Chander Dhingra's Blog
Wednesday, March 31, 2021
टू स्टेट्स - एक नई कहानी ( Two States - A New Story ) - 65
टू स्टेट्स - एक नई कहानी
( Two States - A New Story )
-II-
चन्दर धींगरा / Chander Dhingra
http://chander1949.blogspot.com/?m=1
( ६५ ) इन्द्राणी चाय बनाकर लायी और मुझे एक कप पकड़ते पकड़ाते हुए बोली, ' चलो, छत पर चलते हैं, वहां खुली हवा में बैठकर चाय का आनंद लेंगे...' हम छत पर आ गए। मौसम बहुत ही सुहाना था। मंद हवा चल रही थी। दूर की गगनचुम्बी इमारतों में चमक रही लाइट्स मानों प्रदूषण से छिप गए सितारों की पूर्ति कर रहीं थीं। पिशी के घर की छत पर एक बेंच न जाने कब से रखी हुई है। मैं तो बचपन से ही इसे देखता आ रहा हूँ। मुझे इस बेंच की दाहिनी ओर हल्की सी निकली हुई कील का पता है। दो बार वह मुझे चुभ चुकी है। आज मैंने बेंच की उस जगह पर हाथ फेरा तो पाया कि सतह एकदम सामान्य थी। मैंने इन्द्राणी की ओर देखा तो वह समझ गयी। उसने कहा कि अनजाने में वह कील उसे भी कई बार परेशान कर चुकी थी और उसने उसे हथोड़े से ठीक कर दिया था। मैं सोचने लगा कि कैसे ये छोटी छोटी बातें हमारे स्मृति-संसार में हमेशा के लिए घर बना लेती हैं। पिशी के घर की छत, लकड़ी की पुरानी बेंच और उभरी कील मेरे स्मृति-पटल पर सदैव बनी रहेंगी।
इन्द्राणी छत की मुंडेर पर एक ओर जा खड़ी हुई थी। उसने काले रंग की तांत वाली बंगाली साड़ी पहनी हुई थी। उसके लंबे-घने बाल हवा में उड़ रहे थे। वह एक पल चाय के कप को संभालती और दूसरे पल उसे एक ओर रख, अपने बालों को पीछे की ओर करती। दूर क्षितिज पर काली घटा उमड़ कर आ रही थी। इन्द्राणी की साड़ी का पल्लू, उसके बिखरे-उड़ते घने बाल, आकाश में छायी काली घटा के साथ ऐसे समरूप हो रहे थे मानों दो दृश्य न होकर, एक ही कैनवास हो। उस क्षण अचानक मुझे इन्द्राणी में प्रसिद्ध बंगाली अभिनेत्री का अक्स दिखाई दिया था। मैंने कहा, ' कभी कभी तुम में सुचित्रा सेन दिखती है...' उसने मुझे चौकतें हुए देखा, ' अच्छा, मेरा मज़ाक उड़ाने का कोई और तरीका नहीं मिला, कहाँ वह, कहाँ मैं ? मैंने कहा कि ऐसी बात न थी और मैं सच में अपने मन की बात कह रहा था। उसने फिर से मुझे देखा और मेरे मन की सत्यता को भाँपने का प्रयास किया। उसने कहा, ' तुम्हें सुन्दर और आकर्षक पत्नी मिली है... मैं तो मनप्रीत के सामने भी खुद को हीन समझती हूँ... और तुम मेरी तुलना सुचित्रा से कर रहे हो, वाह ! भाई हो तो तुम्हारे जैसा, वैसे कहीं तुम यह तो नहीं चाहते कि मैं कहूं कि तुम में मुझे उत्तम कुमार की झलक दिखती है ? खैर छोड़ो ये बातें, बताओ, हमारी मनप्रीत के क्या हालचाल हैं... उसे साथ लेकर आते तो बहुत अच्छा लगता...' इस पर मैंने कुछ न कहा था। इन्द्राणी ने ही बातों का सिलसिला जारी रखते हुए कहा, ' मनप्रीत बहुत समझदार लड़की है... वह साहसी और विनम्र भी है... देखो कैसे वह अपना सब कुछ एक ओर छोड़ कर यहाँ बंगाल के अपरिचित समाज में आ गई है... उसे खुद को यहाँ समायोजित करने में असुविधा तो अवश्य हो रही होगी ? मैंने कहा, ' हां वह बहुत साहसी तो है परन्तु यहाँ उसे खुद को एडजस्ट करने में अधिक असुविधा नहीं हुई है... उसे अच्छा जॉब मिल गया है... वह हमारा रविंद्र संगीत भी सीख रही है... बंगाली समाज सरलता से सबको अपने साथ समेट लेता है... ' इन्द्राणी ने कहा, ' यह सब तो ठीक है परन्तु देखा जाये तो वह भी एक तरह की लाभार्थी है... उसे भी तो एक नामी परिवार की ससुराल मिली है... अच्छे सास-ससुर हैं और सी ए में नेशनल टॉपर