Chander Dhingra's Blog

Wednesday, March 10, 2021

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -62

टू स्टेट्स - एक नई कहानी  ( Two States - A New Story ) -II- चन्दर धींगरा  /  Chander Dhingra                                             http://chander1949.blogspot.com/?m=1  ( ६२ )  ऑफिस से मैंने पिंकी को फ़ोन लगाया, ' तुम्हारी कार ठीक करवा दी है.. पंचर ही था... '  उसने तुरंत कहा, '  हो ही नहीं सकता... उन गुंडों ने रात में हवा निकाली होगी... ' मैंने जोर देते हुए कहा, अरे नहीं...एक आदमी भेजा था...वह चक्का खोलकर ले गया था और ठीक करवाकर लाया था और उसने फिक्स भी कर दिया था... सौ रुपये भी लगे और मुझे ऑफिस पहुँचने में देर भी हो गयी...' मैंने उसे यह न बताया कि वह आदमी और कोई नहीं वही बस्ती का शांतु था। मैंने उसे इस काम के लिए बक्शीश भी दी थी। वह मेरी बात से असंतुष्ट लगी। उसने कहा, ' वह आदमी व्हील में हवा भर कर ले आया होगा और तुमसे बेकार में पैसे वसूल कर गया होगा... आई एम श्योर...' मैंने कहा कि वह बेफिजूल शक कर रही थी और कार में पंचर तो कभी भी हो सकता था। उसने कहा कि चलो जो हुआ सो हुआ अब आगे से न हो। मैंने उफ्फ कहते हुए कहा, 'पंचर तो कभी भी हो सकता है ... गाड़ी है, कभी कभी समस्या तो देगी ही.. चलो शाम को मिलते हैं... समय से आ जाना...' उसने कहा, ' देखती हूँ परन्तु आज भी काम कुछ अधिक ही है ...' मैंने कहा, ' ये तुम्हारा काम तो बढ़ता ही जा रहा है, यूँ ही बढ़चढ़ कर काम दिखाती रहोगी तो प्रेशर बढ़ता ही जायेगा...आज कह देना की घर में कुछ काम है और निकल आना... ऐसा करना ही पड़ता है... अधिक सच्चाई और कर्तव्यनिष्ठा अच्छी नहीं होती...'  मैं समझ पा रहा था कि उस ओर वह मेरी बात पर मुस्कुरा रही थी।  उस दिन रोबी दा ने संदेश भिजवाया कि लंच के बाद हम लोगों को कहीं जाना था। मैं तो अपना काम निपटाने में जुटा हुआ था। परन्तु रोबी दा ने फोन पर बताया कि मेरा उनके साथ जाना आवश्यक था और उन्होंने मेरे अधिकारी से इस सम्बन्ध में बात कर ली थी और मुझे चिंता की आवश्यकता न थी। उन्होंने बताया कि बैठक का स्थल मेरे घर के समीप ही था और बैठक के बाद मैं सीधे घर लौट सकता था। मुझे भी यह बात ठीक लगी और मैंने उन्हें हाँ कह दिया । लंच के कुछ समय बाद ही हम लोग ऑफिस से निकल आये थे। कार में उन्होंने एक बार फिर से कहा, 'चलो, आज घर जल्दी पहुँच जाओगे और अपनी पत्नी के साथ शाम बिता पाओगे..' मैंने उन्हें पिंकी के व्यस्त दिनचर्या के बारे में बताया। मैंने कहा कि उसका ऑफिस से लौटना पूरी तरह अनिश्चित होता जा रहा था। उन्होंने कहा कि मुझे अपनी पत्नी को समझाना चाहिए कि ऑफिस के काम में अधिक उलझते नहीं जाना चाहिए। मैंने कहा, ' मैं तो उसे समझाने की कोशिश करता रहता हूँ परन्तु वह थोड़ी जिद्दी है और अपने दायित्व को अधिक महत्व देती है...' उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी पंजाब की थी और उसे यहाँ के हिसाब से समायोजित होने में समय तो लगेगा ही। मैंने कहा, ' हाँ वह तो ठीक है परन्तु रोबी दा, कितना समय लगेगा... आप तो दुनियादारी समझते हैं...' रोबी दा हँस पड़े थे। उन्होंने  कहा कि अंतर्जातीय विवाह किया है तो मुझे बहुत कुछ सहना भी होगा। मैं रोबी दा से हमेशा से प्रभावित रहा हूँ। उनकी इस बात ने मुझे चिंता में डाल दिया था। मैं खुद में उलझने लगा था। रोबी दा की यह बैठक भी किसी राजनीतिक दल की बैठक जैसी थी। मैं खामोश सा उनके साथ बैठा रहा था, वहाँ क्या चर्चा