Chander Dhingra's Blog

Wednesday, March 3, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -61

टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                 http://chander1949.blogspot.com/?m=1    ( ६१ ) हम दोनों घर से निकलने को हुए तो कुछ तय न किया था कि कौन सी पिक्चर देखेंगे। मैंने पिंकी को सुझाव दिया कि हिंदी पिक्चर ही देख लेते हैं। उसने तुरंत न कर दिया, ' नहीं, आज तो बंगाली मूवी ही देखेंगे... आज के दो कार्यक्रम नष्ट हो चुके हैं, अब बंगाली पिक्चर भी न देखी तो पूरा दोष मुझ ही आ जायेगा.. ना, आज तो बंगाली मूवी ही देखनी है '  घर के बाहर आ मैंने कहा कि बंगाली पिक्चर के लिए तो दूर के सिनेमा हॉल में जाना होगा जब कि हिंदी पिक्चर पास के ही सिनेमा हॉल में चल रही थी और वहां हम पैदल ही जा सकते थे। पिंकी हंसने लगी, ' ये दूर-पास का बहाना न चलेगा..मैं कार की चाबी लेकर ही आयी हूँ... जितना भी दूर जाना हो, पिक्चर तो बंगाली ही देखेंगे...' वह दूर खड़ी अपनी कार की ओर बढ़ गयी थी। हमारे घर का कार का गैराज है किंतु अपनी कार न होने के कारण हमने उसे किराये पर दे रखा था। पिंकी की कार घर के एक कोने में खुले में रखनी होती थी। उसने देखा कि कार पर कुछ गंदे कपड़े, धोकर सूखने के लिए डाले हुए थे। ये साथ की बस्ती के लोगों का काम था। पिंकी मुझसे पहले भी इस बात की शिकायत कर चुकी थी कि हर सुबह उसे उन कपड़ों को हटाने के लिए, बस्ती वालों को आवाज़ देनी होती थी और उसे विलम्ब हो जाता था। मैंने उसे तब कहा था कि मैं उन लोगों को कह दूँगा। आज फिर अपनी कार पर कपड़ों को पाया था वह गुस्से में आ गयी थी। उसने मुझे कहा, ' देखो, ये हाल है.. अब पहले इन्हें हटाओ फिर कार निकालो ...मैं नहीं कुछ करुँगी ... जो कुछ करना है, आप ही करो ... मुझे मेरी कार पर गंदगी नहीं चाहिए...जिनके कपड़े हैं अपने घर में सुखायें...मेरी कार इस काम के लिए नहीं है... ' मैंने उससे शांत रहने को कहा और बस्ती के एक लड़के को आवाज़ देकर बुलाया और कपड़े हटा देने को कहा। पिंकी ने कहा, ' आज ही नहीं..कभी भी कार पर कपड़े नहीं होने चाहिए... अगर दिखे तो मैं छोडूंगी नहीं...चाहे पुलिस को रिपोर्ट करनी पड़े...' मैं उसे शांत रहने का प्रयत्न करने लगा। लड़का कपड़े समेट ही रहा था कि उसका पिता सामने आ गया था। उसने शायद पुलिस शब्द सुन लिया था। उसने मुझसे कहा, ' इतना क्या हो गया कि भाभीजी नाराज़ हो गयी हैं... खड़ी गाड़ी पर दो-चार कपड़े सूखने डाल देने से क्या गाड़ी ख़राब हो जाएगी ? मैं उसे जानता था और शान्तु दा कहकर बुलाता था। मैंने उसे समझाते हुए कहा कि ऐसी कोई बात नहीं थी बस कार पर कपड़े न डाला करो। उसने कहा, ' रात भर  कार की देखभाल भी हम ही तो करते हैं... भाभी तो पुलिस की बात कर रही है...अब तो इस कार से हम दूर ही रहेंगे... बड़े लोगों की बात है, हम तो गरीब काम-काजी लोग हैं ...' उसकी बात में एक तरह का तंज़ था। मैं समझ रहा था कि असल में वह क्या कह रहा था। मैंने उस शांत रहने का इशारा किया और पिंकी को कहा कि चलो।  