Chander Dhingra's Blog
Wednesday, March 24, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 64
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ६४ ) पिंकी ने कार स्टार्ट की और मुझे साथ बिठा, मेरे ऑफिस की ओर तेज रफ़्तार में निकल गयी थी। कुछ देर तक हम दोनों ही खामोश थे। मैंने कहा, ' अब खुश ? तुम्हारी कार की कोई समस्या न होगी...' उसने कहा, ' ये बात नहीं है, कार हो या कोई अन्य मशीन, कभी न कभी ब्रेकडाउन तो होगा लेकिन कोई बदमाशी कर परेशान करे तो उससे तो निपटना ही चाहिए ...और ये केवल मेरी कार नहीं है...ये हम सब की है... हमारी फॅमिली कार है...' मैंने कहा, ' नहीं, तुम्हारी ही है, तुम ही चलाती हो... तुम्हारे मामा ने दी है तो तुम्हारी ही है...' उसने कहा, ' आप भी चलाया करो, किसने रोका है... चलो, कल से ड्राइविंग की प्रैक्टिस कराते हैं...पर इसके लिए सुबह तो आपको ही उठना पड़ेगा...' मैंने कुछ न कहा परन्तु मैं समझ न पाया था कि मैं किसी सामान्य युवक की तरह कार को दौड़ाना चाहता था या किसी भ्रमित से बंगाली युवक की तरह, कार को, समाज के एक विशेष वर्ग का प्रतीक दिखा, उस से दूर रह, स्वयं को बौद्धिक स्तर पर ऊँचा दिखाना चाहता था ? शायद मैं चाहता था कि पिंकी भी कार न चलाये और हम लोग एक ड्राइवर रख लें। कभी-कभार परिवार के साथ कहीं दूर आना-जाना करें।
मेरा ऑफिस आ गया था। पिंकी ने एक ओर कार रोकी। वह नीचे उतर आयी थी। उसने मुझे मुस्कुराते हुए देखा, ' चलो जो हुआ अच्छा ही हुआ, मम्मी जी ने होशियारी से काम करवा दिया, वैसे ये सब काम हम दोनों को ही निपटा देने चाहिए... एक और बात है, ये जिसे गरीब आदमी कह रहे हो न, वह गरीब कम बदमाश ज्यादा है... चक्के में हवा तो उसी ने निकाली थी... वह आगे भी ऐसा ही करता रहेगा... आप देखते जाओ...' वह कार की ओर मुड़ी तो मेरे अधीनस्थ कार्य करने वाला दिलीप सामने आ गया था। उसने आदर से पिंकी को देखा और कहा, ' नमस्ते, भाभीजी... आप रोज गेट तक आकर चली जाती हैं... आज भीतर भी आइये... ' पिंकी ने कहा, ' आज नहीं भैय्या... फिर किसी दिन, आज पहले ही देर हो चुकी है... आप भी किसी दिन आइये न हमारे घर, मिसेज को लेकर... पंजाबी खाना खिलाऊंगी... ' पिंकी यह कह,कार में बैठ आगे बढ़ गयी थी। मैं और दिलीप सड़क पार कर, ऑफिस गेट की ओर बढ़ गए थे। दिलीप ने कहा कि भाभी बहुत ही स्मार्ट थी और कैसे होशियारी के साथ कार चलाती थी। मैंने हूँ.. कह उसकी बात को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की थी। मैं सोच रहा था कि पिंकी को ऐसे ही किसी से भी इतना अपनापन नहीं दिखाना चाहिए। इस दिलीप को मैं अच्छे से पहचानता हूँ। ये अब सबको कहता फिरेगा कि मेरी वाइफ कैसे स्मार्टली कार चलाती है और उसने उसे सपत्नीक अपने घर पर आमंत्रित कर, पंजाबी खाने की दावत दी है।
मुझे पिंकी का यह खुलापन एक तरह की असुविधा दे रहा था। मैं सोच रहा था कि वह जिस तरह के खुले माहौल से आयी है तो उसका इस तरह का व्यवहार स्वाभाविक था, परन्तु मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि वह बदले हुए माहौल में स्वयं को बदल क्यों नहीं रही थी ? उसे अच्छे से विदित था कि वह एक दूसरे राज्य और भिन्न भाषा-संस्कृति में विवाह कर रही थी तो स्वयं के परिवर्तन के लिए भी उसे तैयार रहना चाहिए था। एक बार फिर से मस्तिष्क ने मेरा साथ दिया था। उसने मेरे मन को समझाया कि किसी भी बदलाव को समय की आवश्यकता होती है, पिंकी भी समय के साथ, यहाँ के अनुरूप हो जाएगी। मेरे मस्तिष्क और मन का यह द्वन्द हमेशा भीतर चलता रहा है। आज, बीते दिनों को एक खुली दृष्टि से देख रहा हूँ तो सोचता हूँ कि हमारा मस्तिष्क तो हमारी सुविधा के अनुरूप ही तो हमें समझाता है। वह वही परामर्श देता है जो हमें प्रिय होता है और जैसा हम चाहते हैं। मेरे मस्तिष्क के पास यह शक्ति भी तो थी कि वह मुझे यह समझाता कि मैं अपनी पत्नी के विवाहोपरांत स्वभाव को अपने हिसाब से क्यों बदलना चाहता था ? क्या उसका हक़ नहीं था कि वह भी मुझ में कुछ परिवर्तन देखे ? कुछ दिनों के चंडीगढ़ प्रवास के दौरान जो जीवन शैली, मैं वहां देखकर आया था, उससे प्रभावित तो अवश्य ही था। मैं शायद, एक दबी सी हीन भावना से ग्रसित तो नहीं होता जा रहा था ?