हो रही थी, उससे अनभिज्ञ। मेरे मन को रोबी दा के शब्द रोंध रहे थे कि अंतर्जातीय विवाह किया है तो बहुत कुछ सहना भी पड़ेगा। घर पहुँच, किसी बेचारा सा, बिस्तर पर पड़ा रहा था। कई तरह के विचार आ रहे थे। क्या मैं इसी नौकरी में रहते, धीरे-धीरे सड़ तो न जाऊंगा ? क्या मुझे अपनी शिक्षा स्तर के बारे में न सोचना चाहिए ? पिंकी तो अपने कर्म क्षेत्र में अच्छा कर रही है ? उसने अपना मित्र-वर्ग भी बढ़ा लिया है। न जाने कौन कौन सी शंकाएं मेरे भीतर, सागर की लहरों की तरह उठ उठ कर आ रही थी और अनजाने तट से टकरा रही थी, फिर से अधिक प्रबल प्रवाह से लौट आने के लिए। मुझे लगता, बैंगलोर, मुंबई या किसी अन्य शहर में जाना चाहिए जहाँ कर्म क्षेत्र के विभिन्न आयाम हैं। दूसरे ही पल लगता कि मुझे रोबी दा के साथ पूरी तरह से जुड़ जाना चाहिए और संगठन और यूनियन के प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। एक बार यह भी लगा कि मेरा छोटा सा घर संसार हो, पिंकी सरल गृहणी की तरह इसे संभाले, मैं शाम को लौटूँ तो वह मुझे प्रतीक्षारत मिले। एक विचार यह भी आया कि अर्थ शास्त्र में आगे शिक्षा लूँ और विदेश में जाकर इस विषय पर कुछ कर दिखाऊँ। मैं मानसिक रूप से अस्तव्यस्त हो रहा था कि पिंकी का फोन आया। उसने सूचना दी कि उसे घर लौटने में विलम्ब होगा। मैंने खुद को हताश महसूस किया और नीचे जाकर, हमेशा की तरह,ऐसी  मनस्थिति में सामने की दुकान से सिगरेट सुलगाकर, बिना कुछ सोचे, दिशाहीन सा, आगे की ओर बढ़ने लगा। दो नाम मुझे मानों अपनी और आकर्षित कर रहे थे। मेरा मित्र सुब्रत और इन्द्राणी। उस दिन मैं, सुब्रत के घर की ओर बढ़ गया था।  सुब्रत पुराना साथी था। हम दोनों अपना अपना मन एक-दूसरे के साथ साझा किया करते थे। वह घर पर ही था। उस दिन, उसने सरदार अभिजीत सिंह के सम्बोधन से मेरा स्वागत किया था। उसने कहा, ' अच्छा हुआ तुम आ गए, मैं बोर हो रहा था, पर चलो थोड़ा आस-पास का चक्कर लगाकर आते हैं... ' मैंने कहा, ' ठीक है...' जैसा हुआ करता था वैसा ही उस दिन भी हुआ था। उसने सिगरेट का पैकेट निकाला और मेरी और बढ़ाया था। मैंने ना कहा तो वह हंसने लगा, ' अरे, हमारी पंजाबी भाभी ने सिगरेट पर रोक लगा दी है क्या ? मैंने उसे बताया कि ऐसी बात नहीं थी और मैंने रास्ते में ही एक सिगरेट फूंकी थी। उसने कहा कि एक फूंकी है तो दूसरी भी फूँक लेनी चाहिए। मैंने उससे सिगरेट ली और लम्बा कश लगाया। उसने कहा, 'लगता है बीबी से कुछ गर्मागर्मी हुई है...' मैंने कहा कि उसे अपनी अटकलें नहीं लगाना चाहिए, पिंकी अपने ऑफिस से देर से आने वाली थी इसलिए समय बिताने के लिए उसके पास आ गया था। हम लोग आगे बढ़ते जा रहे थे। सुब्रत लगभग एक चैन स्मोकर है। कुछ समय बाद उसने फिर मेरी ओर सिगरेट का पैकेट बढ़ा दिया था और इस बार मैंने बिना कुछ कहे सिगरेट सुलगा ली थी। सुब्रत कुछ समझने की कोशिश कर रहा था। हम एक पार्क की बैंच पर आ बैठे थे। उसने मेरा मन खंगालने की कोशिश करते हुए कहा, ' पति-पत्नी का सम्बन्ध ऐसा है कि आरम्भ में एक-दूसरे को समझने में बहुत असुविधा होती है... धीरे धीरे सब सामान्य होता जाता है या यूँ कहें कि सामान्य कर लेना होता है...' उसकी बात ने मुझे प्रोत्साहित कर दिया था और मैंने उसे कहा कि मुझे कलकत्ता से बाहर जाकर, किसी बड़ी कम्पनी में कुछ कर दिखाना चाहिए। उसका मत था कि मैं अपने माता-पिता को यहाँ छोड़कर कहीं कैसे जा सकता था। उसने यह भी कहा कि अब मेरी पत्नी का भी तो एक अच्छा-खासा जॉब है सो आर्थिक रूप से मुंबई या