हम दोनों निकल तो आये परन्तु पिंकी का मूड उखड़ा हुआ था। उसने कहा कि वह आदमी तो गुंडा जैसा लग रहा था और मुझे उससे डाँटकर बात करनी चाहिए थी। उसने कहा, ' चंडीगढ़ होता तो इसे दिखा देती...' मैंने कहा, ' इन लोगों के मुँह नहीं लगना चाहिए... बाद मैं मौका देखकर मैं इसे समझा दूँगा   ...' पिंकी ने हूँ कहकर, गाड़ी के एक्सीलेटर पर पैर दबा दिया था। उसने कहा कि ऐसे लोगों से उन्हीं की भाषा में बात की जानी चाहिए, ' कल देखती हूँ, अगर मेरी कार पर कपड़े सुखाये तो देख लूंगी...' मैंने उसे गुस्सा दिखाते हुए कहा, ' अब बस भी करो, कहा तो है, मैं बात करूँगा...वे बस्ती के काम काजी लोग हैं, उनसे सोच-समझकर  निपटना होता है...' पिंकी अभी भी सहज न थी। उसने कहा, ' देखती हूँ आपकी समझदारी और टेक्ट ?  हम लोग कार को एक और खड़ा कर बाहर आ गए। सिनेमा हॉल के प्रवेश द्वार के ऊपर बड़े पोस्टर को देख वह हंसने लगी। पोस्टर में फिल्म के नायक के गले में फूलों की मालायें डाली हुई थी। उसने हैरान होते हुए कहा, ' ये क्या, हीरो का ऐसा सम्मान ?  मैंने कुछ न कहा बस उसे अंदर आने को कहा। पिक्चर हॉल का वातावरण देख कर वह चौंक गयी थी। शायद यह चंडीगढ़ से भिन्न सा था। यह एक बंगाली फिल्म प्रचलित फिल्म थी। मैं जानता था कि बांग्ला सिनेमा जिसने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की हुई है, से यह पूर्णतः उससे अलग फिल्म थी। मैं उसे यह फिल्म न दिखाना भी न चाहता था परन्तु विवश था। पिंकी किसी तरह फिल्म देखती रही थी। पूरा समय वह कभी हंसती, कभी चुटकी लेती और कभी हैरान हो जाती थी। उसे वहां का माहौल और दर्शक वर्ग अच्छे न लगे थे। फिल्म समाप्ति पर बाहर आये तो उसने कहा, ' इससे अच्छा तो हिंदी फिल्म ही देख लेते...' मैंने उसे समझाते हुए कहा, अरे ! ऐसी फिल्में भी बनती हैं, ये आम लोगों के लिए हैं... किसी अन्य दिन अच्छी बांग्ला फिल्म देखेंगे...सत्यजीत रे और मृणाल सेन का नाम सुना है न ? उसने कहा, ' मैं जानती हूँ कमर्शियल सिनेमा होता है... परन्तु ये फिल्म तो उस हिसाब से भी नहीं थी, ये तो रूढ़िवादी भावनाओं को प्रोत्साहित करने वाली, बहुत ही बेकार फिल्म थी... समय बेकार गया ... इससे अच्छा तो घर में ही आराम करते और टीवी देखते...' मैंने चिढ़ते हुए कहा, ' अब बस भी करो...तुम्हें सत्यजीत रे की फिल्म दिखाऊंगा.. तब तुम्हें पता चलेगा कि असली सिनेमा क्या होता है और कहानी क्या होती है ...'  हम घर पहुंचे तो कार खड़ी करते हुए फिर से वही बात आ गयी, ' फिर से मेरी कार पर कपड़े सूखते हुए दिखे तो देखना, कैसा मज़ा चखाती हूँ, इन गधों को...' मैंने कहा, ' अंदर चलो, उन लोगों ने सुन लिया तो बे वजह एक झंझट उठ खड़ा होगा... ऐसे लोग तो मौके की तलाश में रहते हैं कि कोई इशू मिले   ...' हम अंदर आये तो माँ ने फिल्म के बारे में पूछा। फिल्म का नाम सुनते ही वह पारंपरिक बंगाली अंदाज़ में छी.. छी.. करने लगी थी। उन्होंने कहा, ' अरे! कोई अच्छी फिल्म दिखाते...' पिंकी ने चुटकी लेते हुए, व्यंग्य भाव से कहा, ' इन्हें ऐसी ही फिल्में पसंद होंगी, इसीलिए मुझे ले गए थे ...' मैं झेंप गया था। पिंकी ने कार पर कपड़े सुखाने वाली बात भी माँ को बताई। मैंने कहा, ' तुम्हें कहा है न, मैं बात करूँगा ...अब माँ को बताने की क्या जरुरत थी...' माँ ने मेरा विरोध करते हुए कहा कि बताया तो क्या हुआ था ? साथ ही उन्होंने मुझे हिदायत देते हुए कहा, शांतु से कहना कि मैंने मना किया है, हमारी कार पर कोई कपड़ा-वपडा न डाले ...मेरा नाम लेना... वो बदमाश आदमी है, तुम्हारी बात न सुनेगा ...' मुझे माँ की यह बात ठीक न लगी थी। मैंने कहा कि शांतु मेरी बात क्यों न सुनेगा ? माँ की बातों से पिंकी भी थोड़े जोश में आ गयी थी।   