Chander Dhingra's Blog
Wednesday, January 13, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 54
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( हफ्ते वार इस लंबी कहानी को साझा करने का सिलसिला जारी है। आज गुरुवार है, अब आगे .. )
( ५४ ) उस राजस्थानी परिवार के उत्सव में खाना तो शाकाहारी होना ही था। मैं तो हमेशा से नॉन वेजेटेरियन खाने का शौकीन रहा हूँ परन्तु यहाँ जो खाना खिलाया गया था, वह भी मुझे अच्छा लग रहा था। पिंकी बहुत आनंद के खा रही थी। उसकी नयी बनी मित्र और भाभी, उसके प्रति विशेष स्नेह दिखा रही थी। खाने के बाद भी उन्होंने हमें रोके रखा था और अपने सगे-सम्बन्धियों से पिंकी का परिचय करवाया था। वो लोग एक-दूसरे से संपर्क नंबर ले-दे रहे थे। पिंकी आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी। मुझे अच्छा तो लग रहा था परन्तु मैं नहीं चाहता था कि मेरी पत्नी इन व्यवसायी परिवारों में घिरती चली जाये। अब जब सत्य को अपने साथ लेकर बैठा हूँ तो छुपाने का प्रयास नहीं करूँगा। उस दिन मैं एक हीन भावना से ग्रसित हो रहा था। उस धनाढ्य मारवाड़ी परिवार में, मैं खुद को जमा नहीं पा रहा था। मैं उनकी व्यावसायिक सफलता से अपने बंगाली समाज की असफलता को जोड़ कर देख रहा था। मैं भीतर ही भीतर तैश में था। एक द्वन्द सा था जो मुझे विचलित किये जा रहा था। मैं खुद को सहज-सरल दिखाने को विवश था। मेरी अत्यंत विकट स्थिति बनी हुई थी। दूसरी ओर पिंकी थी जो सभी से सरलता और मुक्त ह्रदय से मिलजुल रही थी। वह अपने नाम के अनुरूप मनप्रीत बनी हुई थी। वह मेरी ओर देखती तो मैं मुस्कुरा देता था। मेरी मुस्कान में एक तरह का सन्देश छिपा होता था कि अब हमें चलना चाहिए। वह यह छिपा सन्देश पढ़ भी लेती थी और इशारे से कहती कि बस थोड़ी देर में चलते हैं।
कुछ समय बाद हम विदा लेने को तैयार हुए तो पिंकी की केडिया भाभी ने उसे प्रसाद के नाम पर एक बड़ा सा पैकेट पकड़ाया। पिंकी ने कहा कि हम तो प्रसाद ग्रहण कर चुके थे। उन्होंने कहा कि ये घर वालों के लिए था। फिर उन्होंने अपनी कार से हमें पहुंचा देने की पेशकश भी की। मुझे अच्छा तो नहीं लग रहा था परन्तु पिंकी ने थैंक यू और सो नाइस आदि कह दिया था, मुझे मान लेना पड़ा था। कार में बैठते ही मैंने कहा, ' ऐसी जगहों पर मैं असुविधा महसूस करता हूँ..प्लीज, भविष्य में मुझे साथ चलने के लिए मत कहना..' पिंकी ने आश्चर्य सा भाव दिखाया मानों कह रही हो, ' अरे यह क्या बात हुई..' कुछ क्षण बाद उसने कहा, ' पहली बार मिले थे न इस लिए कम्फर्टेबल नहीं थे..दोस्ती हो जाएगी तो ठीक हो जायेगा..मुझे भी शुरू में ऐसा ही लगा था पर बाद में मुझे ये लोग अच्छे लगने लगे..' उसकी इस बात पर मैंने कोई प्रतिक्रिया न दी थी। पिंकी को शायद लगा था कि मैं उसकी बात से सहमत हो गया था परन्तु मैं सोच रहा था कि बाद में यह खुद ही समझ जाएगी कि व्यावसायिक समाज के लोगों से घनिष्टता अच्छी नहीं होती। बौद्धिक स्तर पर हम उनके साथ नहीं मिल सकते। हमारा घर अधिक दूर न था। कुछ ही मिनटों में हम घर के सामने थे। पिंकी ने हैरानी दिखाते हुए कहा, ' अरे पहुँच भी गए ? मैंने कहा, ' हाँ, वाकिंग डिस्टेंस ही तो है.. हम आराम से पैदल चल कर आ सकते थे..