Chander Dhingra's Blog

Wednesday, January 20, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -55

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra  http://chander1949.blogspot.com/?m=1                                (  हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे  ..  )  ( ५५ )  चाय पी कर मीटिंग वाले सभागार में वापिस लौटा तो कुछ हलचल दिखाई दी थी। एक बजुर्ग नेता पहुँच चुके थे और सामने रखी कुर्सी पर बैठे हुए थे। किसी ने उनके सामने माइक  रखा तो उन्होंने कहा कि कुछ ही लोग हैं और माइक के बिना भी काम चल जायेगा और उन्हें इसकी आवश्यकता न थी। उन्होंने सम्बोधित करते हुए जानकारी दी कि अचानक मौसम के ख़राब हो जाने के कारण मीटिंग में सभी लोगों के न पहुँच पाने की संभावना थी। फिर उन्होंने दो नाम लिए और दोनों के लिए दा शब्द का प्रयोग किया था। स्पष्ट था कि वे दोनों वरिष्ठजन थे। उन्होंने सूचित किया कि उन दोनों की ओर से, मीटिंग में न आ पाने की सूचना आ चुकी थी। इसके बाद उन्होंने न जाने क्या-क्या बातें की थी। मुझे जो समझ  आया वह सार यह था कि बहुत कठिन समय आने वाला था और संगठन को मजबूत करने की आवश्यकता थी। रोबी दा भी ऑफिस में अपने सहयोगियों के साथ बैठ, जब भी बातें किया करते थे तो इसी तरह का स्वर सुनाई देता था। अचानक उन्होंने मुझे सामने आने का संकेत दिया। रोबी दा की ओर से मेरा परिचय देते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें गर्व था कि एक नामी परिवार का सदस्य वहां बैठक में आया था। उन्होंने यह भी कहा कि सी ए की डिग्री होने के बावजूद भी मैंने संगठन  को मजबूत बनाने के लिए हाथ बटाया था। उनका मानना था कि मुझ जैसे नवयुवकों को आगे आना चाहिए था। मुझे उनकी बातें अच्छी लग रही थी। कोई भी व्यवस्था युवाजन के बिना आगे नहीं बढ़ सकती, वह ठीक ही तो कह रहे थे। उन्होंने अंत में मेरे नाना के देश के स्वतंत्रता आंदोलन में विशिष्ट योगदान का भी जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि उन जैसे देशभक्तों के कारण ही देश ने अग्रेजों के शासन से आज़ादी पायी थी।  इस मीटिंग में भी प्लास्टिक के कप में चाय दी गयी थी। यह एक छोटी सी बात थी परन्तु अब मुझे ऐसा लगता था कि ये छोटी-छोटी बातें ही हमारे व्यवहार और कर्म के प्रति हमारी मानसिकता को तय करते हैं। क्या मुझ पर यह चंडीगढ़ प्रवास का असर था ?  मीटिंग समाप्त होने पर बाहर निकला तो ये लगता रहा था कि रोबी दा जिसे अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण मीटिंग कह रहे थे, उसमें ऐसा क्या था ? मेरे दिमाग ने प्रश्न तो उठाया था परन्तु मेरे मन ने तुरंत एक बहाना जैसा उत्तर भी दे दिया था, 'शायद, मौसम के ख़राब हो जाने के कारण मीटिंग अधूरी सी रह गयी थी..' अब मुझे घर वापिस पहुँचने की फ़िक्र थी। तेज वर्षा के कारण यातायात व्यवस्था लगभग टूट चुकी थी। मैं किसी तरह कलकत्ता के केंद्र बिंदु डलहौजी स्क्वायर पहुंचा था। वहां से मेरे घर की ओर जाने वाली बहुत सी बस उपलब्ध रहती हैं। घर पहुंचा तो मेरी दुर्दशा दर्शनीय हो चुकी थी। पिंकी ने देखा तो परेशान  हो गयी थी। उसने जल्दी से कपड़े बदलने को कहा। माँ मेरे प्रति उसकी बेचैनी को देख संतुष्ट हो रही थी। पिंकी ने कहा कि ऐसे मौसम में इतनी दूर जाने की क्या आवश्यकता थी ? वह दो बातों से हैरान थी। एक तो यह कि मैं अपना नया वाला मोबाइल साथ क्यों नहीं ले गया था और दूसरे, इस ख़राब मौसम में, मैंने टैक्सी क्यों न ली थी ? मैं उसे क्या समझाता ? बस इतना कहा कि मोबाइल ले जाना याद न रहा था और उस इलाके में वापसी के लिए टैक्सी मिली ही नहीं थी। मैं जानता था ये दोनों बातें असत्य थी। मोबाइल के लिए मैं चिंतित था कि बारिश के कारण वह ख़राब हो सकता था, इसलिए न ले गया था और टैक्सी के लिए मैंने प्रयास ही नहीं किया था क्यों कि ऐसे मौसम में कलकत्ता के टैक्सीवाले अपनी मनमानी करते हैं और दुगना-तिगुना किराया वसूलते हैं। पर  इस चंडीगढ़ की लड़की को क्या-क्या बताता ? कभी कभी थोड़ा-बहुत झूठ बोलना आवश्यक हो जाता है। किसी बात को अपने हिसाब से, झूठ के सहारे, कैसे नया रंग दिया जा सकता है, यह कला, न जाने मैंने किससे सीखी थी ? कहा जाता है कि हम अपने माता-पिता का कुछ अंश स्वाभाविक रूप से पा जाते हैं। यह अंश जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच छिपा और दबा सा रहता है परन्तु परिस्थिति विशेष में उभर कर सामने आ जाता है। उस क्षण जो हमारे माता-पिता के समकालीन होते हैं वे बरबस कह उठते हैं, 'अरे ! ऐसा तो तेरी माँ किया करती थी.. या, यह तो एकदम अपने पिता की तरह कर रहा है..' हमारे माँ-बाप हमारे भीतर ही समाये होते हैं, हमेशा के लिए। उस दिन जब मैंने छोटी सी घटना को नया रूप दिया था तो कभी कहीं पढ़ा या सुना, यह तथ्य याद गया था। मैं सोचने लगा था कि यह गुण मुझे माँ से मिला था या पिता से ?   पिंकी मेरी दशा देख परेशान तो थी परन्तु उसने मुझे सहज करने के लिए, हँसते हुए कहा, ' यह मौसम तो गरमागर्म पकोड़े और चाय-काफी का है.. अभी बनाती हूँ.. ' उसने इशारे से बिशाखा को बुलाया। मैं फ्रेश हो चुका था और माँ के पास आकर बैठ गया था। कुछ ही समय में पिंकी एक बड़ी प्लेट में पकोड़े लेकर आ गयी थी। उसने हँसते हुए कहा, ' ये हैं हमारे पंजाबी पकोड़े .. आज केवल प्याज और आलू के ही हैं ..फिर किसी दिन गोभी, पनीर, बैगन और अण्डों के पकोड़े भी खिलाऊँगी .. '  फिर उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' लगता है यहाँ काफी के शौकीन नहीं हैं..आज चाय ही सही परन्तु अब से इस घर में चाय के साथ साथ कॉफी का ऑप्शन भी रहा करेगा..' मैंने अपने बाबा की ओर देखा। वह बहुत आनंदित दिख रहे थे। चाय-पकोड़ों का आनंद लेते हुए न जाने क्यों मैंने पिंकी के मामाजी से कार लेने वाली बात उठा दी, ' तुमने मामाजी से बात की क्या ? पिंकी ने बताया कि उसने नहीं की थी क्यों कि मैं स्वयं ही तो इसके पक्ष में न था। पिंकी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ' आज देखा, कितनी असुविधा हुई.. टैक्सी नहीं मिली.. और मामाजी की वो मारूति तो ऐसे ही बेकार खड़ी है..मेरे ख्याल में तो ले लेनी चाहिए..' इस बार मैंने कुछ न कहा परन्तु मेरी ख़ामोशी वह समझ गयी और उसने कहा, ' मैं आज ही मामाजी बात करती हूँ..'  उसने रात में अपने मामाजी से बात की और जैसा अनुमान था, मामाजी तुरंत राजी हो गये। उन्होंने हँसते हुए कहा, ' चलो, अच्छा है, इस मारुती रानी को कलकत्ता की सड़कों पर घूमने-घामने का मौका मिलेगा..