लिस्ट वाला हैंडसम पति... किसी भी पंजाबी लड़की के लिए तो यह एक सपने जैसा ही होगा... ' हम दोनों काफी समय तक छत पर बैठे, बहुत कुछ बतियाते रहे थे। फिल्मों की बातें, बचपन की बातें, उन दिनों की कम्युनिस्ट लहर की राजनैतिक बातें और भी बहुत कुछ। वर्षा की बूंदे, हवा के साथ उड़ने-बिखरने लगी थीं। मैंने कहा कि हमें घर के भीतर आ जाना चाहिए परन्तु भीगना अच्छा भी लग रहा था। हम वहीं बैठे रहे। बाद में पिशी ने आवाज देकर बुलाया तो हम नीचे आये। फिर से चाय का दौर चला। वर्षा थम चुकी थी पर मौसम में नमी थी। मैं घर पहुंचा तो पिंकी को प्रतीक्षा करते पाया। उसने हैरान होते हुए कहा, ' क्या बात हुई, आज लेट हो गए ... सब ठीक है न, आप तो समय से आ जाते हो ? मैंने कहा, ' बस, ऐसे ही लेट हो गया... ऑफिस से निकलने में ही देर हो गयी थी... काम का प्रेशर कभी कभी हम बैंक वालों पर भी हो जाता है... ' वह हँसने लगी। उसने बिशाखा की ओर देखते हुए कहा, ' आज बाउदी जल्दी आ गयी तो दादा लेट हो गए... चलो गर्मागर्म अदरक वाली चाय पीते हैं... ' मैंने कहा, ' चाय नहीं, भूख लगी है, सीधे खाना ही कहते हैं... ' फिर सामान्य होते हुए मैंने बिशाखा से पूछा, ' आज क्या बना है ?
माँ भी सामने आ गयी थी। उन्होंने कहा कि भूख तो उन्हें भी लगी थी। बिशाखा खाना परोसने में जुट गयी थी। टेबल पर माँ ने पिंकी से पूछा, ' तुम्हारा म्यूजिक का क्लास कैसा चल रहा है, मनप्रीत ? उसने कहा कि ठीक ही था, ' सप्ताह में दो दिन, वो भी केवल एक घंटा... जितना हो सकता है, हो रहा है ... वैसे मैंने एक रविंद्र गीत परफेक्ट कर लिया है... अर्थ नहीं मालूम परन्तु मैं गा सकती हूँ... टीचर कह रही थी कि मेरी पकड़ अच्छी है... ' माँ ने बताया कि क्लब में दो सप्ताह बाद एक संगीत का कार्यक्रम होने जा रहा था और यदि पिंकी कुछ तैयार कर ले तो वह उसके लिए एक गीत गाने की सिफारिश क्लब सेक्रेटरी से कर सकती थी। पिंकी ख़ुशी से चहकने लग गयी थी। मैंने कहा, ' अभी नहीं... अभी ट्रेनिंग पर फोकस करो... बाद में स्टेज पर उतरने की सोचना... ' माँ ने कहा कि ऐसी स्टेज की कोई बात न थी। क्लब का छोटा सा इन-हाउस कार्यक्रम था और मनप्रीत यदि बंगाली रविंद्र संगीत सुनाती है तो सब को अच्छा ही लगेगा। माँ भी उत्साहित थी, ' पंजाबी लड़की और रविंद्र संगीत..अच्छा जमेगा... थोड़ी बहुत त्रुटि हो भी तो भी लोग एन्जॉय करेंगे... ' माँ के तर्क के सामने मैं क्या कहता, चुप हो गया था। पिंकी तो माँ की बात से जोश में आ गयी थी। उसने कहा, ' मम्मी जी मेरा नाम दे दो... दो सप्ताह का समय है न, तब तक एक दम पक्का कर लूंगी... दो सप्ताह में कुछ एक्स्ट्रा क्लास भी कर लूंगी... '
वही हुआ जो पिंकी कह रही थी। अगले दो सप्ताह मानों उसने रविंद्र संगीत के नाम कर दिए थे। वह सुबह कुछ जल्दी जॉगिंग पर गयी और वहीं से संगीत की क्लास में। वह घर पर भी यही संगीत सुनती रही थी। मुझसे भी उसने प्रैक्टिस करवाने का अनुरोध किया था। उसे सिखाना मुझे अच्छा लग रहा था और मैं उसके उत्साह को देख प्रभावित था। कार्यक्रम में दो दिन ही रह गए थे। माँ ने उससे पूछा, ' क्यों मनप्रीत, तैयार हो न, रविवार को तुम्हें गाना है ? पिंकी ने बच्चों की तरह कहा, ' बिल्कुल मम्मी जी, आपका नाम ऊँचा करना है...' माँ ने कहा, ' तो फिर कुछ सुनाओ... ' हम सभी वहीं माँ के पलंग पर बैठ गए थे। पिंकी ने बिना किसी झिझक के एक गीत सुनाया था। गीत समाप्त होने पर माँ ने उसे अपने आलिंगन में भर लिया था। माँ ने कहा, ' अब मुझे चिंता नहीं है...'
