Chander Dhingra's Blog
Wednesday, February 3, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 57
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ५७ ) समय आगे बढ़ते चला जा रहा था और साथ ही मेरे मन से वैवाहिक जीवन की गुलाबी रोमांटिकता को फीका भी कर रहा था। मैं यह परिवर्तन महसूस कर पा रहा था। परन्तु लगता कि यह समय से पहले हो रहा था। पिंकी हमेशा की तरह उत्साहित ही थी। वह तो दिन दिन व्यस्त होती जा रही थी। माँ के महिला आयोग वाले कामों में हाथ बटा रही थी। माँ को भी उसका साथ और सहयोग अच्छा लगता था। माँ ने उसे रबिन्द्र संगीत की शिक्षिका से मिलवा दिया था। यह शिक्षिका माँ की पुरानी परिचित थी और पिंकी जैसी सुन्दर और गैर-बंगाली लड़की को अपनी छात्रा के रूप में पा बहुत प्रसन्न थी। पहले दिन मैं ही पिंकी को लेकर उनके पास गया था। पिंकी की गायन क्षमता जानने के लिए जब उन्होंने उसे कुछ गाने के लिए कहा तो पिंकी ने एक पंजाबी भजन सुनाया था। मैं गुरुद्वारे में इस भजन को सुन चुका था। वह शिक्षिका जिन्हें मैं मानसी मासी के नाम से जानता था, बहुत प्रभावित हुई थी। उन्होंने कहा था कि मनप्रीत को रविंद्र संगीत सीखने में अधिक कष्ट न होगा। केवल शब्दों के उच्चारण पकड़ने होंगे। यह तय हुआ था कि सप्ताह में दो दिन वह उनके पास जाया करेगी। घर आकर जब माँ को यह बताया तो वह भी कहने लगी कि उन्हें पूरा विश्वास था कि मनप्रीत इस नए संगीत में दक्षता पा लेगी। उन्होंने मेरी ओर देखते हुए हंसकर कहा, ' तुम भी तो रविंद्र संगीत गाते हो और अच्छा गाते हो, अब दोनों में प्रतिस्पर्धा होगी ..' मैं तो चुप था बस हल्का सा मुस्कुरा दिया था परन्तु पिंकी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी थी। उसने कहा, ' मैंने इनका गाना सुना है मम्मी जी, इनके जैसा अच्छा तो मैं कभी न गा पाऊँगी ..'
हम तीनों की बातचीत चल ही रही थी कि बिशाखा एक लिफाफा मेरे हाथ में दे गयी। उसने कहा कि लेटर बॉक्स में था। मैंने देखा तो पाया कि वह मनप्रीत कौर रॉय के नाम का था। मैंने उसे पकड़ाते हुए कहा, ' यह तुम्हारा है ..' वह हैरान रह गयी थी और उसने कहा, ' वाह, कलकत्ता के पते पर मेरा पहला लेटर ..' उसने जब खोलकर पढ़ा तो मेरी ओर देख बोली, ' अरे ! यहाँ तो काम बहुत फ़ास्ट होता है..वो जो अप्लाई किया था, उनका जवाब आ गया है ..' उसने पत्र मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने पढ़ा तो सब समझ आ गया। उसने कलकत्ता के बहुत बड़े और नामी होटल में एकाउंट्स हेड के पद के लिए आवेदन किया था, उसे मिलने के लिए बुलाया गया था। बाबा भी यह सब सुनकर वहां आ गए थे। मैंने कहा, ' पिंकी का इंटरव्यू कॉल आया है ..' बाबा ने पत्र लिया और पढ़ने लगे। उन्होंने कहा कि यह कोई औपचारिक इंटरव्यू लेटर नहीं लगता, सैलरी आदि की बात करना चाहते हैं.. शायद मनप्रीत का सिलेक्शन उन्होंने कर लिया है..' मुझे भी अब ऐसा ही लगा था। मैंने कहा, ' जरूर किसी सरदार जी के हाथ में चयन का अधिकार होगा, मनप्रीत कौर नाम देखकर बुला रहे होंगे वर्ना ऐसा थोड़े ही होता है..' पिंकी ने भी हँसते हुए बात को लिया, ' अच्छा, आपके यहाँ कैंडिडेट का सिलेक्शन नाम से कर लेते हैं.. सी वी वग़ैहरा नहीं देखते ? मैंने मुस्कुराते बात को टाल दिया और कहा, ' दो दिन बात बुलाया है..मैं तुम्हारे साथ चलूँगा.. ' पिंकी फिर एक बार हँसी, ' अच्छा, क्या मेरा स्कूल का एडमिशन है जो गार्डियन बनकर साथ जाओगे.. मैं खुद चली जाऊँगी.. अब तो मेरे पास अपनी कार भी है..' उसकी इस बात पर मुझे थोड़ी बौखलाहट हुई थी। मैंने कहा,' इधर फाइव स्टार होटल में नौकरी करोगी, उधर संगीत की क्लास और फिर माँ के साथ महिला आयोग का काम भी.. इतना सब कर पाओगी..' उसने चुटकी लेते हुए कहा, ' चिंता मत करो.. हम पंजाब के हैं..