वह दिन भी हमेशा की तरह, बासी रोटी सा कटा था। रोबी दा, स्वभावतः आते-जाते टकराये थे और उन्होंने वही कहा जो अक्सर कहा करते थे कि मुझ पर उनकी बहुत उम्मीदें थी कि मैं संगठन को अधिक समय दूंगा और उसे आगे बढ़ाऊंगा। वो दिलीप भी एक बार कह गया था कि उसे पंजाबी भाभीजी बहुत अच्छी लगी थी और वह अवश्य ही किसी दिन, अपनी पत्नी संग हमारे घर आएगा। उसने व्यंग्य सा करते हुए कहा था कि कार तो मुझे ही चलानी चाहिए और भाभीजी को साथ में बिठाना चाहिए क्योंकि ड्राइवर की सीट पर बैठा पति ही ज्यादा अच्छा दिखता है। मैंने सोचा कि उसे कहूं कि आज के समय में पत्नी कार चलाये या पति, कुछ फर्क नहीं पड़ता परन्तु मैं रुक गया था। मैं जानता था कि इस विषय को उसके साथ उठाया तो वह बात को राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और न जाने कौन कौन से समाज सुधारकों तक ले जायेगा।
संध्या में ऑफिस से निकला तो घर जाने का मन न हुआ था। लगा कि क्यों समय से बंधा घर पहुँच जाता हूँ। कहीं कोई दिनचर्या में नवीनता नहीं है। पैदल चलते हुए, डलहौजी बस स्टैंड की ओर बढ़ गया था। मेरे घर की ओर जाने वाली मिनी बस खड़ी थी। मैं उसमें न चढ़ा और उसकी साथ वाली बस में जा बैठा था। यह बस इन्द्राणी के घर की ओर जाती थी। अपने को सामान्य करते हुए मैंने सोचा कि अपनी पिशी यानि बुआ के घर कुछ समय बिताकर जाऊंगा। इन्द्राणी ने दरवाजा खोला तो मेरी बगल में झाँकने लगी थी। ' अरे ! इस समय और वो भी अकेले..' मैंने कहा कि ऑफिस से निकला तो ऐसे ही मन बन गया कि पिशी से मिलता जाऊँ। मेरी बात पर उसने कहा, ' ये तुम दूसरी बार अकेले आये हो, अबकी बार मनप्रीत को साथ लेकर न आये तो घर में प्रवेश न मिलेगा ' मैंने कहा, ' उसे लेकर ही आता परन्तु आज तो सीधे ऑफिस से ही आ गया क्यों कि मनप्रीत को इन दिनों ऑफिस से घर लौटने में देर हो जाती है.. मुझे पहले घर पहुँच उसका इंतज़ार करना पड़ता है, आज सोचा उसके समय के साथ ही घर पहुंचा जाये..चलो, चाय पिलाओ... पिशी के घर की चाय की बात ही कुछ और है...' मेरे पास कुछ कहने को नहीं था, इसलिए मैंने चाय की बात उठायी थी परन्तु, इन्द्राणी ने यह सुन, मुँह बनाया और इठलाते हुए कहा, ' तुम जानते हो इस घर में चाय मैं ही बनाती हूँ... कभी यह भी कह दिया करो कि इन्द्राणी की चाय की बात ही कुछ और है...मेरी भी तारीफ किया करो...जैसे मैं तुम्हें हीरो और उत्तम कुमार कहती रहती हूँ...' ( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर... )
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