बैंगलोर जाना अर्थहीन होगा। साथ ही यहाँ की पारिवारिक सरलता और सहयोग बाहर न मिल पायेगा, बाहर तनावपूर्ण जीवन हो जाएगा। हम दोनों की बातें यूँ ही चल रही थी और उसके पैकेट की सिगरेटें कम होते हुए, अंतिम दो-चार ही रह गयी थीं। काफी समय बाद हम वहां से उठे तो सुब्रत ने हमारे वार्तालाप का निचोड़ निकालते हुए कहा, 'बंगाल की अपनी एक संस्कृति है... हम एक ऐसे वातावरण में बढ़े हुए हैं जहाँ से अलग हो पाना लगभग असंभव है... यहाँ का सरल जीवन है जो अनुशासन के कठोर नियम से बंधा नहीं रह सकता... हम सहज रूप से जीना चाहते हैं... सहजता हमारी जीवन पद्धति है जिसमें आलस्य है, लापरवाही है और उन्मुक्तता है... हम अल्प में संतुष्ट हैं... ऊपर उठने की होड़, प्रतिस्पर्धता तो सीखा सकती है, सहजता नहीं... तुम्हारी पत्नी इस माहौल से विपरीत सामाजिक पद्धति से आयी है, उसे भी वैसी ही कठिनाइयां स्वीकार करनी होंगी जैसी तुम्हें, यदि तुम्हें मुंबई या बैंगलोर में बसना पड़े... वैसे समय सबको परिवर्तित होना सीखा देता है...अब तुमने अंतरजातीय सम्बन्ध बनाया है तो उससे पैदा होने वाली कठिनाइयों को भी स्वीकार करना होगा.. '  मैं अपने मित्र के ज्ञान पर मुग्ध था। परन्तु वह कुछ ऐसा न कह रहा था जिसे मैं न जानता था। लगभग हर बांग्ला साहित्यक पुस्तक पढ़ने के पश्चात मुझे  कुछ ऐसा ही लगता रहा है। सुब्रत से मिलने से पहले मैं जितना उलझन में था, उससे अधिक अब मिलने के बाद था। सिगरेट का कड़वा  धुवाँ जो मेरे मुँह में चिपका हुआ था, अब दिमाग पर भारीपन बन रहा था। पिंकी मेरे धूम्रपान के खिलाफ थी। उसने मुझे इस आदत को छोड़ देने का दबाव तो कभी न दिया था परन्तु मैं उसकी इच्छा समझ सकता था और इससे दूर रहना चाहता था। आज मेरे भीतर ही भीतर एक की दोष और अपराधी भावना जाग्रत हो रही थी। उस दिन मैंने मन ही मन निश्चय किया था कि अबसे सिगरेट से दूर रहूँगा।  घर पहुँचने पर , पिंकी ने ही दरवाजा खोला था। उसने मेरे प्रवेश करते ही कहा, ' खूब सिगरेट पी कर आये हो.. तुम जानते हो ये अच्छी चीज़ नहीं है... ' माँ और बाबा सामने ही बैठे हुए थे। उन दोनों को विदित था कि मैं कभी कभी सिगरेट पी लेता था। वे चुप थे। पिंकी ने कहा, ' मुझे ये गन्दी आदत एकदम पसंद नहीं है...' अब माँ ने कहा, ' इसे आदत नहीं है... बस कभी कभी-कभार दोस्तों के साथ...'  पिंकी ने कहा, ' नहीं, कभी भी नहीं ... मेरा हस्बैंड कभी भी सिगरेट नहीं पीयेगा...' मैं समझ पा रहा था कि वह गुस्से में थी इसलिए उसकी आवाज़ में आदेश का स्वर था। मैंने कहा कि छोड़ो, कभी कभार दोस्त मिल जाये तो हो जाती है। उसे न जाने उस दिन क्या हो गया था। उसने कहा, ' ऑफिस में भी दो लोग हैं जो बिना सिगरेट के नहीं रह पाते और यहाँ घर पर भी पतिदेव हैं जो दोस्तों के नाम पर सिगरेट का धुँवा उड़ाते हैं.. ' मैंने उसे फिर से कहा कि यह कोई बहुत बड़ी बात न थी परन्तु उसने कहा, ' यह बहुत बड़ी बात है... मेरे साथ यह आदत न चलेगी...' अब मैं भी झुंझला गया था। मैं दिन भर से एक तरह के तनाव में था। मैंने भी कहा, ' ये तुम्हारा पंजाब नहीं है... जो हर काम वहाँ जैसा हो... यहाँ सिगरेट सामान्य चीज है, उसे इशू नहीं बनाया जाता...'  यह कह ऊपर कमरे में, बिस्तर पर आ गिरा था। मैं सोच रहा था कि एक तरह का दबाव मुझ पर आ रहा था। शायद पिंकी का सिगरेट विरोध नहीं बल्कि उसका खुला व्यक्तित्व था जो मेरे लिए तनाव का कारण बनता जा रहा था। ( आज बस, गुरुवार को आगे, यहीं पर...) 

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