Chander Dhingra's Blog

Wednesday, February 24, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) - 60

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra     http://chander1949.blogspot.com/?m=1  ( ६० )  पिंकी ने इन कुछ माह में ही अपने कार्य स्थल पर अच्छी खासी जगह बना ली थी। हर शाम हम परिवार वाले मिलते तो पिंकी की ही बातें होती थी। उसके घर लौटने का समय अब अनिश्चित सा हो गया था। अक्सर देर से पहुँच पाती थी। आज ये हो गया था, आज वो हो गया था.. आज मीटिंग थी.. आज वहां जाना पड़ गया था ..' वह घर आती तो ऐसी बातों से ही शुरुवात होती थी। एक दिन मैंने उसे कहा था कि अपने काम में उतना ही उलझना चाहिए, जितना आवश्यक हो, उससे अधिक नहीं। परन्तु उसने कहा था कि अपने काम को उस स्तर तक ले जाना चाहिए जो श्रेष्ठम हो, भले ही इसके लिए कितना ही श्रम और समय क्यों न देना पड़े। बाबा मेरी बात में सहमति जताते और उसे कहते कि वह थक जाती होगी। इस पर वह कहती कि क्या उन्हें वह थकी-हारी दिखती थी ? उसका तर्क होता कि जब वह किसी दायित्व को सम्पूर्णता में निपटाती है तो उसे जो संतोष मिलता है वह उसके लिए सबसे विश्राम वाला पल होता है। वह सदैव स्फूर्ति से भरी दिखती थी। मुझे सुस्ताता देखती तो हँसते हुए कहती, ' क्यों, क्या आज फिर अधिक खा लिया है ? बिशाखा से कहूँगी, आपको माछ-भात कम दिया करे .. ' मैं मुस्कुरा देता था और कहता, ' चलो, तुमने माछ-भात कहना तो सीख लिया है.. आराम भी आवश्यक है, ज़िन्दगी में.. तुम भी सुस्ता लिया करो.. माछ-भात खा कर.. ' उसका जवाब होता, ' संडे है न रिलैक्स करने के लिए ..'  मैं उसकी बात पर मन ही मन सोचता कि इस  लड़की ने अपनी कैसी दिनचर्या बना रखी है। सप्ताह में सुबह चार दिन जॉगिंग और दो दिन म्यूजिक क्लास जाती है, फिर भागते-दौड़ते प्रातः के कर्म निपटाती है और बाय मम्मी जी - बाय पापा जी कहते हुए, अपने होटल की तरफ दौड़ती है। घर लौटने का कोई निश्चित समय नहीं। संडे की बात कर रही है पर उस दिन तो यह बिशाखा को छुट्टी दे देती है। उसे कहती है, ' दीदी, आज आप बैठो...आज मैं खिलाती हूँ...' इसके अलावा माँ भी उसको अपने साथ यहाँ-वहाँ ले जाने को आतुर रहती है। पिंकी को अपने साथ ले चलने में क्या माँ को एक तरह का आत्मबल मिलता था ?  मैंने निश्चय किया कि एक रविवार को पिंकी को साथ लेकर कहीं घूमने जाया जायेगा। मैंने उसे दो दिन पहले ही कहा था, 'संडे को फ्री रहना.. हम लोग कहीं दूर जायेंगे.. ' फिर मैंने उसे बताया कि सुबह बेलूर मठ जायेंगे, लंच एक खास बंगाली होटल में खाएंगे और फिर एक पिक्चर देखेंगे..' वह बहुत खुश थी। उसने कहा, ' बंगाली पिक्चर दिखानी होगी..लवली पूछती रहती है कि कोई बंगाली पिक्चर देखी या नहीं ? मुझे उसका प्रस्ताव अच्छा लगा था। मैंने कहा कि बंगाली पिक्चर ही देखेंगे। मैं दो दिन तक रविवार का इंतज़ार करता रहा था। आज रविवार था। हम दोनों ही उत्साहित थे। रात को ही यह तय किया था कि सुबह ही निकल जाएँगे। सब ठीक था कि पिंकी के लिए उसके कार्यालय से फ़ोन आ गया था। कुछ विशेष कार्य आन पड़ा था और उसे बुलाया जा रहा था। पिंकी ने स्पष्ट शब्दों में इनकार कर दिया था। उसने कहा कि उसके कुछ कार्यक्रम पहले से ही तय थे और किसी भी हाल में उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता था। हम घर से निकल ही रहे थे कि उसका मोबाइल बज उठा था। ये उसके विभाग के वरिष्ठ प्रबंधक का कॉल था। पिंकी, एक ओर होकर मोबाइल पर ग़ौर से बात सुनती रही और यस सर कहकर मेरे पास आयी। उसने कहा, ‘ मैं होकर आती हूँ .. इस काम को टाला नहीं जा सकता .. मैं एक-दो घंटे में ही आ जाऊँगी..’ मैंने कहा, ‘ तुम्हें एकदम पक्का होकर ना कहना चाहिए था.. सप्ताह में एक दिन तो अपने लिए होना ही चाहिए..’ उसने कहा, सर ने ख़ुद कॉल किया था, उन्हें ना नहीं किया जा सकता..’ मैंने कहा,’क्यों नहीं.. आज संडे है..’ उसने कहा, ‘ जब दायित्व होता है और किसी को आप पर विश्वास होता है तो ना नहीं कर सकते..’ मैंने कहा,’ तुम्हारी जगह मैं होता तो कभी न जाता..’ पिंकी को मेरी बात असत्य सी लगी थी। उसने कहा, ‘ क्या आप अपने रवि साहब को उस दिन ना कर पाए थे ? थोड़ा संयम रखो ..मैं होकर आती हूँ .. बेलूर मठ किसी अन्य दिन चले जायेंगे ..आज लंच एक साथ लेंगे और पिक्चर भी देखेंगे ..और दोनों बंगाली ..’ उसने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ दबा दिया था। मैं परेशान तो हो रहा था परंतु मैं भी मुस्कुरा दिया था। मैंने कहा, ‘ चलो ..जल्दी आना .. लेकिन तुम्हारे ऑफिस के काम और रोबी दा के काम में फ़र्क़ है ..वह सामाजिक दायित्व है.. दोनों का अंतर तुम्हें समझना चाहिए ..’ उसने कुछ भी उत्तर न दिया और मुस्कुराते हुए निकल गयी थी, यह कहकर कि जल्दी आने की कोशिश करेगी। मैं उसकी प्रतीक्षा में उबासियाँ ले रहा था। एक बंगाली उपन्यास हाथ में था जो मेरा साथ दे रहा था। मैं पन्ने उलटता रहा और उस कहानी को किसी-किसी मोड़ पर खुद से जोड़ता रहा था। अचानक घड़ी में देखा तो सुइयाँ एक बजे की स्थिति को पाने की होड़ में दौड़ रही थीं। अरे! यह पंजाबी लड़की अभी तक नहीं आयी ? यह बेचैनी उस उपन्यास के लेखक पर पड़ी थी। मैंने प्रथम पृष्ठ पर छपे उसके नाम को अपने पैन से इस तरह से उलझाया था कि उसके अर्थ को अनर्थ कर दिया था और पुस्तक को अलग पटक दिया था। लगभग दो घंटे बाद पिंकी ने घर में प्रवेश किया। वह सॉरी -सॉरी कह रही थी और मैं खामोश था। उसने कहा,' क्या बताऊँ.. निकल ही रही थी तो निखिल ने खबर दी और मैं रुक गयी ..निखिल ने कहा कि अजय देवगन होटल में आ रहा था  .. मैंने सोचा उसे पास से देखने का मौका है .. थोड़ी देर रुक जाती हूँ..मेरा पसंदीदा एक्टर है ..बस यह थोड़ी देर, अधिक होती चली गयी और मैं वहीं  अटक गयी.परन्तु,  इस रुकने का फायदा भी हुआ..मेरी एक फोटो उसके साथ खिंच गयी है..मिलेगी तो लवली को भेजूंगी..' वह किसी बच्चे की तरह एक साँस में कह गयी थी। मैं बहुत ही अधिक कुढ़ा हुआ था और भूख से भी ग्रस्त था। मैंने मन ही मन उसके सहायक निखिल को मनपसंद गाली दी और उसे कहा, ' एक तो सुबह का प्लान खत्म हो चुका था और अब तुमने लंच भी बेकार कर दिया.. अजय देवगन है क्या जो उसके लिए इतनी देर तक छुट्टी बेकार कर दी ? उसने मुझे देखा और कहा, ' सॉरी पर अजय देवगन को पास से देखने का मौका था.. कैसे छोड़ देती ? मैंने कहा, ' वो पंजाबी है इसीलिए न ? पिंकी ने मुझे घूरते हुए कहा, ' ये बात नहीं है.. वो अच्छा अभिनेता है और मेरा पसंदीदा है.. क्या तुम ने उसकी कोई फिल्म देखी है ? और  पंजाबी-वंजाबी वाली बात होती तो आज मैं यहाँ ने होती.. मेरी तरह उसने भी एक बंगाली से शादी की है..' वह हँस रही थी। मैंने पैर पटकते हुए बिशाखा को आवाज़ दी और पूछा, ' कुछ खाने को मिलेगा, तुम्हारी बहू माँ ने लंच के बारह बजा दिए हैं..' पिंकी ने हँसते हुए कहा, ' बारह लंच के नहीं हम सरदारों के बजते हैं ..