यहाँ तो बेचारी घर में बंद रहती है..' मामाजी ने मुझसे भी बात की थी और मुझे मारुती कार के कई गुण समझाए थे। उन्होंने यह भी कहा कि वह कार भिजवाने की व्यवस्था करवा देंगे और कुछ ही दिनों में यह कार पहुँच जाएगी। मैं रोमांचित हो रहा था। मैंने मन ही मन सोचा कि मुझे अब ड्राइविंग क्लास लेनी होंगीं। एक ऐसा स्कूल तो हमारे घर से बाहर निकलकर ही मुख्य सड़क पर लगभग सौ मीटर की दूरी पर ही है। उसके बहुत से पोस्टर और गाड़ियां मैं अक्सर देखा करता था। उस समय मुझे उसी ड्राइविंग स्कूल का ख्याल आया था। मैंने पिंकी को बताया तो वह हंसने लगी थी। उसने कहा, ' गाड़ी आयी नहीं और ड्राइविंग स्कूल पहले ही आ गया..अच्छा है, जब तक गाड़ी कलकत्ता आये, ड्राइविंग सीख लोगे..कल से ही ज्वाइन कर लो..सुबह बहुत समय होता है.. मैं जॉगिंग पर जाऊँगी और आप ड्राइविंग पर ..' मैं उसे क्या कहता, उसका उत्साह देखता रह गया था। पिंकी ने कहा कि कल सुबह मैं उसके साथ चलूँ और इस ड्राइविंग वाले मामले को तय कर आएं। मैंने जब कहा कि यह सब इतनी जल्दी नहीं होता और माँ-बाबा से बात करनी होगी तो वह मेरा मुँह ताकती रह गयी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' बड़ों की सलाह लेना अच्छी बात है परन्तु कार और ड्राइविंग जैसे मामलों में आत्मनिर्भर होना चाहिए.. वर्ना ड्राइविंग करोगे कैसे  ..' मैंने कहा, ' ठीक है  ..कल जब ड्राइविंग स्कूल ज्वाइन कर लूंगा तो आकर माँ को बता दूंगा..'  सुबह पिंकी ने मुझे समय से जगा दिया था। वह पूरी तैयारी में थी। मैं आज नहीं कल करता रह गया था परन्तु वह मुझे तैयार करा नीचे लेकर आ गयी थी। वह आजकल अपनी मारवाड़ी भाभी के साथ लेक तक जाती थी। कुछ ही समय में वह लोग अपनी कार लेकर आ गए। उन्होंने गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। मुझे देख वे हंसने लगे और भाभी ने मुझसे कहा, ' अच्छा है, भाई साहब आप भी सुबह की सैर पर आने लगे   ..' पिंकी ने उन्हें पूरी बात बताई। यह लेक कलकत्ता की बहुत सुन्दर लेक है। कहा जाता है कि इसकी परिकल्पना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने की थी। यहाँ सुबह का नज़ारा देखने योग्य था। इतने लोग, दूर-दूर तक लगी गाड़ियां और इतनी चहल-पहल। मैं सबके साथ खामोश सा लेक के इस छोर से उस छोर तक चलता रहा था। मुझे अच्छा लग रहा था। एक घंटे के बाद जब हम लोग लौटने को हुए तो उन भाई साहब ने एक ड्राइविंग स्कूल की गाड़ी को देख कहा, ' आइये, आपका काम यहीं करवा देते हैं..' हम उस गाड़ी के पास पहुंचे। उन्होंने ही ड्राइवर और प्रशिक्षक से बात की। वह स्वयं ही स्कूल का कर्ता-धर्ता भी था। यह तय हुआ कि अगले दिन से इसी समय वह मुझे ट्रेनिंग देगा। हम सब एक साथ आएंगे। एक घंटा पिंकी और वे लोग सैर करेंगे और मैं अपनी ड्राइविंग क्लास।  उसने एक फॉर्म पर वहीं  मेरे हस्ताक्षर लिए और कहा कि मैं कल एक फोटो और फीस जमा कर दे दूँ। सब कुछ बहुत सरलता से हो गया था। मुझे उसी क्षण से लगने लगा था कि मैं अब अपनी कार चला सकता था और पिंकी को बगल में बिठा दूर तक जा सकता था।  घर पहुंचे तो माँ ने हँसते हुए स्वागत किया। उन्होंने पिंकी का हाथ पकड़ कहा, ' मनप्रीत, यह बहुत अच्छा काम किया जो अभिजीत को सुबह उठा, सैर पर ले गयी..वह कुछ कहती इससे पहले ही मैंने ड्राइविंग सीखने वाली बात बताई। उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी मैंने आशा की थी। उन्होंने इसे खारिज़ करते हुए, बाबा को बुलाया और कहा, ' ये लोग कलकत्ता जैसे सड़कों पर खुद कार चलाएंगे ? ये खतरनाक काम नहीं होगा.. ड्राइवर रखो..देखते नहीं कितने एक्सीडेंट होते हैं, यहाँ.. ' हम दोनो शांत थे। 

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