तुमने बेकार में उनकी कार ली..' पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' मैंने क्या ली..वो इतने प्यार से कह रही थी तो ना कहना अच्छा थोड़े ही लगता ? पिंकी ने भैया कहकर ड्राइवर को धन्यवाद दिया था। उसने भी आदर के साथ गुड नाइट कहते हुए, फिर से कभी आने के लिए कहा था। उसके हावभाव से मैं समझ गया था कि वह बिहार का था। उस समय मैंने सोचा था कि इस तरह के ड्राइवर और काम वाले मिलना सौभाग्य की बात थी। साथ ही मैंने यह भी सोचा कि इन व्यापारी अमीर लोगों से इन्हें अच्छी तनख्वाह मिलती है तभी तो ये अच्छे से काम करते हैं।
ऊपर घर पर प्रवेश करने पर माँ को प्रतीक्षा करते पाया था। वह कुछ गंभीर भी दिखीं थी। मैंने इशारे से पूछा कि सब ठीक था न ? उन्होंने कहा, 'हाँ, सब ठीक है..' फिर उन्होंने पिंकी की ओर देखते हुए कहा, ' मनप्रीत, कैसी रही तुम्हारी पूजा-पार्टी ? पिंकी मुस्कुरा दी, 'पार्टी नहीं मम्मी जी ..पूजा और लंगर प्रसाद.. बहुत अच्छा लगा..पर आपका बेटा वहां बोर हो रहा था..' माँ ने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' इसका पूजा-पाठ में दिल थोड़े ही लगेगा..ये बचपन से ही ऐसा है..अच्छा सुनो, कल का कोई कार्यक्रम न रखना.. कल मनप्रीत को मेरे साथ कहीं जाना है..' मैंने मामला जानना चाहा तो माँ ने बताया कि जद्दूबाबू बाजार इलाके के किसी पंजाबी परिवार की एक घटना, वहां के पुलिस थाने में दर्ज हुई थी। पारिवारिक हिंसा का मामला था। क्षेत्र के सांसद ने उन्हें फोन किया था कि माँ को परिवार वालों से जाकर मिलना चाहिए। बाद में पुलिस थाने और स्थानीय विधायक के फोन भी आये थे। अब बात यह थी कि विधायक विपक्ष की पार्टी के थे। सांसद जो वामफ्रंट के थे, मेरे नाना के अनुयायी थे, वह चाहते थे कि माँ, मनप्रीत के साथ वहां जाये ताकि माँ की पंजाबी बहू होने का प्रभाव डाला जा सके। पिंकी ने जब यह सब सुना तो उत्साहित हो गयी थी। उसने कहा, ' मैं तो जरूर जाऊंगी..और बंगाली साड़ी पहनूंगी..' माँ ने उसे टोक दिया, ' अरे, बंगाली साड़ी किसी और दिन पहनना..कल तो तुम्हें पक्की पंजाबन बनकर मेरे साथ जाना होगा..मामला एक पंजाबी परिवार का है..समझी ? पिंकी हंसने लगी। बाद में उसने गहरे लाल रंग की पंजाबी ड्रैस निकालकर मुझे दिखाई थी और पूछा था कि वह ड्रेस अगले दिन के लिए कैसी रहेगी ? मैंने बिना देखे कहा था, ' जो भी पहनो, ठीक है..' उसने कहा, 'ये क्या बात हुई, बिना देखे कह रहे हो कि ठीक है ? मैं थोड़ा सा झुंझला गया था। मैंने कहा, ' अब मैं क्या कहूं..बंगाल में हो तो तुम्हें यहाँ जैसी ही दिखना चाहिए.. यहाँ भी पंजाबी ही बन कर रहना चाहती हो तो मैं क्या कहूं ? वह मुझे देखती रह गयी थी। उसने कहा कि वह तो मम्मी जी के आदेश का ही पालन कर रही थी, उन्होंने ही उसे पंजाबी ड्रेस पहनने को कहा था। मैंने आँखे चुराते हुए, उसकी बात में सहमति जताई थी परन्तु मेरे दूसरी ओर मुंह फेर लेने से वह मेरा मन भांप गयी थी। उसने कहा, ' मम्मी जी की बात को न तो नहीं कह सकती.. और देखा जाये तो उनका कहना गलत नहीं है क्यों कि वह मुझे किसी पंजाबी सिख परिवार में ले जा रही हैं..' मैंने बात को समाप्त करते हुए कहा था, ' चलो छोड़ो इस बात को..तुम जानोऔर माँ जाने..'