सुबह रोज की तरह वह अपने ऑफिस के लिए निकली थी। उसने देखा कि एक पुराना और एक गन्दा जीन्स पेंट उसकी कार की शोभा बड़ा रहा था। वह गुस्से में आ गयी थी और उसने उसे एक ओर फेंक दिया था और कार स्टार्ट कर निकल गयी। मैं ऊपर बालकोनी से देख रहा था और समझ रहा था कि यह  ठीक न हुआ था। शाम को वह देर से लौटी थी। वह थकी हुई भी लग रही थी। मैंने सुबह वाली बात उठाई और उससे कहा कि किसी का कपड़ा एक और नहीं फेंक देना चाहिए था। उसने मुझे निराशा से देखा और कहा कि आज का दिन वह बहुत व्यस्त रही थी और थकी हुई थी और इस फ़िजूल से विषय में नहीं उलझना चाहती थी।  मैंने व्यंग्य के स्वर में कहा, ' तुम और थकान, कैसी पंजाबी लड़की हो ? उसने भी कड़ा सा जवाब दिया, ' हाँ, पंजाबी लोग थकते थोड़े ही हैं... वे तो स्टील के बने होते हैं ..' उसने बिशाखा से भी जोर के भाव में कहा, ' दीदी, कुछ खाने को मिलेगा ? कुछ भी दो जल्दी दो.. इस पंजाबी लड़की को भूख भी लगती है...' मैं उसका मुँह ताकता रह गया था। उसने जल्दी जल्दी जो भी परोसा गया था, खाया और ऊपर कमरे में चली गई थी। मैंने वहां जाकर उससे पूछना चाहा तो वह एक बार फिर से छिटक गयी और कहा, ' आप रहने दो...अपने रोबी दादा की छत्र छाया में आराम करो... मुझे आज सोने दो...'  मैं क्या कहता बस यही सोचकर रह गया कि एक बड़े संस्थान के दायित्व पूर्ण पद पर काम कर रही है, तो मानसिक दबाव होगा ही। हम दोनों चुपचाप लेट गए थे। एक-दो घंटे बाद मैंने उसे टटोलने का प्रयास किया तो उसने झुंझलाते हुए मुझे अलग कर दिया और दो शब्द कहे, ' सोने दो... ' इन दो शब्दों में इतना प्रभाव था कि मैं एक ओर हो गया था और काफी देर तक जागता रहा था। मैं सोच रहा था कि कहीं उसका कोई अपरिचित रूप तो सामने नहीं आ रहा था ? सुबह, वह हर दिन की तरह सामान्य थी। बिशाखा और माँ से हँस-हँस कर बातें कर रही थी। रात वाला आक्रोश अब उसके चेहरे पर न था। उसने बताया कि वह दिन भी खूब व्यस्त जाने वाला था। तीन मीटिंग्स भी थी। मैंने उसे कहा कि अगर ऐसी बात थी तो उसे उस दिन म्यूजिक क्लास छोड़ देनी चाहिए थी। उसने एक अनोखा सा अंदाज़ दिखाते हुए कहा, ' अरे वाह ! ऑफिस में काम है तो सुबह की रूटीन मिस कर दूँ ? हम पंजाबी हैं, बाबू मोशाय ! किछू भी छोड़ेंगे नहीं.. ' वहऑफिस के लिए तैयार हो नीचे आ गयी थी। उसने देखा कि कार का एक चक्का बैठा हुआ था। वह परेशान हो गयी थी। उसने नीचे से ही बिशाखा और मुझे आवाजें दी। मैंने बालकनी से झाँका तो उसने इशारे से मुझे कार का बैठा हुआ चक्का दिखाया। मैं दौड़ता हुआ नीचे गया। वह गुस्से में थी, ' देखो, क्या किया है ...'   मैंने कहा, ' अरे पंचर हो गया है ? तुम आज टैक्सी से चली जाओ ...' उसने कहा, ' पंचर नहीं हुआ है...हवा निकाली  गयी है... और इन लोगों को सिर पर चढ़ाओ...' मैंने उसे धैर्य रखने को कहा। भाग्य से एक टैक्सी मिल गयी और मैंने उसे बिठाया और रवाना किया। जाते जाते वह गयी कि अपने उस बदमाश दादा से इस समस्या को सुलझा कर रखना। पिंकी तो चली गयी थी परन्तु मैं उसकी कार को ठीक करवाने में लग गया था और विलम्ब से अपने ऑफिस पहुंचा था। मैं बहुत खिन्न हो रहा था और सोच रहा था कि कार को रखना तो सरल काम न था। ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर ... )

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