आपके लंच के तो तीन बज रहे हैं.. देर हो रही थी तो मैं रास्ते से तुम्हारा मनपसंद चाइनीस पैक करवा कर लायी हूँ .. आओ मुझे भी बहुत भूख लग रही है..' उसने बैग से लंच के चार डिब्बे निकाले। मैंने देखा, वह एक महंगे रेस्टॉरेंट का खाना था। मैंने कहा, ' इतने महंगे रेस्टॉरेंट से लाने की क्या जरूरत थी..' उसने फिर से चुटकी लेते हुए कहा ..' कभी कभी चलता है..हर बार महँगा-सस्ता नहीं देखा जाता..' बिशाखा ने प्लेटें लगा दी। पिंकी ने मुझे बुलाते हुए कहा, ' जल्दी आओ, अभी गरम है, खा लो ..' भूख तो लगी हुई थी, मैं खाने बैठ गया था। पिंकी भी चाव से खा रही थी। उसने बिशाखा से पूछा, मम्मी जी-पापा जी खाये छे ? '  इन दिनों वह बांग्ला बोलने का प्रयास करती थी। मैंने कहा, ' और नहीं तो क्या तुम्हारे इंतज़ार में बैठे रहते ? उसे मेरे कहने का अंदाज़ अच्छा न लगा था, ' वे दोनों तो घर पर ही खाने वाले थे..बाहर जाकर तो हम दोनों को ही खाना था..आप बिना वज़ह नाराज़ हो रहे हैं ..कभी कभी ऐसा हो ही जाता है.. इसमें इतना कुछ खोजने की क्या जरुरत है..' कभी हल्की सी बात भी अनचाहे ही गहरी हो जाती है। शायद उस दिन ऐसा ही हुआ था। आज सालों बाद याद कर रहा हूँ तो खुद पर क्रोधित और शर्मशार हो रहा हूँ। पिंकी अपने दायित्व को ही तो निभा रही थी। उसे शायद मुझसे सहानुभूति और कुछ स्नेह भरे शब्दों की आशा थी। एक मैं था, जो अधिक तो न बोल रहा था परन्तु मेरी बातों में एक तंज़ का स्वर था। किसी अभिनेता के प्रति झुकाव किसी भी लड़की के लिए स्वाभाविक है। एक उम्र के लड़के लड़कियों में यह होता ही है। मैं स्वयं भी तो उन दिनों एक बंगाली अभिनेता के प्रति आकर्षित हुआ करता था। उस दिन वह स्वादिष्ट लंच एक फ़ांस सा हो गया था। हम दोनों खा तो रहे थे परन्तु खामोश थे। ऐसा खाना केवल पेट के लिए होता है। वह भूख को समाप्त तो कर सकता है परन्तु आनंद और संतुष्टि नहीं दे सकता।  शाम को सरलता लाने के मकसद से मैं पिंकी के करीब आया था। वह माँ के बिस्तर पर ही विश्राम कर रही थी। मैंने उसे कहा, ' पिक्चर चलना है न ? उसने तुरंत तो उत्तर न दिया परन्तु मेरे दोबारा पूछने पर कहा, 'अब मन नहीं हो रहा .. थोड़ा सिरदर्द भी है ..आज नहीं, फिर कभी ..' मैंने उसे मनाने की कोशिश न की थी और न ही कुछ अधिक बोला था।  मैंने केवल कहा, ' मैं समझ सकता हूँ.. काम का प्रेशर हो रहा है, तुम पर..आराम करो ..' वह बोली नहीं ऐसी कोई बात नहीं है .. चलो चलते हैं..बेलूर मठ जाने और बंगाली लंच का कार्यक्रम तो खत्म हो गया है.. अब  बंगाली फिल्म का कार्यक्रम तो हो ही जाये.. चलो, मैं पांच मिनिट में तैयार हो जाती हूँ.. ' वह एक बार फिर से अपने स्वभाविक खुशमिज़ाज़ स्वरुप में थी। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर )

No comments:

Post a Comment