अगले दिन माँ और पिंकी अपने मिशन पर निकलने को तैयार थे। मैं पिंकी को देखता रह गया था। उसने इशारे से पूछा कि वह कैसी लग रही थी ? मैं मुस्कुरा दिया था। मुझे मुस्कुराता देख, वह खिलखिलाई और माँ की ओर देख बोली, ' मम्मी जी मैं रेडी हूँ.. चलें.. ' माँ भी तैयार हो चुकी थी। दोनों राज्य महिला आयोग का बोर्ड लगी गाड़ी में निकल गए थे। मुझे अच्छा तो न लग रहा था कि माँ उसे अपने शासकीय कार्य में ले गयी थी परन्तु मैं समझ पा रहा था कि इस तरह के कार्यों में जोड़तोड़ तो लगाया ही जाता है। इसके साथ, इसी बहाने नवविवाहिता पंजाबी बहू को कलकत्ता की गतिविधियाँ देखने को मिल रहीं थी। मैं औंधें लेटे हुए कल्पना कर रहा था कि वो दोनों अब तक घटना स्थल वाले घर पहुँच गए होंगे और माँ अपने मिज़ाज़ के हिसाब से रुवाब दिखा रही होंगी और पिंकी चुपचाप एक ओर खड़ी, कलकत्ता के सिख-पंजाबी परिवार की स्थिति का अंदाज़ा लगा रही होगी। शायद कुछ ही समय में वह उस परिवार में घुलमिल भी जाएगी। साथ ही साथ सोच की एक अन्य लहर भी दौड़ी चली जा रही थी कि क्या मेरी पत्नी का इस तरह से सब से घुलमिल जाना और सब को अपना बना लेना, न जाने, हमारे पारिवारिक जीवन के लिए कैसा होगा ? उसने मेरे माँ-बाबा, बिशाखा, बाबा के मित्र और मेरे काका के साथ साथ, केडिया परिवार और उस बांग्ला टीवी की समाचार एंकर को तो प्रभावित कर ही लिया था। माँ, महिला आयोग के काम में उसका सहयोग अपने लिए अच्छा मानने लगी थी। केडिया भाभी ने तो मानों उसे अपनी सबसे प्रिय सहेली बना लिया था। वह टीवी एंकर जिससे मैं प्रभावित हुआ करता था, अपना विजिटिंग कार्ड पिंकी को दे चुकी थी और उससे आश्वासन ले चुकी थी कि कभी वह पंजाब सम्बंधित टीवी कार्यक्रम बनाएगी तो उसमें उसे जरूर भाग लेना होगा। पिंकी का मोबाइल नंबर भी उसने, मनप्रीत कौर के नाम से रख लिया था। मैं इन ख्यालों में भटका हुआ था कि रोबी दा का फोन आ गया था। उन्होंने क्षमा दर्शाते हुए बात आरम्भ की थी। उन्होंने कहा कि वह समझ सकते थे कि मैं अपनी पत्नी के साथ व्यस्त होऊँगा और अवकाश का आनंद ले रहा होऊंगा परन्तु उनकी आवश्यकता अपरिहार्य थी। उन्होंने मुझे संध्या चार बजे एक बैठक, जो काशीपुर क्षेत्र में होने जा रही थी, में उनके प्रतिनिधि के रूप में जाने का आग्रह किया था। उन्होंने बताया था कि अस्वस्थ होने के कारण वह न जा पा रहे थे। उन्होंने आयोजकों को इसकी सूचना भी भिजवा दी थी। रोबी दा ने आग्रह शब्द तो कहा था परन्तु उनके स्वर में निर्देश का भाव था। मैं क्या कहता ? ' ठीक है, रोबी दा ..' कहने के अतिरिक्त मेरे पास कोई विकल्प न था।
काशीपुर एक भीड़भाड़ वाला क्षेत्र है। वहां पहुँचने के लिए काफी समय लग जाता है। मुझे वैसे भी वह क्षेत्र अच्छा न लगता था। उस दिन कलकत्ता का मौसम भी प्रतिकूल था। वर्षा अपना विराट रूप दिखाने के मिज़ाज़ में थी। बेमना सा मैं, परेशान था। मैंने बिशाखा को बुला, उसे मेरे लिए खाना बनाने को कहा था। मैंने उसे कहा कि मुझे किसी अत्यंत आवश्यक कार्य के लिए बाहर जाना था। वह मुझे देखती रह गयी मानों कह रही हो, ' बहूमाँ तो आ जाए .. एक साथ खाना..' मैंने भी उसका मन पढ़ लिया था और कहा, ' माँ अपनी बहू को लेकर गयी हुई हैं.. वे दोनों कब कब लौटेंगी, कुछ ठीक नहीं.. मैं खाना खा कर निकल जाता हूँ.. बहुत आवश्यक कार्य है, मैं विलम्ब नहीं कर सकता..तुम उन्हें बता देना ..'