काम से घबराते नहीं हैं..' अब तो मैं चिढ़ ही गया था। मैंने कहा, ' ये पंजाब-बंगाल क्या है ? मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था..बड़े होटल के एकाउंट्स को संभालना, काफी मेहनत का काम होगा.. काफी समय देना पड़ेगा..तुम्हें लगता है कर लोगी, तो ठीक है.. मुझे क्या..' अब माँ ने कहा कि वहां मिलकर आओ और देखो क्या दे रहे हैं, सैलरी ठीक होनी चाहिए। बाबा को इन सब विषयों का अधिक अनुभव था। उन्होंने कहा कि ऐसी कंपनियों में सैलरी आड़े नहीं आती, यदि कैंडिडेट पसंद है तो वे लोग अच्छी सैलरी ही देते हैं। मैं चुप था। कुछ समय बाद मैंने पिंकी से गंभीर होते हुए कहा कि डाक्यूमेंट्स वगैरह ठीक से रख लेना।
माँ का इधर-उधर आना-जाना इन दिनों बढ़ गया था। उन्होंने कहा कि शाम को किसी सेमिनार में जाना था। उन्होंने सेमिनार का कार्ड पिंकी को देते हुए कहा, ' मनप्रीत, चलोगी ? पिंकी ने कार्ड को सरसरी रूप में देखा और कहा, ' हाँ, मम्मी जी, क्यों नहीं, ये सेमिनार तो स्टेट्समैन वालों का है, अच्छा ही होगा ..' शाम को समय से माँ और पिंकी निकल गए थे। मैं अपने ख्यालों में उलझा हुआ, सुबह का और अब तक बासी हो चुका अख़बार एक बार फिर से कुतरने लग गया था। मेरी दृष्टि समाचारों से अलग स्थानीय विज्ञापनों पर घूम रही थी। अख़बार में छपी जिन बातों को हम अक्सर नज़रअंदाज़ करते रहते हैं, वे सब ऐसे उदास क्षणों में सामने आ जाती हैं। अक्सर बहुत कुछ हमारे आसपास होता रहता है और हम अपरिचित रहते हैं। मैंने देखा, एक जाने माने चाइनीस रेस्टोरेंट की हमारे इलाके में ब्रांच खुल चुकी थी। मुझे तो पता ही न था। यूँ ही खुद से उलझते मैं नीचे उतर आया और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कोने वाली पान की दुकान पर एक ओर को टिक सामने दौड़ती-भागती सड़क को देखता रहा। वह दुकान वाला अच्छे से मुझे जानता था। उसने अपनी ओर से मेरी तरफ सिगरेट बढ़ा दी। फिर उसने कहा कि भाभी बहुत होशियार हैं और क्या आत्मविश्वास के साथ कार चलाती हैं और उसकी दुकान के सामने से तेजी से कार में निकल जाती हैं। मैंने उसकी बातों का जवाब न दिया था और आगे बढ़ गया था।
मैं सिगरेट के कश लगाते हुए, बिना गंतव्य सोचे, चला जा रहा था। फिर मैंने खुद को अपनी बुआ के घर के सामने पाया। शायद भीतर कहीं मेरा मन यहीं आना चाहता था। मैंने डोर बेल बजायी तो बुआ ने ही दरवाज़ा खोला था। वह मेरे दायें बायें देखने लगी। उन्होंने कहा, ' बहू कहाँ है ? मैंने कहा, ' पिशी, वो माँ के साथ किसी काम पर गयी है..मैं घर में अकेला था तो आपसे मिलने चला आया.. ' उन्होंने कहा कि मैंने ठीक किया था और अपनी पिशी से मिलने आया था। उन्होंने मुझे स्नेह से बिठाया और घर का हालचाल पूछने लगी। मैंने पूछा, ' इन्द्राणी घर पर नहीं है ? उन्होंने कहा कि इन्द्राणी ऊपर अपने कमरे में थी और स्कूल का काम कर रही थी। मैं ऊपर चला गया। इन्द्राणी भी मुझे अचानक देख हैरान हो गयी थी। उसे भी मुझे बताना पड़ा कि क्यों मैं अकेला आया था। कुछ इधर-उधर की बातें हुई और उसने चुटकी लेते हुए पूछा, ' और वैवाहिक जीवन कैसा चल रहा है ? मैंने कहा कि सब ठीक था और पिंकी सबकी चहेती बनती जा रही थी। जब बातें और आगे बढ़ी तो छिपता हुआ मेरा मन सामने निकल आया। मैंने कहा, ' अब तो यह मान ही लेना होगा कि हम, दो भिन्न स्टेट्स के संस्कारों और परम्पराओं से जुड़े हैं, समायोजित होने में समय तो लगेगा ही..' इन्द्राणी के लिए इतनी सी बात का इशारा काफी था। उसने कहा कि वह समझ सकती थी। यह सांस्कृतिक अंतर स्वाभाविक था। ( आज यहीं तक, आगे अगले गुरुवार को, यहीं पर ..)
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