ड्राइवर के नाम पर, गाड़ी चला सकता है तो हम क्यों नहीं ? मैं उसे समझाने की कोशिश करता रहा और अंत में विषय पर विराम लगाने के मकसद से यही कहा कि यह कलकत्ता था और यहाँ की बातें उसे धीरे-धीरे समझ में आयेंगी। वह हंसने लगी और उसने कहा, ' आप अंत में इसी बात पर आ जाते हो कि यह कलकत्ता है..पर इस विषय को मैं, धीरे-धीरे नहीं, तुरंत समझना चाहूँगी.. कार आने दो, जिस दिन आएगी, उसी दिन मम्मी जी को घूमाकर लाऊँगी.. तुम भी साथ में बैठना.. उन्हें महसूस होना चाहिए कि ड्राइविंग का आनंद क्या होता है   ..'  ऐसा ही हुआ था। कुछ ही दिनों में मामाजी ने अपने ड्राइवर के साथ कार भिजवा दी थी। ड्राइवर कार हमें दे, अगली संध्या की कालका मेल ट्रैन से लौट गया था। एक दिन बाद ही पिंकी ने कार में कहीं घूम आने की बात  उठाई थी। उसका आग्रह किसी शिशु-जिद्द की तरह था। मैं, बाबा और माँ भी उत्साहित हो, उसके साथ कार में बैठ लिए थे। उसने मुझसे गाइड बनने की बात कही थी । कुछ ठीक न था कि कहाँ जाएं, किधर से होते हुए जाएं ? हम लोग पार्क स्ट्रीट से होते हुए धर्मतला, डलहौजी से ईडन गार्डन, फोर्ट विलियम और विक्टोरिया मेमोरियल का चक्कर लगा कर लौटे। पथ में हम लोगों ने एक लोकप्रिय चाय के स्टाल पर रुक, मसाले वाली चाय भी पी थी।  हम सब के लिए यह एक अनूठा अनुभव था। बाबा तो बहुत ही आनन्दित थे। हमारे  घर के एक और छोटा सा मंदिर है। इसके आसपास एक बस्ती है। यहाँ रहने वाले लोग इस मंदिर में आये दिन पूजा-पाठ करते रहते हैं और इन आयोजनों के लिए चंदा वसूलते रहते हैं। उन्होंने जब पिंकी को ड्राइवर की सीट से निकलते हुए देखा तो पास आकर, माँ से कुछ बख्शीश मांगने लगे थे। उनकी बात में प्रार्थना या आग्रह नहीं, बल्कि एक तरह के दबाव का भाव था। मानों कह रहे हों, ' अमीर बहू घर आयी है, हमारा भी कुछ बनता है  ..'    मैं लिखता तो जा रहा हूँ पर कभी रुक कर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों है कि मुझे सब वृतांत स्पष्ट रूप से कैसे याद हैं ? खुद से बात करता हूँ तो पूछता हूँ, ' अभिजीत, तुम्हारी ज़िंदगी तो ठीक ही चल रही थी फिर ऐसा हो गया कि तुम खुद को दोषी मान बैठे ? इस पृथ्वी पर जो भी आया है वह अपने हिस्से के दोष का भागीदार बनने को विवश है। सभी भीड़ का अंग बनकर आगे बढ़ते जा रहे हैं, एक गहरी अंधी खाई में खुद को समाप्त करने के लिए। खाई में खुद को जब तक झोंक न दें तब तक, न जाने कितने मुखोटे पहनते, उतारते और फेंकते चले जाते हैं। कभी नियति, कभी दायित्व, कभी तहजीब, कभी यह, कभी वो, न जाने कौन कौन सी मज़बूरियां हैं जो हमें असत्य के साथ बांधें रखती हैं। सब के साथ तुम भी तो इसी चक्र का हिस्सा हो। तुम ही क्यों रुक बैठे, सत्य का प्रण ले ?  जब भी मेरे स्मृति-प्रवाह में इस तरह की लहर उठ आती हैं तो मैं ठहर जाता हूँ और खुद को प्रोत्साहित करने का प्रयास करता हूँ कि मुझे मन की इन अपरिचित लहरों ने ही तो आज तक पराजित किया था। ये दुबकी सी छिपी रहती हैं मेरे भीतर और न जाने क्यों कभी कभी उठ आती हैं, मुझे फिर एक बार भ्रमित और शंकित करने के लिए। परन्तु मैं तो निश्चय कर चुका हूँ खुद से ही युद्ध करने का। मैं पराजय में ही अपनी जय देखता हूँ।    