जैसा अनुमान था वैसा ही हुआ था। मेरे घर से निकलने के कुछ समय बाद ही मौसम ने करवट ले ली थी। तेज प्रवाह से हवाएं चलने लगी थी और जोर से वर्षा होने का आभास होने लगा था। कलकत्ता की सड़कों में पानी जमने में देर नहीं लगती। मैं गरियाहाट तक पैदल चल पहुंचा था और वहां से किसी तरह एक भीड़भाड़ वाली बस में चढ़ तो गया किन्तु मैं समझ पा रहा था कि एक-डेढ़ घंटे बाद जब गंतव्य पर उतरूँगा तो मेरी दशा कैसी होगी ? मेरे जूते भीग चुके थे और छाता अपने काम में नाकाम हो रहा था। मैं रोबी दा को मन ही मन कोस रहा था कि उन्होंने मुझे फँसा दिया था। काशीपुर पहुँचने पर मैं टूट चुका था। इधर-उधर पूछते हुए बैठक स्थल पर पहुंचा था। यह पार्टी का उस क्षेत्र का कार्यालय था। कुछ ही लोग आये हुए थे। मैंने अपना परिचय संयोजक महोदय को दिया तो उन्होंने एक कुर्सी की ओर बैठने का संकेत किया और आगे निकल गए थे। सब खामोश बैठे थे। लगता था वे सब मेरे ही तरह किसी वरिष्ठ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और आपस में उनका एक-दूसरे से परिचय न था। मेरे पास बैठे सज्जन ने मौसम का हवाला देते हुए बात आरम्भ की थी। उसका आरोप था कि नगर की जलनिकासी की पुख्ता व्यवस्था नहीं की जा रही थी। वह मेरी ही उम्र का युवक था। वह अपनी ओर से कई बातें किये जा रहा था। वह जिस स्थान से आया था, वह काफी दूर था और तीन बसें बदलकर वहां पहुंचा था। मैं उसकी बातें चुपचाप सुने जा रहा था। मैंने उससे केवल इतना कहा, ' मीटिंग कब आरम्भ होगी, समय तो हो चुका था ? उसने तीन नाम लिए थे और बताया था कि जब तक वे नहीं पहुँच जाते, मीटिंग आरम्भ होने का प्रश्न ही नहीं था। अब मैं उठा और बाहर चला आया था। सामने एक चाय की दुकान थी। वहां एक कप चाय पी थी। हम कलकत्ता वासी चाय के लिए कप शब्द का प्रयोग करते हैं परन्तु यहाँ यह चाय का कप, एक मिटटी का भाड़ होता है जिसे गैर बंगाली लोग कुल्हड़ कहते हैं। मैंने एक सिगरेट भी सुलगायी थी हालाँकि पिंकी को याद कर मैंने दो कश के बाद ही उसे एक ओर फेंक दिया था। मैं सोच रहा था कि अब तक वह घर आ चुकी होगी। मुझे यह भी आभास था कि उसने माँ का अच्छे से सहयोग किया होगा और उस पीड़िता को न्याय का पूरा भरोसा दिया होगा। पीड़िता ने पिंकी में एक सच्ची सहेली देखी होगी। माँ ने अपने मिशन की सफलता पर, घर पहुँचते ही कई जगह फोन किये होंगे और घटना को बढ़ा -चढ़ा कर बताया होगा। वह अपनी बहू पर स्नेह वर्षा कर रही होंगी और अपना स्नेह कुछ यूँ दर्शाया होगा, ' मनप्रीत, आज तुम्हारे हाथ के बने,आलू के पराठें खाने का मन है..'
( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर .. )
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