रविवार को हम सभी क्लब गए थे। उस दिन वहां काफी रौनक थी। क्लब के विशाल खुले प्रांगण में स्टेज बनाया गया था। चारों ओर हरियाली छायी हुई थी।लोग सामने रखी कुर्सियों पर बैठते जा रहे थे। ये समाज में परिचित और रसूखदार चेहरे थे। कहा जाता है कि कलकत्ता के विशिष्ट और कुलीन बंगाली वर्ग को देखना हो तो इस क्लब में आना चाहिए। पिंकी बंगाली तांत की पीली साड़ी में अति सुन्दर दिख रही थी। उसे देख कोई भी कह नहीं सकता था कि वह एक पंजाबी लड़की है। बांग्ला टीवी की वह समाचार वाचिका देबजानी भी वहां थी। पिंकी को देख वह पास आयी और उसने पिंकी को अपनी बाँहों में ले लिया, ' अरे, मनप्रीत तुम तो पूरी बंगाली हो गयी हो... कितनी सुन्दर दिख रही हो, इस साड़ी में...' पिंकी मुस्कुरा दी और उसे बताया कि वह भी वहां एक-दो गीत सुनाने वाली थी। उस टीवी समाचार वाचिका ने आश्चर्य दिखाते हुए, ' अच्छा, पंजाबी गाना ? पिंकी ने कहा , ' नहीं जी, आपका रविंद्र संगीत... कुछ भूल-चूक हो जाये तो बुरा मत मानना... पहला प्रयास है... '
जब पिंकी को स्टेज पर आमंत्रित किया गया तो परिचय में कहा गया कि चंडीगढ़ की पंजाबी लड़की जिसने अपने लिए बंगाली वर चुना था और जिसकी सासू माँ राज्य के महिला आयोग की अध्यक्षा हैं और जिन्होंने अपने अथक प्रयास से, पंजाबी बहू में रविंद्र संगीत के प्रति रूचि जाग्रत की है। उन्होंने इस अभूतपूर्व संगीत विधा में ट्रेनिंग दी है और मंच पर आने के लिए प्रेरित किया है। उद्घोषणा पर खूब तालियां बजी और जब पिंकी ने अपना गाना समाप्त किया तो और भी अधिक और देर तक तालियाँ बजती रही। कार्यक्रम समाप्ति पर जब हम अपनी कार की और बढ़ रहे थे तो वह टीवी वाली देबजानी दौड़ती हुई आयी। उसने गर्मजोशी से पिंकी से हाथ मिलाते हुए कहा, ' बहुत-बहुत बधाई... बहुत अच्छा गया... तुम्हारी कलकत्ता वाली मम्मी जी ने बहुत अच्छी ट्रेनिंग दी है... अब तो तुम्हें टीवी पर आना होगा...' फिर उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, ' कल हम एक नए शो की रुपरेखा के लिए मीटिंग रहे हैं... आप प्लीज मनप्रीत को लेकर मेरे स्टूडियो में रात आठ बजे आ जाना... मैनें उसके लिए कुछ सोचा है...' उसने पर्स से एक कार्ड निकाल, मुझे पकड़ाया और पक्का करते हुए कहा, ' आपके घर के पास ही है...जरूर आना... आपकी पत्नी के लिए यह एक सुअवसर है... '
( आज बस, आगे गुरुवार को, यहीं पर...)
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