हम दोनों के दिन बीत रहे थे। मैं कभी उत्साहित हो जाता था और कभी निष्पक्ष हो, एक ओर हाशिये पर आ जाता था। पिंकी सदैव उत्साहित थी। वह हर ओर अपना प्रभामंडल फैलाती जा रही थी। पिंकी ने माँ और बाबा के साथ साथ बिशाखा को भी प्रभावित कर लिया था। मार्निंग वाक वाले दल में वह प्रिय बन चुकी थी। अब तो खिलखिलाते हुए उसने बांग्ला शब्दों का प्रयोग शुरू कर दिया था। एक दिन ऑफिस से लौटने पर मैंने उसे माँ के साथ रबिन्द्र संगीत दोहराते हुए देखा था तो हैरान रह गया था। मैंने उसे कहा था कि वह तो बहुत अच्छा गा रही थी। वह खुश थी और चाहती थी कि वह किसी से यह संगीत भली भांति सीखे। माँ को उसका प्रस्ताव अच्छा लगा था और उन्होंने उससे तभी आश्वस्त कर दिया था कि वह इसकी व्यवस्था करवा देंगी। इस बीच पिंकी के मामाजी कलकत्ता दो तीन दिन के लिए आये थे। मुझे लगा था कि उनके प्रति मेरा एक दायित्व है। मैं उनका परिचय अपने कलकत्ता और बंगाल से करवाना चाहता था। मैं वह सब कुछ उन्हें दिखाना चाहता था जिसमें इतिहास था, कला थी और संस्कृति थी। परन्तु उनका प्रभाव कुछ ऐसा था कि वह ही मुझे और अपनी बेटी जैसी भांजी को हमारे नगर  का वह रूप दिखाते रहे जिससे अब तक, मैं ही अपरिचित था। कुछ अवसरों पर इन्द्राणी भी हमारे साथ थी। पिंकी ने ही उसे साथ ले लेने का सुझाव दिया था। कभी पांच सितारा होटल में खाना-पीना, कभी नामी क्लब में शाम, कभी खास रेस्टोर में लंच। पिंकी बहुत खुश थी और यह स्वाभाविक भी था। इन्द्राणी, मामाजी की शानोशौकत से प्रभावित थी। वह मुझे कई बार कह चुकी थी कि मैंने क्या तकदीर पाई थी। इन दिनों में मैंने पाया कि ज़िंदगी में बेफिक्री क्या होती है ?  बिना मोलतोल के कुछ भी खरीद लेना, कैसा सुख देता है। ये पसंद है, ले लो, ये माँ के लिए ले लो,ये इसके लिए, वो उसके लिए। घर पर जो है, पुराना और अप्रचलित है उसे फेंक, ये नया ले लो। यही सब चलता रहा था। मैं सबके साथ मुस्कुराते हुए घूम-फिर तो रहा था किंतु भीतर ही भीतर उदास और नाराज़ था। मैंने मामाजी से कलकत्ता की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मार्किट देखने को कहा तो वह अपनी घड़ी देख, समय का हिसाब लगाने लगे थे। फिर एक अवसर पर मैंने उन्हें टैगोर का पुस्तैनी घर दिखाने की बात की तो वह अगली बार कह कर टाल गए थे।  पिंकी चंडीगढ़ वाली नौकरी पर त्यागपत्र दे आयी थी। उसने मुझे जब यह बताया था तो मैंने ओके-गुड तो अवश्य कहा था परन्तु मुझे इसमें एक भूल दिख रही थी। उसे यह निर्णय लेने से पहले मुझसे बात कर लेनी चाहिए थी। पिंकी ने कहा था कि वह कलकत्ता में ही कोई नौकरी ढूंढ लेगी। वह यह भी चाहती थी कि मैं भी किसी नई और भविष्य चमकाने वाली कंपनी में प्रयास करूँ। उसके अनुसार मैंने सी ए में उच्च पच्चीस में स्थान में पाया था तो मुझे इस बैंक की नौकरी से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए था। मैंने जब उससे कहा कि इसके लिए मुझे कलकत्ता से बाहर जाना होगा तो उसने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, ' सो व्हाट .. ' मैं उससे मन की बात न कह पाया था बस अपना घर और माता-पिता का हवाला देकर विषय को टाल गया था। वास्तविकता यह थी कि मैं समझता था कि मुंबई, बंगलौर या किसी अन्य शहर में, खुश न रह पाऊँगा और अपनी बंगाली मानसिकता के साथ, अकेला जीवन बिताने को विवश हो जाऊँगा। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर.. )   

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